रीढ़ की हड्डी
लेखक: जगदीशचंद्र माथुर — एकांकी (1939); विवाह, स्त्री-शिक्षा और रूढ़ियों पर करारा व्यंग्य।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Hindi • Book: Ganga • गद्य खंड
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
रीढ़ की हड्डी — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Ganga (BSEB, कक्षा 9) | अध्याय 6 | लेखक: जगदीशचंद्र माथुर | विधा: एकांकी (1939) | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): बैठक में बातचीत करता परिवार — एकांकी के वातावरण का सामान्य चित्र।

बैठक का कमरा, कुर्सियाँ और चाय के कप — पारिवारिक बातचीत का दृश्य।
एकांकी का सार
पात्र-परिचय: उमा (लड़की), रामस्वरूप (बाबू, लड़की के पिता), प्रेमा (लड़की की माँ), शंकर (लड़का), गोपालप्रसाद (लड़के के पिता), रतन (रामस्वरूप का घरेलू सहायक)। एकांकी की रचना 1939 में की गई — उस समय भारतीय समाज में शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों को समान अवसर नहीं मिलते थे।
मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। बाबू रामस्वरूप और रतन तख़्त बिछा रहे हैं — लड़के वाले आने वाले हैं। दरी, चादर, हारमोनियम और सितार का प्रबंध होता है। प्रेमा परेशान हैं — उनकी लाडली बेटी उमा मुँह फुलाए पड़ी है। प्रेमा की समझ में "पढ़ाई-लिखाई के जंजाल" आते नहीं — "अपना ज़माना अच्छा था; 'आ-ई' पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो 'स्त्री-सुबोधिनी' पढ़ ली। सच पूछो तो 'स्त्री-सुबोधिनी' में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं — ऐसी बातें कि क्या तुम्हारी बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई में होंगी।" रामस्वरूप ठठोली करते हैं — ग्रामोफ़ोन दो तरह का होता है: एक आदमी का बनाया हुआ, जिसे जब चाहे रोक लो; दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ, जिसका रिकॉर्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं।
गोपालप्रसाद और शंकर आते हैं। उमा से पूछताछ होती है। उमा स्पष्ट कहती है — "जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।" उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ प्राप्त करना या नौकरी पाना नहीं, आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना है। एकांकी का चरम क्षण अंत में आता है, जब उमा करारा जवाब देती है — "घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं।" यहाँ 'रीढ़ की हड्डी' शरीर का अंग नहीं, आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है — और शंकर की छवि इसके विपरीत उभरती है: नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता।
एकांकी का व्यंग्य समाज की अनुचित मान्यताओं पर है — विवाह के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़कियों की माँग, विवाह में लेन-देन, और दिखावा। बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं — उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा, यही अंतर्द्वंद्व है। गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में समानता यही है कि दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं। संवाद-शैली स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण है — इसीलिए एकांकी आज भी सजीव लगती है।
लेखक के बारे में
जगदीशचंद्र माथुर (1917–1978) का जन्म शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। वे इंडियन सिविल सर्विस में थे। उन्होंने एकांकी और नाटक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया; 'रीढ़ की हड्डी' उनकी सबसे प्रसिद्ध एकांकी है।
मुख्य शब्द
- एकांकी — एक अंक का नाटक; इसमें भी एक कहानी होती है, लेकिन रूपरेखा कहानी से थोड़ी अलग होती है — पात्र, परिवेश, रंग-निर्देश, संवाद, समस्या, मुख्य विचार और समाधान।
- रंग-निर्देश / मंच-निर्देश — नाटक की शुरुआत में दिया गया निर्देश जो स्थान, परिवेश और सामाजिक स्थिति बताता है; जैसे — "मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा।"
- संवाद-निर्देश — पात्र के बोलने के ढंग, हाव-भाव या क्रिया के बारे में कोष्ठक में दिया गया निर्देश।
- रीढ़ की हड्डी (प्रतीक) — आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता; जिसके पास यह नहीं, वह दबाव के आगे झुक जाता है।
