मैं और मेरा देश
लेखक: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' — व्यक्ति और देश का अटूट संबंध; देश का सम्मान ही नागरिक का सम्मान।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Hindi • Book: Ganga • गद्य खंड
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
मैं और मेरा देश — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Ganga (BSEB, कक्षा 9) | अध्याय 7 | लेखक: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): सूर्योदय के समय खेतों और गाँव के ऊपर लहराता झंडा — देश-प्रेम का सामान्य चित्र।

स्कूल के मैदान में पेड़ लगाते बच्चे — कर्तव्य और सेवा का भाव।
निबंध का सार
लेखक अपने घर में जनमा था, पला था। अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों का ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था। अपने नगर में घूम-फिरकर, वहाँ के विशाल समाज का संपर्क पा, वहाँ के संचित ज्ञान-भंडार का उपयोग कर, उसे अपनी सेवाओं का दान दे, उसकी सेवाओं का सहारा पा — और इस तरह एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर वह खड़ा हुआ था। वह अपने नगर के लोगों का सम्मान करता था, वे भी उसका सम्मान करते थे। उसे बहुतों की अपने लिए ज़रूरत पड़ती थी; वह भी बहुतों की ज़रूरत का उनके लिए जवाब था। इस तरह वह समझ रहा था कि वह अपने में अब पूरा हो गया है, पूरा फैल गया है, पूरा मनुष्य हो गया है। उसे लगता था कि उसकी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही — जो चाहिए, वह सब उसके पास है: मेरा घर, मेरा पड़ोस, मेरा नगर और मैं। वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी पूर्ण है मेरी स्थिति!
एक दिन आनंद की इस दीवार में एक दरार पड़ गई। दरार का अर्थ है पूर्णता के भाव पर प्रहार। और तब लेखक को सोचना पड़ा कि अपने घर, अपने पड़ोस, अपने नगर की सीमाओं में ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी उसकी स्थिति एकदम हीन है — और हीन भी इतनी कि उसका कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है, एक मामूली अपराधी की तरह, और उसे यह भी अधिकार नहीं कि वह उस अपमान का बदला लेना तो दूर रहा, उसके लिए कहीं अपील या दया-प्रार्थना ही कर सके। क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई? उत्तर है — हाँ, एक भूकंप आया था, पर यह भूकंप किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, लेखक के मानस में ही उठा था। और भूकंप में कोई धरती थोड़े ही हिली थी, आकाश थोड़े ही काँपा था — एक तेजस्वी पुरुष का अनुभव ही वह भूकंप था, जिसने लेखक को हिला दिया।
वे तेजस्वी पुरुष थे स्वर्गीय पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय। अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए और जो घोर अंधकार और भयंकर बवंडरों के झकझोरों में जीवन-भर खेल, उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे, उन्हीं में एक थे लालाजी। उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं। वे उन्हीं दिनों सारे संसार में घूमे थे। उनके व्यक्तित्व के गठन में उनके परिवार, उनके पास-पड़ोस और उनके नगर ने अपने सर्वोत्तम रत्नों की ज्योति उन्हें भेंट दी थी। संसार के देशों में घूमकर वे अपने देश में लौटे, तो उन्होंने अपना सारा अनुभव एक ही वाक्य में भरकर बिखेर दिया — "मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।" क्या सचमुच यह अनुभव एक मानसिक भूकंप नहीं है, जो मनुष्य को झकझोरकर कहे कि किसी मनुष्य के पास संसार के ही नहीं, यदि स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों, पर उसका देश गुलाम हो या किसी भी दूसरे रूप में हीन हो, तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते?
