Educational Galaxy shield logo

Educational Galaxy

LEARN • THINK • SPEAK • GROW

Class 10 • Hindi • Godhuli Bhag-2

Chapter 9: आविन्यों

फ़्रांस के आविन्यों में उन्नीस दिन — एक पुराने मठ में रचना, मौन और पत्थर की स्मृतियाँ।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

Print lets you save as PDF from the browser. This is not a textbook PDF.

आविन्यों — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10)  | गद्य खंड — अध्याय 9 | प्रकार: ललित रचना (अशोक वाजपेयी) |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

आविन्यों के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पुराने शहर की गलियों में घूमता यात्री — यात्रा-अनुभव का एक सामान्य चित्र।

आविन्यों के लिए चित्र

पुरानी इमारतों का रेखाचित्र बनाते यात्री — एक सामान्य चित्र।

इस अध्याय के बारे में

यह रचना फ़्रांस के आविन्यों शहर की यात्रा और वहाँ के प्रवास पर आधारित है। लेखक फ़्रांस सरकार के सौजन्य से ला शत्रूज़ में रहकर अपना कुछ काम करने के न्यौते पर गए थे। आविन्यों में पुराने ईसाई संतों के मठों की इमारतों को बचाकर उनका बहुत समझदारी से जीर्णोद्धार किया गया है — उनमें एक कलाकेंद्र की स्थापना की गई है, जो इन दिनों रंगमंच और लेखन से जुड़ा हुआ है।

लेखक आविन्यों में कुल उन्नीस दिन रहे — 24 अक्तूबर से 10 नवंबर 1994 की दोपहर तक। अपने साथ वे हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें और कुछ संगीत के टेप्स लेकर गए थे। सिर्फ अपने में रहने और लिखने के अलावा प्राय: कुछ और करने की कोई विवशता न होने का जीवन में यह उनका पहला अवसर था — इतने निपट एकांत में रहने का अनुभव उन्हें पहली बार मिला।

रचना में आविन्यों के प्रति लेखक का सम्मान कई रूपों में व्यक्त होता है — वहाँ की इमारतों, नदी के तट, और पत्थर की स्मृतियों के माध्यम से। नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को अपने देश और अपनी कविता की याद आती है, और वे नदी और कविता में समानता पाते हैं — दोनों बहती हैं, दोनों जीवित हैं। अंत में लेखक यह भी कहते हैं कि तटस्थ रह पाना किसके लिए संभव नहीं हो पाता — क्योंकि मनुष्य का मन किसी न किसी पक्ष से जुड़ ही जाता है।

क्या सीखना है

आविन्यों, ला शत्रूज़, लेखक के प्रवास की अवधि और सामग्री, तथा नदी-कविता की समानता को समझें।

मुख्य शब्द

  • आविन्यों — फ़्रांस का एक शहर, जहाँ लेखक उन्नीस दिन रहे।
  • ला शत्रूज़ — फ़्रांस सरकार के सौजन्य से मिला वह स्थान, जहाँ लेखक रहकर काम करने गए थे।
  • कलाकेंद्र — पुराने मठों की इमारतों में स्थापित रंगमंच और लेखन से जुड़ा केंद्र।
  • जीर्णोद्धार — पुरानी इमारतों को बचाकर उनकी समझदारी से मरम्मत।
  • मौन का स्थापत्य — चुप्पी और शांति की वास्तुकला — ला शत्रूज़ के स्थापत्य का वर्णन।
  • तटस्थता — किसी पक्ष से न जुड़ना — लेखक के अनुसार यह संभव नहीं हो पाता।

याद रखें

  • लेखक फ़्रांस सरकार के सौजन्य से ला शत्रूज़ गए थे।
  • आविन्यों में कुल उन्नीस दिन रहे — 24 अक्तूबर से 10 नवंबर 1994 तक।
  • साथ ले गए: हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें, संगीत के टेप्स।
  • पुराने मठों की इमारतों में कलाकेंद्र स्थापित किया गया है।
  • नदी और कविता में समानता: दोनों बहती हैं, दोनों जीवित हैं।
लेखक का परिचय

