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Deepakam • पाठ 2

Chapter 2: अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

छोटी-छोटी चीज़ों का संगठन भी बड़ा काम सिद्ध कर देता है — कपोतों की कथा।

Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 8 • Sanskrit • Book: Deepakam

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पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में

बाहरी कथा — कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्मावकाश में देवभूमि उत्तराखण्ड देखने गए। वे गौरीकुण्ड पहुँचे और श्रीकेदार-क्षेत्र की चढ़ाई कर रहे थे कि लक्ष्य से पहले तेज़ वर्षा शुरू हो गई। चारों ओर अन्धकार छा गया, नदी के तेज़ जल-वेग से सेतु टूट गया और पर्वत-स्खलन हो गया। सब ऊँचे स्वर से रोने और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। तब नायक ने सबको धीरज बँधाया — विपत्ति में धैर्य रखकर उपाय सोचो। वर्षा शान्त होने पर हम सब मिलकर सेतु और मार्ग बनाकर फिर लक्ष्य की ओर जाएँगे। कुछ मित्रों को यह असम्भव लगा, पर नायक ने आत्मविश्वास के बल से कहा कि असम्भव काम भी मिलकर अवश्य सिद्ध होगा। इसी प्रसंग में उसने हितोपदेश की एक कथा सुनाई।

भीतरी कथा — गोदावरी के तट पर एक विशाल शाल्मली वृक्ष था, जहाँ दूर-दूर से पक्षी आकर रहते थे। एक दिन एक व्याध (बहेलिया) ने तण्डुल-कण बिखेरकर जाल फैलाया और छिपकर बैठ गया। कपोतराज चित्रग्रीव अपने परिवार के साथ आकाश-मार्ग से जा रहा था। कुछ कपोत वन में तण्डुल देखकर लोभ से खिंच गए। चित्रग्रीव ने चेताया — निर्जन वन में तण्डुल कहाँ से? कोई व्याध होगा; बिना विचारे काम नहीं करना चाहिए। एक कपोत ने अहंकार से उसकी अवज्ञा की और कहा कि बड़ों की बात आपत्काल में माननी चाहिए, पर हर बात में इतना विचार करें तो भोजन भी न हो। सब कपोत नीचे उतरे, तण्डुल खाने लगे और जाल में बँध गए। तब वे उसी कपोत को कोसने लगे जिसकी बात से वे बँधे थे। चित्रग्रीव ने कहा — यह उसका दोष नहीं है; आने वाली विपत्ति को कौन जान सकता है? तिरस्कार छोड़कर उपाय सोचो। विपत्ति में विस्मय (घबराहट) ही कापुरुष का लक्षण है; सत्पुरुष का लक्षण है — विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में व्यसन।

फिर चित्रग्रीव ने नीति-वचन सुनाया — छोटी वस्तुओं की भी संहति कार्यसाधिका होती है। सबने एकचित्त होकर जाल उठाया और उड़ गए। व्याध दूर से दौड़ा, पर पक्षी उसकी दृष्टि से दूर निकल गए और वह लौट गया। तब चित्रग्रीव ने कहा — हमारा मित्र हिरण्यक नामक मूषकराज गण्डकी तट के चित्रवन में रहता है; वह अपने दाँतों से हमारे पाश काट देगा। हिरण्यक अनिष्ट की शंका से सौ द्वार वाला बिल बनाकर रहता था। पहले वह कपोतों के गिरने के भय से चुप रहा, फिर चित्रग्रीव की आवाज़ पहचानकर आनन्द से बाहर आया। उसने पहले चित्रग्रीव का बन्धन काटना चाहा, पर चित्रग्रीव ने कहा — पहले मेरे आश्रितों के पाश काटो, फिर मेरे। हिरण्यक प्रसन्न होकर बोला — इस आश्रित-वात्सल्य से तुम त्रैलोक्य के स्वामित्व के भी योग्य हो। उसने सबके बन्धन काट दिए। सब कपोत मुक्त होकर उड़े और राजा की नीति-शिक्षा और नायक-धर्म की प्रशंसा करने लगे।

