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Class 9 • Geography • Bharat Bhumi evam Log

Chapter 9: क्षेत्रीय अध्ययन

किसी क्षेत्र को खुद जाकर समझना — प्रश्नावली, आँकड़े, भूमिगत जल-स्तर, भूमि उपयोग और प्रदूषण का क्षेत्रीय अध्ययन। पुस्तक पृष्ठ 130–137।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Geography • Book: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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क्षेत्रीय अध्ययन — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 9)  |  अध्याय 9  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — अध्याय का विषय-स्तरीय सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

क्षेत्रीय अध्ययन के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पहाड़ी, मैदानी और तटीय क्षेत्र — क्षेत्रीय विविधता का एक सामान्य चित्र। यह किताब का चित्र नहीं है।

क्षेत्रीय अध्ययन के लिए चित्र

गाँव के परिदृश्य का अध्ययन करते लोग — क्षेत्रीय अध्ययन का एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

क्षेत्रीय अध्ययन क्या है — एक उपागम

क्षेत्रीय अध्ययन भूगोल का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह मूलतः एक अध्ययन उपागम है, जिसके द्वारा क्षेत्र विशेष के मानव और इसके परिवेश के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। यह जानकारी मानव-वातावरण संबंध को समझने में संजीवनी का काम करती है।

अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों में अंतर पाया जाता है। किसी विशिष्ट क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन पर स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि-उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण इत्यादि का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है; लोगों के रहन-सहन का स्तर भी इन तत्वों से जुड़ा है। मानवीय गतिविधियाँ भी अपने परिवेश पर प्रभाव डालती हैं — इन बातों को समझने के लिए क्षेत्रीय अध्ययन आवश्यक है।

इस अध्ययन विधि से हम प्रत्यक्ष रूप से सूचनाएँ संग्रह करते हैं और इनका विभिन्न विधियों से विश्लेषण करते हैं।

कार्य-विधि और आँकड़ों के प्रकार

क्षेत्रीय अध्ययन की कार्य-विधि इस प्रकार है — सर्वप्रथम क्षेत्र में जाकर क्षेत्र का अवलोकन करते हैं। अध्ययन के उद्देश्य को आधार मानकर सभी पहलुओं पर विचार करते हैं और संबंधित प्रश्नावली तैयार करते हैं। प्रश्नावली से जो लिखित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं, उन्हें एकत्रित कर अध्ययन और विश्लेषण करते हैं। ये प्राथमिक आँकड़ों के स्रोत हैं।

क्षेत्रीय अध्ययन में प्राथमिक और द्वितीयक, दोनों प्रकार के आँकड़ों का उपयोग होता है। प्राथमिक आँकड़े निश्चित किए गए क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए जाते हैं; द्वितीयक आँकड़े किसी स्रोत द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं — जैसे नगरपालिका, ग्राम पंचायत, कृषि विभाग, जनगणना विभाग आदि।

क्षेत्र के चयन में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि उस क्षेत्र के ज्वलंत मुद्दों को उसमें शामिल किया जाए — जैसे किसी क्षेत्र के जलस्तर में गिरावट, भूमि उपयोग, प्रदूषण के विभिन्न प्रकार (वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि)।

प्रश्नावली विधि

प्रश्नावली विधि में लोगों से प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रश्नों को आवश्यकता के अनुसार पहले से ही शिक्षक की सहायता से तैयार कर लिया जाता है। सर्वेक्षण के लिए अनेक प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं — प्रश्नों की प्रकृति, वांछित आँकड़ों की प्रकृति और वहाँ के लोगों की पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है।

कुछ प्रश्नों के उत्तर हाँ या नहीं में हो सकते हैं — जैसे 'क्या आप नौकरी करते हैं?' इस प्रश्न का उत्तर 'हाँ' या 'नहीं' में होगा। बहुविकल्प वाले प्रश्नों के उत्तर में कुछ विकल्प दिए जाते हैं, उनमें से केवल एक विकल्प ही सही होता है।

