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Class 9 • Geography • Bharat Bhumi evam Log

Chapter 5: प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य प्राणी

भारत के पाँच वन-प्रकार, ऊँचाई के साथ बदलती वनस्पति, वन्य प्राणी और संरक्षण — पुस्तक के अनुसार समझें।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Geography • Book: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य प्राणी — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 9)  |  अध्याय 5  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — अध्याय का विषय-स्तरीय सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य प्राणी के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): ऊँचे पेड़, हिरण और झाड़ियाँ — जंगल के जीवन का एक सामान्य चित्र। यह किताब का चित्र नहीं है।

प्राकृतिक वनस्पति एवं वन्य प्राणी के लिए चित्र

घास के मैदान में हाथी और हिरण — वन्य जीवन का एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

प्राकृतिक वनस्पति — परिभाषा और भारत की समृद्धि

प्राकृतिक वनस्पति से तात्पर्य वैसे पेड़-पौधों से है जो पूरी तरह अपने प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल उगते हैं और बढ़ते हैं। इनके उगने एवं बढ़ने में मनुष्य का किसी भी प्रकार का हाथ नहीं रहता है। इस तरह कृषि की विभिन्न फसलें, फलों के बगीचे वनस्पति तो कहलाएँगे किंतु प्राकृतिक वनस्पति नहीं, क्योंकि कृषिगत फसलें, फलों के बगीचे आदि मनुष्यों द्वारा लगाए जाते हैं।

पुस्तक का बॉक्स: वनस्पति को जन्म के आधार पर दो भागों में बाँटा जाता है — देशज एवं विदेशज। स्थानीय वनस्पति देशज कहलाती है; बाहर से आई हुई वनस्पति विदेशज कहलाती है।

हमारे देश में लगभग 47,000 विभिन्न प्रजातियों के पौधे पाए जाते हैं। इस तरह भारत जैव विविधता के मामले में विश्व में दसवें स्थान पर एवं एशिया में चौथे स्थान पर है। भारत में लगभग 15,000 फूलों के पौधे हैं जो विश्व में फूलों के पौधों का 6% हैं। इस देश में बहुत से बिना फूलों वाले पौधे हैं जैसे फर्न, शैवाल आदि। भारत में लगभग 89,000 प्रजातियों के जानवर तथा विभिन्न प्रकार की ताजे पानी की तथा समुद्री मछलियाँ पाई जाती हैं।

बड़े-बड़े वृक्षों एवं झाड़ियों द्वारा ढँके हुए विशाल क्षेत्र को वन कहते हैं। भारत में प्राचीन समय से वनों का भारी महत्त्व रहा है। दण्डकारण्य, वृन्दावन, नंदनवन, काननवन आदि प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध वन हैं जो ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहे हैं जहाँ भारतीय इतिहास की अनेक महत्त्वपूर्ण धार्मिक घटनाएँ घटित हुई हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में वृक्षों को पूजने की परम्परा रही है। वेदों में तो वनों को समस्त सुखों का आधार माना गया है। अनेक धर्मग्रंथों में वृक्ष को पुत्र तुल्य माना गया है।

वनों की क्षति और विविधता के भौगोलिक कारण

शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि, कृषि के लिये खेतों की बढ़ती हुई माँग, ईंधन की बढ़ती माँग, शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के लिये अधिकाधिक भूमि की आवश्यकता, बाढ़ों का प्रकोप, दावानल का प्रकोप आदि के कारण वनों की काफी क्षति हुई है। मैदानी क्षेत्र में घनी जनसंख्या के कारण वन अब नाम मात्र के रह गए हैं।

भारत में वनस्पति एवं वन्य प्राणियों में इतनी विविधता निम्नलिखित भौगोलिक कारणों से पायी जाती है। पहला — भू-भाग का स्वरूप: पहाड़, पठार एवं मैदानी भागों में एक ही प्रकार की वनस्पति नहीं पायी जाती है। पहाड़ का धरातल काफी उबड़-खाबड़, ऊँचा तथा दुर्गम होता है, इसलिए इस पर अलग तरह की वनस्पतियाँ उगती हैं। पठार अपेक्षाकृत कम ऊँचे होते हैं किन्तु इनका भी धरातल मैदानी भागों की तरह एकदम समतल नहीं होता है, अतः यहाँ की वनस्पति अलग किस्म की होती है। मैदानी भाग का धरातल समतल होता है, अतः मानव बसाव के लिये सबसे सुगम है; यहाँ मनुष्यों का बसाव सबसे अधिक है; लोग कृषि कार्य एवं बस्तियों के लिये प्राकृतिक वनस्पति को काटकर साफ कर दिये हैं, इसलिए मैदानी भागों में प्राकृतिक वनस्पति का सर्वथा अभाव पाया जाता है।

दूसरा — मिट्टी: मिट्टी की अलग-अलग किस्में भी वनस्पति को प्रभावित करती हैं। राजस्थान की बलुआही मिट्टी में विशेष प्रकार की काँटेदार झाड़ियाँ मिलती हैं। वहीं गंगा के डेल्टा प्रदेश में जहाँ दलदल है वहाँ एक खास किस्म के वृक्ष सुंदरी पाए जाते हैं; पर्वतीय भागों में अधिक ऊँचाई पर वृक्षों के वन पाए जाते हैं। पथरीली मिट्टी के क्षेत्र में संकुल वन पाए जाते हैं।

