Chapter 3: अपवाह स्वरूप
नदियों का जाल — हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियाँ, झीलों के प्रकार, प्रदूषण और संरक्षण, पुस्तक के अनुसार समझें।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Geography • Book: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
अपवाह स्वरूप — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 9) | अध्याय 3 | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): मुख्य नदी, सहायक नदियाँ और डेल्टा — अपवाह तंत्र का एक सामान्य चित्र। यह किताब का चित्र नहीं है।

मैदान से बहती चौड़ी नदी — एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
परिचय — अपवाह, द्रोणी और जलविभाजक
'अपवाह' शब्द से तात्पर्य जल प्रवाह से है। विविध क्षेत्रों से आनेवाली छोटी-छोटी जल धाराएँ आपस में मिलकर एक मुख्य नदी का निर्माण कर लेती हैं; अंततः इन नदियों का जल किसी बड़े जलाशय जैसे झील, समुद्र या खाड़ी में प्रवाहित हो जाता है।
एक नदी तंत्र द्वारा जिस क्षेत्र का जल प्रवाहित होता है उसे अपवाह द्रोणी (बेसिन) कहा जाता है। जब कोई ऊँचा क्षेत्र, जैसे पर्वत या उच्चभूमि, दो निकटवर्ती अपवाह द्रोणियों को एक दूसरे से अलग करती है तब ऐसी उच्चभूमि जलविभाजक कहलाती है।
किसी भी अपवाह तंत्र का विकास वहाँ की भू-आकृतियों से निर्धारित होता है। भू-आकृति के आधार पर भारत की नदियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है: 1. हिमालय की नदियाँ तथा 2. प्रायद्वीपीय नदियाँ।
पुस्तक का बॉक्स बताता है कि विश्व की सबसे बड़ी अपवाह बेसिन आमेजन नदी की है, और पूछता है कि भारत में किस नदी का अपवाह बेसिन सबसे बड़ा है। पुस्तक यह भी बताती है कि नदियाँ अपने गाद से प्राकृतिक तटबंध बनाती हैं, जो बाढ़ क्षेत्र में मानव अधिवास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माने जाते हैं — और पूछती है कि बिहार की राजधानी पटना किस नदी के प्राकृतिक तटबंध पर अवस्थित है (गंगा के)।
हिमालय की नदियाँ — बारहमासी और गॉर्ज बनाने वाली
हिमालय की अधिकांश नदियाँ बारहमासी अथवा स्थायी हैं। इन्हें वर्षा के जल के अतिरिक्त पर्वत की चोटियों पर जमे हिम के पिघलने से सालोंभर जलापूर्ति होती रहती है। सिंधु एवं ब्रह्मपुत्र जैसी भारत की प्रमुख नदियाँ हिमालय से निकलती हैं। इन नदियों ने प्रवाह के क्रम में पर्वतों को काटकर गॉर्ज का निर्माण किया है।
ये नदियाँ अपने मार्ग के ऊपरी भाग में तीव्र अपरदन करती हैं और सिल्ट, बालू, मिट्टी जैसे अपरदित पदार्थों का संवहन करती हैं। ज्यों-ज्यों नदियाँ आगे बढ़ती हैं, अवसाद की मात्रा बढ़ती जाती है। मध्य एवं निचले मार्ग में जहाँ भूमि की ढाल कम हो जाती है, नदियों को संवहन करने में कठिनाई होने लगती है। परिणामतः नदियाँ विसर्पित होकर गोखुर झील, बाढ़ का मैदान और डेल्टा जैसी अनेक आकृतियों का निर्माण करती हैं।
प्रायद्वीपीय नदियाँ — मौसमी, छिछली और कम लम्बी
यहाँ की अधिकांश नदियाँ मौसमी हैं, जिनका स्रोत मुख्यतः वर्षा जल है। ग्रीष्म ऋतु एवं शुष्क मौसम में जब वर्षा नहीं होती, यहाँ की बड़ी-बड़ी नदियों का जलस्तर घटकर छोटी-छोटी धाराओं या नलिकाओं में परिणत हो जाता है।
इनमें से कुछ नदियाँ पठारी भाग तथा पश्चिमी घाट पर्वत से निकलकर पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती हैं। किंतु प्रायद्वीपीय भारत की अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये नदियाँ छिछली और कम लम्बी हैं और अनेक जगहों पर जलप्रपात का निर्माण करती हैं।
बंगाल की खाड़ी में गिरनेवाली नदियों द्वारा डेल्टा और अरब सागर में गिरने वाली नदियों द्वारा ज्वारनदमुख (एस्चुअरी) का निर्माण होता है — यह अंतर परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
सिंधु नदी
सिंधु नदी भारत की विशालतम नदियों में से एक है। यह तिब्बत के समीप मानसरोवर झील से निकलकर दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती हुई भारत में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जिले में प्रवेश करती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ जास्कर, नूब्रा, श्योक तथा हंजा हैं।
लद्दाख में सिंधु नदी गॉर्ज का निर्माण करती है, जिसे गिलगिट गॉर्ज कहते हैं — यह पर्यटन के लिए आकर्षण का केन्द्र-बिन्दु है। बलूचिस्तान तथा गिलगिट से होते हुए यह नदी अटक में पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकल जाती है। यहाँ मिठानकोट (पाकिस्तान) के समीप सतलुज, व्यास, रावी, चिनाव तथा झेलम आदि नदियाँ सिंधु से मिल जाती हैं।
तत्पश्चात् यह नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर कराँची से पूर्व मैदान का निर्माण करते हुए अरब सागर में जा गिरती है। हिमालय से निकलने वाली इस नदी की लम्बाई लगभग 2900 कि०मी० है। इस नदी का एक तिहाई प्रवाह क्षेत्र भारत (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं पंजाब) में और शेष पाकिस्तान में स्थित है।
सावधानी: पुस्तक में सिंधु का प्रवाह क्षेत्र 'लगभग 250 वर्ग कि०मी०' छपा है — यह आँकड़ा स्पष्टतः अधूरा/त्रुटिपूर्ण है, इसलिए इस पृष्ठ पर प्रवाह-क्षेत्र का आँकड़ा उद्धृत नहीं किया गया है। उत्तर में यह आँकड़ा कभी न लिखें।
