Chapter 19: हिरोशिमा
एक दिन सहसा सूरज निकला — पर वह सूरज मानव का रचा हुआ था, और मानव को ही भाप बनाकर सोख गया।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
हिरोशिमा — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | पद्य खंड — अध्याय 7 | प्रकार: कविता (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय') | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): मलबे से उगता पौधा और उड़ता कबूतर — शांति की आशा का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

शांति के लिए गुब्बारे छोड़ते बच्चे — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह कविता हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरने की घटना पर आधारित है। प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज वह परमाणु विस्फोट है — वह सहसा निकला, जैसे कोई नया सूरज उग आया हो। पर वह सूरज प्राकृतिक नहीं था, बल्कि मानव का रचा हुआ था — और वह मानव को ही भाप बनाकर सोख गया।
छायाएँ दिशाहीन सब ओर इसलिए पड़ती हैं, क्योंकि विस्फोट की रोशनी इतनी तेज़ थी कि हर दिशा में छायाएँ बिखर गईं — जैसे काल-सूर्य के रथ के पहियों के अरे टूटकर दसों दिशाओं में बिखर गए हों। मनुष्य की छायाएँ हिरोशिमा की दीवारों, पत्थरों और ज़मीन पर पड़ी हुई हैं — वे छायाएँ ही अब मनुष्य की साखी हैं, यानी गवाह हैं।
कविता आज के युग में भी प्रासंगिक है, क्योंकि परमाणु हथियारों का खतरा आज भी बना हुआ है। हिरोशिमा की छायाएँ हमें याद दिलाती हैं कि मानव की रची हुई शक्ति मानव को ही नष्ट कर सकती है — और इसीलिए शांति की आवश्यकता आज भी उतनी ही है।
क्या सीखना है
परमाणु विस्फोट का सूरज, दिशाहीन छायाएँ, मनुष्य की साखी और कविता की प्रासंगिकता को समझें।
मुख्य शब्द
- हिरोशिमा — जापान का शहर, जहाँ 1945 में परमाणु बम गिरा था।
- काल-सूर्य — मृत्यु का सूरज; यहाँ परमाणु विस्फोट का प्रतीक।
- साखी — गवाह, साक्षी।
- प्रज्वलित क्षण की दोपहरी — विस्फोट का वह क्षण, जब दोपहरी-सी रोशनी फैल गई।
- दिशाहीन छायाएँ — हर दिशा में बिखरी हुई छायाएँ।
याद रखें
- प्रथम अनुच्छेद का सूरज परमाणु विस्फोट है।
- वह मानव का रचा हुआ सूरज था।
- छायाएँ दिशाहीन सब ओर पड़ीं।
- मनुष्य की छायाएँ ही उसकी साखी हैं।
- कविता आज भी प्रासंगिक है — परमाणु खतरा बना हुआ है।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (1911–1987) हिंदी के प्रमुख कवि, कथाकार और संपादक थे। 'हिरोशिमा' उनकी प्रसिद्ध कविता है, जो परमाणु-त्रासदी पर आधारित है।
कविता की व्याख्या में पंक्तियाँ हूबहू न लिखें — भाव अपने शब्दों में लिखें। 'मानव का रचा हुआ सूरज' और 'छायाएँ ही साखी' के भाव अवश्य लिखें।
'प्रज्वलित क्षण की दोपहरी' और 'आज के युग में प्रासंगिकता' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: कविता के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| सूरज | परमाणु विस्फोट — मानव का रचा हुआ |
| छायाएँ | दिशाहीन, सब ओर बिखरी हुई |
| प्रज्वलित क्षण | विस्फोट का क्षण — दोपहरी-सी रोशनी |
| मनुष्य की साखी | हिरोशिमा में पड़ी हुई छायाएँ |
| प्रासंगिकता | परमाणु खतरा आज भी बना हुआ है |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज क्या है? वह कैसे निकलता है?
संकेत: परमाणु विस्फोट से सोचें। - छायाएँ दिशाहीन सब ओर क्यों पड़ती हैं? स्पष्ट करें।
संकेत: विस्फोट की तेज़ रोशनी से सोचें। - प्रज्वलित क्षण की दोपहरी से कवि का आशय क्या है?
संकेत: विस्फोट के क्षण से सोचें। - मनुष्य की छायाएँ कहाँ और क्यों पड़ी हुई हैं?
संकेत: हिरोशिमा की दीवारों से सोचें। - आज के युग में इस कविता की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
संकेत: परमाणु खतरे से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि मानव की रची हुई शक्ति — परमाणु बम — मानव को ही नष्ट कर देती है। हिरोशिमा में जो सूरज निकला, वह प्राकृतिक नहीं था, बल्कि मानव का रचा हुआ था, और वह मानव को ही भाप बनाकर सोख गया। मनुष्य की छायाएँ ही अब उसकी साखी हैं। - प्रथम अनुच्छेद का सूरज क्या है?