तीसरा — जलवायु। (क) तापमान: हिमालय पर्वत इसका बहुत ही अच्छा उदाहरण है। हिमालय पर्वत पर बढ़ती ऊँचाई के साथ तापमान घटता जाता है और उसी के साथ-साथ पेड़-पौधों की किस्म भी बदलती जाती है। जहाँ तापमान अत्यंत कम होता है वहाँ पौधे उग ही नहीं पाते हैं। (ख) सूर्य का प्रकाश: सूर्य प्रकाश की अवधि, उसका तिरछापन तथा समुद्र तल से ऊँचाई जैसे कारकों का इस पर सीधा प्रभाव पड़ता है। गर्मी के मौसम में अधिक सूर्य प्रकाश मिलने के कारण पेड़-पौधे अधिक बढ़ते हैं। (ग) वर्षण: वर्षा की मात्रा वनस्पति को नमी उपलब्ध कराती है। जैसे-जैसे वर्षा की मात्रा घटती या बढ़ती है वैसे-वैसे वनस्पति में परिवर्तन होता है। पूर्वोत्तर राज्य में जहाँ बहुत अधिक वर्षा होती है वहाँ अत्यन्त सघन वनस्पति एवं सदाबहार वृक्ष पाए जाते हैं। इसके विपरीत पश्चिमी घाट पर्वत की पूर्वी ढलान जो वृष्टि छाया में पड़ता है वहाँ वनस्पति की सघनता, उसका प्रकार एवं उसकी ऊँचाई सभी प्रभावित होते हैं। गंगा के मैदान में जैसे-जैसे हम पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, वर्षा की मात्रा एवं उसकी अवधि घटती जाती है; इसका प्रभाव वनस्पति की सघनता, वृक्षों की ऊँचाई एवं उसके किस्म पर देखने को मिलता है।

वनों की उपयोगिता, पारिस्थितिक तंत्र और जीवोम

वन हमारे लिए इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? मानव-जीवन के लिये इनकी अनेक उपयोगिताएँ हैं: वातावरण की गुणवत्ता को निर्धारित करना — जैसे कार्बन-डायऑक्साइड की मात्रा को संतुलित करना, वर्षा को आकर्षित करना, मिट्टी अपरदन को रोकना, पत्तियों की खाद द्वारा मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाना आदि। इसके साथ-साथ ये हमें अनेक प्रकार के वन उत्पाद भी उपलब्ध कराते हैं जैसे कीमती लकड़ियाँ, जलावन, पशुओं का चारा, शहद, कत्था, जड़ी-बूटियाँ आदि। इसके साथ-साथ वन विभिन्न प्रकार के वन्य-प्राणियों के लिये निवास स्थान भी प्रदान करते हैं।

परियोजना कार्य (पाठ के भीतर): वर्षा ऋतु में अपने मुहल्ले एवं गाँव में वन महोत्सव का आयोजन करें और इसमें मनुष्य के लिये उपयोगी वृक्षों जैसे अर्जुन, कचनार, नीम, कदम्ब आदि को लगाएँ तथा वहाँ रहनेवाले लोगों को पशुओं से इनकी रक्षा के विषय में बताएँ।

पारिस्थितिक तंत्र: पृथ्वी पर पेड़-पौधे तथा जीवों का वितरण काफी हद तक भौतिक दशाएँ एवं जलवायु से प्रभावित होता है। वन खास किस्म की वनस्पति, खास किस्म के प्राणी जगत् को संरक्षण देते हैं। जब किसी जगह की वनस्पति बदल जाती है तो वहाँ के रहने वाले जीव-जंतुओं की संख्या तथा किस्म भी बदल जाती है। किसी भी जगह के पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु अपने भौतिक वातावरण से अंतर्संबंधित होते हैं तथा एक दूसरे से भी संबंधित होते हैं। अतः ये तीनों आपस में मिलकर एक पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं। मनुष्य भी इस पारिस्थितिक तंत्र का एक अभिन्न अंग है। मनुष्य वनों को जब अपने लाभ के लिये काटता है तो वह पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव लाता है तथा अपने भौतिक वातावरण की गुणवत्ता में गिरावट लाता है। इससे पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों एवं जीव-जंतुओं की कई प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने के कगार पर पहुँच गई हैं।

जीवोम: पृथ्वी पर एक खास किस्म वाले वनस्पति-जगत् एवं प्राणी-जगत् वाले विशाल पारिस्थितिक तंत्र को जीवोम कहते हैं, जैसे — मॉनसून जीवोम, मरुस्थलीय जीवोम, विषुवत् रेखीय जीवोम आदि। इन सभी प्रकार के जीवोम में एक खास किस्म की वनस्पति एवं एक खास किस्म के प्राणी-जगत् एक दूसरे से अंतरसंबंधित हैं; ये सभी पृथ्वी के एक विस्तृत क्षेत्र में पाए जाते हैं।

वनस्पति के पाँच प्रकार — एक दृष्टि में

हमारे देश में तापमान, वर्षा एवं धरातल की विविधता पाई जाती है, इसलिए हमारे यहाँ प्राकृतिक वनस्पति में भी विभिन्नता पायी जाती है: (1) उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन, (2) उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन, (3) उष्ण कटिबंधीय कँटीले वन तथा झाड़ियाँ, (4) पर्वतीय वन, (5) मैंग्रोव या डेल्टाई वन।