गंगा नदी
इस नदी की मुख्य धारा 'भागीरथी' की उत्पत्ति हिमालय स्थित गंगोत्री हिमानी के 'गोमुख' से हुई है। अलकनंदा उत्तराखण्ड स्थित देवप्रयाग में भागीरथी से मिल जाती है तथा गंगा नदी के नाम से प्रवाहित होती है। हरिद्वार के समीप गंगा नदी मैदानी भाग में प्रवेश करती है।
इस नदी की लम्बाई 2,525 कि०मी० है, जो देश के अन्तर्गत उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल राज्यों से बहती हुई फरक्का होते हुए बंगलादेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसे पद्मा के नाम से पुकारा जाता है। हुगली नदी भारत में गंगा की मुख्य शाखा (वितरिका) है।
हिमालय की अनेक नदियाँ — यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी आदि — अपने जल को गंगा में उत्सर्जित करती हैं। इसके अतिरिक्त केन्द्रीय उच्चभूमि से निकलने वाली नदियाँ, जैसे सोन, भी गंगा में मिल जाती हैं।
फरक्का के समीप गंगा नदी दो भागों में बँटती है। प्रथम भाग हुगली गंगा की वितरिका के रूप में डेल्टा से होते हुए बंगाल की खाड़ी में जा गिरता है। दूसरा भाग मुख्यधारा के रूप में बंगलादेश में प्रविष्ट होता है जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी इसमें आकर मिल जाती है। इस संगम को 'मेघना' के नाम से पुकारा जाता है। गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व एक विशाल डेल्टा का निर्माण करती हैं — 'सुन्दरवन' का डेल्टा।
जल विभाजक का उदाहरण: सिंधु एवं गंगा नदी के मध्य अरावली की उच्च भूमि जल विभाजक है। अरावली से सुन्दरवन तक मैदान की लंबाई 800 कि०मी० है; इसकी ढाल 1 मीटर/6 कि०मी० की दर से सुन्दरवन की तरफ घटती जाती है।
ब्रह्मपुत्र नदी
इस नदी की उत्पत्ति तिब्बत स्थित मानसरोवर झील से हुई है। इसकी लंबाई 2900 कि०मी० से भी अधिक है पर इसका अधिकांश प्रवाह क्षेत्र, सिंधु की ही भांति, भारत से बाहर स्थित है। यह उत्तर में हिमालय के समानान्तर प्रवाहित होकर नामचा बरवा शिखर के समीप अंग्रेजी के U आकार की मोड़ बनाकर अरुणाचल प्रदेश में गॉर्ज के माध्यम से प्रवेश करती है। इसे यहाँ स्थानीय भाषा में 'दिहांग' के नाम से भी जानते हैं।
असम के समीप बुड़ी दिहांग, दिसांग, कपोली (कपिली), लोहित, केनुला एवं अन्य सहायक नदियाँ दक्षिण से आकर ब्रह्मपुत्र नदी से मिल जाती हैं। हिमालय से आकर मिलने वाली सहायक नदियों में सुवंश्री (सुबनसिरी), कामेंग, धनश्री (धनसिरी), मनष (मानस) और तिस्ता हैं।
ब्रह्मपुत्र का उद्गम क्षेत्र तिब्बत एक शीत एवं शुष्क क्षेत्र है, जहाँ नदी के जल में सिल्ट की मात्रा नगण्य होती है; किन्तु जब यह नदी उच्च पर्वत क्षेत्र से गुजरती है तथा असम में जब अनेक धाराएँ इनसे मिलती हैं तो नदी में जल और सिल्ट की मात्रा और अधिक बढ़ जाती है। यहाँ यह गुंफित होकर अनेक द्वीपों (दियारा) को जन्म देती है।
प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में नदी की घाटी में अवसाद की मात्रा बढ़ने से जल का प्रवाह तटबंधों को पारकर अगल-बगल के क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ का स्वरूप धारण कर लेता है। इससे असम एवं बंगलादेश में भारी जान-माल की क्षति होती है। अन्य हिमालयी नदियों की अपेक्षा ब्रह्मपुत्र नदी में सिल्ट की अधिक मात्रा में निक्षेप से नदी के मार्ग में बार-बार परिवर्तन होता रहता है।
पुस्तक का बॉक्स बताता है कि ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में शांग-पो और बंगलादेश में 'जमुना' के नाम से पुकारा जाता है और यह एक प्रकार की पूर्ववर्ती नदी है। कार्य-कलाप: बिहार में प्रवाहित होने वाली प्रमुख पूर्ववर्ती नदियों को सूचीबद्ध कीजिए।
यमुना, घाघरा, गंडक, कोसी
यमुना नदी महान हिमालय के 'यमुनोत्री' हिमानी से निकलकर 1375 कि०मी० की दूरी तय करते हुए प्रयाग (इलाहाबाद) के निकट गंगा में मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ चम्बल, बेतवा, केन आदि हैं जो इसके दाहिने तट से आकर मिलती हैं।
घाघरा ट्राँस-हिमालयन क्षेत्र के करनाली स्थित मापचा चूँगो हिमनद से निकलती है; दक्षिण-पूर्व दिशा में बहकर हिमालय को पार करती है। पर्वतीय क्षेत्र में करनाली एवं मैदानी क्षेत्र में घाघरा के नाम से जानी जाती है; नेपाल से प्रवाहित होकर छपरा के पास शारदा नदी का जलग्रहण कर गंगा से मिल जाती है। उत्तर प्रदेश में इसे सरयू के नाम से भी पुकारा जाता है।
गंडक नदी महान हिमालय से निकलकर नेपाल होते हुए बिहार के चंपारण में प्रवेश करती है। इस नदी के परिवहन मार्ग में तीव्र परिवर्तन और अवसाद से अत्यधिक निक्षेपण से यहाँ बाढ़ की आशंका बनी रहती है। इस नदी के साथ कई पौराणिक किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं।
कोसी नदी महान हिमालय के गोसाईथान से निकलकर नेपाल होते हुए बिहार के सुपौल जिला में प्रवेश करती है। उद्गम स्थल के समीप कोसी की मुख्यधारा 'अरुण' कहलाती है। अन्य सहायक धाराओं में मिलाची, भोटिया, सप्तकोशी, ताम्बा, लिक्खू, दुग्ध तथा तम्बूर प्रमुख हैं। कोसी कई अन्य धाराओं को समाहित कर कुरसेला (सहरसा) के निकट गंगा से जाकर मिल जाती है। पुस्तक के अनुसार इस नदी की लंबाई लगभग 230 कि०मी० है — पृष्ठ पर पुस्तक-आँकड़ा ही दर्ज है।
