Chapter 18: जनतंत्र का जन्म
समय का रथ अब जनता के द्वार पर है — और जनता ही अब देवता है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
जनतंत्र का जन्म — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | पद्य खंड — अध्याय 6 | प्रकार: कविता (रामधारी सिंह दिनकर) | माध्यम: हिंदी
यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): एक साथ खड़ी जनता — लोकतंत्र के भाव का एक सामान्य चित्र।

विद्यालय-चुनाव में मतदान करते विद्यार्थी — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह कविता जनतंत्र के जन्म की कविता है — यानी जनता के शासन के आगमन की। कवि की दृष्टि में समय के रथ का घर्घर-नाद जनता के जागरण की आवाज़ है — वह आवाज़, जो सदियों से सोई हुई जनता को जगा रही है। कविता के आरंभ में कवि भारतीय जनता का वर्णन एक ऐसी शक्ति के रूप में करता है, जो सदियों से दबी हुई थी, पर अब जाग उठी है।
कवि के अनुसार कुछ लोगों की दृष्टि में जनता फूल या दुधमुँही बच्ची की तरह है — यानी कोमल, निरीह और असहाय। पर कवि उनका प्रतिवाद करता है — जनता कोमल नहीं, बल्कि शक्तिशाली है; उसकी हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है, और उसकी साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है।
विराट जनतंत्र का स्वरूप यह है कि उसमें जनता ही शासक है — कवि उन लोगों के सिर पर मुकुट धरने की बात करता है, जो अब तक दबे हुए थे। कवि की दृष्टि में आज के देवता वे लोग हैं, जो जनता के बीच रहते हैं — देवता अब मंदिरों में नहीं, बल्कि जनता के बीच मिलेंगे। कविता का मूल भाव यह है कि जनता की शक्ति ही जनतंत्र का जन्म है।
क्या सीखना है
समय के रथ का नाद, जनता का वर्णन, जनतंत्र का स्वरूप और आज के देवताओं को समझें।
मुख्य शब्द
- जनतंत्र — जनता का शासन; लोकतंत्र।
- समय का रथ — समय की गति; इतिहास का पहिया।
- घर्घर-नाद — रथ की घर्घराहट की आवाज़; जागरण की आवाज़।
- विराट जनतंत्र — विशाल, महान जनतंत्र।
- दुधमुँही — दूध पीती बच्ची; यहाँ कोमल, निरीह का प्रतीक।
याद रखें
- समय के रथ का घर्घर-नाद जनता के जागरण की आवाज़ है।
- जनता को फूल या दुधमुँही बच्ची समझना गलत है।
- जनता की हुँकार से महलों की नींव उखड़ जाती है।
- विराट जनतंत्र में जनता ही शासक है।
- आज के देवता जनता के बीच मिलेंगे।
रामधारी सिंह दिनकर (1908–1974) राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्र-प्रेम, जनता की शक्ति और क्रांति का भाव है। 'जनतंत्र का जन्म' उनकी प्रसिद्ध कविता है।
कविता की व्याख्या में पंक्तियाँ हूबहू न लिखें — भाव अपने शब्दों में लिखें। 'समय के रथ का घर्घर-नाद' और 'आज के देवता' के भाव अवश्य लिखें।
'जनता को फूल या दुधमुँही बच्ची समझने वालों का प्रतिवाद' और 'विराट जनतंत्र का स्वरूप' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: कविता के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| समय का रथ | जनता के जागरण की आवाज़ |
| जनता का वर्णन | सदियों से दबी, अब जागी हुई शक्ति |
| गलत दृष्टि | जनता को फूल या दुधमुँही बच्ची समझना |
| जनता की शक्ति | हुँकार से महल की नींव उखड़ जाती है |
| विराट जनतंत्र | जनता ही शासक; दबे हुए लोगों पर मुकुट |
| आज के देवता | जनता के बीच मिलेंगे |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- कवि की दृष्टि में समय के रथ का घर्घर-नाद क्या है? स्पष्ट करें।
संकेत: जनता के जागरण से सोचें। - कविता के आरंभ में कवि भारतीय जनता का वर्णन किस रूप में करता है?
संकेत: दबी हुई शक्ति से सोचें। - कवि के अनुसार किन लोगों की दृष्टि में जनता फूल या दुधमुँही बच्ची की तरह है और क्यों? कवि क्या कहकर उनका प्रतिवाद करता है?
संकेत: कोमलता बनाम शक्ति से सोचें। - कवि जनता के स्वप्न का किस तरह चित्र खींचता है?
संकेत: जनतंत्र के सपने से सोचें। - विराट जनतंत्र का स्वरूप क्या है? कवि किनके सिर पर मुकुट धरने की बात करता है और क्यों?
संकेत: दबे हुए लोगों से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि जनता की शक्ति ही जनतंत्र का जन्म है — सदियों से दबी हुई जनता अब जाग उठी है, और उसकी हुँकार से महलों की नींव उखड़ जाती है। विराट जनतंत्र में जनता ही शासक है, और आज के देवता जनता के बीच ही मिलेंगे। - समय के रथ का घर्घर-नाद क्या है?