- व्यंग्य — मज़ाक, हास्य या कटाक्ष के माध्यम से किसी दोष, कुरीति, अन्याय या पाखंड को प्रकट करना।
याद रखें
- एकांकी की रचना 1939 में हुई; पात्र: उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद, रतन।
- उमा कॉलेज में पढ़ी है, उसने बी.ए. पास किया है; शिक्षा का सही अर्थ = आत्मबल और स्वतंत्र विचार।
- प्रेमा की सोच: "पढ़ाई-लिखाई के जंजाल"; 'स्त्री-सुबोधिनी' वाली पुरानी सोच।
- रामस्वरूप: आधुनिकता का दिखावा, विचार रूढ़िवादी — अंतर्द्वंद्व।
- अंतिम वाक्य: "घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं।"
- व्यंग्य: विवाह में कम पढ़ी-लिखी लड़की की माँग, लेन-देन, दिखावा; संवाद-शैली स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: 'रीढ़ की हड्डी' को शरीर का अंग समझकर उत्तर लिख देना। शीर्षक प्रतीक है — आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता। और शंकर की छवि "चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता" नहीं, "नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता" है — विकल्पों में यही अंतर परखा जाता है।
तालिका: पात्र और उनकी सोच
| पात्र | सोच / भूमिका |
|---|---|
| उमा | पढ़ी-लिखी, सशक्त महिला; शिक्षा = आत्मबल और स्वतंत्र विचार |
| रामस्वरूप | आधुनिकता का दिखावा, विचार रूढ़िवादी; अंतर्द्वंद्व का पात्र |
| प्रेमा | पुरानी सोच — पढ़ाई-लिखाई जंजाल, 'स्त्री-सुबोधिनी' का ज़माना अच्छा था |
| गोपालप्रसाद | लड़के के पिता; दिखावे और परंपरा के शिकार, रामस्वरूप से समानता |
| शंकर | लड़का; रीढ़ की हड्डी (नैतिक साहस) की कमी का प्रतीक |
| रतन | घरेलू सहायक; हास्य और स्वाभाविक संवाद का स्रोत |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' का शीर्षक किसका प्रतीक है?
संकेत: आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता के बारे में सोचो। - 'रीढ़ की हड्डी' एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?
संकेत: समाज की अनुचित मान्यताओं के बारे में सोचो। - "घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं" — यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?
संकेत: नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता के बारे में सोचो। - "जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।" — उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ क्या है?
संकेत: आत्मबल और स्वतंत्र विचार के बारे में सोचो। - गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?
संकेत: दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं — इस बारे में सोचो।
प्रश्न और उत्तर
- बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।
रामस्वरूप बेटी को पढ़ाते-लिखाते हैं और लड़के वालों के सामने आधुनिक घर का दिखावा करते हैं — तख़्त, दरी, चादर, हारमोनियम-सितार का प्रबंध। पर भीतर से वे चाहते हैं कि उमा लड़के वालों के सामने वैसी ही दिखे जैसी परंपरा चाहती है; उमा के मुँह फुलाने पर वे घबराते हैं और प्रेमा को दोष देते हैं। दिखावा करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा — यही उनका अंतर्द्वंद्व है। - 'रीढ़ की हड्डी' का संदर्भ दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
पहला अर्थ उमा के लिए — शिक्षा से प्राप्त आत्मबल और स्वतंत्र विचार, जो उसे रूढ़ियों के सामने झुकने नहीं देते; वह रीढ़ की हड्डी वाली है। दूसरा अर्थ शंकर के लिए — उसके पास डिग्री या योग्यता हो सकती है, पर नैतिक साहस और चारित्रिक दृढ़ता नहीं; उमा का अंतिम वाक्य इसी कमी की ओर संकेत करता है। एक ही शब्द दो पात्रों को दो विपरीत छोरों पर खड़ा कर देता है। - "मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं" — प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
पता चलता है कि उस समय स्त्री-शिक्षा को बोझ और जंजाल समझा जाता था। 'आ-ई' पढ़ लेना, गिनती सीख लेना और 'स्त्री-सुबोधिनी' पढ़ लेना ही पर्याप्त माना जाता था। बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई को अनावश्यक और विवाह में बाधा समझा जाता था। विवाह के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़कियों की माँग इसी सोच का परिणाम थी। - लेखक ने 'रीढ़ की हड्डी' शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?
