Chapter 7: परंपरा का मूल्यांकन
परंपरा का ज्ञान सबसे ज़्यादा किसके लिए ज़रूरी है — और साहित्य में विकास समाज की तरह नहीं होता।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
परंपरा का मूल्यांकन — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | गद्य खंड — अध्याय 7 | प्रकार: निबंध (रामविलास शर्मा) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पुराना वृक्ष और नई कोंपलें — परंपरा और नवीनता का एक सामान्य प्रतीकात्मक चित्र।

पीढ़ियों के बीच कहानियाँ साझा करता परिवार — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह निबंध परंपरा के मूल्यांकन पर आधारित है। लेखक कहता है कि परंपरा का ज्ञान उन लोगों के लिए सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जो साहित्य और संस्कृति से जुड़े हैं — क्योंकि बिना परंपरा के ज्ञान के वे अपने ही साहित्य को नहीं समझ सकते। परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक महत्त्वपूर्ण है — क्योंकि साहित्य किस वर्ग की आवाज़ है, यह समझे बिना उसका सही मूल्यांकन नहीं हो सकता।
साहित्य का वह पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है, जिसमें मनुष्य की आदिम भावनाएँ, उसका द्वंद्व-भाव और उसकी भावनाएँ व्यक्त होती हैं — साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है। साहित्य में विकास-प्रक्रिया उसी तरह संपन्न नहीं होती, जैसे समाज में — सामाजिक विकास में सामंती सभ्यता से पूँजीवादी सभ्यता को अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है, और पूँजीवादी से समाजवादी को, पर यह आवश्यक नहीं है कि सामंती समाज के कवि की अपेक्षा पूँजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ हो। 19वीं और 20वीं सदी के कवि पुराने कवियों से पीछे रह गए हैं — वे अपने पूर्ववर्ती कवियों का अनुकरण नहीं करते, उनसे सीखते हैं, और स्वयं नई परंपराओं को जन्म देते हैं।
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य की चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता स्वीकार करता है — आर्थिक संबंधों से प्रभावित होना एक बात है, उनके द्वारा चेतना का निर्धारित होना और बात है। भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है — सब कुछ परिस्थितियों द्वारा अनिवार्यत: निर्धारित नहीं हो जाता। यही कारण है कि साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है। लेखक जातीय अस्मिता का उल्लेख भी करता है — भारत की बहुजातीयता मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की देन है, और बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। निबंध का समापन करते हुए लेखक एक स्वप्न देखता है — एक ऐसे समाज का, जिसमें परंपरा की सही समझ हो और समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता हो।
क्या सीखना है
परंपरा का ज्ञान, साहित्य का वर्गीय आधार, साहित्य की स्थायी पक्ष, सापेक्ष स्वाधीनता और जातीय अस्मिता को समझें।
मुख्य शब्द
- परंपरा — पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर।
- वर्गीय आधार — साहित्य किस वर्ग की आवाज़ है — इसका विवेक।
- सापेक्ष स्वाधीनता — आर्थिक संबंधों से प्रभावित होते हुए भी चेतना की आंशिक स्वतंत्रता।
- द्वंद्वात्मक भौतिकवाद — मार्क्सवादी दर्शन; चेतना और आर्थिक संबंधों का द्वंद्वात्मक संबंध।
- जातीय अस्मिता — किसी जाति या समुदाय की पहचान।
याद रखें
- परंपरा का ज्ञान साहित्य से जुड़े लोगों के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है।
- साहित्य का स्थायी पक्ष: आदिम भावनाएँ और द्वंद्व-भाव।
- साहित्य में विकास समाज की तरह नहीं होता।
- साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है।
- भारत की बहुजातीयता संस्कृति और इतिहास की देन है।
रामविलास शर्मा (1912–2000) हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और मार्क्सवादी चिंतक थे। उनकी आलोचना में परंपरा, वर्ग और इतिहास का गहरा विवेक है। 'परंपरा का मूल्यांकन' उनका प्रसिद्ध निबंध है।
साहित्य में विकास और समाज में विकास को एक जैसा मत लिखें — लेखक का पूरा तर्क इसी अंतर पर है। उत्तर में 'सापेक्ष स्वाधीनता' अवश्य लिखें।
'साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है' और 'जातीय अस्मिता' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: निबंध के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| परंपरा का ज्ञान | साहित्य से जुड़े लोगों के लिए सबसे ज़रूरी |
| वर्गीय आधार | साहित्य किस वर्ग की आवाज़ है — विवेक ज़रूरी |
| स्थायी पक्ष | आदिम भावनाएँ, द्वंद्व-भाव |
| विकास | साहित्य में समाज की तरह नहीं होता |
| सापेक्ष स्वाधीनता | चेतना आर्थिक संबंधों से प्रभावित, पर निर्धारित नहीं |
| जातीय अस्मिता | भारत की बहुजातीयता संस्कृति-इतिहास की देन |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- परंपरा का ज्ञान किनके लिए सबसे ज़्यादा आवश्यक है और क्यों?