सर्वेक्षणकर्ता उस क्षेत्र में जाकर सर्वप्रथम इस बात का पता लगाता है जो उस समय की ज्वलंत समस्या है; तत्पश्चात उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों से प्रश्नावली के द्वारा जानकारी इकट्ठा करता है। इन प्राप्त आँकड़ों का अध्ययन कर प्रतिवेदन तैयार किया जाता है, जिससे उस क्षेत्र की समस्या के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती है — जैसे बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का अध्ययन, किसी गाँव या नगर की भूमि के उपयोग में क्या परिवर्तन आया है, या नगर में वाहनों की संख्या में वृद्धि से प्रदूषण के स्तर में कितनी वृद्धि हुई।

कार्यकलाप — (अ) शहर में प्रदूषण किन कारणों से बढ़ रहा है? (ब) मोटर वाहन की संख्या में वृद्धि हुई है या नहीं?

भूमिगत जल-स्तर में गिरावट — कारण

एक उदाहरण के रूप में भूमिगत जलस्तर में गिरावट के कारणों और संरक्षण के उपायों का विवरण दिया जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि और उद्योग व कृषि के विकास के कारण भूमिगत जल का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा है, जिससे भूमिगत जल-स्तर में गिरावट होने लगी है। कुछ इलाकों में भूमिगत जल-स्तर खतरनाक स्तर से भी नीचे चला गया है।

नगरीय और ग्रामीण, दोनों ही इलाकों में भूमिगत जल-स्तर में अभूतपूर्व गिरावट आयी है। नगरों में जनसंख्या विस्फोट और सीवर जैसी आधुनिक सुविधाओं के कारण जल की माँग बढ़ी है। नलकूपों के द्वारा गाँव में सिंचाई की जाती है, जिससे भूमिगत जल-स्तर में गिरावट आती जा रही है।

बिहार के गया, नवादा, नालन्दा, जहानाबाद, औरंगाबाद आदि जिलों में नलकूप द्वारा सिंचाई के कारण भूमिगत जल-स्तर में स्पष्ट गिरावट देखने को मिल रही है, जिससे इस क्षेत्र में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो गया है। नगरों के कूड़े-कचड़ों को बाहरी सीमा पर छोड़ दिया जाता है, जो वर्षा जल के साथ रिसकर जमीन के अंदर भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहा है।

जल-स्तर की माप और उपाय — वाटर हारवेस्टिंग

अवभूमा जल की गहराई की माप कुओं में जल के स्तर को फीते से मापकर निश्चित की जाती है। नलकूप बैठाने के क्रम में वेधन के समय पाइप की सहायता से भौम-जल-स्तर की गहराई मापी जाती है। वर्षा और शुष्क ऋतुओं में भौम जल-स्तर में परिवर्तन होता है, इसलिए आँकड़ों का दिनांक मौसम के अनुसार अंकित किया जाना चाहिए। गहराई को मापकर भौम जल-स्तर का समोच्च रेखा मानचित्र बनाया जा सकता है।

भूमिगत जल-स्तर में गिरावट को दूर करने के उपाय — नगरीय जनसंख्या को एक जगह व्यवस्थित कॉलोनी या बहुमंजिली इमारतें बनाकर उनके छतों पर जल संचय कर उस जल के द्वारा भूमिगत जल के पुनःभरण में सहायता मिलेगी। वर्षा जल को जमीन में गड्ढे बनाकर — जिसे चार्जिंग पिट कहा जाता है — भूमिगत जल-स्तर में सुधार किया जा सकता है।

बिहार में भूमिगत जल-स्तर में सुधार के लिए वर्षा जल को विभिन्न सरकारी कार्यालयों के छतों के पानी को पाइप के द्वारा भूमि पर बने टंकी से जोड़े जाने की योजना है। इस विधि को वाटर हारवेस्टिंग कहते हैं। प्रत्येक घर में इस विधि को अपनाने से भूमिगत जल-स्तर में सुधार किया जा सकता है।