(1) उष्ण-कटिबंधीय सदाबहार वन

ये वन पश्चिमी घाट के अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह तथा असम के ऊपरी भाग में पाए जाते हैं। यहाँ मोटे तौर पर 200 सें०मी० से अधिक वर्षा होती है तथा बहुत थोड़े समय के लिये ऋतु शुष्क होती है। इस क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा तथा ऊँचे तापमान के कारण वृक्ष काफी अधिक बढ़ते हैं। इनकी ऊँचाई प्रायः 60 मीटर या उससे अधिक होती है तथा ये सघन वन के रूप में विकसित होते हैं। इसके कारण यहाँ सूर्य-प्रकाश धरातल पर नहीं पहुँच पाता है। सूर्य प्रकाश पाने की होड़ में वृक्षों की ऊँचाई बढ़ती जाती है। यहाँ विभिन्न प्रकार की लताएँ वृक्षों से लिपटी रहती हैं तथा धरातल विभिन्न प्रकार की झाड़ियों से आच्छादित रहता है। इस प्रकार के वन में एक जगह से दूसरे जगह जाने में काफी कठिनाई होती है।

वृक्ष अपने पत्ते एक ही बार और एक ही समय पर नहीं गिराते हैं बल्कि थोड़ा-थोड़ा और हर समय गिराते हैं, इसलिए वृक्ष हर समय पत्तियों से लदे हुए नजर आते हैं। अतः इनका नाम सदाबहार जंगल भी है। इस वन में अनेक बहुमूल्य लकड़ियों के वृक्ष पाए जाते हैं जैसे रोजवुड, सिंकोना, आबनूस (एबोनी), बांस इत्यादि। इस जंगल में चूँकि वृक्ष सघन एवं ऊँचे होते हैं, अतः एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर फाँदने वाले जानवर — लंगूर, बंदर एवं इनकी अन्य प्रजातियाँ — पायी जाती हैं। हाथी तथा असम के दलदली भागों में पाया जाने वाला एक सींग वाला गैंडा इसी वन का जंतु है। इसके अलावा यहाँ विभिन्न प्रकार के पक्षी एवं रेंगने वाले जीव एवं कीड़े पाए जाते हैं।

(2) उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन

इन वनों का विस्तार भारत में सबसे अधिक क्षेत्र में है। यहाँ 50 सें०मी० से 200 सें०मी० वर्षा होती है। इसमें वृक्ष अपनी पत्तियों को एक साथ 1 से 2 महीने तक के लिये गिरा देते हैं। अतः वृक्ष काफी समय तक पत्तारहित रहते हैं, इसलिए इन्हें पतझड़ वन कहते हैं।

परियोजना कार्य (पाठ के भीतर): अपने परिवेश में पाए जाने वाले उन सभी वृक्षों को सूचीबद्ध करो जो अपनी पत्तियों को एक साथ गिरा देते हैं और देखने में एकदम नग्न प्रतीत होते हैं; वैसे वृक्षों की भी पहचान करो जो थोड़ा-थोड़ा कर पत्तियाँ गिराते हैं और सालों भर हरा-भरा प्रतीत होते हैं।

नमी की उपलब्धि के आधार पर इन वनों को आर्द्र तथा शुष्क पर्णपाती वनों में बाँटा गया है। आर्द्र पर्णपाती वन वहाँ पाए जाते हैं जहाँ लगभग 100–200 सें०मी० वर्षा होती है। इनका वितरण देश के पूर्वी भाग, उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालय के पर्वतीय प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढाल आदि है। इस वन की प्रमुख विशेषता चंदन तथा सागवान के वृक्ष हैं। बाँस, साल, शीशम, खैर, कुसुम, अर्जुन तथा शहतूत यहाँ पाए जाने वाले अन्य वृक्ष हैं।

शुष्क पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ वर्षा लगभग 50–100 सें०मी० के बीच होती है। ये वन प्रायद्वीपीय पठार के आन्तरिक भाग तथा उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। यहाँ वृक्षों की सघनता अत्यंत कम है। इस क्षेत्र को लोगों ने बड़े पैमाने पर खेती एवं अन्य कार्यों के लिये वन और घास के मैदान को साफ कर दिया है। यहाँ मोटे तौर पर नीम, पीपल, सागवान तथा साल के वृक्ष मिलते हैं।

पर्णपाती जंगलों में ही खास पशु-पक्षी पाए जाते हैं जिसमें सिंह, शेर, जंगली सूअर, हिरण और हाथी की प्रधानता है। यहाँ विविध प्रकार के पक्षी, छिपकली, साँप, कछुआ आदि पाए जाते हैं। इस प्रदेश में मोर बहुतायत में पाए जाते हैं।

(3) उष्ण कटिबंधीय कँटीले वन तथा झाड़ियाँ

जहाँ वर्षा 50 सें०मी० से कम होती है वहाँ अनेक प्रकार के काँटीले वन तथा झाड़ियाँ पाए जाते हैं। इस प्रकार की वनस्पति उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में पाई जाती है। इसके अंतर्गत गुजरात, राजस्थान, हरियाणा के आर्द्रशुष्क क्षेत्र, उत्तर-प्रदेश का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र, मध्य प्रदेश का उत्तर-पश्चिम क्षेत्र आदि सम्मिलित हैं। इसके अंतर्गत खजूर, यूफोर्बिया, एकेसिया (बबूल) तथा नागफनी (कैक्टस) प्रजातियाँ आती हैं।

