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Deepakam • पाठ 1

Chapter 1: संगच्छध्वं संवदध्वम्

ऋग्वेद के संगठन-सूक्त के तीन मन्त्र — साथ चलना, साथ बोलना, एक मन होना।

Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 8 • Sanskrit • Book: Deepakam

Print से browser से PDF save कर सकते हैं। यह textbook PDF नहीं है।

पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में

पाठ एक संवाद से शुरू होता है। खेल में एक दल हार जाता है। आचार्य पूछते हैं कि प्रतिद्वन्द्वी दल कैसे हारा। उत्तर मिलता है — उस दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनोभेद और द्वेषभाव था, उन्होंने एक-दूसरे का सहयोग नहीं किया। तब यह प्रश्न उठता है कि विजय के लिए क्या-क्या आवश्यक है। उत्तर है — मिलकर काम करना, एकता और परस्पर सामञ्जस्य।

यहीं वेद का सन्देश आता है। यह सन्देश ऋग्वेद के प्रसिद्ध संगठन-सूक्त से लिया गया है। वेद को प्राचीन भारतीय ज्ञान-परम्परा में साक्षात् ब्रह्म के मुख से निकली पवित्र दैवी वाणी माना गया है। वेद की चार संहिताएँ हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। पाठ में संगठन-सूक्त के तीन प्रसिद्ध मन्त्र पढ़ाए गए हैं, जिनका भाव नीचे अपने शब्दों में दिया गया है।

तीन मन्त्रों का भाव (अपने शब्दों में)

पहला मन्त्र — हे मनुष्यो! तुम सब परिवार, गण, समाज, राष्ट्र और विश्व में मिलकर आगे बढ़ो और साथ-साथ अभ्युदय साधो। परस्पर अच्छे विचारों का आदान-प्रदान करते हुए एक स्वर से बोलो। तुम्हारे मन एक-दूसरे के भावों को अच्छी तरह जानें; परस्पर मनोभेद न रहे। जैसे सृष्टि के आरम्भ में देवों ने सृष्टि-निर्माण के यज्ञ की सफलता के लिए अपना-अपना कर्तव्य स्वीकार करके परस्पर उत्तम समन्वय से अपना-अपना काम निभाया था, वैसे ही तुम भी अपने कुटुम्ब, दल और लोक की प्रगति के लिए अपने-अपने कर्तव्य का सुचारु निर्वाह करो। वैमनस्य छोड़कर ऐक्यभाव से जियो, तभी सब अभीष्ट फल पाएँगे।

दूसरा मन्त्र — एक काम में साथ लगे लोगों का चिन्तन समान और सौहार्दपूर्ण हो, उनकी समिति अर्थात् लक्ष्य-सिद्धि समानी हो, मन समान और सौमनस्यपूर्ण हो तथा चित्त से उत्पन्न ज्ञान भी एकीभूत हो। घर, वर्ग और लोक में द्वेष के बिना सब सुख से सौहार्दपूर्ण जीवन जिएँ। ऋषि संघटित संकल्प और मन्त्रणा को दिव्यभाव से जोड़कर प्रकट करते हैं और सामूहिक प्रार्थना से ज्ञान-यज्ञ सम्पन्न करते हैं।

तीसरा मन्त्र — तुम्हारा संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय सामरस्यपूर्ण हों, और तुम्हारा मन ऐसा समान और सामञ्जस्ययुक्त हो जिससे तुम्हारा संघटन शोभन और उत्कृष्ट बने। इसी से परिवार, गण, समाज, राष्ट्र और विश्व में सुख, शान्ति और मैत्रीभाव विराजता है। इन मन्त्रों से संघटित सहजीवन की प्रेरणा मिलती है — प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञान-प्राप्ति और आत्मतृप्ति।

Labelled diagram for संगच्छध्वं संवदध्वम्

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): एक साथ रास्ते पर चलते और बात करते बच्चे। एकता के भाव की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

Illustration for संगच्छध्वं संवदध्वम्

पेड़ के नीचे घेरा बनाकर बात करते बच्चे। साथ चलने की सामान्य तस्वीर।

मुख्य शब्द — शब्दार्थ

शब्दअर्थ
संगच्छध्वम्मिलकर चलो
संवदध्वम्एक स्वर से बोलो, सहमति से बोलो
समवेतस्वरेणसम्मिलित स्वर से
मनोभेदःमनों का भेद, मनमुटाव
सामञ्जस्यम्परस्पर मेल, तालमेल
आकूतिःसंकल्प, अभिप्राय
समितिःसभा; यहाँ लक्ष्य-सिद्धि का भाव
सौमनस्यम्मन की प्रसन्नता और सौहार्द

व्याकरण — इस पाठ से

सर्वनाम-रूप (अस्मद्–युष्मद्): द्वितीया में माम् और त्वाम्, चतुर्थी में मह्यम् और तुभ्यम्, षष्ठी में मम और तव रूप चलते हैं। इनके छोटे रूप मे और ते भी प्रयुक्त होते हैं, जैसे नमः ते। उत्तर लिखते समय यह देखो कि क्रिया किस विभक्ति की माँग करती है।

लट् से लोट्: पाठ के अभ्यास में लट्-लकार के वाक्यों को लोट्-लकार (आज्ञा/प्रेरणा के अर्थ) में बदलना सिखाया गया है। संगच्छध्वम् और संवदध्वम् स्वयं लोट् के रूप हैं — इनमें आदेश नहीं, सामूहिक प्रेरणा का भाव है।

