Educational Galaxy shield logo

Educational Galaxy

LEARN • THINK • SPEAK • GROW

Class 9 • Geography • Bharat Bhumi evam Log

Chapter 2: भौतिक स्वरूप: संरचना एवं उच्चावच

भारत का भौतिक स्वरूप कैसे बना — प्लेट विवर्तनिक से हिमालय तक, और छह भौतिक विभागों का पूरा विवरण।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Geography • Book: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

Print lets you save as PDF from the browser. This is not a textbook PDF.

भौतिक स्वरूप: संरचना एवं उच्चावच — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 9)  |  अध्याय 2  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — अध्याय का विषय-स्तरीय सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): हिमालय, मैदान और पठार — भारत के भौतिक स्वरूप का एक सामान्य चित्र। यह किताब का चित्र नहीं है।

भौतिक स्वरूप : संरचना एवं उच्चावच के लिए चित्र

बर्फ़ से ढकी हिमालय की चोटियाँ और नीचे घाटी — एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

परिचय — भौतिक स्वरूप की विविधता

भारत का आकार विशाल है, जिसके कारण इसके भौतिक स्वरूप में विविधता पायी जाती है: कहीं ऊँचे-ऊँचे विशाल पर्वत, दूसरी ओर पठारी भाग एवं दूर-दूर तक चौरस दिखाई देने वाला विशाल मैदान।

सभी प्रकार की स्थलाकृतियों का विकास हुआ है, पर ये सभी जगह एक समान नहीं हैं: विशाल पर्वतीय भाग कहीं बर्फ से ढका है तो कहीं उन पर घने वन उगे हुए हैं; नदियों ने पठारी भाग को काट-छाँट कर उबड़-खाबड़ बना दिया है; विशाल मैदान के समतल स्वरूप को नदियों की खड़ी कगार ने प्रभावित किया है (चित्र 2.1 — उत्तर-दक्षिण काट: हिमालय, गंगा-सिंधु का मैदान, मालवा पठार, बुंदेलखंड पठार, नीलगिरि, कन्याकुमारी)।

भारत का वर्तमान भौतिक रूप तैयार होने में करोड़ों वर्ष लगे हैं; इस लंबी अवधि में भूगर्भीय हलचलों के साथ-साथ बाह्य शक्तियों जैसे अपक्षय, अपरदन और निक्षेपण की भी अहम् भूमिका रही है।

प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत

भूगर्भ शास्त्रियों ने भारत के भौतिक स्वरूप के निर्माण को बताने की कोशिश की है; इस संदर्भ में कई सिद्धांत प्रचलित हैं, किंतु वर्तमान में अधिकतर भूगर्भशास्त्रियों ने 'प्लेट विवर्तनिक' सिद्धांत (Plate Tectonic theory) पर सहमति दी है। इस सिद्धांत के अनुसार सम्पूर्ण भूपर्पटी कई प्लेटों में विभाजित है; भारत का प्रायद्वीपीय पठार इसी का हिस्सा है।

बॉक्स: प्लेट विवर्तनिक (Plate Tectonic) शब्द का प्रयोग तुजो विल्सन (Tujo Wilson) ने 1965 ई. में किया, किंतु इस सिद्धांत को सर्वप्रथम डब्ल्यू. जे. मॉर्गन (W. J. Morgan) ने 1967 ई. में प्रतिपादित किया।

पृथ्वी की ऊपरी पर्पटी बड़ी एवं छोटी-छोटी प्लेटों से बनी है। बड़े प्लेट: 1. आस्ट्रेलियाई/भारतीय भूखंड, 2. अफ्रीकी भूखंड, 3. अमेरिकी भूखंड, 4. यूरेशियाई भूखंड, 5. प्रशांत भूखंड, 6. अंटार्कटिक भूखंड। छोटे प्लेट: 1. अरेबियन, 2. फिलीपीनी, 3. जुआन-डु फुका, 4. कोकोस, 5. नज़का, 6. स्कैटिया, 7. कैरेबियन, 8. सोमालिया, 9. बिस्मार्क।

प्लेट धरातल के वे दृढ़ क्षेत्र हैं, जो दोष भू-पटल का निर्माण करते हैं; दो प्लेटों के बीच विवर्तनिकी अथवा प्लेट सीमान्त का निर्माण होता है। चित्र 2.2: भू-पृष्ठ की मुख्य प्लेटें (मानचित्र)।