इन वनस्पतियों के लिये पानी की माँग सबसे महत्त्वपूर्ण है। अतः इसे प्राप्त करने के लिये इनकी जड़ें अत्यंत गहरी होती हैं। पानी को अधिक से अधिक बचा कर रखा जा सके इसलिए इनके तने मोटे होते हैं या पत्तियाँ मोटी, रोएँदार या गूद्देदार होती हैं। भौतिक वातावरण के साथ प्राकृतिक वनस्पति के समायोजन का यह अनूठा उदाहरण है। इन जंगलों में प्रायः चूहे, खरगोश, लोमड़ी, भेड़िया, जंगली गधा और ऊँट जैसे जानवर पाये जाते हैं।

(4) पर्वतीय वन — ऊँचाई के साथ बदलती वनस्पति

धरातल पर अक्षांश के कारण तापमान में अंतर आता है, उसी प्रकार पर्वतीय क्षेत्र में बढ़ती ऊँचाई से तापमान प्रभावित होता है। इस तरह धरातल पर जिस प्रकार अक्षांश के परिवर्तन से वनस्पति का प्रकार बदलता है उसी प्रकार पर्वत पर बढ़ती ऊँचाई के साथ वनस्पति का प्रकार बदलता है।

हिमालय के निचले भागों में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन तथा उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन पाए जाते हैं। 1000 मीटर से 2000 मीटर तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आर्द्र शीतोष्ण कटिबंधीय वन पाए जाते हैं। इनमें चौड़ी पत्ती वाले ओक, लारेल तथा चेस्टनट वृक्षों की प्रधानता है। 1500–3000 मीटर की ऊँचाई के बीच शंकुधारी वृक्ष जैसे चीड़, देवदार, सिल्वर फर, स्प्रूस आदि वृक्ष पाए जाते हैं। इससे अधिक ऊँचाई (लगभग 3,600 मीटर से अधिक) पर अल्पाइन वनस्पति पाई जाती है। इनमें सिल्वर फर, जूनिपर पाइन मुख्य हैं। हिम रेखा और वन रेखा के बीच में घास और फूल के मैदान अवस्थित हैं; गढ़वाल हिमालय में फूलों की घाटी इसका उदाहरण है।

नोट: पुस्तक में ही 1000–2000 और 1500–3000 की पट्टियों का अतिव्यापन है — इस पृष्ठ पर दोनों पट्टियाँ पुस्तक के अनुसार ही दर्ज की गयी हैं।

जैसे-जैसे हिमरेखा से निकटता बढ़ती जाती है वृक्षों का कद घटता जाता है। तेज हवा के कारण वृक्षों का आकार टेढ़ा-मेढ़ा होता जाता है। अंततः इनकी संख्या नगण्य हो जाती है। इसके बाद अल्पाइन घास पाया जाता है। इसका उपयोग गुज्जर एवं बक्करवाल जैसी जनजातियाँ गर्मी में पशुचारण के लिये करती हैं; जाड़े में जब तापमान एकदम कम हो जाता है तब ये निचली घाटियों में उतर जाते हैं।

इन वनों में प्रायः कश्मीरी महामृग (हंगुल), चितरा हिरण, खरगोश, जंगली भेड़, तिब्बती बारहसिंगा, याक, हिम तेंदुआ, गिलहरी, रीछ, घने बालों वाली बकरियाँ और भेड़ आदि पाए जाते हैं। अपने पशुओं के चारण हेतु गर्मी-ऋतु में अधिक ऊँचाई पर चढ़कर तथा जाड़े में घाटी में उतरकर पशु चारण की क्रिया को ट्रांसह्यूमन (पुस्तक में 'ट्रांसदयुमन' छपा है) कहा जाता है।

(5) मैंग्रोव वन

यह एक विशेष प्रकार की वनस्पति है जो समुद्री तटीय क्षेत्रों में डेल्टाई एवं दलदल प्रदेशों में पायी जाती है। यहाँ समुद्र का नमकीन जल तथा नदियों के मीठे जल द्वारा लाए गए महीन पंक एवं बालू द्वारा निर्मित दलदल एक विशेष पारिस्थितिक तंत्र को जन्म देते हैं जिसमें सुंदरी नामक वृक्ष बहुलता से पाया जाता है। इन वृक्षों की जड़ें पानी के ऊपर तक निकली होती हैं। ऐसा लगता है मानों पक्षियों के पंजे पानी में धँसे हुए हैं।

यह वनस्पति गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियों के डेल्टाई भागों में तथा अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के आंतरिक तटीय भागों में पायी जाती है। सुन्दरवन प्रदेश में रॉयल बंगाल टाइगर सबसे प्रसिद्ध जानवर पाया जाता है। इसके अलावा मगरमच्छ, घड़ियाल, कछुआ, साँप आदि भी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

