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Bihar Board — BSEB • कक्षा 9 • हिंदी • Ganga • अध्याय 5

आखिरी चट्टान तक

लेखक: मोहन राकेश — कन्याकुमारी की यात्रा; तीन समुद्रों का संगम, विवेकानंद चट्टान और सूर्यास्त की खोज।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Hindi • Book: Ganga • गद्य खंड

यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।

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आखिरी चट्टान तक — EG के अपने शब्दों में सार

पुस्तक: Ganga (BSEB, कक्षा 9)  |  अध्याय 5  |  लेखक: मोहन राकेश  |  माध्यम: Hindi

आखिरी चट्टान तक के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): ऊँची चोटी पर पहुँचता पर्वतारोही — लक्ष्य प्राप्ति का सामान्य चित्र।

आखिरी चट्टान तक के लिए चित्र

बादलों के नीचे चोटी तक जाता पथरीला रास्ता — कठिन यात्रा का भाव।

यात्रा-वृत्तांत का सार

कन्याकुमारी — सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि। लेखक होटल के आगे बने बाथ टैंक की बाईं तरफ़, समुद्र के अंदर से उभरी स्याह चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफ़ेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी — इन तीनों के संगम-स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी, हर तरफ़ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं; बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं, जिससे उनके ऊपर चरखों की जालियाँ बन जाती थीं। लेखक देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था — "शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति।" तीनों तरफ़ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता लेखक कुछ देर भूल गया कि वह कौन है — एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में वह जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा — बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब होश आया तो देखा कि उसकी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफ़ी घिर गई है; पूरा शरीर सिहर गया। उसने फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर नज़र डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।

पश्चिमी क्षितिज में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। लेखक सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। दूर पश्चिमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नज़र आ रहा था — वह 'सैंड हिल' थी, जिसकी चर्चा वह वहाँ पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे — आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति। वे सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफ़ी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी। कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था; हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ़ बैठ गईं — उस पूरे कैनवस में एक तरफ़ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह।

सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ़ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए लेखक कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ़ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए उसने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं, पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नज़र आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया — वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो। सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर बैठ गया — ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और उसने, सिर्फ़ उसने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो। पीछे दाईं तरफ़ दूर-दूर हटकर उगे नारियलों के झुरमुट नज़र आ रहे थे; गूँजती हुई तेज़ हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं। पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक शृंखला दूर तक चली गई थी। सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया था; सुनहली किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था — रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेला गया हो। लेखक ने उस रेत पर दूर तक बने अपने पैरों के निशानों को देखा।

यह यात्रा-वृत्तांत केवल स्थान-चित्रण नहीं है — इसमें प्रकृति का सजीव रूपांकन, मानव-जीवन और समाज की झलक तथा आत्मानुभूति का गहरा समन्वय मिलता है। लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों, नवयुवकों, शिक्षा, धार्मिक परंपराओं (मंदिर, अर्घ्य) के बारे में भी बताया है; साथ ही लहरों से संघर्ष और अँधेरे में भटकने का भय जैसे रोमांच भी इसमें हैं।

लेखक के बारे में

हिंदी साहित्य के बहुमुखी रचनाकार मोहन राकेश (1925–1972) का जन्म अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, डायरी-लेखन और यात्रा-वृत्तांत — सभी विधाओं में लिखा। 'आखिरी चट्टान तक' में उनकी भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और चित्रात्मक है — दृश्य पाठक के मन में ऐसे जीवंत हो जाते हैं कि लगता है वह भी लेखक के साथ ही यात्रा कर रहा है।