प्लेटों की गति के तीन वर्ग: (1) कुछ प्लेटें एक दूसरे के करीब आती हैं और विनाशी प्लेट सीमान्त का निर्माण करती हैं; (2) कुछ प्लेटें एक दूसरे से दूर जाती हैं तब निर्माणक प्लेट सीमान्त का निर्माण करती हैं; (3) जब दो प्लेट एक दूसरे को रगड़ते हुए विपरीत दिशा से जाती हैं तो उसे संरक्षी प्लेट सीमान्त कहते हैं। जब दो प्लेट एक दूसरे के करीब आती हैं तब या तो वे टकरा कर टूट सकती हैं या एक प्लेट फिसल कर दूसरी प्लेट के नीचे चली जाती है।

इन प्लेटों में लाखों वर्षों से हो रही गति के कारण महाद्वीपों की स्थिति एवं आकार में परिवर्तन आया है; भारत की वर्तमान स्थलाकृति का आधारभूत विकास भी इस प्रकार की गतियों से हुआ है।

बॉक्स (पृथ्वी की आयु): पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग पाँच अरब वर्ष पूर्व हुई थी; इस आयु को चार महाकल्पों (Era) में बाँटा गया है — 1. अजैविक (Azoic), 2. पुरा जीव/प्रारम्भिक (Palaeozoic/Primary), 3. मध्यजीव/द्वितीय (Mesozoic/Secondary), 4. नूतन जीव (Cainozoic); पुनः इन्हें कल्प (Period) में बाँटा गया है; पूर्व कैम्ब्रियन की सबसे लम्बी अवधि रही है, यह पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज से लगभग 55 करोड़ वर्ष पहले समाप्त हुआ।

बॉक्स (प्लेटों की गति): प्रतिवर्ष आर्कटिक कटक के निकट 2.5 सेंटीमीटर और प्रशांत महासागर में 5 से 18 सेंटीमीटर है।

बॉक्स (पैंजिया): पूर्व में भूमंडल पर केवल एक ही भूखंड था जिसे पैंजिया कहा जाता था; इसके उत्तरी भाग को 'अंगारा लैंड' और दक्षिणी भाग को 'गोंडवाना लैंड' कहा जाता था और इसके मध्य में 'टेथिस' सागर था; प्रायद्वीपीय पठार 'गोंडवाना लैंड' का अंश है और वास्तव में यही भाग भारत की आधार भूमि है।

प्रायद्वीपीय पठार भूपर्पटी के सबसे पुराने भागों में से एक है; यह वह खंड है जो पृथ्वी के प्रथम ठोस हुए धरातल का प्रतिनिधित्व करता है; यह भूखंड कभी समुद्र में नहीं डूबा, अर्थात् यह भाग भारत का सबसे प्राचीन कठोर एवं दृढ़ भूखंड है।

प्लेटों की गति के कारण प्लेटों के किनारे व ऊपर की शैलों में दबाव व तनाव उत्पन्न होता है; इस कारण मोड़ (वलन), भ्रंशीकरण तथा ज्वालामुखीय क्रियाएँ होती हैं।

गोंडवाना, टेथिस और हिमालय का जन्म

भारत 20 करोड़ वर्ष पूर्व सुदूर दक्षिण में था, जो गोंडवाना लैंड का भाग था; इसी गोंडवाना लैंड में भारत, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के क्षेत्र शामिल थे।

संवहनीय धाराओं ने भू-पर्पटी को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया; भारत आस्ट्रेलिया भूमि से अलग होकर, अर्थात् दक्षिण का पठार उत्तर दिशा की ओर प्रवाह के कारण, अपने से अधिक बड़े प्लेट 'यूरेशियन प्लेट' से टकराया।

इस प्रकार लगभग 7 करोड़ वर्ष पूर्व ऑलीगोसीन कल्प में इन टकराव से दोनों प्लेटों के बीच स्थित 'टेथिस' भू-सन्नति के अवसादी चट्टानों में वलन पैदा हुआ और पश्चिम एशिया के पर्वतीय श्रृंखला का विकास हुआ, जिनके निर्माण का कार्य आज भी जारी है।

हिमालय के ऊपर उठने तथा उसके दक्षिण में टेथिस के शेष भाग के नीचे मुड़ने तथा उनमें अवसादों के निक्षेप के कारण एक बहुत बड़ी द्रोणी (बेसिन) का निर्माण हुआ। इसके बाद उत्तरी पर्वतों एवं दक्षिण के पठारों से बहने वाली नदियों के अवसाद के द्रोणी में निक्षेप होने से एक बड़े समतल भू-भाग का विकास हुआ, जो भारत का विशाल मैदान कहलाता है।