अशोक वाजपेयी का जन्म 16 जनवरी 1941 को हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध कवि, आलोचक और संस्कृति-चिंतक हैं। यह रचना उनकी यात्रा-आधारित ललित रचना है, जिसमें आविन्यों के प्रवास का वर्णन है।

तिथियों में भ्रम से बचें

आविन्यों में प्रवास 24 अक्तूबर से 10 नवंबर 1994 तक, कुल उन्नीस दिन का था। साथ ले गई चीज़ें: टाइपराइटर, पुस्तकें और संगीत के टेप्स — यही उत्तर में लिखें।

परीक्षा टिप

'मौन का स्थापत्य' और 'नदी और कविता में समानता' — ये दो बिंदु इस पाठ के सबसे विशिष्ट बिंदु हैं, इन्हें अवश्य लिखें।

Chart / Table: रचना के मुख्य बिंदु

विषयविवरण
स्थानआविन्यों (फ़्रांस); ला शत्रूज़
अवधि24 अक्तूबर – 10 नवंबर 1994; कुल उन्नीस दिन
साथ की चीज़ेंहिंदी टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें, संगीत के टेप्स
इमारतेंपुराने ईसाई मठों का जीर्णोद्धार; कलाकेंद्र
नदी तटलेखक को अपने देश और कविता की याद
निष्कर्षतटस्थ रह पाना संभव नहीं होता

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. आविन्यों क्या है और वह कहाँ अवस्थित है?
    संकेत: फ़्रांस के शहर से सोचें।
  2. हर बरस आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है?
    संकेत: रंगमंच और लेखन के केंद्र से सोचें।
  3. लेखक आविन्यों किस सिलसिले में गए थे? वहाँ उन्होंने क्या देखा-सुना?
    संकेत: फ़्रांस सरकार के न्यौते से सोचें।
  4. ला शत्रूज़ क्या है और वह कहाँ अवस्थित है? आजकल उसका क्या उपयोग होता है?
    संकेत: मठों की इमारतों और कलाकेंद्र से सोचें।
  5. नदी और कविता में लेखक क्या समानता पाता है?
    संकेत: बहने और जीवित होने से सोचें।

प्रश्न और उत्तर

  1. इस रचना का केंद्रीय भाव क्या है?
    केंद्रीय भाव यह है कि यात्रा केवल जगह देखना नहीं है — वह किसी स्थान की संस्कृति, इतिहास और लोगों से मिलने का अनुभव है। आविन्यों में लेखक को एकांत, रचना और पत्थर की स्मृतियों का एक नया अनुभव मिलता है।
  2. आविन्यों क्या है?
    आविन्यों फ़्रांस का एक शहर है, जहाँ पुराने ईसाई संतों के मठों की इमारतों को बचाकर उनका जीर्णोद्धार किया गया है और उनमें रंगमंच व लेखन से जुड़ा एक कलाकेंद्र स्थापित किया गया है।
  3. लेखक आविन्यों किस सिलसिले में गए थे?
    लेखक फ़्रांस सरकार के सौजन्य से ला शत्रूज़ में रहकर अपना कुछ काम करने के न्यौते पर गए थे। वहाँ वे कुल उन्नीस दिन रहे — 24 अक्तूबर से 10 नवंबर 1994 तक।
  4. लेखक आविन्यों क्या साथ लेकर गए थे?
    लेखक अपने साथ हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें और कुछ संगीत के टेप्स लेकर गए थे। सिर्फ अपने में रहने और लिखने के अलावा कुछ और करने की कोई विवशता न होने का जीवन में यह उनका पहला अवसर था।
  5. इस रचना से क्या सीख मिलती है?
    यही कि किसी स्थान को समझने के लिए वहाँ रहना, उसके मौन को सुनना और उसकी स्मृतियों से जुड़ना ज़रूरी है — और तटस्थ रह पाना मनुष्य के लिए संभव नहीं होता, क्योंकि मन किसी न किसी पक्ष से जुड़ ही जाता है।

पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)

इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 14 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।

  1. आविन्यों क्या है और वह कहाँ अवस्थित है?
    आविन्यों फ़्रांस का एक शहर है। वहाँ पुराने ईसाई संतों के मठों की इमारतों को बचाकर उनका बहुत समझदारी से जीर्णोद्धार किया गया है और उनमें एक कलाकेंद्र की स्थापना की गई है, जो रंगमंच और लेखन से जुड़ा हुआ है।
  2. हर बरस आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है?
    हर बरस आविन्यों में रंगमंच और लेखन से जुड़ा समारोह हुआ करता है — कलाकेंद्र में रंगकर्मी, संगीतकार, अभिनेता और नाटककार आते हैं और पुराने मठों के चैंबर में कुछ अवधि के लिए रहकर सारा समय अपना रचनात्मक काम करने में बिताते हैं।
  3. लेखक आविन्यों किस सिलसिले में गए थे? वहाँ उन्होंने क्या देखा-सुना?
    लेखक फ़्रांस सरकार के सौजन्य से ला शत्रूज़ में रहकर अपना कुछ काम करने के न्यौते पर गए थे। वहाँ उन्होंने पुराने मठों की जीर्णोद्धारित इमारतें, कलाकेंद्र, रंगमंच और लेखन से जुड़े लोगों का आना-जाना, और नदी के तट का शांत वातावरण देखा-सुना।
  4. ला शत्रूज़ क्या है और वह कहाँ अवस्थित है? आजकल उसका क्या उपयोग होता है?
    ला शत्रूज़ आविन्यों के पास का वह स्थान है, जहाँ पुराने ईसाई संतों के मठों की इमारतें हैं। आजकल उसका उपयोग कलाकेंद्र के रूप में होता है — वहाँ रंगकर्मी, संगीतकार, अभिनेता और नाटककार कुछ अवधि के लिए रहकर अपना रचनात्मक काम करते हैं।
  5. ला शत्रूज़ का अंतरंग विवरण अपने शब्दों में प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट कीजिए कि लेखक ने उसके स्थापत्य को 'मौन का स्थापत्य' क्यों कहा है?
    ला शत्रूज़ का अंतरंग विवरण यह है कि वहाँ पुरानी इमारतों को बचाकर उनका समझदारी से जीर्णोद्धार किया गया है — दो-दो कमरों के चैंबर, सुसज्जित फर्नीचर, आधुनिक रसोईघर और नहानघर, और पीछे आँगन। लेखक ने उसके स्थापत्य को 'मौन का स्थापत्य' इसलिए कहा है, क्योंकि वहाँ का वातावरण शांत और एकांतपूर्ण है — पत्थर की दीवारें, खामोश गलियारे और एकांत का अनुभव मौन को ही स्थापत्य बना देते हैं।
  6. लेखक आविन्यों क्या साथ लेकर गए थे और वहाँ कितने दिनों तक रहे? लेखक की उपलब्धि क्या रही?
    लेखक अपने साथ हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें और कुछ संगीत के टेप्स लेकर गए थे, और वहाँ कुल उन्नीस दिन रहे — 24 अक्तूबर से 10 नवंबर 1994 की दोपहर तक। उनकी उपलब्धि यह रही कि सिर्फ अपने में रहने और लिखने के अलावा कुछ और करने की कोई विवशता न होने का जीवन में यह उनका पहला अवसर था — इतने निपट एकांत में रहने का अनुभव उन्हें पहली बार मिला।
  7. 'प्रतीक्षा करते हैं पत्थर' शीर्षक कविता में कवि क्यों और कैसे पत्थर का मानवीकरण करता है?
    कवि पत्थर का मानवीकरण इसलिए करता है, क्योंकि पत्थर भी प्रतीक्षा करता है — जैसे मनुष्य किसी की प्रतीक्षा करता है, वैसे ही पत्थर भी समय की प्रतीक्षा में खड़ा रहता है। कवि पत्थर को एक जीवित, प्रतीक्षा करने वाले प्राणी के रूप में दिखाता है, जो सदियों से चुपचाप खड़ा है और किसी के आने की प्रतीक्षा कर रहा है।