मुख्य शब्द

  • यात्रा-वृत्तांत — किसी यात्रा के अनुभवों, दृश्यों और भावनाओं का सजीव वर्णन; इसमें दृश्य-वर्णन, आत्मानुभूति, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, जीवन-दर्शन, शैली और रोमांच — सबका समन्वय होता है।
  • संगम — मिलने का स्थान; कन्याकुमारी में अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम है।
  • समाधिस्थ — समाधि में लीन; विवेकानंद चट्टान पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी।
  • सैंड हिल — कन्याकुमारी में पीली रेत का ऊँचा टीला, जहाँ से लोग सूर्यास्त देखते हैं।
  • अर्घ्य — पूजा में देवता को दिया जाने वाला जल आदि; मंदिर की धार्मिक परंपरा का अंग।

याद रखें

  • कन्याकुमारी: अरब सागर + हिंद महासागर + बंगाल की खाड़ी का संगम; विवेकानंद चट्टान (समाधि-स्थल)।
  • "शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति" — सागर की व्यापकता का वर्णन।
  • लेखक कुछ देर भूल गया कि वह कौन है — आत्म-विस्मृति, विस्मय की मनःस्थिति।
  • सूर्यास्त सैंड हिल से नहीं, आगे के ऊँचे टीले से देखा — एक के बाद एक टीले पार किए; टाँगें थकीं, मन नहीं थका।
  • "सिर्फ़ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो" — प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्टि।
  • स्थानीय लोग, मंदिर, अर्घ्य, गेस्ट हाउस के बैरे की कॉफ़ी — समाज की झलक।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: सूर्यास्त को सैंड हिल से देखा हुआ लिख देना। पुस्तक के बहुविकल्पीय प्रश्न में यही जाँच है — लेखक ने मनोहारी सूर्यास्त अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से देखा, सैंड हिल से नहीं। सैंड हिल पर वह रुका, फिर आगे बढ़ा — यही उसकी मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का प्रमाण है।

तालिका: यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्व और इस पाठ में उनके उदाहरण

तत्वइस पाठ में उदाहरण
दृश्य-वर्णनसमुद्र, चट्टानें, लहरों का चित्रण, रंग, आकाश, रेत का जीवंत चित्रण
आत्मानुभूति व भावनाएँविस्मय, रोमांच, भय, आत्म-संवेदना, अपने अस्तित्व का बोध, प्रकृति से संवाद
सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यविवेकानंद चट्टान, स्थानीय लोग, नवयुवक, शिक्षा, धार्मिक परंपराएँ (मंदिर, अर्घ्य)
जीवन-दर्शन"शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति"
शैलीगत विशेषताएँसजीव, प्रवाहपूर्ण भाषा, दृश्यात्मकता
रोमांच व संघर्षलहरों से संघर्ष, अँधेरे में भटकने का भय, टीले-दर-टीले चलना

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा?
    संकेत: विवेकानंद चट्टान, अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले, पश्चिमी क्षितिज या सैंड हिल — किसमें से?
  2. "मैं कुछ देर भूल गया कि मैं मैं ही हूँ" — यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
    संकेत: विस्मित हो जाने के बारे में सोचो।
  3. "मैंने, सिर्फ़ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो" — इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है?
    संकेत: संतुष्टि के बारे में सोचो।
  4. "शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति" वाक्य में वर्णन है —
    संकेत: सागर की व्यापकता के बारे में सोचो।
  5. लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि —
    संकेत: यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ने के बारे में सोचो।