चित्र 2.3: नए मोड़दार पर्वत का निर्माण (कुनलुन पर्वत, तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, टेथिस सागर, भू-अभिनति)। सागरों से टकराती लहरों और पठार से निकलने वाली नदियों के अवसादी निक्षेप से समुद्र तटीय मैदान का विकास हुआ।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह निमज्जित उच्च पर्वतीय भूमि का अवशेष है, जबकि लक्षद्वीप का निर्माण प्रवाली निक्षेप द्वारा हुआ है।

भारत के क्षेत्रफल का बँटवारा और ऊँचाई

भारत के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 11% पर्वतीय भाग, 28% पठारी क्षेत्र, 18% पहाड़ी और 43% भू-भाग मैदानी है। पहाड़ी एवं पठारी भाग की औसत ऊँचाई 300-900 मीटर के बीच है; इसके विपरीत मैदान एवं तटीय क्षेत्र में औसत ऊँचाई 160 मीटर से भी कम पायी जाती है।

उत्तर के पर्वतीय भाग की औसत ऊँचाई 1,200 मीटर से 6,000 मीटर तक है; इस भूभाग में कुछ शिखर ऐसे हैं जिनकी ऊँचाई 8,000 मीटर से भी अधिक है और इनमें अधिकतर चोटियाँ वर्ष भर बर्फ से ढँकी रहती हैं। यहाँ दबाव के कारण परिवलन एवं क्षेत्र भ्रंश मिलते हैं।

झीलों के निक्षेपित होने से वृहद हिमालय में कई घाटियों का निर्माण हुआ है; इनमें कश्मीर में डल एवं वूलर झीलें अवशेष के रूप में इसके प्रमाण हैं। उत्तर की उच्च भूमि के मध्य में (हिमाचल) 1,000 मीटर से भी अधिक गहरी गॉर्ज पाई जाती है, जिसमें कई नदियाँ प्रवाहित होती हैं। इस भू-भाग के दक्षिण (शिवालिक) में भी कई महत्त्वपूर्ण घाटियों का विकास हुआ है।

हिमालय पर्वत पामीर गांठ से निकलकर पूरब की ओर जाता है; यह दक्षिण की ओर चाप बनाते हुए उत्तर-पूर्व की ओर चली जाती है। ब्रह्मपुत्र नदी को पार करने के उपरान्त यह दक्षिण की ओर मुड़ जाती है, जहाँ ये पटकोई (अरुणाचल प्रदेश), नागा (नागालैंड), मणिपुर तथा लुसाई (मिजोरम पहाड़ियों) के नाम से विख्यात है; इसे पूर्वांचल की पहाड़ियाँ भी कहा जाता है।

हिमालय क्षेत्र में कई छोटी-बड़ी हिमानियाँ मिलती हैं, इनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, सियाचिन, बाल्टोरा, बिआफो तथा बतूरा प्रमुख हैं। यहाँ कई प्रसिद्ध दर्रे भी हैं, इनमें जम्मू-कश्मीर से जोजिला और बुर्जिल, हिमाचल प्रदेश में बड़ा लाचला और शिपकीला, उत्तरांचल में थागला तथा सिक्किम में नाथुला और जालपला दर्रे प्रमुख हैं।

भौतिक विभाग (i) — हिमालय पर्वत श्रेणी

सामान्य तौर पर भारत को छह भौतिक विभागों में बाँट सकते हैं: (i) हिमालय पर्वत श्रेणी, (ii) उत्तर का विशाल मैदान, (iii) दक्षिण का पठार, (iv) तटीय मैदान, (v) भारतीय मरुस्थल, (vi) द्वीप समूह।

भारत की उत्तरी सीमा पर फैला हिमालय पर्वत श्रेणी भूगर्भीय रूप से नवीन एवं बनावट के दृष्टिकोण से वलित (मोड़दार) पर्वत श्रृंखला है। ये पर्वत श्रृंखलाएँ पश्चिम से पूर्व दिशा में सिंधु और ब्रह्मपुत्र के बीच करीब 2,500 कि.मी. की लम्बाई में अर्द्धवृत्त (चाप) के रूप में फैला हुआ है; इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग कि.मी. है; यह विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रेणी है। इसकी चौड़ाई कश्मीर में 500 कि.मी. एवं अरुणाचल में मात्र 160 कि.मी. है; पश्चिमी भाग की अपेक्षा पूर्वी भाग की ऊँचाई में अधिक विविधता पाई जाती है और इसकी तीन समानान्तर श्रृंखलाएँ हैं।