क्योंकि पूरी एकांकी का केंद्र यही प्रश्न है कि किसमें रीढ़ की हड्डी है — आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता किसके पास है। शीर्षक छोटा, तीखा और प्रतीकात्मक है; वह शरीर से अधिक चरित्र की ओर इशारा करता है। दूसरा शीर्षक हो सकता है — 'उमा का उत्तर' या 'शिक्षा का अर्थ' — क्योंकि एकांकी का मुख्य विचार यही है कि शिक्षा का अर्थ डिग्री नहीं, आत्मबल है। अपना शीर्षक कारण सहित लिखो। - एकांकी की पड़ताल: एकांकी के दस बिंदुओं (नाम, लेखक, पात्र, परिवेश/देश-काल, रंग-निर्देश, संवाद-निर्देश, समस्या, संवाद, मुख्य विचार, समाधान/परिणाम) में से प्रत्येक का एक-एक उदाहरण एकांकी में से ढूँढ़कर लिखिए।
नाम: 'रीढ़ की हड्डी'; लेखक: जगदीशचंद्र माथुर; पात्र: उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद, रतन; परिवेश: 1939 का भारतीय समाज, मामूली सजा कमरा; रंग-निर्देश: "मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा... तख़्त का दूसरा सिरा रतन ने पकड़ रखा है"; संवाद-निर्देश: कोष्ठक में दिए गए हाव-भाव और क्रियाएँ; समस्या: विवाह में कम पढ़ी-लिखी लड़की की माँग और लेन-देन; संवाद: स्वाभाविक, व्यंग्यपूर्ण बातचीत; मुख्य विचार: शिक्षा = आत्मबल, रीढ़ की हड्डी = आत्म-सम्मान; समाधान: उमा का करारा उत्तर — रूढ़ि के सामने झुकने से इनकार।
विस्तार — और गहराई से
- एकांकी को कक्षा में प्रस्तुत करने का समय है। अपने समूह के साथ मिलकर एकांकी के किसी एक दृश्य का चुनाव कीजिए, उसकी तैयारी कीजिए और कक्षा में उसे प्रस्तुत कीजिए।
समूह बनाइए और उचित हाव-भाव द्वारा उस दृश्य का अभिनय कीजिए — जैसे तख़्त बिछाने का दृश्य, प्रेमा-रामस्वरूप की नोक-झोंक, या उमा का अंतिम उत्तर। रंग-निर्देश के अनुसार मंच-सज्जा, प्रकाश और वस्त्रों में आवश्यक परिवर्तन करने की छूट निर्देशक के पास होती है। - आज के विवाह-विज्ञापनों और रिश्तों की बातचीत में शिक्षा की माँग कैसी है? 1939 की स्थिति से तुलना कीजिए — क्या बदला है, क्या अभी भी वैसा ही है?
आज लड़कियों की शिक्षा को महत्व दिया जाता है, पर कभी-कभी "ज़्यादा पढ़ी-लिखी" को भी समस्या माना जाता है। तुलना करके लिखो कि रूढ़ि पूरी तरह गई है या रूप बदलकर बची है। - उमा का उत्तर आज भी प्रासंगिक क्यों है?
क्योंकि आज भी योग्यता को डिग्री से और चरित्र को दिखावे से मापा जाता है। उमा का प्रश्न — "रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं" — हर युग में पूछा जा सकता है: दबाव के आगे कौन झुकता है और कौन डटा रहता है।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है
- मेरे उत्तर मेरे तर्क: छह बहुविकल्पीय प्रश्न — शीर्षक का प्रतीक, व्यंग्य का विषय, शंकर की छवि, उमा की दृष्टि में शिक्षा का अर्थ, गोपालप्रसाद-रामस्वरूप की समानताएँ, संवाद-शैली — उत्तर के साथ कारण भी बताना है।
- मेरी समझ मेरे विचार: चार चर्चा-प्रश्न — रामस्वरूप का अंतर्द्वंद्व, रीढ़ की हड्डी के दो अर्थ, प्रेमा की सोच से स्त्री-शिक्षा की स्थिति, शीर्षक का चुनाव और वैकल्पिक शीर्षक।
- एकांकी की पड़ताल: दस बिंदु — एकांकी का नाम, लेखक का नाम, पात्र, परिवेश/देश-काल, रंग-निर्देश, संवाद-निर्देश, समस्या, संवाद, मुख्य विचार, समाधान/परिणाम — प्रत्येक का एकांकी से उदाहरण।
- रंग-निर्देश: शुरुआती रंग-निर्देश द्वारा पृष्ठभूमि की रचना; मंचन के समय निर्देशक की छूट (मंच-सज्जा, प्रकाश, वस्त्र)।
- कक्षा-प्रस्तुति: किसी एक दृश्य का चुनाव, तैयारी और अभिनय।
दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें
- एकांकी (1939): उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद, रतन।
- उमा: बी.ए. पास; शिक्षा = आत्मबल और स्वतंत्र विचार।
- रीढ़ की हड्डी = आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक।
- व्यंग्य: कम पढ़ी-लिखी लड़की की माँग, लेन-देन, दिखावा; संवाद स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण।
- अंतिम वाक्य ही एकांकी का सार है — शंकर की नैतिक साहस की कमी।
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