सर्वेक्षण विधि — भूमिगत जल-स्तर में गिरावट का सर्वेक्षण करने के लिए किसी गाँव या नगर के कुछ कुओं और नलकूपों का चयन कीजिए, और इसकी तुलना 4–5 वर्ष पहले के जल-स्तर से कीजिए। कुओं का जल-स्तर मापने के लिए कुओं में रस्सी डालकर उसे फीते की सहायता से मापकर उसकी गहराई नोट कीजिए। 4–5 वर्ष पहले के आँकड़ों से मिलाकर जल-स्तर में हुए परिवर्तन का अनुमान हो जाएगा। भूमिगत जल-स्तर वर्षा ऋतु से पहले और उसके बाद मापा जा सकता है, जिससे वर्षा के प्रभाव का अनुमान लगाया जा सके। इसके लिए अनुसूची बनाई जा सकती है — क्रम सं०, नलकूपों की क्रम संख्या, वर्तमान जल-स्तर, पहले का जल-स्तर, जल-स्तर में परिवर्तन, परिवर्तन की दर (पंक्तियाँ 1–4, रिक्त)।

भूमि उपयोग के स्वरूप में परिवर्तन

भूमि उपयोग अध्ययन का उद्देश्य भूमि के वर्तमान उपयोगों की जानकारी प्राप्त करना है। भूमि उपयोग के क्षेत्रीय अध्ययन में पूरे गाँव को लिया जा सकता है या उसके किसी एक टोले को — यह चयन क्षेत्र के आकार पर निर्भर करेगा। क्षेत्र बड़ा है तो उसके किसी एक भाग का, यदि छोटा है तो पूरे क्षेत्र का अध्ययन किया जा सकता है।

किसी गाँव के भूमि उपयोग के सर्वेक्षण के लिए गाँव के भूकर (कैडस्ट्रल) मानचित्र में सभी प्रकार के भूमि उपयोग को दर्शाना जरूरी है। गाँव के भूकर मानचित्र में खेतों का आकार और उनकी संख्या प्रदर्शित होती है। सर्वेक्षण करने से पूर्व क्षेत्र की कोई स्थायी वस्तु संदर्भ बिन्दु के रूप में चुन ली जाती है। मानचित्र पर भूमि उपयोग संकेत चिह्न द्वारा दर्शाया जा सकता है — उदाहरण के लिए गेहूँ के खेतों को 'ग' और धान के खेतों को 'ध' चिह्न से निरूपित किया जा सकता है।

एक अलग मानचित्र पर मिट्टी के प्रकारों को उनके रंग और संरचना के अनुसार दिखा सकते हैं। मानचित्र पर खेतों के ढाल, अपवाह और सिंचित व असिंचित फसलों के विषय पर प्रश्नावली तैयार कर सकते हैं। किसानों से विचार-विमर्श के लिए प्रश्नावली के अनुसार सूचना एकत्र की जाती है। छात्रों की विभिन्न टोलियाँ बनाकर आँकड़ों को एकत्र कर सारणीबद्ध करना, फसलों और सिंचाई साधनों को विभिन्न रंगों से दिखाया जा सकता है। भूमि उपयोग, मिट्टी और भू-आकृतियों के मानचित्रों को एक दूसरे पर अध्यारोपित कर संयुक्त मानचित्र बनाया जा सकता है।

इन आँकड़ों और मानचित्रों का विश्लेषण करके अपनी रिपोर्ट तैयार करें; इस रिपोर्ट में उपयुक्त स्थानों पर मानचित्रों और सारणियों को भी संलग्न करें। साक्षात्कार से किसानों से प्राप्त भूमि-उपयोग के आँकड़ों की सारणी (पृ० 134) में ये स्तंभ हैं — क्रम सं०, खेत की संख्या, किसान का नाम, खेत का क्षेत्रफल (हेक्टेयर में), मिट्टी की किस्म (लाल, काली, दुमट आदि), पैदा की जाने वाली फसलें (खरीफ: धान, ज्वार, बाजरा / रबी: गेहूँ / सभी ऋतु में), सिंचाई (खरीफ / रबी / सभी ऋतु में)।

पुस्तक का चित्र (पृ० 134) — खेत-सीमाएँ और शस्य प्रतिरूप (रबी फसलें) — संकेत: M मक्का, W गेहूँ, B जौ, G चना, P आलू, K खेसारी, O तिलहन; एक छायांकित प्रतीक भी है जिसका नाम-लेबल रेंडर में अस्पष्ट है — उसका अर्थ नहीं गढ़ा गया है (नीचे सावधानी देखें)।

