Chapter 2: नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्
Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 7 • Sanskrit • Book: Deepakam — Part 2
नौ सुभाषितों का रस — पाँच ‘वकार’, छह दोष, शुद्धि के साधन और भारत की परिभाषा
नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् — EG के अपने शब्दों में सार
Book: Deepakam — Part 2 (CBSE, Class 7) | Chapter 2 | Medium: Sanskrit (सरल Hindi व्याख्या सहित)

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पेड़ के नीचे पुस्तक पढ़ता बालक। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर है, पुस्तक का दृश्य नहीं।

अच्छी बातें सुनते बच्चे। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर।
पाठ का आरम्भ — विद्यालय की दीवार पर लिखा श्लोक
एक छात्रा विद्यालय की दीवार पर लिखा वाक्य देखकर पूछती है — ‘इस जगत् में कोई अयोग्य नहीं है, केवल (सही) योजक (प्रेरक/मार्गदर्शक) दुर्लभ है’ — इसका भाव क्या है? आचार्य समझाते हैं कि सब योग्य हैं, परन्तु प्रेरक और मार्गदर्शक का अभाव होता है। यहीं से सुभाषितों की चर्चा शुरू होती है। सुभाषित का अर्थ है — श्रेष्ठ जनों द्वारा कहा गया सुन्दर वचन, जिसमें जीवन-मूल्य छिपे हों। सुभाषित पढ़ने से नैतिक और सामाजिक विकास होता है — क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह सुभाषित सिखाते हैं। इसलिए बच्चे कहते हैं — ‘हम नित्य सुभाषितों का रस पिएँगे।’
नौ सुभाषित — भावार्थ अपने शब्दों में
श्लोकों को पूरा उद्धृत करने के स्थान पर यहाँ प्रत्येक का भाव दिया गया है — परीक्षा में भाव ही पूछा जाता है।
| क्रम | विषय (पहचान-शब्द) | भाव अपने शब्दों में |
|---|---|---|
| 1 | पाँच ‘वकार’ | जो मनुष्य अच्छे वस्त्र पहनता है, शरीर से स्वस्थ है, मधुर और हितकारी वचन बोलता है, सदा अध्ययन में लगा है और विनम्रता से व्यवहार करता है — वस्त्र, वपुः, वाक्, विद्या, विनय — इन पाँच ‘व’ वाले गुणों से युक्त मनुष्य लोक में पूजित (सम्मानित) होता है। |
| 2 | छह दोष | ऐश्वर्य और उन्नति चाहने वाले मनुष्य को छह दोष छोड़ने चाहिए — अधिक निद्रा, तन्द्रा (ऊँघ), भय, क्रोध, आलस्य और काम को टालते रहने की आदत (दीर्घसूत्रता)। ये उन्नति के अवरोधक हैं। |
| 3 | शुद्धि के चार साधन | शरीर जल से शुद्ध होता है, मन सत्य से, भूतात्मा (जीव) विद्या और तप से, और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। |
| 4 | भारत की परिभाषा | समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो वर्ष (देश) है, वही भारत है — जहाँ भारती (भारतीय) सन्तति रहती है। |
| 5 | बूँद-बूँद से घड़ा | जल की बूँदें गिरते-गिरते क्रमशः घड़ा भर जाता है। उसी प्रकार छोटा-छोटा निरन्तर अभ्यास ही सब विद्याओं, धर्म और धन का हेतु (कारण) बनता है। |
| 6 | बुद्धि का विस्तार | जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है और पण्डितों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमल-दल के समान खिलकर फैल जाती है। |
| 7 | प्रिय वचन | सब प्राणी प्रिय वचन देने से प्रसन्न होते हैं, इसलिए वही बोलना चाहिए। वचन (मीठी बात) में कंजूसी कैसी? |