औषधीय पादप

भारत प्राचीन समय से ही अपने मसालों एवं जड़ी-बूटियों के लिये प्रसिद्ध रहा है। आयुर्वेद भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति में विभिन्न जड़ी-बूटियों का समावेश रहा है। हमारी भारतीय संस्कृति में घरेलू नुस्खे द्वारा भी इन जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर आम बीमारियों को दूर करने का प्रचलन है। आयुर्वेद में लगभग 2000 पादपों का वर्णन है और कम से कम 500 तो निरंतर प्रयोग में आते रहे हैं। विश्व संरक्षण संघ (IUCN) ने लाल सूची के अंतर्गत 352 पादपों को शामिल किया है जिनमें 52 पादप अति संकटग्रस्त हैं और 49 किस्में तो नष्ट होने के कगार पर हैं।

कार्य: अपने क्षेत्र के औषधीय पौधों की पहचान करें; उनके नामों को सूचीबद्ध कर उसके उपयोग को लिखें; इस कार्य में गाँव के बड़े-बूढ़ों की भी मदद लें।

वन्य प्राणी

वनस्पति की ही भाँति भारत वन्य प्राणियों में भी धनी है। यहाँ जीवों की 89,000 प्रजातियाँ मिलती हैं। देश में 1200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह विश्व की कुल वन्य प्राणी प्रजातियों का 13% है। मछलियों की भी यहाँ 2,500 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जो विश्व की लगभग 12% हैं। भारत में विश्व के 5% से 8% तक स्तनधारी जानवर, उभयचर तथा रेंगने वाले जीव पाए जाते हैं।

स्तनधारी जीवों में हाथी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। ये भारत के उष्णार्द्र वनों में पाए जाते हैं। एक सींग वाला गैंडा अन्य महत्त्वपूर्ण जानवर है जो असम के दलदली क्षेत्रों में रहता है। कच्छ के रन तथा थार के मरुस्थल में क्रमशः जंगली गधे तथा ऊँट पाए जाते हैं। भारतीय भैंसा, नीलगाय, छोटा मृग (गैजल) तथा विभिन्न प्रजातियों वाले हिरण आदि कुछ अन्य जानवर हैं जो भारत के जंगलों में पाए जाते हैं। यहाँ बंदरों की अनेक प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं।

पुस्तक का बॉक्स: क्या आप जानते हैं कि भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में लागू किया गया है? भारत विश्व का अकेला देश है जहाँ शेर और बाघ दोनों ही पाए जाते हैं। गुजरात के गिर जंगल में भारतीय सिंहों का प्राकृतिक निवास स्थान है। भारतीय बाघ का निवास स्थान पश्चिम बंगाल का सुंदर वन, मध्य प्रदेश, झारखंड तथा हिमालयी क्षेत्रों के वन प्रदेश हैं। लद्दाख के ठंढे प्रदेशों में याक पाया जाता है जो गुच्छेदार सींगों वाला तथा बोझ ढोने वाला, बैल की तरह का पशु है।

नदियाँ, झील तथा समुद्री क्षेत्रों में कछुए, मगरमच्छ तथा घड़ियाल पाए जाते हैं। पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है जहाँ घड़ियाल पाया जाता है। पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में दीघा समुद्री तट पर विश्व प्रसिद्ध बड़े-बड़े कछुए पाए जाते हैं। भारत में पक्षियों की अनेकानेक प्रजातियाँ हैं: मोर, तोता, मैना, सारस, बत्तख, कबूतर आदि देश के वनों एवं आर्द्र क्षेत्र में रहते हैं।

प्रवासी पक्षी: भारत के कुछ दलदली भाग प्रवासी पक्षियों के लिये प्रसिद्ध हैं। शीत ऋतु में साइबेरियन सारस बहुत बड़ी संख्या में भारत आते हैं। इनके कुछ मनपसंद स्थान गुजरात में कच्छ का रण, राजस्थान स्थित भरतपुर पक्षी विहार तथा बेगूसराय में काँवर झील के पास गंगा नदी के किनारे का क्षेत्र हैं। पटना में मोकामा का टाल क्षेत्र भी कई प्रकार के पक्षियों का निवास स्थान एवं क्रीड़ा स्थल है।

हमने अपनी फसलों का चयन जैव विविध वातावरण के संदर्भ में किया है; इसी तरह औषधि पादपों का चुनाव भी प्रकृति में उपलब्ध औषधीय जड़ी-बूटी के भंडार से किया है। दूध देने वाले पशु भी प्रकृति में वर्तमान अनेक पशुओं में से चुने गए हैं। पशुओं से हमें विभिन्न प्रकार के आहार, परिवहन, कृषि कार्य में मदद आदि प्राप्त होती है। बहुत से कीड़े-मकोड़े हमें फसलों एवं फूलों के परागण में मदद करते हैं तथा हानिकारक कीड़ों का भक्षण करते हैं और इस तरह उन पर जैविक नियंत्रण करते हैं। प्रत्येक प्रजाति का पारिस्थितिक तंत्र के सफल संचालन में योगदान है, अतः उनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

हम सभी जानते हैं कि प्रकृति के अत्यधिक दोहन के कारण कई पादप तथा जीव संकटग्रस्त हो गए हैं और पारिस्थितिक तंत्र में असंतुलन पैदा हो गया है। लगभग 300 पादप प्रजातियाँ संकट में हैं तथा 20 प्रजातियाँ विनष्ट हो चुकी हैं। कई वन्य जीवन प्रजातियाँ भी संकटग्रस्त हैं तथा कई विलुप्त होने के कगार पर हैं।