प्रदूषण — प्रकार, कारण और बचाव

प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। प्रदूषण के अंतर्गत मृदा प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण प्रमुख हैं।

स्थानीय स्तर पर प्रदूषण का अध्ययन करने के लिए विद्यार्थी किसी कारखाने अथवा किसी चौराहे का चयन कर सकते हैं। रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से हुए प्रदूषण का अध्ययन करने के लिए कृषि क्षेत्र या उसके निकट जलाशय का भी चयन किया जा सकता है।

प्रदूषण के कारण और प्रदूषित करने वाले ठोस अपशिष्ट पदार्थों के बारे में जानकारी, क्षेत्र के लोगों से बातचीत के द्वारा प्राप्त की जा सकती है। प्रदूषण फैलाने वाले कारक, आस-पास के क्षेत्रों पर प्रदूषण का प्रभाव, लोगों द्वारा झेली गई कठिनाइयाँ और मिट्टी के अनुपजाऊ होने के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

क्षेत्रीय अध्ययन में वायु और जल-प्रदूषण का अध्ययन मुख्य रूप से किया जाता है; साथ ही स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को भी निर्धारित किया जा सकता है। प्रदूषण अध्ययन में प्रदूषित क्षेत्र को निर्धारित कर शिक्षकों की मदद से छात्रों का समूह बनाकर आवश्यक आँकड़े एकत्र करने चाहिए।

क्षेत्रीय अध्ययन के बारे में प्रस्तुत इस प्रकार के प्रतिवेदन से जहाँ एक ओर समस्याओं के समन्वित समाधान के उपाय सामने आएँगे, वहीं दूसरी ओर सूक्ष्म स्तर पर उस क्षेत्र के अध्ययन में भी सहायता मिलेगी। इस प्रकार के अध्ययनों से स्थानीय समस्याओं को नियंत्रित करने में भी सहायता मिल सकती है।

सावधानियाँ — पुस्तक की अपनी बातें

खेत-सीमाएँ चित्र के संकेत-चिह्नों में छायांकित प्रतीक का नाम-लेबल रेंडर में अस्पष्ट है — पृष्ठ पर केवल स्पष्ट कोड (M/W/B/G/P/K/O) दिए गए हैं; छायांकित प्रतीक का अर्थ नहीं गढ़ा गया है।

दीर्घ प्रश्न 1 (क) का उत्तर 'वन' तर्क सहित है — फसल क्षेत्र 1980 (6788) से 2000 (3426) में गिरा है, पर 1801–1980 के बीच बढ़ा भी है, इसलिए 'लगातार घट रहा' केवल वन पर लागू होता है। सारणी के आँकड़े जैसे छपे हैं वैसे ही दर्ज हैं (फसल क्षेत्र का 2000 में तेज गिरावट भी जैसा छपा है वैसा)।

वर्तनियाँ पुस्तक के अनुसार: भूकर (कैडस्ट्रल), चार्जिंग पिट, वाटर हारवेस्टिंग, अध्यारोपित, संजीवनी (मानव-वातावरण संबंध को समझने में 'संजीवनी का काम')।