लौटकर बाहरी कथा — नायक ने कहा — आपद्ग्रस्त कपोतों ने बुद्धिबल और संगठन-सामर्थ्य से आत्मरक्षा की, तो हम संगठित होकर आत्मरक्षण क्यों नहीं कर सकते? उसके प्रेरक वचनों से उत्साहित सबने भय, शोक और सन्देह छोड़ दिया और सेतु-निर्माण में लग गए। भगीरथ-प्रयत्नों से सेतु बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के प्राण बचाए।

Labelled diagram for अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): मिलकर बड़ा पत्ता ले जाती चींटियाँ। छोटे जीवों की एकता की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

Illustration for अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

आकाश में एक साथ उड़ते पक्षियों का झुंड। संगठन की सामान्य तस्वीर।

मुख्य शब्द — शब्दार्थ

शब्दअर्थ
भग्नःटूटा हुआ
अक्रन्दन्रोने लगे
सविषादम्दुःखपूर्वक
सम्भूयमिलकर
तरुःवृक्ष
व्याधःबहेलिया, लुब्धक
तण्डुलकणान्चावल के कण
विकीर्यबिखेरकर
विस्तीर्यफैलाकर
संहतिःसंगठन, एकता
कार्यसाधिकाकाम को सिद्ध करने वाली
आश्रितवात्सल्यम्आश्रितों के प्रति स्नेह

व्याकरण — इस पाठ से

ल्यप्-प्रत्यय: उपसर्ग के साथ धातु में ल्यप् लगता है और अर्थ होता है “करके” — जैसे वि + कॄ + ल्यप् से विकीर्य (बिखेरकर) और वि + स्तॄ + ल्यप् से विस्तीर्य (फैलाकर)। बिना उपसर्ग के उसी अर्थ में क्त्वा आता है। अभ्यास में वाक्यों को ल्यप्-प्रत्ययान्त रूपों में बदलना है।

उपसर्ग-प्रयोग: क्त्वा के स्थान पर उपसर्ग जोड़कर ल्यप् का प्रयोग करके पद बदलो — जैसे सम् + भूय (मिलकर) का भाव समझो। उपसर्ग धातु के अर्थ को दिशा देता है।

समास और सन्धि-विच्छेद: समासयुक्त पद से रिक्त स्थान भरो और सार्थक पद जानकर सन्धि-विच्छेद करो। पहले पद का विग्रह सोचो, फिर सन्धि का नियम पहचानो — स्वर-सन्धि है या व्यञ्जन-सन्धि, यह विग्रह से ही स्पष्ट होता है।

परीक्षा टिपउत्तर में दोनों कथाओं को जोड़ो — बाहरी कथा (सेतु-निर्माण) और भीतरी कथा (कपोत-जाल) — और अन्त में नीति-वाक्य का अर्थ अपने शब्दों में लिखो। केवल एक कथा लिखने से उत्तर अधूरा रहता है।
सामान्य गलतीचित्रग्रीव को दोषी ठहराना। पाठ में स्पष्ट है — चित्रग्रीव ने पहले ही चेताया था; बन्धन लोभ और अवज्ञा का फल था, और मुक्ति संगठन का फल थी।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. सेतु कैसे टूटा?
    संकेत: वर्षा, नदी का वेग और पर्वत-स्खलन के बारे में सोचो।
  2. कपोत जाल में क्यों बँधे?
    संकेत: लोभ और चित्रग्रीव की चेतावनी की अवज्ञा की बात सोचो।
  3. “विकीर्य” का ल्यप्-विग्रह लिखो।
    संकेत: उपसर्ग + धातु + ल्यप् के रूप में तोड़ो।
  4. एक समासयुक्त पद चुनकर उसका विग्रह लिखो।
    संकेत: पद के दोनों भागों का अर्थ अलग-अलग सोचो।
  5. एक वाक्य का सन्धि-विच्छेद करो।
    संकेत: पहले सार्थक पद पहचानो, फिर सन्धि का नियम लगाओ।