संरक्षण के प्रयास

पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन का प्रमुख कारण बढ़ती हुई जनसंख्या का दबाव, कृषि तथा निवास के लिये वनों की अंधाधुंध कटाई, रासायनिक तथा औद्योगिक अवशिष्ट तथा अम्लीय जमाव के कारण प्रदूषण, लालची व्यवसायियों का अपने व्यवसाय के लिये अत्यधिक शिकार करना आदि है।

अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिये कई कदम उठाए गए हैं। (क) देश में चौदह जीवमंडल निचय (आरक्षित क्षेत्र) स्थापित किये गए हैं। इनमें से चार की गणना विश्व के जीवमंडल निचयों में की गई है: सुंदरवन (पश्चिम बंगाल), नंदा देवी (उत्तरांचल), मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु), नीलगिरि (केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु)। चौदह के नाम: सुंदरवन, मन्नार की खाड़ी, नीलगिरि, नंदा देवी, नोकरेक, ग्रेट निकोबार, मानस, सिमलीपाल, दिहांग-दिबांग, डिब्रू-साइखोवा, अगस्त्यमलाई, कंचनजंघा, पंचमढ़ी, अचनकमार-अमरकंटक।

(ख) 1992 से सरकार द्वारा पादप उद्यानों को वित्तीय तथा तकनीकी सहायता देने की योजना बनाई गई है। (ग) शेर संरक्षण, गैंडा संरक्षण, भैंसा संरक्षण, घड़ियाल संरक्षण आदि अनेक योजनाएँ बनाई गई हैं एवं उनका क्रियान्वयन हो रहा है। (घ) 89 नेशनल पार्क, लगभग 500 वन्य प्राणी अभयवन और कई चिड़ियाघर राष्ट्र की पादप और जीव के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए बनाए गए हैं।

Key Terms — मुख्य शब्द

  • प्राकृतिक वनस्पति — पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल उगने-बढ़ने वाले पेड़-पौधे; इनमें मनुष्य का हाथ नहीं होता। कृषि फसलें/बगीचे प्राकृतिक वनस्पति नहीं हैं।
  • देशज / विदेशज — स्थानीय वनस्पति देशज; बाहर से आई हुई वनस्पति विदेशज।
  • पारिस्थितिक तंत्र — किसी जगह के पेड़-पौधे, जीव-जंतु और भौतिक वातावरण का अंतर्संबंधित तंत्र; मनुष्य भी इसका अभिन्न अंग है।
  • जीवोम — एक खास किस्म की वनस्पति एवं प्राणी-जगत् वाला विशाल पारिस्थितिक तंत्र; उदाहरण — मॉनसून, मरुस्थलीय, विषुवत् रेखीय जीवोम।
  • सदाबहार वन — पत्ते एक साथ नहीं, थोड़ा-थोड़ा हर समय गिराने वाले वन; वर्षा 200 सें०मी० से अधिक; वृक्ष 60 मी०+ ऊँचे।
  • पर्णपाती (पतझड़) वन — वृक्ष 1–2 महीने के लिए एक साथ पत्ते गिरा देते हैं; वर्षा 50–200 सें०मी०; भारत में सबसे अधिक क्षेत्र में।
  • कँटीले वन — वर्षा 50 सें०मी० से कम; गहरी जड़ें, मोटे तने, मोटी/रोएँदार/गूद्देदार पत्तियाँ — पानी बचाने का अनुकूलन।
  • मैंग्रोव वन — डेल्टाई/दलदली तटीय वन; सुंदरी वृक्ष की जड़ें पानी के ऊपर निकली होती हैं; रॉयल बंगाल टाइगर का घर।
  • ट्रांसह्यूमन — गर्मी में पशुओं के साथ अधिक ऊँचाई पर चढ़ना और जाड़े में घाटी में उतरना (गुज्जर, बक्करवाल); पुस्तक में 'ट्रांसदयुमन' छपा है।
  • जीवमंडल निचय — संरक्षित आरक्षित क्षेत्र; भारत में चौदह, जिनमें से चार विश्व के जीवमंडल निचयों में गिने जाते हैं।
  • लाल सूची — विश्व संरक्षण संघ की सूची; 352 पादप शामिल — 52 अति संकटग्रस्त, 49 नष्ट होने के कगार पर।