Key Terms — मुख्य शब्द

  • क्षेत्रीय अध्ययन — भूगोल का एक अध्ययन उपागम — क्षेत्र विशेष के मानव और उसके परिवेश के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करना।
  • प्राथमिक आँकड़े — निश्चित किए गए क्षेत्र में जाकर एकत्रित किए गए आँकड़े।
  • द्वितीयक आँकड़े — किसी स्रोत से उपलब्ध आँकड़े — नगरपालिका, ग्राम पंचायत, कृषि विभाग, जनगणना विभाग आदि।
  • प्रश्नावली — पहले से (शिक्षक की सहायता से) तैयार प्रश्नों का समूह; हाँ/नहीं प्रश्न और बहुविकल्प (केवल एक सही) प्रश्न।
  • भौम जल-स्तर — भूमिगत जल की गहराई; कुओं में फीते से और नलकूप वेधन में पाइप से मापी जाती है; वर्षा/शुष्क ऋतु में बदलती है।
  • चार्जिंग पिट — जमीन में बनाया गया गड्ढा जिसमें वर्षा जल डालकर भूमिगत जल-स्तर में सुधार किया जाता है।
  • वाटर हारवेस्टिंग — छतों के वर्षा जल को पाइप से भूमि-टंकी से जोड़कर भूमिगत जल का पुनःभरण करने की विधि।
  • भूकर (कैडस्ट्रल) मानचित्र — गाँव का मानचित्र जिसमें खेतों का आकार और संख्या प्रदर्शित होती है; भूमि उपयोग संकेत चिह्नों (ग = गेहूँ, ध = धान) से दिखाया जाता है।
  • अध्यारोपण / संयुक्त मानचित्र — भूमि उपयोग, मिट्टी और भू-आकृतियों के मानचित्रों को एक दूसरे पर रखकर बनाया गया संयुक्त मानचित्र।
  • ज्वलंत मुद्दे — क्षेत्र चयन में शामिल किए जाने वाले तात्कालिक मुद्दे — जलस्तर में गिरावट, भूमि उपयोग, वायु/जल/ध्वनि प्रदूषण।

Remember — याद रखें

  • क्षेत्रीय अध्ययन एक उपागम है — मानव-वातावरण संबंध को समझने में संजीवनी का काम करता है।
  • कार्य-विधि: क्षेत्र में जाकर अवलोकन → उद्देश्य-आधारित प्रश्नावली → आँकड़े एकत्र कर अध्ययन/विश्लेषण → प्रतिवेदन।
  • प्राथमिक आँकड़े क्षेत्र में जाकर; द्वितीयक आँकड़े स्रोतों से (नगरपालिका, ग्राम पंचायत, कृषि विभाग, जनगणना विभाग)।
  • भूमिगत जल-स्तर: माप फीते/पाइप से; बिहार के गया, नवादा, नालन्दा, जहानाबाद, औरंगाबाद में स्पष्ट गिरावट; उपाय — चार्जिंग पिट, वाटर हारवेस्टिंग।
  • भूमि उपयोग: भूकर मानचित्र, संदर्भ बिन्दु, संकेत चिह्न (ग/ध), अध्यारोपित संयुक्त मानचित्र; चित्र-संकेत M/W/B/G/P/K/O।
  • प्रदूषण: मृदा, वायु, जल, ध्वनि — स्थानीय अध्ययन के लिए कारखाना/चौराहा या कृषि क्षेत्र/निकट जलाशय का चयन।
  • दीर्घ प्रश्न की सारणी: वन लगातार घट रहा (6215 → 3454); सबसे कम भू-क्षेत्र तृण भूमि का।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सबसे बड़ी भूल: प्राथमिक और द्वितीयक आँकड़ों को उल्टा लिखना — क्षेत्र में जाकर इकट्ठे किए गए आँकड़े प्राथमिक हैं; स्रोतों से मिले आँकड़े द्वितीयक हैं (वस्तुनिष्ठ 1)। दूसरी भूल: क्षेत्रीय अध्ययन को 'विधितंत्र/सिद्धांत/मॉडल' लिखना — पुस्तक के अनुसार यह एक उपागम है (वस्तुनिष्ठ 2)। तीसरी भूल: दीर्घ प्रश्न 1 (क) में फसल क्षेत्र लिखना — फसल क्षेत्र 1801–1980 के बीच बढ़ा भी है, इसलिए 'लगातार घट रहा' केवल वन है। चौथी भूल: खेत-चित्र के अस्पष्ट छायांकित प्रतीक का अर्थ गढ़ना — पृष्ठ पर केवल स्पष्ट कोड दिए गए हैं।

Chart / Table: दीर्घ प्रश्न की सारणी — प्रमुख भू-उपयोग का क्षेत्रफल (जैसा छपा है वैसा)

प्रमुख भू-उपयोग180118501920195019802000
वन621559605675538250523454
फसल क्षेत्र686268326745678067883426
तृण भूमि265538915117015001513