प्रश्न और उत्तर

  1. मित्र किस उद्देश्य से उत्तराखण्ड गए थे?
    वे विद्यालय के ग्रीष्मावकाश में देवभूमि उत्तराखण्ड के दर्शन के लिए गए थे। गौरीकुण्ड पहुँचकर वे श्रीकेदार-क्षेत्र की चढ़ाई कर रहे थे।
  2. विपत्ति में नायक ने क्या उपदेश दिया?
    नायक ने कहा — विपत्काल में धैर्य रखकर उपाय सोचो। वर्षा शान्त होने पर हम सब मिलकर सेतु और मार्ग बनाकर फिर लक्ष्य की ओर जाएँगे।
  3. चित्रग्रीव ने कपोतों को क्या चेतावनी दी थी?
    चित्रग्रीव ने कहा — निर्जन वन में तण्डुल-कणों का होना सम्भव नहीं लगता; कोई व्याध होगा। बिना विचारे काम नहीं करना चाहिए।
  4. कपोत जाल से कैसे मुक्त हुए?
    सबने एकचित्त होकर जाल उठाया और उड़ गए। फिर हिरण्यक मूषकराज ने अपने दाँतों से सबके पाश काट दिए।
  5. चित्रग्रीव ने अपना बन्धन सबसे बाद में क्यों कटवाया?
    क्योंकि वह अपने आश्रितों के प्रति वात्सल्य रखता था — पहले आश्रितों के पाश कटें, फिर मेरे। इसी से हिरण्यक ने उसे त्रैलोक्य के स्वामित्व के योग्य कहा।

विस्तार — और गहराई से

  1. सत्पुरुष के लक्षण अपने शब्दों में लिखो।
    विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में रुचि और शास्त्र-श्रवण में व्यसन — ये प्रकृतिसिद्ध महात्माओं के लक्षण बताए गए हैं।
  2. “विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्” — इसका अर्थ स्पष्ट करो।
    विपत्ति में घबराहट ही कायरता का लक्षण है। धैर्य और उपाय-चिन्तन ही सत्पुरुष का लक्षण है।
  3. पाठ के क्रियापदों के प्रयोग-कौशल पर अन्य वाक्य बनाओ।
    जैसे सम्भूय, विकीर्य, विस्तीर्य जैसे पदों को लेकर अपने वाक्य बनाओ और देखो कि ल्यप् का अर्थ “करके” कैसे जुड़ता है।
  4. परिचर्चा: इस कथा से अपने जीवन में क्या शिक्षा ले सकते हो?
    कक्षा में चर्चा करो — टीम के काम में, खेल में या घर में संगठन और धैर्य से कठिन काम कैसे सिद्ध होता है।
  5. कथाक्रम: घटनाओं को सही क्रम में लिखो।
    वर्षा और सेतु-भंग → नायक की प्रेरणा → कपोत-कथा → जाल से मुक्ति → हिरण्यक की सहायता → सेतु-निर्माण और प्राण-रक्षा।
पुनरावलोकन — Recap
  • बाहरी कथा: गौरीकुण्ड–केदार मार्ग पर वर्षा, सेतु-भंग; नायक की प्रेरणा से सामूहिक सेतु-निर्माण।
  • भीतरी कथा: चित्रग्रीव, व्याध का जाल, संगठन से उड़ान, हिरण्यक से मुक्ति, आश्रित-वात्सल्य।
  • नीति: अल्प वस्तुओं की संहति भी कार्यसाधिका होती है।
  • व्याकरण: ल्यप् (विकीर्य, विस्तीर्य), उपसर्ग-प्रयोग, समास, सन्धि-विच्छेद।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।