Remember — याद रखें

  • पादप प्रजातियाँ लगभग 47,000; फूलों वाले पौधे लगभग 15,000 (विश्व का 6%); जीव प्रजातियाँ लगभग 89,000।
  • जैव विविधता: विश्व में 10वाँ, एशिया में 4था स्थान; पक्षी 1200+ (विश्व का 13%); मछलियाँ 2,500 (विश्व की लगभग 12%); स्तनधारी/उभयचर/रेंगने वाले 5–8%。
  • वन-प्रकार और वर्षा: सदाबहार 200+ सें०मी०; पर्णपाती 50–200 (आर्द्र लगभग 100–200, शुष्क लगभग 50–100); कँटीले <50 सें०मी०।
  • पर्वतीय पट्टियाँ: निचला — सदाबहार/पर्णपाती; 1000–2000 मी० — आर्द्र शीतोष्ण (ओक, लारेल, चेस्टनट); 1500–3000 मी० — शंकुधारी (चीड़, देवदार, सिल्वर फर, स्प्रूस); 3600 मी०+ — अल्पाइन।
  • मैंग्रोव: गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी के डेल्टा + अंडमान-निकोबार तट; सुंदरी वृक्ष; रॉयल बंगाल टाइगर।
  • आयुर्वेद में लगभग 2000 पादपों का वर्णन, कम से कम 500 निरंतर प्रयोग में; लगभग 300 पादप संकट में, 20 विनष्ट।
  • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972; शेर — गिर (गुजरात); बाघ — सुंदरवन, मध्य प्रदेश, झारखंड, हिमालयी वन; एक सींग वाला गैंडा — असम के दलदल; घड़ियाल — केवल भारत में।
  • चौदह जीवमंडल निचय; विश्व-सूची में चार — सुंदरवन, नंदा देवी, मन्नार की खाड़ी, नीलगिरि; 89 नेशनल पार्क; पादप-उद्यान सहायता योजना 1992 से।
  • प्रवासी पक्षी: साइबेरियन सारस — कच्छ का रण, भरतपुर, काँवर झील (बेगूसराय); मोकामा का टाल (पटना) भी पक्षी-स्थल।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सबसे बड़ी भूल: पाँचों वन-प्रकारों की वर्षा-सीमाएँ उल्टा लिखना — सदाबहार 200+, पर्णपाती 50–200, कँटीले <50। दूसरी भूल: वस्तुनिष्ठ प्रश्न 3 में 'वनस्पति प्रजातियाँ' पूछी गयी हैं पर विकल्प 89,000 (जीवों की संख्या) से मेल खाते हैं — पाठ में पादप 47,000 हैं; उत्तर विकल्प के अनुसार (क) 89000 लिखें और नोट में असंगति दर्ज करें। तीसरी भूल: शेर और बाघ का निवास उल्टा लिखना — शेर गिर (गुजरात), बाघ सुंदरवन/मध्य प्रदेश/झारखंड/हिमालयी वन।

Chart / Table: वनस्पति के प्रकार — वर्षा, क्षेत्र और मुख्य वृक्ष/जीव

वन-प्रकारवर्षामुख्य क्षेत्रमुख्य वृक्ष / जीव
उष्ण कटिबंधीय सदाबहार200 सें०मी० से अधिकपश्चिमी घाट (अधिक वर्षा), अंडमान-निकोबार, असम का ऊपरी भागरोजवुड, सिंकोना, आबनूस, बांस; लंगूर, बंदर, हाथी, एक सींग वाला गैंडा
उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती (आर्द्र)लगभग 100–200 सें०मी०पूर्वी भाग, उत्तर-पूर्वी राज्य, हिमालय पर्वतीय प्रदेश, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढालचंदन, सागवान, बाँस, साल, शीशम, खैर, कुसुम, अर्जुन, शहतूत
उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती (शुष्क)लगभग 50–100 सें०मी०प्रायद्वीपीय पठार का आंतरिक भाग, उत्तर प्रदेशनीम, पीपल, सागवान, साल; सिंह, शेर, सूअर, हिरण, हाथी, मोर
उष्ण कटिबंधीय कँटीले वन/झाड़ियाँ50 सें०मी० से कमगुजरात, राजस्थान, हरियाणा (आर्द्रशुष्क), दक्षिण-पश्चिम UP, उत्तर-पश्चिम MPखजूर, यूफोर्बिया, बबूल, नागफनी; चूहे, खरगोश, लोमड़ी, भेड़िया, जंगली गधा, ऊँट
पर्वतीय वनऊँचाई के अनुसारहिमालय: 1000–2000 मी० शीतोष्ण; 1500–3000 मी० शंकुधारी; 3600 मी०+ अल्पाइनओक, लारेल, चेस्टनट; चीड़, देवदार, सिल्वर फर, स्प्रूस; हंगुल, याक, हिम तेंदुआ
मैंग्रोव / डेल्टाई वनतटीय डेल्टा/दलदलगंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी डेल्टा; अंडमान-निकोबार तटसुंदरी; रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, कछुआ, साँप

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. प्राकृतिक वनस्पति की परिभाषा लिखिए और बताइए कि गेहूँ की फसल प्राकृतिक वनस्पति क्यों नहीं है।
    संकेत: प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल बिना मनुष्य के हाथ के उगने-बढ़ने वाले पौधे; गेहूँ मनुष्य द्वारा लगाया जाता है, इसलिए नहीं।
  2. वर्षा के आधार पर तीन वन-प्रकारों की सीमाएँ और एक-एक क्षेत्र लिखिए।
    संकेत: सदाबहार 200+ (पश्चिमी घाट); पर्णपाती 50–200 (सबसे अधिक क्षेत्र); कँटीले <50 (राजस्थान/गुजरात)।
  3. हिमालय में ऊँचाई के साथ वनस्पति कैसे बदलती है? चार पट्टियाँ क्रम से लिखिए।
    संकेत: निचला सदाबहार/पर्णपाती → 1000–2000 शीतोष्ण → 1500–3000 शंकुधारी → 3600+ अल्पाइन।
  4. पारिस्थितिक तंत्र और जीवोम में अंतर एक-एक उदाहरण सहित लिखिए।
    संकेत: तंत्र = किसी जगह के पौधे+जीव+वातावरण का अंतर्संबंध; जीवोम = विशाल क्षेत्र का वैसा तंत्र (मॉनसून जीवोम)।
  5. भारत के पाँच संकट-संकेत लिखिए (लाल सूची, विनष्ट प्रजातियाँ, संरक्षण उपाय)।
    संकेत: 352 लाल-सूची पादप (52 अति संकटग्रस्त, 49 कगार पर); ~300 संकट में, 20 विनष्ट; 14 जीवमंडल निचय, 1972 अधिनियम, शेर/गैंडा/घड़ियाल योजनाएँ।