कोसी तीव्र मार्ग परिवर्तन एवं कटाव के लिए विख्यात है। एक तरफ अपने जलोढ़ से ऊपजाऊ मैदान का निर्माण करती है, वहीं दूसरी तरफ अपने क्रूर बाढ़ की विभीषिका से इसे अभिशप्त भी करती है। बाढ़ से रक्षा के लिए इसके दोनों तटों पर तटबंध बनाया गया है। पुस्तक का बॉक्स: बिहार राज्य को कोसी नदी में बाढ़ आने से अपार क्षति होती है; इस कारण इस नदी को 'बिहार का शोक' भी कहा जाता है। गंगा द्वारा लायी गयी नवीन जलोढ़ से निर्मित बाढ़ मैदान 'टाल' के नाम से भी पुकारे जाते हैं — पुस्तक पूछती है कि बिहार में टाल का विस्तार कहाँ है।
नर्मदा, तापी और पश्चिम की अन्य नदियाँ
नर्मदा नदी मध्यप्रदेश में अमरकंटक के निकट मैकाल की पहाड़ी से निकलने वाली नदी है जो पश्चिम की ओर एक भ्रंश घाटी में बहती है। खम्भात की खाड़ी में भड़ोंच के निकट गिरने से पूर्व विविध दर्शनीय स्थलों का निर्माण करती है। जबलपुर के निकट भेराघाट में संगमरमर के शैलखंडों में यह नदी गहरे गॉर्ज से बहती है तथा धुआँधार प्रपात (कपिलधारा) का निर्माण करती है।
नर्मदा की अधिकांश सहायक नदियाँ छोटी-छोटी हैं जो समकोण पर मुख्य धारा से मिलती हैं। इस नदी की लंबाई 1,312 कि०मी० है जो मध्य प्रदेश और गुजरात राज्यों में प्रवाहित होती है। यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे लम्बी नदी है।
तापी नदी मध्यप्रदेश के बैतूल जिला में स्थित सतपुड़ा की पहाड़ी से निकलती है। यह नर्मदा की भाँति भ्रंश घाटी से निकलकर नर्मदा के समानान्तर मध्यप्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र राज्यों से होते हुए खम्भात की खाड़ी में गिरती है। सूरत के निकट पुरना इसकी एकमात्र प्रमुख सहायक नदी है।
इसके अतिरिक्त पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों में गुजरात की साबरमती तथा माही प्रमुख हैं। पश्चिमी घाट पर्वत से निकलकर अनेक नदियाँ अरब सागर में गिरती हैं — गोवा का मांडवी और जुआरी, कर्नाटक की कालिन्दी, गंगावेली, शर्वती तथा नेत्रवती, केरल की पेरियार, पम्बा तथा मनिमाला — कुछ प्रमुख, छोटी पर तीव्रगामी नदियाँ हैं। राजस्थान के मरुस्थलीय भाग से होकर बहने वाली नदियों में लूनी प्रधान नदी है।
पुस्तक का बॉक्स: राजगीर में गर्म पानी का झरना तथा ककोलत का ठंढा पानी का झरना बिहार राज्य स्थित जलप्रपात के उदाहरण हैं। पुस्तक पूछती है कि साबरमती और माही नदियाँ किन-किन राज्यों से प्रवाहित होती हैं।
महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और पूर्व की अन्य नदियाँ
महानदी प्रायद्वीपीय भारत में बंगाल की खाड़ी में प्रवाहित होने वाली तीसरी सबसे लम्बी नदी है। इसकी लंबाई 890 कि०मी० है। यह नदी छत्तीसगढ़ स्थित रायपुर के निकट से निकलकर उड़ीसा से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसकी अपवाह प्रणाली का विस्तार छत्तीसगढ़, झारखंड तथा उड़ीसा में है। प्रमुख सहायक नदियाँ शिवनाथ, हंसदेव, मांद, जोंक और तेल हैं।
गोदावरी नदी महाराष्ट्र के नासिक के निकट पश्चिमी घाट से निकलती है। इसकी द्रोणी (बेसिन) महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में फैली हुई है। यह प्रायद्वीपीय नदियों में सबसे लम्बी है; इसकी लंबाई लगभग 1450 कि०मी० है। इसी नदी का 50 प्रतिशत अपवाह बेसिन महाराष्ट्र में विकसित हुआ है। प्राणहित, वर्धा, मंजीरा, बेनगंगा तथा पेनगंगा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। बड़े आकार एवं विस्तार के कारण दक्षिण भारत में इस नदी को दक्षिण की गंगा या वृद्ध गंगा जैसे नामों से विभूषित किया गया है।
कृष्णा नदी पश्चिमी घाट स्थित महाबलेश्वर (महाराष्ट्र) के निकट एक स्रोत से निकलकर लगभग 1290 कि०मी० क्षेत्र में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसकी अपवाह बेसिन का विस्तार महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश राज्यों में है। प्रमुख सहायक नदियों में दूधगंगा, पंचगंगा, तुंगभद्रा, कोयना, घाटप्रभा, मालप्रभा, मूसी तथा भीमा हैं।
कावेरी नदी की उत्पत्ति पश्चिमी घाट स्थित ब्रह्मगिरि पहाड़ी से हुई है। इसकी लंबाई लगभग 760 कि०मी० है। इसका अपवाह बेसिन तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक राज्यों में फैला हुआ है। प्रमुख सहायक नदियों में अमरावती, भवानी, हेमावती, लोगपावनी, अकावली, लक्ष्मण तीर्थ तथा काबिनी हैं। अंततः यह नदी तमिलनाडु स्थित कुडलुर से दक्षिण बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
उपरोक्त नदियों के अतिरिक्त भी कई छोटी-छोटी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हैं, जिनमें दामोदर, ब्राह्मणी, वैतरणी एवं सुवर्णरेखा प्रमुख हैं। पुस्तक का बॉक्स: 'शिव-समुद्रम्' जलप्रपात भारत का दूसरा सबसे बड़ा प्रपात है जो कावेरी नदी पर है; इस जलप्रपात के बिजलीघर से मैसूर तथा कोलार स्वर्ण-क्षेत्र को विद्युत प्रदान होती है। ज्ञात कीजिए: भारत का सबसे बड़ा जलप्रपात कौन सा है? यह कहाँ अवस्थित है?