प्रश्न-निर्माण: रेखांकित पद को आधार बनाकर प्रश्न बनाओ — जैसे मनोभेद के स्थान पर किम्, कुतः, केन जैसे प्रश्नवाचक शब्दों से प्रश्न बनेगा, उत्तर में वही पद आएगा।

परीक्षा टिपकेवल शीर्षक का अर्थ लिखना पर्याप्त नहीं है। अच्छे उत्तर में तीनों मन्त्रों का भाव क्रम से लिखो — साथ चलना, एक स्वर से बोलना, मन-हृदय-संकल्प की समानता — और जीवन में उदाहरण जोड़ो।
सामान्य गलतीसंगच्छध्वम् को केवल “साथ चलो” और संवदध्वम् को केवल “साथ बोलो” लिखकर छोड़ देना। संवदध्वम् में सुनना, समझना और सहमति भी शामिल है — यही बात उत्तर को पूरा बनाती है।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. विजय के लिए क्या-क्या आवश्यक है?
    संकेत: मिलकर काम, एकता और तालमेल के बारे में सोचो।
  2. प्रतिद्वन्द्वी दल क्यों हारा?
    संकेत: मनोभेद, द्वेष और सहयोग की कमी के बारे में सोचो।
  3. देवों का उदाहरण मनुष्यों के लिए क्या सिखाता है?
    संकेत: अपना-अपना कर्तव्य और परस्पर समन्वय की बात सोचो।
  4. लट्-लकार के एक वाक्य को लोट् में बदलकर लिखो।
    संकेत: क्रिया के अन्त में आज्ञा/प्रेरणा का रूप लगाओ।
  5. रेखांकित पद “मनोभेदः” को आधार बनाकर एक प्रश्न बनाओ।
    संकेत: प्रश्नवाचक शब्द से प्रश्न शुरू करो, उत्तर में वही पद आए।

प्रश्न और उत्तर

  1. संगच्छध्वं संवदध्वम् का भाव क्या है?
    इसका भाव है — साथ चलो, साथ बोलो। जब लोग एक साथ चलते हैं और प्रेम से बात करते हैं, तो उनका मन एक हो जाता है और काम में शक्ति आती है।
  2. यह सन्देश किस वेद से लिया गया है?
    यह सन्देश ऋग्वेद के संगठन-सूक्त से लिया गया है। वेद की चार संहिताएँ हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
  3. दूसरे मन्त्र में क्या समान होने की कामना की गई है?
    दूसरे मन्त्र में मन्त्र (चिन्तन), समिति (लक्ष्य-सिद्धि), मन और चित्त — इन चारों के समान और सौहार्दपूर्ण होने की कामना की गई है।
  4. तीसरे मन्त्र का जीवन में क्या फल बताया गया है?
    तीसरे मन्त्र के अनुसार संकल्प, हृदय और मन की समानता से परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व में सुख, शान्ति और मैत्रीभाव विराजता है।
  5. सर्वनाम के मे/ते रूपों का प्रयोग समझाओ।
    मे और ते अस्मद् और युष्मद् के छोटे रूप हैं। जैसे नमः ते में ते चतुर्थी का भाव देता है। वाक्य में विभक्ति क्रिया और अर्थ से पहचानी जाती है।

विस्तार — और गहराई से

  1. कक्षा में एकता कैसे दिखती है?
    कक्षा में एकता तब दिखती है जब सब साथ पढ़ते हैं, एक-दूसरे की मदद करते हैं, किसी का मज़ाक नहीं उड़ाते और सबकी बात सुनी जाती है।
  2. झगड़े कम करने में संवाद कैसे मदद करता है?
    जब लोग एक-दूसरे की बात सुनते और समझते हैं, तो गलतफहमी दूर होती है। संवाद से मन का गुस्सा कम होता है और समाधान निकलता है।
  3. “देवों ने अपना-अपना कर्तव्य निभाया” — इसका अपने जीवन से एक उदाहरण दो।
    जैसे कक्षा के किसी सामूहिक काम में एक छात्र सामग्री लाता है, दूसरा लिखता है, तीसरा प्रस्तुत करता है — सब अपना काम निभाएँ तो काम सफल होता है।
  4. पट्टिका से शब्द चुनकर मन्त्रों के रिक्त स्थान भरो — यह अभ्यास क्या सिखाता है?
    यह अभ्यास मन्त्रों के पदों को ठीक-ठीक पहचानना सिखाता है। रिक्त स्थान में वही पद आता है जो मन्त्र के अर्थ और छन्द से मेल खाता है।
  5. परिचर्चा: अपने जीवन में एकता का एक अनुभव लिखो।
    परिवार, खेल या कक्षा का कोई ऐसा प्रसंग लिखो जहाँ मिलकर काम करने से कठिन काम आसान हुआ हो, और बताओ कि उसमें किस-किस का क्या योगदान था।
पुनरावलोकन — Recap
  • संगठन-सूक्त ऋग्वेद से है — साथ चलो, एक स्वर से बोलो, मन एक हों।
  • तीन मन्त्र: साथ चलना + कर्तव्य-निर्वाह; चिन्तन-समिति-मन-चित्त की समानता; संकल्प-हृदय-मन की समानता।
  • व्याकरण: अस्मद्–युष्मद् रूप (माम्/त्वाम्, मह्यम्/तुभ्यम्, मम/तव, मे/ते), लट् → लोट्, प्रश्न-निर्माण।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।