प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers

  1. प्राकृतिक वनस्पति किसे कहते हैं? देशज और विदेशज में क्या अंतर है?
    पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल, बिना मनुष्य के हाथ के उगने-बढ़ने वाले पेड़-पौधे प्राकृतिक वनस्पति हैं; कृषि फसलें और बगीचे इसमें नहीं आते। स्थानीय वनस्पति देशज कहलाती है, बाहर से आई हुई विदेशज।
  2. भारत में वनस्पति की विविधता के तीन भौगोलिक कारण समझाइए।
    (1) भू-भाग का स्वरूप — पहाड़/पठार/मैदान में अलग वनस्पति; मैदान में बसाव अधिक होने से प्राकृतिक वनस्पति का अभाव। (2) मिट्टी — बलुआही में काँटेदार झाड़ियाँ, डेल्टा-दलदल में सुंदरी, पथरीली में संकुल वन। (3) जलवायु — तापमान (ऊँचाई के साथ घटता है), सूर्य-प्रकाश (अवधि/तिरछापन/ऊँचाई), वर्षण (मात्रा घटने-बढ़ने से वनस्पति बदलती है)।
  3. सदाबहार और पर्णपाती वनों में चार अंतर बताइए।
    सदाबहार: वर्षा 200+ सें०मी०, वृक्ष 60 मी०+, पत्ते थोड़ा-थोड़ा हर समय गिरते हैं (सदा हरे), क्षेत्र — पश्चिमी घाट/अंडमान/ऊपरी असम। पर्णपाती: वर्षा 50–200 सें०मी०, वृक्ष 1–2 महीने एक साथ पत्ते गिराते हैं (पतझड़), सबसे अधिक क्षेत्र, चंदन-सागवान प्रमुख।
  4. पर्वतीय वन की ऊँचाई-पट्टियाँ और मैंग्रोव वन की विशेषताएँ लिखिए।
    पर्वतीय: निचला सदाबहार/पर्णपाती; 1000–2000 मी० आर्द्र शीतोष्ण (ओक, लारेल, चेस्टनट); 1500–3000 मी० शंकुधारी (चीड़, देवदार, सिल्वर फर, स्प्रूस); 3600 मी०+ अल्पाइन (सिल्वर फर, जूनिपर पाइन); हिम-वन रेखा के बीच घास-फूल मैदान (फूलों की घाटी)। मैंग्रोव: डेल्टाई/दलदली तट, सुंदरी वृक्ष की जड़ें पानी के ऊपर, रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल।
  5. भारत में वन्य प्राणियों की समृद्धि और संरक्षण के उपाय बताइए।
    89,000 जीव प्रजातियाँ; पक्षी 1200+ (13%); मछलियाँ 2,500 (~12%); स्तनधारी/उभयचर/रेंगने वाले 5–8%। शेर गिर में, बाघ सुंदरवन/मध्य प्रदेश/झारखंड/हिमालयी वन में, एक सींग वाला गैंडा असम में, घड़ियाल केवल भारत में। संरक्षण: 1972 अधिनियम, 14 जीवमंडल निचय (4 विश्व-सूची में), 89 नेशनल पार्क, शेर/गैंडा/भैंसा/घड़ियाल योजनाएँ, 1992 से पादप-उद्यान सहायता।
पुनरावलोकन — याद रखने योग्य बातें
  • प्राकृतिक वनस्पति = बिना मनुष्य के हाथ के, वातावरण के अनुकूल उगने वाले पौधे; देशज स्थानीय, विदेशज बाहर से।
  • पादप ~47,000; फूलों वाले ~15,000 (6%); जीव ~89,000; जैव विविधता — विश्व 10वाँ, एशिया 4था।
  • पाँच वन: सदाबहार (200+), पर्णपाती (50–200), कँटीले (<50), पर्वतीय (ऊँचाई-पट्टियाँ), मैंग्रोव (डेल्टा, सुंदरी)।
  • तंत्र = पौधे+जीव+वातावरण का अंतर्संबंध; जीवोम = विशाल क्षेत्र का वैसा तंत्र; ट्रांसह्यूमन = ऋतु-प्रवास पशुचारण।
  • संरक्षण: 1972 अधिनियम; 14 जीवमंडल निचय (4 विश्व-सूची में); लाल सूची 352 (52 अति संकटग्रस्त, 49 कगार पर)।

अभ्यास — किताब के प्रश्न-प्रकार (उत्तर सहित)

नीचे अध्याय के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर दिए गए उत्तरों से मिलान करें।

अभ्यास — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (3 प्रश्न)

अभ्यास — रिक्त स्थानों की पूर्ति (5 प्रश्न)

अभ्यास — कारण बताओ (4 प्रश्न)

अभ्यास — लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न)

अभ्यास — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3 प्रश्न)

अभ्यास — मानचित्र कौशल (2 कार्य)

अभ्यास — परियोजना कार्य (4 कार्य)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।