जलाशय (झील) — सात प्रकार
कश्मीर स्थित डल तथा वूलर झील, नैनीताल, राजस्थान का सांभर झील, बेगूसराय का कांवर पक्षी विहार, बेतिया का सरैयामान, दरभंगा का लक्ष्मीसागर जैसे जलाशयों से आप परिचित हैं। ये मानवीय उपयोग के साधन के साथ-साथ पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र होते हैं। प्रायः जल भरे विशाल गड्ढे को झील के रूप में जाना जाता है। वर्षा के जल के जमाव तथा हिमानियों एवं हिम चादरों के पिघलने से झील का निर्माण होता है। झील मुख्यतः प्राकृतिक कारणों से निर्मित होती है।
निर्माण की दृष्टि से झीलों के प्रकार: (1) धँसान घाटी झील — धँसान घाटी में जल जमाव से; अफ्रीका में अधिक — विक्टोरिया, रूडोल्फ, न्यासा; भारत में तिलैया बाँध द्वारा धँसान घाटी में कृत्रिम झील। (2) गोखुर झील — विसर्पित भाग कटकर मुख्यधारा से अलग हो जाता है, आकार गाय के 'खुर' के समान; उत्तरी बिहार में — बेतिया का सरैयामान, बेगूसराय का कांवर झील। (3) क्रेटर झील — ज्वालामुखी के क्रेटर में वर्षा जल जमा होने से; बोलिविया का टिटीकाका, टर्की का वॉन; भारत में लोनार झील। (4) लैगून झील — स्पिट तथा रोधिका द्वारा समुद्री जल अलग होने से; भारत में चिल्का एवं पुलीकट। (5) अवरोधक झील — भू-स्खलन से चट्टानें गिरकर नदी का प्रवाह रोक दें। (6) हिमानी झील — हिमालय क्षेत्र में; नैनीताल, भीमताल, सातताल। (7) भूगर्भीय क्रिया से निर्मित झील — जम्मू-कश्मीर में वूलर झील मीठे पानी की भारत की सबसे बड़ी झील है; बाँधों से भी झीलें बनी हैं — भाँखड़ा-नांगल से गोविन्द सागर; लोकतक एवं बड़यानी मीठे पानी की झीलें; राजस्थान का लवणयुक्त सांभर झील।
प्रायः यह देखा गया है कि मरुस्थलीय अथवा अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों की झीलें खारे पानी की होती हैं जबकि ठण्डे प्रदेशों तथा पर्वतीय प्रदेशों की झीलों का जल मीठा होता है। झीलों की उपयोगिता: नदियों के बहाव क्षेत्र को सुचारु बनाना; वर्षा या बाढ़ में बहाव को संतुलित रखना; सूखे में संचित जल; जल विद्युत उत्पादन; आस-पास की जलवायु को सामान्य करना; जलीय-परितंत्र का सुदृढ़ीकरण; प्राकृतिक छटा को सुंदर बनाना।
मानव सभ्यता की जीवन-रेखा के रूप में नदियाँ
'सभ्यता की जननी' के रूप में नदी-घाटी क्षेत्र को प्राचीन काल से ही जाना जाता रहा है। सिन्धु घाटी में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो, ह्वांग हो की घाटी में चीन की तथा नील नदी की घाटी में मिस्र की सभ्यता का विकास नदियों से ही हुआ है।
प्रागैतिहासिक मानव संस्कृति की खोज का प्रथम श्रेय फ्रांस के 'बॉचर द परथेस' को है। इन्होंने विभिन्न प्रमाणों के अध्ययन के पश्चात् पेरिस के सीन नदी को सभ्यता का उद्भव केन्द्र बताया। उसी प्रकार डॉ. मित्रा ने मानव उत्पत्ति का केन्द्र शिवालिक के दक्षिण हिमानी के पिघलने से निर्मित नदी घाटी को बताया है। मानव विकास के क्रम में लगभग सभी शोध-प्रतिवेदन नदी घाटी क्षेत्र में मानव सभ्यता के उद्भव केन्द्र मानने पर एकमत प्रतीत होते हैं।
आज इलाहाबाद के समीप प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का केन्द्र बना हुआ है। बड़े-बड़े नगरों तथा महानगरों का विकास भी नदी घाटी क्षेत्र में ही हुआ है। उद्योगों, कृषि कार्यों तथा परिवहन साधनों को विकसित करने में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यद्यपि नदी जल का अत्यधिक दोहन एवं इन जलराशियों में कचरों का उत्सर्जन नदी को अत्यधिक प्रदूषित कर रहा है — आज वैश्विक स्तर पर यह चिंतन का विषय है।
प्रदूषण और संरक्षण
पुस्तक का बॉक्स: पटना स्थित गाँधी सेतु भारत का सबसे लम्बा (7 कि०मी०) सड़क पुल है जिसका निर्माण 1984 ई० में हुआ था। ज्ञात कीजिए: गाँधी सेतु किस नदी पर है? (गंगा पर।)
प्रदूषण: बढ़ती आबादी के साथ जल का अनुप्रयोग भी तीव्र गति से बढ़ गया है। बाढ़ के समय नदियाँ विकराल रूप धारण कर लेती हैं; धरातल के सभी कचरे (अधिवास जनित, औद्योगिक एवं अन्य ठोस कचरे) को आत्मसात् कर लेती हैं, जिससे जल की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है। कृषि में प्रयुक्त उर्वरक, कीटनाशक, पीड़कनाशी, वस्त्र धोने में प्रयुक्त साबुन, सोडा, अपमार्जक तत्त्व घुलकर जल को प्रदूषित करते हैं। मल-जल प्रवाह, मवेशियों की सफाई जैसी मानवीय अनुक्रियाएँ जल प्रदूषण को बढ़ावा देती हैं।
वनों की अंधाधुंध कटाई से मृदा अपरदन की गति में तीव्र वृद्धि हुई है, जिससे नदियों के प्रवाह मार्ग में तीव्र अवसादीकरण हुआ है। ठोस अवसाद, कीचड़, रासायनिक कचरे के बढ़ जाने से जलीय-जीवों का संकट बढ़ गया है साथ ही बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है। पुस्तक के बॉक्स: वर्ष 1987, 2004, 2007, 2008 में कोसी नदी के बाढ़ से बिहार राज्य को अपार धन-जन की क्षति हुई है; बड़े आकार की झील को समुद्र भी कहा जाता है, जैसे कैस्पियन सागर, मृत सागर, अरल सागर आदि।
