Chapter 8: जित-जित मैं निरखत हूँ
कथक के महान नर्तक बिरजू महाराज की आत्मकथा — उन्हीं की ज़ुबानी।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
जित-जित मैं निरखत हूँ — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | गद्य खंड — अध्याय 8 | प्रकार: साक्षात्कार (पं. बिरजू महाराज; साक्षात्कारकर्ता रश्मि वाजपेयी) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): गुरु के साथ अभ्यास करता कलाकार — कला-साधना का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

कला का अभ्यास करते विद्यार्थी — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह पाठ पं. बिरजू महाराज से रश्मि वाजपेयी की बातचीत है — किंचित संपादित रूप में अविकल प्रस्तुत। बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938 में, 4 फ़रवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे, वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ था। घर में वे आखिरी संतान थे — तीन बहनों के बाद। बहनों का जन्म रामपुर में हुआ था, क्योंकि बाबूजी वहाँ 22 साल रहे।
बिरजू महाराज के गुरु उनके बाबूजी ही थे — गण्डा भी उन्हीं से बँधा। जब गण्डा बँधा, तो अम्मा से कहा गया कि जब तक तुम्हारा लड़का नज़राना नहीं देगा, गण्डा नहीं बाँधूँगा — तो 500 रुपये के दो प्रोग्राम मिले, जब 500 रुपये आए तो गण्डा बँधा। बाबूजी की मृत्यु के बाद घर की हालत बहुत कठिन हो गई — पचास रुपये भी मिल जाएँ तो बहुत थे। सबसे दुखद समय वह था, जब बाबूजी की मृत्यु के बाद दसवाँ और तेरहवीं करने के लिए भी पैसा नहीं था — दस दिन के अंदर दो प्रोग्राम करके 500 रुपये इकट्ठे किए गए, और उन्हीं से दसवाँ-तेरहवीं का इंतज़ाम हुआ।
नृत्य की शिक्षा के लिए बिरजू महाराज पहले-पहल हिंदुस्तानी डांस म्यूज़िक (बाद में संगीत भारती) से जुड़े — वहाँ कपिला जी, लीला कृपलानी आदि के संपर्क में आए। कलकत्ते में उन्हें पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला — उसमें शंभू महाराज चाचाजी और बाबूजी दोनों गए थे, पर प्रथम पुरस्कार बिरजू महाराज को मिला। संगीत भारती में उनकी दिनचर्या थी — सुबह 4 बजे उठना, साढ़े 4 बजे चाय, सुबह 5 बजे से रियाज़, 5 से 8 तक रियाज़, फिर घर जाकर एक घंटे में तैयार होकर वापस 9 बजे दो घंटे की क्लास। बिरजू महाराज कई वाद्य बजाते थे — तबला शुरू से, हारमोनियम थोड़ा-बहुत, सितार, गिटार, बाँसुरी, सरोद — और लहरा बजाने के लायक भी। विवाह के बारे में वे बताते हैं कि अठारह साल की उम्र में उनकी शादी अम्माजी ने कर दी थी — बहुत बड़ी गलती की, क्योंकि वे सोच रहे थे कि पहले काम कर लें, फिर शादी करें। शागिर्दों के बारे में उनकी राय है कि अब कला के होने वाले बहुत कम लोग बचे हैं — शाश्वती, वैरोनिक, प्रदीप, कृष्णमोहन, राममोहन — सबका ज़िक्र वे करते हैं, पर कहते हैं कि इन लोगों को बड़ी जल्दी तसल्ली हो गई कि काम मिल गया, अब परफॉरमेंस कर लो, तालीम खत्म हो गई। बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज अपनी अम्मा को मानते थे — जब भी वे नाच देखती थीं, तो वे उनसे पूछते थे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ। पुराने और आज के नर्तकों के बीच वे यह फर्क पाते हैं कि पुराने नर्तक किसी भी मंच पर — चाहे गड्ढे हों, चाहे गैस लाइट की गर्मी हो — नाच लेते थे, पर आज के नर्तक स्टेज की शिकायत करते हैं।