| 8 | आलस्य बनाम उद्यम | आलस्य मनुष्यों के शरीर में बसा महान् शत्रु है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु (मित्र) नहीं है — उद्यम करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता। |
| 9 | व्यास के दो वचन | अठारह पुराणों का सार महर्षि व्यास के दो वचनों में है — परोपकार पुण्य के लिए है, और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए है। |
व्याकरण — तृतीया विभक्ति
पाठ में तृतीया विभक्ति के रूपों का अभ्यास है — ‘से/द्वारा’ का भाव।
| शब्द | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| छात्र | छात्रेण | छात्राभ्याम् | छात्रैः |
| शिक्षक | शिक्षकेण | शिक्षकाभ्याम् | शिक्षकैः |
| विद्या | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभिः |
| छात्रा | छात्रया | छात्राभ्याम् | छात्राभिः |
| सत्य | सत्येन | सत्याभ्याम् | सत्यैः |
| ज्ञान | ज्ञानेन | ज्ञानाभ्याम् | ज्ञानैः |
| किम् | केन | काभ्याम् | कैः |
नियम: तृतीया एकवचन में अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों में ‘एन’ (छात्रेण, सत्येन) और आकारान्त स्त्रीलिङ्ग में ‘या’ (विद्यया, छात्रया) आता है। द्विवचन में प्रायः ‘भ्याम्’ और बहुवचन में पुल्लिङ्ग/नपुंसक में ‘ऐः’, स्त्रीलिङ्ग में ‘भिः’ आता है।
मुख्य शब्द
- सुभाषितम् — सुन्दर और हितकारी कहा हुआ वचन।
- रसः — स्वाद, आनन्द; यहाँ अच्छे विचारों का आनन्द।
- पूजितः — सम्मानित, आदर पाने वाला।
- भूतिः — ऐश्वर्य, उन्नति, वैभव।
- दीर्घसूत्रता — काम को विलम्ब से करने की आदत, टालमटोल।
- भूतात्मा — जीव, प्राणी की आत्मा।
- वर्षम् — देश, भू-खण्ड (यहाँ भारतवर्ष)।
- भारती सन्ततिः — भारत की सन्तानें, भारतीय लोग।
- उद्यमः — परिश्रम, प्रयत्न।
- परोपकारः / परपीडनम् — दूसरों की भलाई / दूसरों को पीड़ा देना।
श्लोकांशों को जोड़ते समय केवल याद्दाश्त से न जोड़ो — अर्थ से मिलाओ। जैसे ‘विद्यया वपुषा वाचा’ वाला अंश पाँच वकारों से जुड़ता है, और ‘षड् दोषाः’ वाला अंश छह दोषों से।
पर्यायवाची भी अभ्यास में आते हैं — जैसे जलम्, लोचनम्, धनम्, बुद्धिः, रिपुः के पर्याय पाठ से चुनकर लिखो। उत्तर में पाठ का शब्द ही लिखो, अपना बनाया हुआ नहीं।
- पाँच वकार: वस्त्र, वपुः, वाक्, विद्या, विनय → मनुष्य पूजित होता है।
- छह दोष: निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य, दीर्घसूत्रता।
- शुद्धि: गात्र जल से, मन सत्य से, भूतात्मा विद्या-तप से, बुद्धि ज्ञान से।
- भारत: समुद्र के उत्तर, हिमालय के दक्षिण का वर्ष।
- व्यास-सार: परोपकार पुण्य, परपीडन पाप।
- तृतीया: छात्रेण, विद्यया, सत्येन, केन — ‘से/द्वारा’ का भाव।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- सुभाषित किसे कहते हैं?
Hint: सुन्दर और हितकारी वचन के बारे में सोचो। - मन को अच्छे विचारों की आवश्यकता क्यों है?
Hint: शरीर और भोजन की तुलना से सोचो। - एक अच्छी बात बताओ जिसे तुम जीवन में उतारना चाहते हो।
Hint: अपने व्यवहार से कोई उदाहरण चुनो। - केवल याद करने से सुभाषित का लाभ क्यों नहीं मिलता?