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. क्षेत्रीय अध्ययन किसे कहते हैं? उसकी कार्य-विधि के चार चरण लिखिए।
    संकेत: एक अध्ययन उपागम — क्षेत्र विशेष के मानव और परिवेश की प्रत्यक्ष जानकारी। चरण: अवलोकन → प्रश्नावली → आँकड़े एकत्र कर अध्ययन/विश्लेषण → प्रतिवेदन।
  2. प्राथमिक और द्वितीयक आँकड़ों में अंतर उदाहरण सहित लिखिए।
    संकेत: प्राथमिक: क्षेत्र में जाकर एकत्रित। द्वितीयक: स्रोतों से — नगरपालिका, ग्राम पंचायत, कृषि विभाग, जनगणना विभाग।
  3. भूमिगत जल-स्तर कैसे मापा जाता है? उसकी गिरावट के दो कारण और दो उपाय लिखिए।
    संकेत: कुओं में फीते से, नलकूप वेधन में पाइप से। कारण: जनसंख्या वृद्धि + उद्योग/कृषि विकास, नलकूप सिंचाई, नगरों में जनसंख्या विस्फोट/सीवर। उपाय: चार्जिंग पिट, वाटर हारवेस्टिंग (छतों का पानी भूमि-टंकी से जोड़ना)।
  4. भूकर मानचित्र क्या है? भूमि उपयोग के अध्ययन में संदर्भ बिन्दु और संकेत चिह्न की भूमिका लिखिए।
    संकेत: गाँव का मानचित्र जिसमें खेतों का आकार/संख्या दिखती है। सर्वेक्षण से पहले कोई स्थायी वस्तु संदर्भ बिन्दु चुनी जाती है; भूमि उपयोग संकेत चिह्नों से दिखाया जाता है (ग = गेहूँ, ध = धान)।
  5. प्रदूषण के चार प्रमुख प्रकार लिखिए और स्थानीय प्रदूषण-अध्ययन के लिए स्थान-चयन के दो विकल्प दीजिए।
    संकेत: मृदा, वायु, जल, ध्वनि प्रदूषण। स्थान: कोई कारखाना/चौराहा, या कृषि क्षेत्र/उसके निकट जलाशय।