  8. आविन्यों के प्रति लेखक कैसे अपना सम्मान प्रदर्शित करते हैं?
    लेखक आविन्यों के प्रति अपना सम्मान वहाँ की इमारतों, नदी के तट और पत्थर की स्मृतियों के प्रति अपनी संवेदनशीलता से प्रदर्शित करते हैं। वे वहाँ के मौन, एकांत और रचनात्मक वातावरण का सम्मान करते हैं और उसे अपनी रचना में सहेजते हैं।
  9. मनुष्य जीवन से पत्थर की क्या समानता और विषमता है?
    समानता यह है कि मनुष्य और पत्थर दोनों समय की प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं — दोनों में धैर्य और स्थायित्व है। विषमता यह है कि मनुष्य का जीवन छोटा और परिवर्तनशील है, जबकि पत्थर सदियों तक अपरिवर्तित खड़ा रहता है — मनुष्य चलता है, पत्थर ठहरा रहता है।
  10. इस कविता से आप क्या सीखते हैं?
    इस कविता से यह सीख मिलती है कि निर्जीव समझी जाने वाली चीज़ों में भी जीवन और प्रतीक्षा का भाव हो सकता है। पत्थर की प्रतीक्षा हमें धैर्य, स्थायित्व और समय के प्रति सम्मान सिखाती है।
  11. नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को क्या अनुभव होता है?
    नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को अपने देश, अपनी कविता और अपने जीवन की याद आती है। नदी का बहता पानी उन्हें जीवन के बहाव का अनुभव कराता है — और वे महसूस करते हैं कि नदी और कविता दोनों जीवित हैं, दोनों बहती हैं।
  12. नदी तट पर लेखक को किसकी याद आती है और क्यों?
    नदी तट पर लेखक को अपने देश और अपनी कविता की याद आती है, क्योंकि नदी का बहाव उन्हें अपने जीवन और अपनी रचना के बहाव की याद दिलाता है। दूर देश में नदी के किनारे बैठकर भी वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए महसूस करते हैं।
  13. नदी और कविता में लेखक क्या समानता पाता है?
    लेखक पाता है कि नदी और कविता दोनों बहती हैं और दोनों जीवित हैं। नदी का पानी जैसे कभी नहीं रुकता, वैसे ही कविता का प्रवाह भी कभी नहीं रुकता — दोनों में गति, जीवन और निरंतरता है।
  14. किसके पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता और क्यों?
    मनुष्य के पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता, क्योंकि मन किसी न किसी पक्ष से जुड़ ही जाता है। चाहे वह किसी स्थान से जुड़ाव हो, किसी व्यक्ति से स्नेह हो या किसी विचार से सहमति हो — मनुष्य पूरी तरह तटस्थ नहीं रह सकता, वह किसी न किसी ओर झुक ही जाता है।
सार — Recap
  • लेखक अशोक वाजपेयी; ललित रचना आविन्यों की यात्रा पर।
  • प्रवास: 24 अक्तूबर – 10 नवंबर 1994; कुल उन्नीस दिन।
  • साथ: हिंदी टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें, संगीत के टेप्स।
  • ला शत्रूज़: पुराने मठों का जीर्णोद्धार; कलाकेंद्र; 'मौन का स्थापत्य'।
  • नदी और कविता: दोनों बहती हैं, दोनों जीवित हैं।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

← Chapter 8: जित-जित मैं निरखत हूँChapter 10: मछली →