क्या सीखना है
बिरजू महाराज का जीवन, गुरु, शिक्षा, पुरस्कार, दिनचर्या, वाद्य, विवाह और शागिर्दों के बारे में समझें।
मुख्य शब्द
- बिरजू महाराज — कथक के महान नर्तक; साक्षात्कार के केंद्रीय व्यक्ति।
- गण्डा — गुरु-शिष्य परंपरा में बाँधा जाने वाला धागा।
- रश्मि वाजपेयी — साक्षात्कारकर्ता; बिरजू महाराज की शिष्या और 'नटरंग' की संपादक।
- संगीत भारती — दिल्ली का संगीत-नृत्य संस्थान; पहले हिंदुस्तानी डांस म्यूज़िक।
- कथक — उत्तर भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली।
याद रखें
- जन्म: 4 फ़रवरी 1938, लखनऊ, जफरीन अस्पताल।
- गुरु: बाबूजी; गण्डा 500 रुपये के नज़राने पर बँधा।
- पहला प्रथम पुरस्कार: कलकत्ते में; शंभू महाराज भी थे।
- संगीत भारती दिनचर्या: सुबह 4 बजे उठना, 5-8 रियाज़।
- सबसे बड़ा जज: अम्मा।
यह पाठ पं. बिरजू महाराज से उनकी सुयोग्य शिष्या, नृत्यांगना और रंगकर्म की पत्रिका 'नटरंग' की संपादक रश्मि वाजपेयी की बातचीत है — किंचित संपादित रूप में अविकल प्रस्तुत। बातचीत के बहाने बिरजू महाराज का अंतरंग जीवन उनके आत्मकथनों में झलक उठता है।
जन्म-तिथि 4 फ़रवरी 1938 है, और गण्डा 500 रुपये के नज़राने पर बँधा था — उत्तर में यही तिथि और राशि लिखें।
'सबसे दुखद समय' और 'सबसे बड़ा जज' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: साक्षात्कार के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 4 फ़रवरी 1938, लखनऊ |
| गुरु | बाबूजी; गण्डा 500 रुपये पर |
| पहला पुरस्कार | कलकत्ते में प्रथम पुरस्कार |
| संगीत भारती | सुबह 4 बजे उठना; 5-8 रियाज़ |
| वाद्य | तबला, हारमोनियम, सितार, गिटार, बाँसुरी, सरोद |
| सबसे बड़ा जज | अम्मा |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है?
संकेत: जन्म और बाबूजी की नौकरी से सोचें। - रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया?
संकेत: बाबूजी की खुशी से सोचें। - बिरजू महाराज के गुरु कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दें।
संकेत: बाबूजी और गण्डा से सोचें। - बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुखद समय कब आया?
संकेत: बाबूजी की मृत्यु के बाद से सोचें। - बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज किसको मानते थे?
संकेत: अम्मा से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस साक्षात्कार का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि एक महान कलाकार का जीवन भी संघर्ष, गरीबी और दुख से भरा होता है — पर रियाज़, गुरु-भक्ति और माँ के आशीर्वाद से वह महानता तक पहुँचता है। - बिरजू महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ?
बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938 में, 4 फ़रवरी, शुक्रवार, सुबह 8 बजे, वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ था। - उनके गुरु कौन थे?
उनके गुरु उनके बाबूजी ही थे — गण्डा भी उन्हीं से बँधा। जब गण्डा बँधा, तो 500 रुपये के दो प्रोग्राम मिलने पर नज़राना दिया गया, और तब गण्डा बँधा। - सबसे दुखद समय कौन-सा था?
सबसे दुखद समय वह था, जब बाबूजी की मृत्यु के बाद दसवाँ और तेरहवीं करने के लिए भी पैसा नहीं था — दस दिन के अंदर दो प्रोग्राम करके 500 रुपये इकट्ठे किए गए, और उन्हीं से दसवाँ-तेरहवीं का इंतज़ाम हुआ। - इस साक्षात्कार से क्या सीख मिलती है?