संकेत: साहित्य से जुड़े लोगों से सोचें। - परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक लेखक क्यों महत्त्वपूर्ण मानता है?
संकेत: किस वर्ग की आवाज़ से सोचें। - साहित्य का कौन-सा पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है? लेखक की राय स्पष्ट करें।
संकेत: आदिम भावनाओं से सोचें। - 'साहित्य में विकास प्रक्रिया उसी तरह संपन्न नहीं होती, जैसे समाज में' — आशय स्पष्ट कीजिए।
संकेत: कवियों की श्रेष्ठता से सोचें। - साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है — इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कौन-से तर्क दिए हैं?
संकेत: द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस निबंध का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि परंपरा का सही मूल्यांकन तभी संभव है, जब साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक हो, और यह समझ हो कि साहित्य में विकास समाज की तरह नहीं होता — साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है, और उसकी स्थायी पक्ष मनुष्य की आदिम भावनाएँ हैं। - परंपरा का ज्ञान किसके लिए ज़रूरी है?
परंपरा का ज्ञान उन लोगों के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, जो साहित्य और संस्कृति से जुड़े हैं — क्योंकि बिना परंपरा के ज्ञान के वे अपने ही साहित्य को नहीं समझ सकते। - साहित्य में विकास समाज की तरह क्यों नहीं होता?
क्योंकि सामाजिक विकास में सामंती से पूँजीवादी और पूँजीवादी से समाजवादी को अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है, पर यह आवश्यक नहीं है कि सामंती समाज के कवि की अपेक्षा पूँजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ हो — 19वीं-20वीं सदी के कवि पुराने कवियों से पीछे रह गए हैं। - साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन कैसे है?
क्योंकि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य की चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता स्वीकार करता है — प्रभावित होना एक बात है, निर्धारित होना और बात है। भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। - इस निबंध से क्या सीख मिलती है?
यही कि परंपरा को आँख बंद करके नहीं, बल्कि विवेक से मूल्यांकित करना चाहिए — और साहित्य की स्वाधीनता को समझना चाहिए।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 15 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- परंपरा का ज्ञान किनके लिए सबसे ज़्यादा आवश्यक है और क्यों?
परंपरा का ज्ञान उन लोगों के लिए सबसे ज़्यादा आवश्यक है, जो साहित्य और संस्कृति से जुड़े हैं — क्योंकि बिना परंपरा के ज्ञान के वे अपने ही साहित्य की जड़ों को नहीं समझ सकते, और न ही नए साहित्य का सही मूल्यांकन कर सकते हैं। - परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक लेखक क्यों महत्त्वपूर्ण मानता है?
क्योंकि साहित्य किस वर्ग की आवाज़ है, यह समझे बिना उसका सही मूल्यांकन नहीं हो सकता — साहित्य का वर्गीय आधार ही बताता है कि वह किसके हितों की बात करता है, और किसके विरुद्ध है। - साहित्य का कौन-सा पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है? इस संबंध में लेखक की राय स्पष्ट करें।
साहित्य का वह पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है, जिसमें मनुष्य की आदिम भावनाएँ, उसका द्वंद्व-भाव और उसकी भावनाएँ व्यक्त होती हैं — साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है, उसमें मनुष्य का पूरा जीवन प्रतिबिंबित होता है, और यही पक्ष स्थायी होता है। - 'साहित्य में विकास प्रक्रिया उसी तरह संपन्न नहीं होती, जैसे समाज में' — आशय स्पष्ट कीजिए।
इसका आशय यह है कि सामाजिक विकास में सामंती से पूँजीवादी और पूँजीवादी से समाजवादी को अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है, पर साहित्य में ऐसा नहीं है — सामंती समाज के कवि की अपेक्षा पूँजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ हो, यह आवश्यक नहीं है। 19वीं-20वीं सदी के कवि पुराने कवियों से पीछे रह गए हैं। - लेखक मानव चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता किन दृष्टांतों द्वारा प्रमाणित करता है?
लेखक यह प्रमाणित करता है कि गुलामी अमेरिका में भी थी और यूरोप में भी थी, पर यूरोप की सभ्यता ने सारे यूरोप को प्रभावित किया, और गुलामों के अमेरिकी मालिकों ने गुलाम संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया — यही दिखाता है कि चेतना आर्थिक संबंधों से प्रभावित तो होती है, पर उनसे निर्धारित नहीं होती। - साहित्य के निर्माण में प्रतिभा की भूमिका स्वीकार करते हुए लेखक किन खतरों से आगाह करता है?
