Chapter 17: भारतमाता
भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी है — पर उसका तप-संयम ही उसकी शक्ति है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
भारतमाता — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | पद्य खंड — अध्याय 5 | प्रकार: कविता (सुमित्रानंदन पंत) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): खेतों और गाँवों की धरती — भारतमाता के भाव का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

खेत में पौधे लगाते बच्चे — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह कविता भारतमाता के चित्र पर आधारित है। प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का चित्र प्रस्तुत करता है — वह अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है, यानी अपने ही देश में वह पराई-सी लगती है। उसका हास भी राहुग्रसित दिखाई पड़ता है — यानी उसकी हँसी भी ग्रहण लगी हुई-सी है, क्योंकि देश की दुर्दशा ने उसे दुखी कर दिया है।
कविता में कवि भारतवासियों का चित्र भी खींचता है — वे भी दुखी, निर्धन और पराधीन हैं। भारतमाता गीता प्रकाशिनी है — वह ज्ञान का प्रकाश फैलाती है — पर फिर भी ज्ञानमूढ़ कही जाती है, क्योंकि उसके बच्चे ज्ञान से दूर हैं।
पर कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम सफल है — क्योंकि उसका तप, उसकी सहनशीलता और उसकी साधना ही उसकी शक्ति है। भारतमाता का तप-संयम ही देश को नई दिशा देगा — यही कविता का आशावादी संदेश है।
क्या सीखना है
भारतमाता का चित्र, प्रवासिनी होने का कारण, भारतवासियों का चित्र और तप-संयम की सफलता को समझें।
मुख्य शब्द
- भारतमाता — भारत की माता के रूप में कल्पना।
- प्रवासिनी — अपने घर से दूर रहने वाली; यहाँ अपने ही देश में पराई-सी।
- राहुग्रसित — ग्रहण लगा हुआ; यहाँ दुख से घिरा हुआ।
- गीता प्रकाशिनी — गीता का प्रकाश फैलाने वाली।
- ज्ञानमूढ़ — ज्ञान से दूर, अज्ञानी।
- तप-संयम — तपस्या और संयम — भारतमाता की शक्ति।
याद रखें
- भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी है।
- उसका हास राहुग्रसित दिखाई पड़ता है।
- भारतमाता गीता प्रकाशिनी है, पर ज्ञानमूढ़ कही जाती है।
- भारतवासी भी दुखी, निर्धन और पराधीन हैं।
- भारतमाता का तप-संयम सफल है — यही आशा है।
सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) छायावाद के प्रमुख कवि थे। उनकी कविताओं में प्रकृति, मानवता और राष्ट्र-प्रेम का भाव है। 'भारतमाता' उनकी प्रसिद्ध राष्ट्र-प्रेम की कविता है।
कविता की व्याख्या में पंक्तियाँ हूबहू न लिखें — भाव अपने शब्दों में लिखें। 'प्रवासिनी' और 'राहुग्रसित' के अर्थ अवश्य लिखें।
'भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों है' और 'तप-संयम क्यों सफल है' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: कविता के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| भारतमाता | अपने ही घर में प्रवासिनी |
| हास | राहुग्रसित — ग्रहण लगा हुआ |
| भारतवासी | दुखी, निर्धन, पराधीन |
| गीता प्रकाशिनी | ज्ञान का प्रकाश, पर ज्ञानमूढ़ |
| तप-संयम | सफल — यही आशा और शक्ति |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का कैसा चित्र प्रस्तुत करता है?
संकेत: प्रवासिनी और राहुग्रसित से सोचें। - भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है?
संकेत: पराधीनता और दुर्दशा से सोचें। - कविता में कवि भारतवासियों का कैसा चित्र खींचता है?
संकेत: दुख, निर्धनता से सोचें। - भारतमाता का हास भी राहुग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है?
संकेत: देश की दुर्दशा से सोचें। - कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है?
संकेत: सहनशीलता और साधना से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी है — अपने ही देश में वह पराई-सी लगती है, क्योंकि देश पराधीन और दुखी है। पर उसका तप-संयम ही उसकी शक्ति है, और वही देश को नई दिशा देगा। - भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों है?