प्रथम अनुच्छेद का सूरज परमाणु विस्फोट है — वह सहसा निकला, जैसे कोई नया सूरज उग आया हो। पर वह प्राकृतिक सूरज नहीं था, बल्कि मानव का रचा हुआ सूरज था। - छायाएँ दिशाहीन क्यों पड़ीं?
क्योंकि विस्फोट की रोशनी इतनी तेज़ थी कि हर दिशा में छायाएँ बिखर गईं — जैसे काल-सूर्य के रथ के पहियों के अरे टूटकर दसों दिशाओं में बिखर गए हों। - हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में क्या है?
हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में उसकी छायाएँ हैं — जो दीवारों, पत्थरों और ज़मीन पर पड़ी हुई हैं। वे छायाएँ ही अब मनुष्य के होने का गवाह हैं। - इस कविता से क्या सीख मिलती है?
यही कि मानव की रची हुई विनाशकारी शक्ति मानव को ही नष्ट कर सकती है — और इसीलिए शांति और मानवता की रक्षा आज भी उतनी ही ज़रूरी है।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 7 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज क्या है? वह कैसे निकलता है?
प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज परमाणु विस्फोट है — वह सहसा निकलता है, जैसे कोई नया सूरज अचानक उग आया हो। पर वह प्राकृतिक सूरज नहीं है, बल्कि मानव का रचा हुआ सूरज है। - छायाएँ दिशाहीन सब ओर क्यों पड़ती हैं? स्पष्ट करें।
छायाएँ दिशाहीन सब ओर इसलिए पड़ती हैं, क्योंकि विस्फोट की रोशनी इतनी तेज़ और सर्वव्यापी थी कि हर दिशा में छायाएँ बिखर गईं — जैसे काल-सूर्य के रथ के पहियों के अरे टूटकर दसों दिशाओं में बिखर गए हों। - प्रज्वलित क्षण की दोपहरी से कवि का आशय क्या है?
प्रज्वलित क्षण की दोपहरी से कवि का आशय विस्फोट का वह क्षण है, जब इतनी तेज़ रोशनी फैल गई कि वह दोपहरी-सी लगने लगी — यानी विस्फोट के क्षण में दिन की रोशनी से भी तेज़ रोशनी फैल गई थी। - मनुष्य की छायाएँ कहाँ और क्यों पड़ी हुई हैं?
मनुष्य की छायाएँ हिरोशिमा की दीवारों, पत्थरों और ज़मीन पर पड़ी हुई हैं — क्योंकि विस्फोट की तेज़ रोशनी में मनुष्य जलकर भाप बन गया, और उसकी छाया ही दीवारों पर रह गई। वे छायाएँ ही अब मनुष्य के होने का प्रमाण हैं। - हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में क्या है?
हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में उसकी छायाएँ हैं — जो दीवारों, पत्थरों और ज़मीन पर पड़ी हुई हैं। मनुष्य तो भाप बनकर उड़ गया, पर उसकी छाया ही अब उसकी गवाह है — वही बताती है कि यहाँ कभी मनुष्य था। - व्याख्या करें — कविता की पंक्तियों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में कविता की तीन पंक्तियों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: एक दिन सहसा सूरज निकला — यानी परमाणु विस्फोट अचानक हुआ, जैसे कोई नया सूरज उग आया हो; काल-सूर्य के रथ के पहियों के अरे टूटकर दसों दिशाओं में बिखर गए — यानी विस्फोट की रोशनी हर दिशा में बिखर गई, छायाएँ दिशाहीन हो गईं; और मानव का रचा हुआ सूरज मानव को भाप बनाकर सोख गया — यानी मानव ने जो विनाशकारी शक्ति बनाई, उसी ने मानव को ही नष्ट कर दिया। - आज के युग में इस कविता की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
आज के युग में भी यह कविता प्रासंगिक है, क्योंकि परमाणु हथियारों का खतरा आज भी बना हुआ है। हिरोशिमा की छायाएँ हमें याद दिलाती हैं कि मानव की रची हुई शक्ति मानव को ही नष्ट कर सकती है — और इसीलिए शांति, मानवता और परमाणु-निरस्त्रीकरण की आवश्यकता आज भी उतनी ही है।
- कवि अज्ञेय; कविता हिरोशिमा पर परमाणु बम की है।
- सूरज = परमाणु विस्फोट; मानव का रचा हुआ।
- छायाएँ दिशाहीन; मनुष्य की साखी ही छायाएँ।
- प्रज्वलित क्षण की दोपहरी = विस्फोट का क्षण।
- आज भी प्रासंगिक: परमाणु खतरा बना हुआ है।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