प्रश्न और उत्तर

  1. यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था, लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
    सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ़ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखना चाहता था — अधूरा दृश्य उसे संतुष्ट नहीं करता था। इसलिए वह आगे बढ़ा, और एक के बाद एक टीले पार करता गया।
  2. लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
    सैंड हिल पर आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति सूर्यास्त देख रहे थे; गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफ़ी पिला रहे थे; लोगों ने सुंदर रंगों का रेशम पहना था। मंदिर, अर्घ्य और धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ नवयुवकों और शिक्षा की झलक भी यात्रा-वृत्तांत में है — स्थान के साथ समाज भी।
  3. "अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया" — इस पंक्ति में 'प्रयत्न की सार्थकता' से क्या अभिप्राय है?
    टीले-दर-टीले चलने का प्रयत्न सफल हुआ — अंत में खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया, सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। थकी टाँगों के बावजूद मन नहीं थका था, और जब लक्ष्य मिला तो संतुष्टि हुई। प्रयत्न की सार्थकता यही है कि कठिनाई के बाद प्राप्त दृश्य और भी मूल्यवान लगता है — जैसे लेखक ने संसार की सबसे ऊँची चोटी पहली बार सर की हो।
  4. यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
    तीन समुद्रों का संगम और विवेकानंद चट्टान का समाधिस्थ-सा रूप; हिंद महासागर की ऊँची लहरों का स्याह चट्टानों से टकराना और चरखों की जालियाँ बनना; बढ़ते पानी में अपनी चट्टान का घिर जाना और कूदकर किनारे पहुँचना; रेत पर अकेले कदम घसीटते हुए टीले-दर-टीले चलना और सुनहली रेत का नया रंग — ये सब लेखक के लिए नए, विस्मयकारी अनुभव थे।
  5. यात्रा-वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिनसे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
    (1) "टाँगें थक रही थीं, पर मन थकने को तैयार नहीं था" — एक के बाद एक कई टीले पार करना। (2) बढ़ते पानी में चट्टान घिर जाने पर सिहरन के बावजूद सुरक्षित चट्टान पर कूदकर किनारे पहुँचना। दोनों में भय और थकान के बावजूद रुकने से इनकार है — यही मानसिक दृढ़ता है।

विस्तार — और गहराई से

  1. अपनी किसी यात्रा को यात्रा-वृत्तांत के छह तत्वों (दृश्य-वर्णन, आत्मानुभूति व भावनाएँ, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, जीवन-दर्शन, शैलीगत विशेषताएँ, रोमांच व संघर्ष) के माध्यम से समझाइए।
    अपनी यात्रा चुनो — कहाँ गए, क्या देखा (दृश्य), कैसा लगा (भावनाएँ), वहाँ के लोग और परंपराएँ (संस्कृति), उससे क्या सीखा (जीवन-दर्शन), कैसे लिखोगे (शैली), क्या रोमांच या कठिनाई आई (संघर्ष)। छह बिंदुओं में बाँधकर लिखो।
  2. दृश्य-वर्णन और आत्मानुभूति का संतुलन इस यात्रा-वृत्तांत की सबसे बड़ी विशेषता क्यों है?
    क्योंकि लेखक केवल दृश्य नहीं गिनाता — वह दृश्य के बीच अपने को भी देखता है ("मैं मैं हूँ यह भूल गया", "दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा")। प्रकृति का वर्णन और मन की भावनाएँ एक साथ चलते हैं, इसलिए पाठक को लगता है कि वह भी लेखक के साथ यात्रा कर रहा है। केवल स्थान-चित्रण होता तो यह पर्यटन-विवरण रह जाता।
  3. "मन थकने को तैयार न था" — अपने किसी अनुभव से इस भाव को स्पष्ट कीजिए।
    जब लक्ष्य सामने हो तो शरीर थक जाता है पर मन नहीं थकता — परीक्षा की तैयारी, खेल का अंतिम दौर, किसी कठिन काम का अंतिम चरण। अपना अनुभव लिखो और बताओ कि किस बात ने मन को थकने नहीं दिया।

पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है

दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें

  • कन्याकुमारी: तीन समुद्रों का संगम; विवेकानंद चट्टान समाधिस्थ-सी।
  • "शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति" = सागर की व्यापकता।
  • सूर्यास्त अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से देखा गया, सैंड हिल से नहीं।
  • टीले-दर-टीले चलना = मानसिक दृढ़ता; "टाँगें थकीं, मन नहीं थका।"
  • यात्रा-वृत्तांत = दृश्य + आत्मानुभूति + संस्कृति + जीवन-दर्शन + शैली + रोमांच।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।