यही कि कला में महानता रियाज़, समर्पण और गुरु-भक्ति से आती है — और माँ का आशीर्वाद ही कलाकार का सबसे बड़ा जज होता है।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 16 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है?
बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ था, और रामपुर से उनका संबंध यह है कि उनके बाबूजी वहाँ 22 साल रहे, और उनकी बहनों का जन्म भी रामपुर में हुआ था। बाबूजी रामपुर के नवाब के यहाँ भी काम करते थे। - रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया?
क्योंकि बाबूजी रोज़ हनुमानजी का प्रसाद माँगते थे कि 22 साल गुज़र गए, अब नौकरी छूट जाए — नवाब साहब बहुत नाराज़ थे कि तुम्हारा लड़का नहीं होगा तो तुम भी नहीं रह सकते। जब नौकरी छूटी, तो बाबूजी बहुत खुश हुए, उन्होंने मिठाई बाँटी और हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी। - नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके संपर्क में आए?
नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज हिंदुस्तानी डांस म्यूज़िक (बाद में संगीत भारती) से जुड़े — वहाँ वे कपिला जी, लीला कृपलानी आदि के संपर्क में आए। - किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला?
शंभू महाराज चाचाजी और बाबूजी के साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को कलकत्ते में पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला — उस समय वे नौ-साढ़े नौ साल के थे, और उन्हें चेन और मेडल भी मिला था। - बिरजू महाराज के गुरु कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दें।
बिरजू महाराज के गुरु उनके बाबूजी ही थे। बाबूजी लखनऊ घराने के प्रसिद्ध कथक नर्तक थे, जो रामपुर के नवाब के यहाँ भी काम करते थे, और उन्होंने ही बिरजू महाराज को नृत्य की तालीम दी — गण्डा भी उन्हीं से बँधा। - बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की?
बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा बहुत छोटी उम्र से ही देनी शुरू कर दी थी — ताऊ जी को और परिवार के बच्चों को, साथ ही संगीत भारती और भारतीय कला केंद्र में भी उन्होंने पढ़ाया। साक्षात्कार में कोई एक 'पहला शिष्य + तिथि' साफ़-साफ़ नहीं मिलता है — शिक्षा उनके प्रदर्शन के साथ-साथ ही चलती रही। (यह उत्तर आंशिक है — किताब में कोई एक साफ़ पहला शिष्य और तिथि नहीं मिली है।) - बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुखद समय कब आया? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए।
सबसे दुखद समय वह आया, जब बाबूजी की मृत्यु के बाद घर में बिल्कुल पैसा नहीं था कि उनका दसवाँ किया जा सके। दस दिन के अंदर बिरजू महाराज ने दो प्रोग्राम किए और उनसे 500 रुपये इकट्ठे हुए, तो दसवाँ और तेरहवीं की गई — बाहर के मित्रों को भी अंदाज़ नहीं रहा होगा कि घर की ऐसी हालत है। - शंभू महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध पर प्रकाश डालिए।
शंभू महाराज बिरजू महाराज के चाचाजी थे — वे भी कथक के प्रसिद्ध नर्तक थे, और बिरजू महाराज के साथ कलकत्ते में प्रथम पुरस्कार के समय भी थे। शंभू महाराज शुरू से ही बड़े शौकीन तबीयत के थे, और बिरजू महाराज उनसे भी सीखते थे। - कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा?
कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का यह प्रभाव पड़ा कि वहाँ से बिरजू महाराज का एक मोड़ आया — तमाम अखबारों में वे छप गए, दूसरे डांसर्स को भी लगा कि लड़के ने कुछ कर ही डाला है, और वहाँ से लोगों को पता लगा कि वे कुछ हैं। - संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी?
संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या थी — सुबह 4 बजे उठना, साढ़े 4 बजे चाय, चाहे बुखार हो या खाँसी, सुबह 5 बजे से रियाज़, 5, 6, 7, 8 तक रियाज़, फिर घर जाकर एक घंटे में तैयार होकर वापस 9 बजे दो घंटे की क्लास। - बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे?
बिरजू महाराज तबला शुरू से बजाते थे, हारमोनियम थोड़ा-बहुत, सितार भी बहुत बजाने लगे थे, गिटार, बाँसुरी, सरोद — और लहरा बजाने के लायक भी थे। सितार की वजह से हाथ में शक्करें बनने लगीं, तो उन्होंने डर के मारे सितार छोड़ दिया कि डांस में दिक्कत होगी। - अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज क्या बताते हैं?
बिरजू महाराज बताते हैं कि अठारह साल की उम्र में उनकी शादी अम्माजी ने कर दी थी — बहुत बड़ी गलती की, जबकि वे सोच रहे थे कि पहले काम कर लें, फिर शादी करें। पर अम्माजी घबराई हुई थीं, क्योंकि पिताजी मर ही गए थे, उनका क्या होगा, पता नहीं — इस घबराहट में शादी कर दी, पर वह उनके लिए बहुत नुकसानदेह रहा। - बिरजू महाराज की अपने शागिर्दों के बारे में क्या राय है?
बिरजू महाराज की राय है कि अब कला के होने वाले बहुत कम लोग बचे हैं — शाश्वती 15-20 साल से लगी हुई है, वैरोनिक भी तरक्की कर रही है, प्रदीप, कृष्णमोहन, राममोहन — सबका ज़िक्र वे करते हैं, पर कहते हैं कि इन लोगों को बड़ी जल्दी तसल्ली हो गई कि काम मिल गया, अब परफॉरमेंस कर लो, तालीम खत्म हो गई — उतना ध्यान नहीं है, जितना होना चाहिए। - व्याख्या करें — साक्षात्कार के तीन कथनों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में तीन कथनों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: पहला — पाँच सौ रुपये देकर मैंने गण्डा बँधवाया, यानी गुरु-शिष्य परंपरा में नज़राना देकर ही गण्डा बँधता है, और बिरजू महाराज ने 500 रुपये के प्रोग्रामों से वह नज़राना दिया; दूसरा — मैं कोई चीज़ चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है, उसको सिखाना है, यानी वे अपने शिष्यों को पूरी ईमानदारी से सिखाते हैं, कोई भेद नहीं रखते; तीसरा — मैं तो बेचारा उसका असिस्टेंट हूँ, उस नाचने वाले का, यानी वे अपने को नाच का सेवक मानते हैं, न कि नाच का मालिक। - बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज किसको मानते थे?
बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज अपनी अम्मा को मानते थे — जब भी वे नाच देखती थीं, तो वे उनसे पूछते थे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर रहा हूँ, और अम्मा की तस्वीर ही उनके लिए सबसे बड़ा प्रमाण थी। - पुराने और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते हैं?
बिरजू महाराज यह फर्क पाते हैं कि पुराने नर्तक किसी भी मंच पर — चाहे गड्ढे हों, चाहे गैस लाइट की गर्मी हो, चाहे बड़े-बड़े पंखे हाँकते नौकर हों — नाच लेते थे, पर आज के नर्तक स्टेज की शिकायत करते हैं कि स्टेज बड़ा खराब है, बड़ा टेढ़ा है, बड़ा गड्ढा है — पुराने नर्तकों को यह सब सोचने का मौका ही नहीं मिलता था।
- साक्षात्कार: बिरजू महाराज से रश्मि वाजपेयी की बातचीत।
- जन्म: 4 फ़रवरी 1938, लखनऊ।
- गुरु: बाबूजी; गण्डा 500 रुपये पर।
- सबसे दुखद समय: बाबूजी की मृत्यु के बाद दसवाँ-तेरहवीं।
- सबसे बड़ा जज: अम्मा।
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