संरक्षण: वनस्पति का विकास प्रदूषण मुक्त पर्यावरण में जीने में मदद करता है — शुद्ध वायु, फल, औषधि, कीमती लकड़ियाँ; इनकी जड़ें मृदा को संगठित रखती हैं जो नदियों एवं वायु द्वारा अपरदन की प्रक्रिया को निष्प्रभावी बना देता है। वनस्पतियाँ वायुमंडल में विद्यमान कार्बन डायआक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन लौटाती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से किसी राष्ट्र के कुल भूभाग का 33 प्रतिशत भाग वनाच्छादित होना चाहिए; वर्तमान समय में भारत का मात्र 9.25 प्रतिशत भूभाग ही वनाच्छादित है (पुस्तक का आँकड़ा), जो पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है।
राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना: नदियों में 90 प्रतिशत जल का संधारण मॉनसूनी वर्षा और हिमालयी क्षेत्र में हिम के पिघलने के कारण होता है; किन्तु इनका अनिश्चित और अपरिमित वितरण बाढ़ और सुखाड़ जैसी परिस्थितियाँ पैदा करता है। भारत सरकार ने 'गंगा कार्य परियोजना' को 1985 में प्रारंभ किया था; किन्तु इसे 3 मार्च 2000 को बंद कर दिया गया। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजनान्तर्गत देश की प्रमुख प्रदूषित नदियों को शामिल किया गया है — 6 राज्यों की 27 नदियों के किनारे बसे 52 नगरों को। इस योजना के अन्तर्गत झील संरक्षण कार्य को भी सम्मिलित किया गया है — प्रारम्भ में दो झील पवई (महाराष्ट्र), ऊटी (तमिलनाडु) को शामिल किया गया था। आज गंगा, यमुना, गोमती सहित अनेक नदियों पर इस तरह के संरक्षण कार्यक्रम चल रहे हैं।
कृषि कार्यों में रसायनों (कीटनाशी, पीड़कनाशी, कवकनाशी) का प्रयोग तीव्र गति से बढ़ रहा है; ये रसायन वर्षा जल या बाढ़ जल में घुलकर नदी के जल को प्रदूषित कर रहे हैं। मैदानी क्षेत्र में मेड लगाकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ठोस अपशिष्टों को रोकने में मदद मिलती है।
राष्ट्रीय जल-संग्रहण केन्द्र का निर्माण: नदियों में जल का स्रोत वर्षा, हिमपात या हिमानी है; जल का वितरण समूचे प्रदेश में एक समान नहीं है। कई नदियों के संदर्भ में किसी एक राज्य का जलस्रोत पर एकाधिकार स्थापित हो जाता है, वहीं पड़ोसी राज्य आवश्यक जलापूर्ति से वंचित रह जाते हैं — ऐसी परिस्थिति में जल वितरण को लेकर राज्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो जाता है। अतः केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय जल संग्रहण केन्द्र की स्थापना करनी चाहिए और राज्यों को आवश्यकतानुसार जलापूर्ति करनी चाहिए — इससे राज्यों के विवाद हल होंगे और बाढ़ एवं सुखाड़ पर भी काबू पाया जा सकेगा। अन्तर-राज्य स्तर पर नदियों को जोड़ने की योजना इस दिशा में एक प्रभावशाली नीति हो सकती है, लेकिन इसके कार्यान्वयन को लेकर अनिश्चितता का माहौल है।
बहुउद्देशीय परियोजनाएँ और मानव जीवन पर प्रभाव
नदियाँ आदि काल से मानव जीवन गतिविधियों का साधन रही हैं; विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों की जन्मस्थली के साथ मानव सभ्यता का पालना भी हैं। नदियों के जलप्रपात जल-विद्युत शक्ति उत्पादन केन्द्र के साथ-साथ पर्यटन के आकर्षक केन्द्र भी हैं। प्राचीन काल में सड़क एवं वायुमार्ग के साधनों के अभाव में यह परिवहन का सर्वाधिक उपयुक्त साधन था; आज यहाँ राष्ट्रीय जल मार्ग का भी विकास हो रहा है। सामरिक दृष्टि से भी नदियाँ आज उपयोगी हो गयी हैं।
नदियों के प्रभाव की वजह से ही कृषि भूमि का आज 40 प्रतिशत भूभाग जलोढ़ मिट्टी से ढंका हुआ है, जो नदी घाटी, डेल्टा और तटीय प्रदेशों में फैले हुए हैं। गंगा, सिंधु, गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा एवं मैदानी क्षेत्र में जलोढ़ की प्रचुरता है। उत्तर बिहार में कोसी, बागमती और गंडक आदि नदियाँ प्रति वर्ष बड़ी मात्रा में जलोढ़ का निक्षेप करती हैं जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी हुई है।
वर्तमान परिवेश में नदियों पर बहुउद्देशीय परियोजनाओं का विकास हुआ है। इनमें से कुछ पूर्ण हो गये हैं और कुछ आज भी निर्माणाधीन हैं। नदियों पर कई बाँध लगाये गये हैं जिससे मानव निर्मित नहर एवं झीलों का विकास हुआ है। ये जलीय जीवों के लिए उत्तम हैं; क्रीड़ा स्थली होने के साथ-साथ पर्यटन के सुरम्य स्थल भी हैं। बाँधों से बाढ़ पर नियंत्रण, नौकायान के मार्ग, जलीय जीव के प्रजनन, मृदा अपरदन की रोकथाम, जल विद्युत उत्पादन, वनों के विकास जैसी योजनाओं को बल मिला है।
भाखड़ा नांगल (सतलुज नदी की परियोजना) 1200 मेगावाट विद्युत उत्पादन के साथ लगभग 20 लाख हेक्टेयर भूभाग को सिंचित करता है। टिहरी परियोजना का विकास भागीरथी नदी पर हुआ है जो 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन करती है। बिहार में अनेक परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं; सोन परियोजना को छोड़ शेष सभी नदी घाटी परियोजनाएँ अभी निर्माणाधीन हैं (पुस्तक-काल की स्थिति)। पंडित नेहरू (प्रथम प्रधानमंत्री) ने नदी घाटी परियोजना को आधुनिक भारत का मंदिर कहा था। पुस्तक का बॉक्स: भागीरथी नदी पर स्थित टिहरी परियोजना विश्व की पाँचवीं और एशिया की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना है (पुस्तक का दावा)। पुस्तक का बॉक्स: भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में साबरमती, माही एवं यमुना प्रमुख हैं।