इस अनुभव की छाया में लेखक सोचता है कि उसका कर्तव्य है कि उसे निजी रूप में सारे संसार का राज्य भी क्यों न मिलता हो, वह कोई ऐसा काम न करे जिससे उसके देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे, उसकी किसी भी प्रकार की शक्ति में कमी आए; साथ ही उसके एक नागरिक के रूप में उसका यह अधिकार भी है कि अपने देश के सम्मान का पूरा-पूरा भाग उसे मिले और उसकी शक्तियों से अपने सम्मान की रक्षा का, जहाँ भी वह हो, भरोसा रहे। देश और नागरिक को बाँधने वाली गाँठ यही है — देश और नागरिक, दोनों बातों को साथ बाँधने वाली गाँठ। व्यक्ति की पूर्णता उसकी निजता में ही नहीं होती, बल्कि उसके परिवार, क्षेत्र विशेष और राष्ट्र की पहचान तक से जुड़ी होती है। व्यक्ति द्वारा किया गया हर कार्य उसकी पहचान के साथ-साथ उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र से भी जुड़ा होता है। देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े होते हैं।
निबंध में आगे यह प्रश्न उठता है कि एक आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है! कोई बड़ा वैज्ञानिक हो तो वह अपने आविष्कार से ही देश को कुछ बल दे, या कोई बहुत बड़ा धनपति हो तो वह अपने धन का भामाशाह की तरह समय पर त्याग कर ही कुछ काम आ सकता है — पर हर आदमी न तो ऐसा वैज्ञानिक ही हो सकता है, न धनिक ही। फिर जो बेचारा अपनी ही दाल-रोटी की फ़िक्र में लगा हुआ हो, वह अपने देश के लिए चाहते हुए भी क्या कर सकता है? लेखक का उत्तर है कि हर एक नागरिक महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है, यदि वह देश के 'शक्तिबोध' और 'सौंदर्यबोध' को हानि न पहुँचाकर सशक्त करता है। जीवन एक युद्ध है — और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता; हर व्यक्ति का अपना योगदान होता है। लेखक ने जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव से सीखा है, वह यही है कि महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है — बड़े-से-बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है, और छोटे-से-छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।
इसी बात को दो घटनाएँ स्पष्ट करती हैं, जिनमें नागरिक और देश को एक साथ बाँधने वाली गाँठ इतनी साफ़ है कि दो बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर भी उसे इतना साफ़ नहीं देखा जा सकता। पहली: स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान गए; रेल में यात्रा करते समय उन्हें खाने को फल न मिले — उन दिनों फल ही उनका भोजन था। एक स्टेशन पर भी फल न मिले तो उनके मुँह से निकला — "जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते!" एक जापानी युवक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा था, अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था; उसने ये शब्द सुन लिए, अपनी बात बीच में छोड़कर भागा और कहीं दूर से एक टोकरी ताज़े फल लाया। स्वामी जी ने उसे फल बेचने वाला समझकर दाम पूछे, पर उसने दाम लेने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने कहा — "आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।" स्वामी जी युवक का यह उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए — उस युवक ने अपने इस कार्य से अपने देश का गौरव जाने कितना बढ़ा दिया! दूसरी घटना: एक दूसरे देश का निवासी एक युवक जापान में शिक्षा लेने आया; उसने सरकारी पुस्तकालय से लाई पुस्तक में से कुछ दुर्लभ चित्र निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया। किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया, पुलिस ने तलाशी लेकर चित्र बरामद किए और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया। मामला यहीं तक न रुका — पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता। मतलब साफ़ है — जहाँ एक युवक ने अपने काम से अपने देश का सिर ऊँचा किया था, वहीं एक युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो जाने कितने वर्षों तक संसार की आँखों में उसे लांछित करता रहा। अंत में निष्कर्ष है — "बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ तो हैं ही नहीं।"
लेखक के बारे में
हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' (1906–1995) का जन्म उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में हुआ था। उनके निबंधों में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के संबंधों पर गहरा चिंतन मिलता है।
मुख्य शब्द
- शक्तिबोध — देश की शक्ति का बोध; नागरिक का कर्तव्य है कि वह देश की शक्ति को हानि न पहुँचाकर सशक्त करे।
- सौंदर्यबोध — देश के सौंदर्य का बोध; सार्वजनिक संसाधनों, ऐतिहासिक स्थानों की स्वच्छता और सौंदर्य बनाए रखना इसी का अंग है।
- मानसिक भूकंप — मन में उठा झकझोर देने वाला अनुभव; यहाँ लाला लाजपत राय के अनुभव ने लेखक के मन में भूकंप ला दिया।
- गाँठ — देश और नागरिक को साथ बाँधने वाली गाँठ; दोनों का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ा है।
- कर्तव्य और अधिकार — कर्तव्य: देश के सम्मान को धक्का न पहुँचाना; अधिकार: देश के सम्मान का पूरा भाग पाना और अपनी रक्षा का भरोसा पाना।