Hint: जानने और करने के अंतर से सोचो। - प्रतिदिन अच्छे विचार पढ़ने की एक आदत बताओ।
Hint: रोज़ की दिनचर्या के बारे में सोचो।
प्रश्न और उत्तर
- सुभाषित का अर्थ क्या है?
सुभाषित का अर्थ है सुन्दर और हितकारी कहा हुआ वचन — ऐसी बात जो सुनने में अच्छी लगे और जीवन के लिए लाभदायक हो। - नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् का भाव क्या है?
इसका भाव है कि हम प्रतिदिन सुभाषितों का रस पिएँ, अर्थात् अच्छे विचारों को मन में उतारें और उनसे जीवन को सुन्दर बनाएँ। - अच्छे विचार मन के लिए क्यों आवश्यक हैं?
जैसे शरीर को अच्छा भोजन चाहिए, वैसे ही मन को अच्छे विचार चाहिए। अच्छे विचार मन को शान्त, सकारात्मक और सही निर्णय लेने वाला बनाते हैं। - सुभाषित का सच्चा लाभ कब मिलता है?
जब हम अच्छी बात को केवल याद नहीं करते, बल्कि अपने व्यवहार में उतारते हैं — सच बोलते हैं, आदर करते हैं और मेहनत करते हैं — तभी सुभाषित का सच्चा लाभ मिलता है। - इस पाठ से क्या सीख मिलती है?
इस पाठ से सीख मिलती है कि प्रतिदिन थोड़े-थोड़े अच्छे विचार ग्रहण करो और उन्हें अपने आचरण में लाओ; यही मन की सच्ची उन्नति है।
अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — NCERT अभ्यास के प्रकारों पर
- नरः कतिभिः वकारैः पूजितः भवति और वे कौन-से हैं?
नर पाँच वकारों से पूजित होता है — वस्त्र, वपुः (शरीर), वाक् (वाणी), विद्या और विनय। - पुरुषेण के दोषाः हातव्याः?
पुरुष को छह दोष छोड़ने चाहिए — निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता। - बुद्धिः केन शुध्यति और मनः केन शुध्यति?
बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है और मन सत्य से शुद्ध होता है; शरीर जल से और भूतात्मा विद्या-तप से शुद्ध होते हैं। - भारतं नाम वर्षं किम्?
समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो वर्ष है, वही भारत नाम का वर्ष है — जहाँ भारती सन्तति रहती है। - जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः कः पूर्यते और इसका भाव क्या है?
जल की बूँदों के क्रमशः गिरने से घड़ा भर जाता है। भाव यह है कि छोटे-छोटे निरन्तर प्रयासों से ही विद्या, धर्म और धन प्राप्त होते हैं। - कस्य बुद्धिः विस्तारिता भवति?
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है और पण्डितों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि सूर्य-किरणों से कमल-दल के समान फैल जाती है। - किं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति?
उद्यम करके मनुष्य कभी दुःखी नहीं होता, क्योंकि उद्यम के समान कोई बन्धु नहीं है; आलस्य ही मनुष्यों का महान् शत्रु है। - व्यासस्य वचनद्वयं किम्?
अठारह पुराणों में व्यास के दो वचन हैं — परोपकार पुण्य के लिए है और परपीडन (दूसरों को पीड़ा देना) पाप के लिए है। - ‘छात्रैः’ किस विभक्ति और वचन का रूप है?
‘छात्रैः’ तृतीया विभक्ति, बहुवचन का रूप है (छात्र + तृतीया बहुवचन)।
परियोजना / कक्षा-कार्य: प्रतिदिन एक सुभाषित चुनकर उसका भाव अपनी मातृभाषा में लिखो; विद्यालय की दीवार के लिए कोई एक प्रेरक सुभाषित सुन्दर अक्षरों में लिखकर लगाओ।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, तालिकाएँ बिना देखे दोहराओ, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