नदियाँ अपने साथ लाये गये अवसाद का निक्षेपण मैदान एवं घाटी में करती हैं जिसमें उपजाऊ मिट्टी के साथ-साथ जीवाश्म भी पाये जाते हैं। ये जीवाश्म खनिज एवं खनिज तेल के स्रोत होते हैं। दामोदर घाटी क्षेत्र कोयला निक्षेप के लिए विश्व विख्यात है। नदी घाटी क्षेत्र से महत्वपूर्ण गैर धात्विक खनिज जैसे लौह अयस्क, सोना, क्वार्ट्ज आदि प्राप्त होते हैं। नदियों के आसपास की जलवायु संशोधित हो जाती है जो मानव बसाव को प्रेरित करती है। इन सुविधाओं को पाकर मानव उन्नति के शिखर पर पहुँचकर आज इन नदियों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है — नदी एवं झील के जल का प्रदूषित होना अंततः मानव सभ्यता के विनाश का ही वातावरण बनाता है।
Key Terms — मुख्य शब्द
- अपवाह — किसी क्षेत्र से जल का बहकर किसी मुख्य नदी/जलाशय तक पहुँचना।
- अपवाह द्रोणी (बेसिन) — एक नदी तंत्र द्वारा जिस क्षेत्र का जल प्रवाहित होता है।
- जलविभाजक — दो निकटवर्ती अपवाह द्रोणियों को अलग करने वाली ऊँची भूमि; उदाहरण — सिंधु-गंगा के बीच अरावली।
- गॉर्ज — नदी द्वारा पर्वतों को काटकर बनाया गया गहरा, सँकरा दर्रा; उदाहरण — सिंधु का गिलगिट गॉर्ज।
- विसर्प — मैदानी भाग में नदी का साँप की तरह टेढ़ा-मेढ़ा बहना।
- गोखुर झील — विसर्पित भाग के कटकर अलग होने से बनी, गाय के खुर के आकार की झील।
- डेल्टा — नदी के मुहाने पर अवसाद के निक्षेप से बना त्रिभुजाकार भूभाग; उदाहरण — गंगा-ब्रह्मपुत्र का सुन्दरवन डेल्टा।
- ज्वारनदमुख (एस्चुअरी) — नदी के मुहाने पर बना चौड़ा, कीप जैसा मुख जहाँ नदी समुद्र से मिलती है; अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ एस्चुअरी बनाती हैं।
- भ्रंश घाटी — धँसाव से बनी घाटी; नर्मदा और तापी भ्रंश घाटी से होकर बहती हैं।
- पूर्ववर्ती नदी — हिमालय के उठने से पहले से बह रही नदी जो पर्वत को काटकर अपना मार्ग बनाए रखती है; उदाहरण — ब्रह्मपुत्र (तिब्बत में शांग-पो, बंगलादेश में जमुना)।
- वितरिका — मुख्य नदी से अलग होकर बहने वाली शाखा; उदाहरण — गंगा की हुगली।
- टाल — गंगा द्वारा लायी गयी नवीन जलोढ़ से निर्मित बाढ़ मैदान (बिहार में)।
- लैगून झील — स्पिट/रोधिका द्वारा समुद्र से अलग हुआ तटीय जल; उदाहरण — चिल्का, पुलीकट।
- क्रेटर झील — ज्वालामुखी के क्रेटर में वर्षा जल जमा होने से बनी झील; उदाहरण — लोनार।
Remember — याद रखें
- गंगा की लम्बाई 2,525 कि०मी० है — भागीरथी (गोमुख, गंगोत्री) + अलकनंदा देवप्रयाग में मिलकर गंगा बनती हैं; फरक्का से हुगली वितरिका और पद्मा मुख्यधारा।
- सिंधु लगभग 2900 कि०मी०, ब्रह्मपुत्र 2900 कि०मी० से अधिक, यमुना 1375 कि०मी०, नर्मदा 1,312 कि०मी०, महानदी 890 कि०मी०, गोदावरी लगभग 1450 कि०मी०, कृष्णा लगभग 1290 कि०मी०, कावेरी लगभग 760 कि०मी०, कोसी पुस्तक के अनुसार लगभग 230 कि०मी०।
- हिमालयी नदियाँ बारहमासी (वर्षा + हिम), प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी (केवल वर्षा) — यही मुख्य अंतर है।
- बंगाल की खाड़ी की नदियाँ डेल्टा बनाती हैं, अरब सागर की नदियाँ ज्वारनदमुख (एस्चुअरी) बनाती हैं।
- गंगा कार्य परियोजना 1985 में शुरू, 3 मार्च 2000 को बंद; राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना — 6 राज्य, 27 नदियाँ, 52 नगर।
- गाँधी सेतु (पटना) 7 कि०मी०, निर्माण 1984 ई०; कोसी बाढ़ के वर्ष — 1987, 2004, 2007, 2008; कोसी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है।
- भाखड़ा नांगल (सतलुज) 1200 मेगावाट + लगभग 20 लाख हेक्टेयर सिंचाई; टिहरी (भागीरथी) 2400 मेगावाट।
- वनाच्छादन लक्ष्य 33 प्रतिशत, पुस्तक-काल में भारत का मात्र 9.25 प्रतिशत वनाच्छादित (पुस्तक का आँकड़ा)।
- सिंधु का प्रवाह-क्षेत्र पुस्तक में '250 वर्ग कि०मी०' छपा है — त्रुटिपूर्ण आँकड़ा, उत्तर में न लिखें।
सबसे बड़ी भूल: हिमालयी और प्रायद्वीपीय नदियों को एक जैसा समझना। हिमालयी = बारहमासी (हिम + वर्षा), गॉर्ज-विसर्प-डेल्टा; प्रायद्वीपीय = मौसमी (केवल वर्षा), छिछली, जलप्रपात। दूसरी भूल: डेल्टा और एस्चुअरी उल्टा लिखना — बंगाल की खाड़ी = डेल्टा, अरब सागर = एस्चुअरी। तीसरी भूल: नर्मदा-तापी को सामान्य घाटी की नदी लिखना — दोनों भ्रंश घाटी से बहती हैं। सिंधु के प्रवाह-क्षेत्र का छपा आँकड़ा (250) त्रुटिपूर्ण है — उसे उत्तर में कभी न लिखें।
Chart / Table: प्रमुख नदियाँ — उद्गम, लंबाई (पुस्तक के अनुसार) और मुख
| नदी | उद्गम | लंबाई (पुस्तक) | गिरती है |
|---|---|---|---|
| सिंधु | मानसरोवर झील (तिब्बत) | लगभग 2900 कि०मी० | अरब सागर |
| गंगा | गोमुख, गंगोत्री (भागीरथी) + देवप्रयाग में अलकनंदा | 2,525 कि०मी० | बंगाल की खाड़ी (पद्मा/मेघना; हुगली वितरिका) |
| ब्रह्मपुत्र | मानसरोवर झील (तिब्बत) | 2900 कि०मी० से अधिक | बंगाल की खाड़ी (मेघना संगम) |
| यमुना | यमुनोत्री हिमानी | 1375 कि०मी० | गंगा में (प्रयाग) |
| घाघरा | मापचा चूँगो हिमनद (करनाली) | पुस्तक में लंबाई नहीं दी गयी | गंगा में (छपरा के पास) |