क्योंकि देश पराधीन है और भारतवासी दुखी, निर्धन और पराधीन हैं — अपने ही देश में भारतमाता को अपना अधिकार नहीं मिलता, इसलिए वह प्रवासिनी-सी लगती है। - भारतमाता का हास राहुग्रसित क्यों है?
क्योंकि देश की दुर्दशा ने उसकी हँसी को भी ग्रहण लगा दिया है — जब देश दुखी हो, तो माता की हँसी भी दुख से घिरी हुई लगती है। - भारतमाता गीता प्रकाशिनी होकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों है?
क्योंकि भारतमाता ज्ञान का प्रकाश फैलाती है — गीता का ज्ञान उसी से आया है — पर उसके बच्चे ज्ञान से दूर हैं, इसलिए वह ज्ञानमूढ़ कही जाती है। - इस कविता से क्या सीख मिलती है?
यही कि देश की दुर्दशा में भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए — भारतमाता का तप-संयम ही उसकी शक्ति है, और वही देश को नई दिशा देगा।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 7 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का कैसा चित्र प्रस्तुत करता है?
प्रथम अनुच्छेद में कवि भारतमाता का चित्र एक ऐसी माता के रूप में प्रस्तुत करता है, जो अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है — अपने ही देश में वह पराई-सी लगती है। उसका हास राहुग्रसित है, उसकी आँखें चिंतित हैं, और उसका मन कुंठित है — क्योंकि देश की दुर्दशा ने उसे दुखी कर दिया है। - भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है?
क्योंकि देश पराधीन है और भारतवासी दुखी, निर्धन और पराधीन हैं। अपने ही देश में भारतमाता को अपना अधिकार नहीं मिलता — वह अपने ही घर में पराई-सी हो गई है, जैसे कोई प्रवासी अपने ही घर में अजनबी हो। - कविता में कवि भारतवासियों का कैसा चित्र खींचता है?
कवि भारतवासियों का चित्र दुखी, निर्धन और पराधीन लोगों के रूप में खींचता है — वे अपने ही देश में अधिकारहीन हैं, उनकी आँखें चिंतित हैं, और उनका मन कुंठित है। - भारतमाता का हास भी राहुग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है?
क्योंकि देश की दुर्दशा ने उसकी हँसी को भी ग्रहण लगा दिया है। जब देश दुखी हो, निर्धन हो और पराधीन हो, तो माता की हँसी भी दुख से घिरी हुई लगती है — जैसे चंद्रमा पर राहु का ग्रहण लग जाता है। - कवि भारतमाता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है?
क्योंकि भारतमाता गीता का प्रकाश फैलाती है — ज्ञान उसी से आया है — पर उसके बच्चे ज्ञान से दूर हैं। जब बच्चे ही ज्ञान से दूर हों, तो माता को ज्ञानमूढ़ कहा जाता है — यही विरोधाभास कवि दिखाता है। - कवि की दृष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है?
क्योंकि भारतमाता का तप, उसकी सहनशीलता और उसकी साधना ही उसकी शक्ति है। देश की दुर्दशा में भी उसका तप-संयम टूटा नहीं है — और यही तप-संयम देश को नई दिशा देगा, इसीलिए वह सफल है। - व्याख्या करें — कविता की पंक्तियों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में कविता की दो पंक्तियों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: भारतमाता का स्वर्ण शस्य (सोने जैसी फसल) दूसरों के पैरों तले लुंठित है — यानी देश की संपदा दूसरों के हाथ में है — और धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित है, यानी सहनशील मन भी अब कुंठित हो गया है; और चिंतित भृकुटि क्षितिज पर तिमिरांकित है, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित है — यानी चिंता की भौंहें क्षितिज पर अँधेरे से घिरी हैं, और झुकी हुई आँखें आकाश की तरह वाष्प से ढकी हुई हैं।
- कवि सुमित्रानंदन पंत; छायावाद।
- भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी।
- हास राहुग्रसित; भारतवासी दुखी, निर्धन, पराधीन।
- गीता प्रकाशिनी, पर ज्ञानमूढ़।
- तप-संयम सफल — यही आशा।
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