लेखक आगाह करता है कि प्रतिभा की पूजा से यह खतरा है कि साहित्य को केवल प्रतिभा का खेल समझ लिया जाएगा, और उसके सामाजिक आधार को भुला दिया जाएगा — प्रतिभा महत्त्वपूर्ण है, पर वह अकेली साहित्य का आधार नहीं है। (यह उत्तर निबंध के तर्क से व्याख्यात्मक रूप में दिया गया है।) - राजनीतिक मूल्यों से साहित्य के मूल्य अधिक स्थायी कैसे होते हैं?
क्योंकि राजनीतिक मूल्य समय के साथ बदल जाते हैं, पर साहित्य के मूल्य — मनुष्य की भावनाएँ, उसका द्वंद्व-भाव — स्थायी रहते हैं। राजनीतिक आंदोलन आते-जाते हैं, पर साहित्य की भावनाएँ सदियों तक जीवित रहती हैं। - जातीय अस्मिता का लेखक किस प्रसंग में उल्लेख करता है और उसका क्या महत्त्व बताता है?
लेखक जातीय अस्मिता का उल्लेख भारत की बहुजातीयता के प्रसंग में करता है — वह बताता है कि भारत की बहुजातीयता मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की देन है, और बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। - जातीय और राष्ट्रीय अस्मिताओं के स्वरूप का अंतर करते हुए लेखक दोनों में क्या समानता बताता है?
लेखक बताता है कि जातीय अस्मिता किसी समुदाय की पहचान है, और राष्ट्रीय अस्मिता पूरे राष्ट्र की पहचान है — दोनों में अंतर है, पर समानता यह है कि दोनों ही संस्कृति और इतिहास से बनती हैं, और दोनों ही मनुष्य की पहचान का आधार हैं। - बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता?
क्योंकि भारत की बहुजातीयता मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की देन है — यहाँ अनेक जातियाँ, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सदियों से साथ रह रही हैं, और यही बहुजातीयता भारत को अद्वितीय बनाती है। - भारत की बहुजातीयता मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की देन है — कैसे?
क्योंकि भारत में अनेक जातियाँ, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सदियों से साथ रह रही हैं, और उनकी परंपराएँ, उनका इतिहास और उनकी संस्कृति मिलकर भारत की बहुजातीयता बनाते हैं — यह किसी एक राजनीतिक निर्णय की देन नहीं है, बल्कि सदियों के सांस्कृतिक इतिहास की देन है। - किस तरह समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है? इस प्रसंग में लेखक के विचारों पर प्रकाश डालें।
लेखक के अनुसार समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है, क्योंकि भारत की बहुजातीयता और उसकी सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए समाजवाद ही सही मार्ग है — समाजवाद से ही सबको समान अवसर और सम्मान मिलेगा। - निबंध का समापन करते हुए लेखक कैसा स्वप्न देखता है? उसे साकार करने में परंपरा की क्या भूमिका हो सकती है? विचार करें।
निबंध का समापन करते हुए लेखक एक ऐसे समाज का स्वप्न देखता है, जिसमें परंपरा की सही समझ हो, साहित्य की स्वाधीनता हो, और समाजवाद हो। उसे साकार करने में परंपरा की भूमिका यह हो सकती है कि परंपरा की सही समझ से ही हम अपने भविष्य का सही मार्ग चुन सकते हैं — परंपरा को विवेक से मूल्यांकित करके ही नया समाज बनाया जा सकता है। (यह उत्तर निबंध के समापन-तर्क से व्याख्यात्मक रूप में दिया गया है।) - साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है — इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कौन-से तर्क और प्रमाण उपस्थित किए हैं?
लेखक ने यह तर्क दिया है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता स्वीकार करता है — प्रभावित होना और निर्धारित होना अलग-अलग बातें हैं। प्रमाण के रूप में उसने गुलामी का दृष्टांत दिया है — गुलामी अमेरिका और यूरोप दोनों में थी, पर यूरोप की सभ्यता ने सारे यूरोप को प्रभावित किया, जबकि अमेरिकी मालिकों ने गुलाम संस्कृति को कुछ नहीं दिया। - व्याख्या करें — निबंध के कथन के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में एक कथन के भाव पूछे गए हैं। इसका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहाँ ज़्यादा है, कहाँ कम है, और इस न्यूनाधिक ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं — यानी जिस समाज में परंपरा का ज्ञान अधिक होता है, वहाँ सामाजिक चेतना भी अधिक होती है, और जहाँ कम होता है, वहाँ सामाजिक परिणाम भी अलग होते हैं।
- लेखक रामविलास शर्मा; निबंध परंपरा के मूल्यांकन पर।
- परंपरा का ज्ञान साहित्य से जुड़े लोगों के लिए सबसे ज़रूरी।
- साहित्य का स्थायी पक्ष: आदिम भावनाएँ, द्वंद्व-भाव।
- साहित्य में विकास समाज की तरह नहीं होता।
- साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन है।
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