| गंडक | महान हिमालय (नेपाल होते हुए) | पुस्तक में लंबाई नहीं दी गयी | गंगा में (चंपारण से) |
| कोसी | गोसाईथान (महान हिमालय) | लगभग 230 कि०मी० (पुस्तक) | गंगा में (कुरसेला, सहरसा) |
| नर्मदा | मैकाल पहाड़ी, अमरकंटक | 1,312 कि०मी० | खम्भात की खाड़ी (भ्रंश घाटी) |
| तापी | सतपुड़ा पहाड़ी, बैतूल | पुस्तक में लंबाई नहीं दी गयी | खम्भात की खाड़ी (भ्रंश घाटी) |
| महानदी | रायपुर के निकट (छत्तीसगढ़) | 890 कि०मी० | बंगाल की खाड़ी |
| गोदावरी | नासिक के निकट, पश्चिमी घाट | लगभग 1450 कि०मी० | बंगाल की खाड़ी |
| कृष्णा | महाबलेश्वर के निकट, पश्चिमी घाट | लगभग 1290 कि०मी० | बंगाल की खाड़ी |
| कावेरी | ब्रह्मगिरि पहाड़ी, पश्चिमी घाट | लगभग 760 कि०मी० | बंगाल की खाड़ी (कुडलुर से दक्षिण) |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- अपवाह द्रोणी और जलविभाजक में अंतर अपने शब्दों में लिखिए और एक-एक उदाहरण दीजिए।
संकेत: द्रोणी = जिस क्षेत्र का जल एक नदी तंत्र से बहता है; विभाजक = दो द्रोणियों को अलग करने वाली ऊँचाई; उदाहरण — अरावली। - हिमालय की नदियाँ बारहमासी क्यों हैं और प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी क्यों? दो-दो कारण लिखिए।
संकेत: हिमालयी — वर्षा + हिम पिघलना; प्रायद्वीपीय — केवल वर्षा, गर्मी में जलस्तर घट जाता है। - गंगा नदी के मार्ग को उद्गम से मुख तक क्रम से लिखिए (देवप्रयाग, हरिद्वार, फरक्का, पद्मा, मेघना, सुन्दरवन)।
संकेत: गोमुख → देवप्रयाग → हरिद्वार → फरक्का (हुगली/पद्मा) → मेघना संगम → सुन्दरवन डेल्टा। - झीलों के सात प्रकारों में से किन्हीं चार के नाम और एक-एक उदाहरण लिखिए।
संकेत: धँसान घाटी — तिलैया; गोखुर — कांवर; क्रेटर — लोनार; लैगून — चिल्का; हिमानी — नैनीताल। - नदी प्रदूषण के तीन कारण और तीन संरक्षण उपाय लिखिए।
संकेत: कारण — औद्योगिक/घरेलू कचरा, उर्वरक-कीटनाशक, वन-कटाई से अवसाद; उपाय — नदी संरक्षण योजना, वन-विकास, मेड/अपशिष्ट नियंत्रण।
प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers
- अपवाह द्रोणी किसे कहते हैं? जलविभाजक का एक उदाहरण दीजिए।
एक नदी तंत्र द्वारा जिस क्षेत्र का जल प्रवाहित होता है उसे अपवाह द्रोणी (बेसिन) कहते हैं। जलविभाजक वह ऊँची भूमि है जो दो निकटवर्ती द्रोणियों को अलग करती है — उदाहरण: सिंधु एवं गंगा के मध्य अरावली की उच्च भूमि। - हिमालय की नदियों और प्रायद्वीपीय नदियों की दो-दो विशेषताएँ बताइए।
हिमालयी: (1) बारहमासी/स्थायी — वर्षा + हिम से सालभर जल; (2) लंबी, गहरी, गॉर्ज-विसर्प-डेल्टा बनाती हैं। प्रायद्वीपीय: (1) मौसमी — स्रोत मुख्यतः वर्षा, गर्मी में जलस्तर घट जाता है; (2) छिछली, कम लम्बी, अनेक जगह जलप्रपात बनाती हैं। - गंगा नदी की मुख्य धारा कहाँ से निकलती है और गंगा नाम कब पड़ता है? फरक्का के बाद गंगा के दो भाग क्या होते हैं?
मुख्य धारा भागीरथी गंगोत्री हिमानी के गोमुख से निकलती है; देवप्रयाग में अलकनंदा मिलने के बाद गंगा नाम पड़ता है। फरक्का के बाद एक भाग हुगली वितरिका बनकर बंगाल की खाड़ी में गिरता है, दूसरा मुख्यधारा बंगलादेश में पद्मा कहलाता है और ब्रह्मपुत्र से मिलकर मेघना बनाता है। - नर्मदा और तापी अन्य प्रायद्वीपीय नदियों से किस बात में भिन्न हैं? नर्मदा की लंबाई और विशेषता बताइए।
दोनों भ्रंश घाटी से होकर पश्चिम की ओर बहकर खम्भात की खाड़ी में गिरती हैं और एस्चुअरी बनाती हैं, जबकि अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियाँ पूर्व की ओर बहकर डेल्टा बनाती हैं। नर्मदा की लंबाई 1,312 कि०मी० है; यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे लम्बी नदी है; भेराघाट में धुआँधार (कपिलधारा) प्रपात बनाती है। - झीलें मानव के लिए क्यों उपयोगी हैं? किन्हीं चार उपयोगों के साथ वूलर और सांभर का अंतर बताइए।
झीलें नदी-बहाव को संतुलित रखती हैं, सूखे में संचित जल देती हैं, जल विद्युत में उपयोगी हैं, जलवायु को सामान्य करती हैं और पर्यटन/जलीय-परितंत्र को सहारा देती हैं। वूलर मीठे पानी की भारत की सबसे बड़ी झील है; सांभर लवणयुक्त (खारे पानी की) झील है।
- अपवाह = जल प्रवाह; द्रोणी = एक नदी तंत्र का क्षेत्र; विभाजक = दो द्रोणियों को अलग करने वाली ऊँचाई (अरावली)।
- हिमालयी नदियाँ बारहमासी (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र); प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी (नर्मदा, तापी, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी)।
- गंगा 2,525 कि०मी०; सिंधु ~2900; ब्रह्मपुत्र 2900+; यमुना 1375; नर्मदा 1,312; गोदावरी ~1450; कृष्णा ~1290; कावेरी ~760; महानदी 890।
- झीलों के 7 प्रकार — धँसान घाटी, गोखुर, क्रेटर, लैगून, अवरोधक, हिमानी, भूगर्भीय/बाँध-निर्मित।
- संरक्षण: गंगा कार्य परियोजना 1985–3 मार्च 2000; राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (6 राज्य, 27 नदियाँ, 52 नगर); वन लक्ष्य 33%।
अभ्यास — किताब के प्रश्न-प्रकार (उत्तर सहित)