समय के रथ का घर्घर-नाद जनता के जागरण की आवाज़ है — वह आवाज़, जो सदियों से सोई हुई जनता को जगा रही है और इतिहास का पहिया घुमा रही है। - जनता को फूल या दुधमुँही बच्ची समझने वालों का कवि क्या प्रतिवाद करता है?
कवि प्रतिवाद करता है कि जनता कोमल, निरीह और असहाय नहीं है — वह शक्तिशाली है। उसकी हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है, और उसकी साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है। - विराट जनतंत्र का स्वरूप क्या है?
विराट जनतंत्र का स्वरूप यह है कि उसमें जनता ही शासक है — कवि उन लोगों के सिर पर मुकुट धरने की बात करता है, जो अब तक दबे हुए थे, क्योंकि अब शासन उन्हीं का होगा। - आज के देवता कौन हैं और वे कहाँ मिलेंगे?
आज के देवता वे लोग हैं, जो जनता के बीच रहते हैं — देवता अब मंदिरों में नहीं, बल्कि जनता के बीच, उनके दुख-सुख में, उनके संघर्ष में मिलेंगे।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 8 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- कवि की दृष्टि में समय के रथ का घर्घर-नाद क्या है? स्पष्ट करें।
कवि की दृष्टि में समय के रथ का घर्घर-नाद जनता के जागरण की आवाज़ है — वह आवाज़, जो सदियों से सोई हुई जनता को जगा रही है। समय का रथ अब जनता के द्वार पर आ गया है, और उसकी घर्घराहट ही जनतंत्र के जन्म की घोषणा है। - कविता के आरंभ में कवि भारतीय जनता का वर्णन किस रूप में करता है?
कविता के आरंभ में कवि भारतीय जनता का वर्णन एक ऐसी शक्ति के रूप में करता है, जो सदियों से दबी हुई थी, पर अब जाग उठी है। सदियों की ठंडी-बुझी राख अब सुगबुगा उठी है — यानी जनता की शक्ति अब फिर से जाग रही है। - कवि के अनुसार किन लोगों की दृष्टि में जनता फूल या दुधमुँही बच्ची की तरह है और क्यों? कवि क्या कहकर उनका प्रतिवाद करता है?
कुछ लोगों — शासकों और सत्ताधारियों — की दृष्टि में जनता फूल या दुधमुँही बच्ची की तरह है, क्योंकि वे जनता को कोमल, निरीह और असहाय समझते हैं। कवि उनका प्रतिवाद करता है कि जनता कोमल नहीं, बल्कि शक्तिशाली है — उसकी हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है, और उसकी साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है। - कवि जनता के स्वप्न का किस तरह चित्र खींचता है?
कवि जनता के स्वप्न का चित्र इस तरह खींचता है कि जनता अब अपने शासन का सपना देख रही है — वह सपना, जिसमें दबे हुए लोगों के सिर पर मुकुट होगा, और जनता ही शासक होगी। यह सपना विराट जनतंत्र का सपना है। - विराट जनतंत्र का स्वरूप क्या है? कवि किनके सिर पर मुकुट धरने की बात करता है और क्यों?
विराट जनतंत्र का स्वरूप यह है कि उसमें जनता ही शासक है। कवि उन लोगों के सिर पर मुकुट धरने की बात करता है, जो अब तक दबे हुए थे — क्योंकि अब शासन उन्हीं का होगा, जो अब तक शोषित थे। यही जनतंत्र का सही स्वरूप है। - कवि की दृष्टि में आज के देवता कौन हैं और वे कहाँ मिलेंगे?
कवि की दृष्टि में आज के देवता वे लोग हैं, जो जनता के बीच रहते हैं — देवता अब मंदिरों में नहीं, बल्कि जनता के बीच, उनके दुख-सुख में, उनके संघर्ष में मिलेंगे। जनता ही अब देवता है। - कविता का मूल भाव क्या है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
कविता का मूल भाव यह है कि जनता की शक्ति ही जनतंत्र का जन्म है। सदियों से दबी हुई जनता अब जाग उठी है, और उसकी शक्ति से ही नया युग आएगा — जिसमें जनता ही शासक होगी और देवता भी जनता के बीच ही मिलेंगे। - व्याख्या करें — कविता की पंक्तियों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में कविता की तीन पंक्तियों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी है — यानी सदियों से दबी हुई जनता की शक्ति अब फिर से जाग रही है — और मिट्टी सोने का ताज पहनकर इठलाती है, यानी साधारण जनता भी अब गर्व से सिर ऊँचा करती है; जनता की हुँकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है, और उसकी साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है — यानी जनता की शक्ति से सत्ता भी हिल जाती है; और जनता की रोके राह में समय में ताव नहीं है — जनता जिधर चाहती है, काल उधर ही मुड़ता है, यानी जनता की इच्छा ही इतिहास की दिशा तय करती है।
- कवि रामधारी सिंह दिनकर; राष्ट्रकवि।
- समय के रथ का घर्घर-नाद = जनता का जागरण।
- जनता कोमल नहीं, शक्तिशाली है।
- विराट जनतंत्र: जनता ही शासक।
- आज के देवता जनता के बीच मिलेंगे।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