प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers

  1. क्षेत्रीय अध्ययन से क्या समझते हैं? उसके महत्त्व और लाभ लिखिए।
    भूगोल का एक अध्ययन उपागम — क्षेत्र विशेष के मानव और परिवेश की प्रत्यक्ष जानकारी, जो मानव-वातावरण संबंध को समझने में संजीवनी का काम करती है। महत्त्व: अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक/सांस्कृतिक/आर्थिक परिस्थितियों और स्थलाकृति, जलवायु, अपवाह, कृषि-उत्पादकता, औद्योगिक विकास, नगरीकरण के प्रभाव को समझना। लाभ: समस्याओं के समन्वित समाधान के उपाय सामने आते हैं, सूक्ष्म स्तर पर क्षेत्र का अध्ययन होता है, स्थानीय समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है।
  2. प्रश्नावली विधि का वर्णन कीजिए — प्रश्न कैसे तैयार किए जाते हैं और उनके प्रकार क्या हैं?
    प्रश्नों को आवश्यकता के अनुसार पहले से शिक्षक की सहायता से तैयार किया जाता है। प्रकार: हाँ/नहीं प्रश्न (जैसे 'क्या आप नौकरी करते हैं?') और बहुविकल्प वाले प्रश्न (कुछ विकल्प दिए जाते हैं, उनमें से केवल एक सही होता है)। सर्वेक्षणकर्ता पहले क्षेत्र की ज्वलंत समस्या पता करता है, फिर प्रश्नावली से जानकारी इकट्ठा करता है और आँकड़ों का अध्ययन कर प्रतिवेदन तैयार करता है।
  3. बिहार में भूमिगत जल-स्तर की गिरावट के कारण, माप और उपाय लिखिए।
    कारण: जनसंख्या वृद्धि, उद्योग/कृषि विकास, नलकूप सिंचाई, नगरों में जनसंख्या विस्फोट/सीवर; गया, नवादा, नालन्दा, जहानाबाद, औरंगाबाद में स्पष्ट गिरावट और गंभीर जल संकट; नगरों के कूड़े-कचरे से वर्षा जल के साथ रिसकर भूमिगत जल प्रदूषित। माप: कुओं में फीते से, नलकूप वेधन में पाइप से; वर्षा ऋतु से पहले/बाद; 4–5 वर्ष पहले के स्तर से तुलना। उपाय: व्यवस्थित कॉलोनी/बहुमंजिली इमारतों की छतों पर जल संचय + पुनःभरण, चार्जिंग पिट, सरकारी कार्यालयों की छतों का पानी पाइप से भूमि-टंकी से जोड़ना (वाटर हारवेस्टिंग), प्रत्येक घर में अपनाना।
  4. भूमि उपयोग के क्षेत्रीय अध्ययन की विधि समझाइए — भूकर मानचित्र, संकेत चिह्न और संयुक्त मानचित्र।
    पूरे गाँव या उसके एक टोले का अध्ययन (आकार पर निर्भर)। भूकर मानचित्र में सभी भूमि उपयोग दर्शाना जरूरी; खेतों का आकार/संख्या प्रदर्शित होती है; सर्वेक्षण से पहले कोई स्थायी वस्तु संदर्भ बिन्दु चुनी जाती है; संकेत चिह्न (ग = गेहूँ, ध = धान)। अलग मानचित्र पर मिट्टी के प्रकार रंग/संरचना से; ढाल/अपवाह/सिंचित-असिंचित पर प्रश्नावली; छात्र-टोलियाँ, सारणीबद्ध, रंगों से प्रदर्शन; मिट्टी/भू-आकृति मानचित्रों का अध्यारोपण = संयुक्त मानचित्र; रिपोर्ट में मानचित्र/सारणियाँ संलग्न।
  5. वायु प्रदूषण के चार स्रोत लिखिए और स्थानीय प्रदूषण-अध्ययन की विधि बताइए।
    नोट: पुस्तक में वायु प्रदूषण के चार स्रोतों की क्रमबद्ध सूची नहीं दी गई है — चर्चा सामान्य रूप में है। अध्याय में उल्लिखित स्रोतों के आधार पर उत्तर: वाहनों की संख्या में वृद्धि (कार्यकलाप बॉक्स), कारखाने/चौराहे से उत्सर्जन, रासायनिक पदार्थों का प्रयोग (कृषि क्षेत्र), नगरों के कूड़े-कचरे और धुआँ/धूल। अध्ययन विधि: प्रदूषित क्षेत्र निर्धारित करना, शिक्षक की मदद से छात्र-समूह बनाकर आँकड़े एकत्र करना, क्षेत्र के लोगों से बातचीत से कारण + ठोस अपशिष्ट + आस-पास प्रभाव + कठिनाइयाँ + मिट्टी अनुपजाऊ होने की जानकारी, स्वास्थ्य प्रभाव निर्धारित करना, प्रतिवेदन तैयार करना।
पुनरावलोकन — याद रखने योग्य बातें
  • क्षेत्रीय अध्ययन एक उपागम है; कार्य-विधि: अवलोकन → प्रश्नावली → आँकड़े → प्रतिवेदन।
  • प्राथमिक आँकड़े क्षेत्र से; द्वितीयक स्रोतों से (नगरपालिका, पंचायत, कृषि/जनगणना विभाग)।
  • भूमिगत जल: माप फीते/पाइप से; बिहार के 5 जिलों में स्पष्ट गिरावट; उपाय — चार्जिंग पिट, वाटर हारवेस्टिंग।
  • भूमि उपयोग: भूकर मानचित्र, संकेत (ग/ध), अध्यारोपित संयुक्त मानचित्र; चित्र-संकेत M/W/B/G/P/K/O।
  • अभ्यास: वस्तुनिष्ठ 2 + लघु 9 + दीर्घ 3 + प्रश्नावली मॉडल 11 + परियोजना 3 = 28 प्रश्न।

अभ्यास — किताब के प्रश्न-प्रकार (उत्तर सहित)

नीचे अध्याय के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर दिए गए उत्तरों से मिलान करें।

अभ्यास — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (2)

अभ्यास — लघु उत्तरीय प्रश्न (9)

अभ्यास — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3)

अभ्यास — क्षेत्रीय अध्ययन : प्रश्नावली मॉडल (11)

अभ्यास — परियोजना कार्य (3)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।