नीचे अध्याय के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर दिए गए उत्तरों से मिलान करें।
अभ्यास — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (पुस्तक के 9 प्रश्न; संख्या 4 पुस्तक में विकल्प-पंक्ति पर छप गयी है)
- 1. लक्ष्मीसागर झील किस राज्य में स्थित है? (क) मध्य प्रदेश (ख) उत्तर प्रदेश (ग) बिहार (घ) झारखंड — उत्तर: (ग) बिहार (दरभंगा का लक्ष्मीसागर, पाठ में ही दिया है)।
- 2. निम्न में से कौन लवणीय झील है? (क) वूलर (ख) डल (ग) सांभर (घ) गोविन्दसागर — उत्तर: (ग) सांभर।
- 3. गंगा नदी पर गांधी सेतु किस शहर के निकट अवस्थित है? (क) भागलपुर (ख) कटिहार (ग) पटना (घ) गया — उत्तर: (ग) पटना।
- पुस्तक-संख्या 5. कौन-सी नदी भ्रंश घाटी से होकर बहती है? (क) महानदी (ख) कृष्णा (ग) तापी (घ) तुंगभद्रा — उत्तर: (ग) तापी (नर्मदा भी भ्रंश घाटी से बहती है, पर विकल्पों में नहीं है)।
- पुस्तक-संख्या 6. कौन-सी नदी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लम्बी नदी है? (क) नर्मदा (ख) गोदावरी (ग) कृष्णा (घ) महानदी — उत्तर: (ख) गोदावरी।
- पुस्तक-संख्या 7. सिन्धु जल समझौता कब हुआ था? (क) 1950 (ख) 1955 (ग) 1960 (घ) 1965 — उत्तर: (ग) 1960; नोट: यह वर्ष पाठ में नहीं दिया गया है — सामान्य ज्ञान/विकल्प-आधारित उत्तर है, पुस्तक-तथ्य के रूप में न लिखें।
- पुस्तक-संख्या 8. शांग-पो किस नदी का उपनाम है? (क) गंगा (ख) ब्रह्मपुत्र (ग) सतलुज (घ) गोदावरी — उत्तर: (ख) ब्रह्मपुत्र।
- पुस्तक-संख्या 9. इनमें से गर्म जल का जलप्रपात कौन है? (क) ककोलत (ख) गरसोप्पा (ग) ब्रह्मकुंड (घ) शिवसमुद्रम — उत्तर: (ग) ब्रह्मकुंड; नोट: पाठ में राजगीर का गर्म पानी का झरना दिया है (ककोलत ठंढे पानी का है); ब्रह्मकुंड राजगीर का गर्म कुंड है — पाठ-आधारित निकटतम उत्तर।
- पुस्तक-संख्या 10. कोसी नदी का उद्गम स्थल है — (क) गंगोत्री (ख) मानसरोवर (ग) गोसाईधाम (घ) सतपुड़ा श्रेणी — उत्तर: (ग) गोसाईधाम (पाठ: गोसाईथान; विकल्प में गोसाईधाम)।
अभ्यास — लघु उत्तरीय प्रश्न (6 प्रश्न)
- 1. जल विभाजक का क्या कार्य है? एक उदाहरण दीजिए। — उत्तर: दो निकटवर्ती अपवाह द्रोणियों को अलग करना; उदाहरण — सिंधु एवं गंगा के मध्य अरावली की उच्च भूमि।
- 2. भारत में सबसे विशाल नदी द्रोणी कौन-सी है? — उत्तर: गंगा की द्रोणी (देश के भीतर सबसे विस्तृत तंत्र; पुस्तक प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ती है — उत्तर पाठ के विवरण से निकला है)।
- 3. सिन्धु एवं गंगा नदियाँ कहाँ से निकलती हैं? — उत्तर: सिंधु — तिब्बत के समीप मानसरोवर झील से; गंगा की मुख्य धारा भागीरथी — गंगोत्री हिमानी के गोमुख से।
- 4. गंगा की दो प्रारंभिक धाराओं के नाम लिखिए? ये कहाँ पर एक-दूसरे से मिलकर गंगा नदी का निर्माण करती हैं? — उत्तर: भागीरथी और अलकनंदा; देवप्रयाग (उत्तराखण्ड) में।
- 5. लम्बी धारा होने के बावजूद तिब्बत के क्षेत्रों में ब्रह्मपुत्र में कम गाद (सिल्ट) क्यों होती है? — उत्तर: उद्गम क्षेत्र तिब्बत शीत एवं शुष्क क्षेत्र है, जहाँ नदी के जल में सिल्ट की मात्रा नगण्य होती है; सिल्ट उच्च पर्वत क्षेत्र और असम में धाराओं के मिलने के बाद बढ़ता है।
- 6. कौन-सी दो नदियाँ भ्रंश घाटी से होकर बहती हैं? समुद्र में प्रवेश करने के पहले वे किस प्रकार की आकृतियों का निर्माण करती हैं? — उत्तर: नर्मदा और तापी; अरब सागर में गिरने से पहले वे ज्वारनदमुख (एस्चुअरी) का निर्माण करती हैं (बंगाल की खाड़ी की नदियों के विपरीत जो डेल्टा बनाती हैं)।
अभ्यास — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (4 प्रश्न)
- 1. हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत की नदियों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए। — संकेत: बारहमासी बनाम मौसमी; उद्गम; गॉर्ज/विसर्प/डेल्टा बनाम छिछली/जलप्रपात/एस्चुअरी; उदाहरण सहित।
- 2. प्रायद्वीपीय पठार के पूर्व एवं पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियों की तुलना कीजिए। — संकेत: पूर्व — बंगाल की खाड़ी, डेल्टा, लंबी (गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी); पश्चिम — अरब सागर, एस्चुअरी, भ्रंश घाटी (नर्मदा, तापी) व छोटी तीव्रगामी नदियाँ।
- 3. भारत की अर्थव्यवस्था में नदियों के महत्व पर प्रकाश डालिए। — संकेत: कृषि (40% भूभाग जलोढ़), सिंचाई, जल विद्युत (भाखड़ा, टिहरी), परिवहन, उद्योग, नगर, मत्स्य, पर्यटन।
- 4. भारत में झीलों के प्रकार का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए। — संकेत: सातों प्रकार — धँसान घाटी, गोखुर, क्रेटर, लैगून, अवरोधक, हिमानी, भूगर्भीय/बाँध-निर्मित, उदाहरण सहित।
अभ्यास — मानचित्र कौशल (2 कार्य)
- (क) भारत के मानचित्र पर निम्नलिखित नदियों को चिह्नित कीजिए तथा उनके नाम लिखिए — गंगा, सतलुज, दामोदर, कृष्णा, नर्मदा, तापी, महानदी, दिहांग।
- (ख) भारत के रेखा मानचित्र पर निम्नलिखित झीलों को चिह्नित कीजिए — चिल्का, सांभर, वूलर, पुलीकट तथा कोलेरू।
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