याद रखें
- व्यक्ति की पूर्णता: घर → पड़ोस → नगर → देश — पहचान की सीढ़ी।
- आनंद की दीवार में दरार = पूर्णता के भाव पर प्रहार; कारण = मानसिक भूकंप।
- लाला लाजपत राय का अनुभव: "अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया... भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।"
- देश गुलाम/हीन हो तो स्वर्ग के भी उपहार गौरव नहीं दे सकते।
- कर्तव्य: देश के सम्मान को धक्का न पहुँचाना; अधिकार: देश के सम्मान का पूरा भाग और रक्षा का भरोसा।
- गाँठ: देश और नागरिक; निष्कर्ष: "मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ तो हैं ही नहीं।"
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: निबंध का भाव केवल "देश का महत्व" लिख देना। सही भाव है — व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध (दोनों का सम्मान एक-दूसरे से जुड़ा है), न कि देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षा। 'दरार' का अर्थ "पारस्परिक संबंध टूटना" या "सुख-सुविधाओं का अभाव" नहीं, "पूर्णता के भाव पर प्रहार" है।
तालिका: पहचान की सीढ़ी
| स्तर | क्या मिलता है |
|---|---|
| घर | जन्म, पालन, पहला अपनापन |
| पड़ोस | खेल, ममता-दुलार, साथ |
| नगर | विशाल समाज का संपर्क, संचित ज्ञान-भंडार, सेवाओं का आदान-प्रदान |
| देश | सम्मान और गौरव की पहचान; देश हीन हो तो व्यक्ति भी हीन महसूस करता है |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- "एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई" — इस पंक्ति में रेखांकित शब्द 'दरार' किस ओर संकेत करता है?
संकेत: पूर्णता के भाव पर प्रहार के बारे में सोचो। - निबंध में कहा गया है कि "ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है" — लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?
संकेत: बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों के बारे में सोचो। - "अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए" — इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में —
संकेत: लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना के दमन के बारे में सोचो। - निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि —
संकेत: उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो — इस बारे में सोचो। - "पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ़ है" — इस वाक्य में रेखांकित शब्द 'गाँठ' किन दो बातों को साथ बाँधती है?
संकेत: देश और नागरिक के बारे में सोचो।
प्रश्न और उत्तर
- स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
क्योंकि युवक का उत्तर साधारण लेन-देन से बहुत ऊपर था। स्वामी जी ने फल बेचने वाला समझकर दाम पूछे, तो युवक ने दाम लेने से इनकार कर दिया और बहुत आग्रह करने पर कहा — "आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।" स्वामी जी मुग्ध हुए क्योंकि युवक ने एक टोकरी फलों से अपने देश का गौरव जाने कितना बढ़ा दिया था — उसके मन में अपने देश की छवि की चिंता थी, धन की नहीं। - जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
युवक ने धन नहीं माँगा; उसने मूल्य के रूप में यही माँगा कि स्वामी जी अपने देश में जाकर किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। उसके व्यक्तित्व की छवि उभरती है — देश-प्रेमी, स्वाभिमानी, कृतज्ञ और संवेदनशील। वह अपनी बात बीच में छोड़कर दूर से ताज़े फल लाया — तत्परता भी उसकी विशेषता है। इसके विपरीत दूसरी घटना का युवक पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुराकर अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगा गया — दोनों घटनाएँ मिलकर बताती हैं कि नागरिक का कार्य ही देश का गौरव या कलंक बनता है। - "बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ तो हैं ही नहीं" — स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
तर्क: व्यक्ति की पहचान उसके घर, पड़ोस, नगर और देश से बनती है — वह जो कुछ है, वह इन्हीं से पाया हुआ है। उसका हर कार्य उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र से जुड़ता है। देश का सम्मान घटे तो नागरिक का सम्मान घटता है; नागरिक का आचरण बिगड़े तो देश की छवि बिगड़ती है। उदाहरण: विदेश में किसी भारतीय की सफलता से भारत का नाम ऊँचा होता है, और किसी की गलती से देश की छवि धूमिल होती है — इसलिए व्यक्ति और देश अलग नहीं हैं। - "देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है" — अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
भाव दोनों दिशाओं में चलता है। देश हीन हो तो नागरिक को भी हीनता का अनुभव होता है (लाजपत राय का कलंक-वाला अनुभव)। और नागरिक का आचरण भी देश को फल देता है — कोई खिलाड़ी पदक जीतता है तो देश गौरवान्वित होता है; कोई सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है तो देश की छवि खराब होती है। अपने आस-पास के उदाहरण — स्वच्छता, ईमानदारी, सेवा — से यही सिद्ध होता है। - "सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता" — इस आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं?
युद्ध में केवल लड़ने वाला ही काम नहीं करता — भोजन पहुँचाने वाला, घायलों की सेवा करने वाला, हथियार बनाने वाला, सबका योगदान होता है। उसी तरह देश की प्रगति में हर नागरिक का दायित्व है — पढ़ाई करना, ईमानदारी से काम करना, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक स्थानों की स्वच्छता और सौंदर्य बनाए रखना, नियमों का पालन करना, दूसरों की सहायता करना। दाल-रोटी की फ़िक्र वाला आदमी भी अपने छोटे-छोटे कामों से देश के शक्तिबोध और सौंदर्यबोध को सशक्त कर सकता है।
विस्तार — और गहराई से
- "मुझे बहुतों की अपने लिए ज़रूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की ज़रूरत का उनके लिए जवाब था।" — प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
सुबह से रात तक की दिनचर्या लिखो — माता-पिता, अध्यापक, मित्र, दुकानदार, सफ़ाईकर्मी — किससे क्या सहयोग लेते हो और बदले में क्या सहयोग देते हो। 'बहुतों' में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखो। - "क्या रुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?" — अपने घर/विद्यालय के आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
सौंदर्यबोध का व्यावहारिक अर्थ यही है — दीवारों पर न लिखना, कूड़ा न फैलाना, पेड़-पौधों की रक्षा करना, ऐतिहासिक स्थानों का सम्मान करना। अपने और अपने साथियों के काम लिखो। - "मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे" — देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें? अपने-अपने समूह में इसकी चर्चा कीजिए और चर्चा से उभरे बिंदुओं को प्रातःकालीन सभा में पढ़कर सुनाइए।
दो सूचियाँ बनाओ — करें: नियमों का पालन, ईमानदारी, स्वच्छता, सेवा, सत्य बोलना। न करें: सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, अफवाह फैलाना, भ्रष्टाचार में भागीदारी, देश की छवि खराब करने वाला आचरण।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है
- मेरे उत्तर मेरे तर्क: छह बहुविकल्पीय प्रश्न — दरार, आनंद वाले प्रश्न, दीन दिन, गौरव का अभाव, गाँठ, निबंध का मुख्य भाव — उत्तर के साथ कारण भी बताना है।
- मेरी समझ मेरे विचार: तीन चर्चा-प्रश्न — रामतीर्थ का मुग्ध होना, जापान के युवक की माँग और छवि, "मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ नहीं" के तर्क।
- मेरे अनुभव मेरे विचार: छह प्रश्न — देश की हीनता-गौरव का फल, बहुतों की ज़रूरत, जीवन-युद्ध के दायित्व, पड़ोस के संबंधों में परिवर्तन, रुचि-सौंदर्य की रक्षा, देश के सम्मान को धक्का न पहुँचाने के उपाय।
- ध्यान दें: इस अध्याय के साथ 'साथ-साथ पढ़ें' में निर्मल जीत सिंह सेखों का पाठ भी है — वह पूरक पाठ है; साइट पर उसका अलग अध्याय-पृष्ठ नहीं है, इसलिए यहाँ उसकी चर्चा नहीं की गई है।
दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें
- पहचान की सीढ़ी: घर → पड़ोस → नगर → देश।
- मानसिक भूकंप: लाला लाजपत राय का अनुभव — गुलामी की लज्जा का कलंक।
- कर्तव्य: देश के सम्मान को धक्का न पहुँचाना; अधिकार: सम्मान का पूरा भाग + रक्षा का भरोसा।
- गाँठ: देश और नागरिक; शक्तिबोध और सौंदर्यबोध को हानि न पहुँचाना।
- दो घटनाएँ: जापानी युवक ने फलों का मूल्य "जापान में अच्छे फल नहीं मिलते — यह न कहिएगा" माँगकर देश का सिर ऊँचा किया; पुस्तकालय से चित्र चुराने वाले युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगाया।
- महत्व कार्य की विशालता में नहीं, उसके करने की भावना में है।
- निष्कर्ष: "मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ तो हैं ही नहीं।"
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