सबसे उत्तरी भाग में स्थित श्रृंखला को महान या आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि कहते हैं; यह सबसे अधिक सतत श्रृंखला है, इसकी औसत ऊँचाई 6,100 मीटर है; इस श्रृंखला की विशेषता यह है कि इसमें सर्वाधिक ऊँचे शिखर तथा हिमालय के सभी प्रमुख शिखर हैं। महान हिमालय वर्ष भर बर्फ से ढका रहता है तथा इससे बहुत सी हिमानियों का प्रवाह होता है।

जम्मू-कश्मीर के उत्तर में कुछ अन्य पर्वत श्रेणियाँ भी फैली हैं; इनमें जैंस्कार पर्वत श्रेणी महान हिमालय की ही एक श्रेणी है; जैंस्कार के उत्तर में लद्दाख पर्वत श्रेणी है; हिमालय के उत्तर में काराकोरम पर्वत श्रेणी है, जिसे ट्रांस हिमालय भी कहा जाता है; इसका शिखर के2 भारत का सबसे ऊँचा और संसार का दूसरा सबसे ऊँचा शिखर (8611 मी.) है; इसे गाडविन आस्टिन तथा गौरीनन्दा पर्वत के नाम से भी जाना जाता है।

महान हिमालय के समानान्तर दक्षिण में स्थित श्रृंखला को लघु हिमालय अथवा मध्य हिमालय कहते हैं; यह हिमालय की सबसे अधिक कटी-छँटी श्रृंखला है तथा इसका निर्माण अत्यधिक संपीडन तथा परिवर्तित शैलों से हुआ है; इसकी ऊँचाई 1800 मीटर से 4,500 मीटर के बीच तथा औसत चौड़ाई 50 किलोमीटर है। यहाँ की कुछ चोटियाँ 5,000 मीटर से अधिक ऊँची हैं; यहाँ नदियाँ 1,000 मीटर तक गहरे गॉर्ज से होकर बहती हैं; शीत ऋतु में इस क्षेत्र में 3–4 महीने बर्फ गिरती है, जबकि ग्रीष्म ऋतु में यहाँ मौसम शीतल और स्वास्थ्यवर्द्धक होता है।

कश्मीर की पीरपंजाल श्रेणी इसी भाग में स्थित है; यहाँ के पर्यटन स्थलों में कश्मीर की घाटी, शिमला, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग आदि हैं; यहाँ की सभी पर्वत श्रेणियाँ घने सदाबहार वनों से ढके रहते हैं तथा इस क्षेत्र में कुछ घास के मैदान भी हैं, जिसे कश्मीर में मर्ग, जैसे-गुलमर्ग, खिलनमर्ग और सोनमर्ग कहते हैं।

बॉक्स: पंजाब = (पंज् + आब) — यह फारसी शब्द है; पंज का अर्थ 'पाँच' और आब का अर्थ 'पानी', अर्थात् पाँच पानी वाला क्षेत्र।

हिमालय के सबसे दक्षिणी श्रृंखला को बाहरी हिमालय, उपहिमालय अथवा शिवालिक कहा जाता है; यह हिमालय की सबसे निचली श्रृंखला है; यह पश्चिम में पोतवार के पठार क्षेत्र से प्रारम्भ होकर पूरब की ओर तिस्ता नदी तक फैला है; इसकी औसत ऊँचाई 900 से 1,500 मीटर के मध्य तथा चौड़ाई 10 से 50 कि.मी. है; पुस्तक का वाक्य लंबाई का आँकड़ा 1,200 कि.मी. भी इसी संदर्भ में देता है — देखें सावधानी। यह हिमालय का सबसे नवीन पर्वतीय भाग है।

इसमें कुछ विस्तृत घाटियाँ भी हैं, जिन्हें दून या द्वार कहते हैं — जैसे-देहरादून, कोटलीदून एवं पाटलीदून, बुटवाल, कांगड़ा घाटी, अलीपुर द्वार इत्यादि। बिहार में पश्चिमी चम्पारण का उत्तर-पश्चिमी पहाड़ी भाग इसी श्रृंखला के अंतर्गत आता है; बिहार के लगभग 856 वर्ग कि.मी. क्षेत्र पर इसका विस्तार है; ये सोमेश्वर की पहाड़ियाँ कहलाती हैं। चित्र 2.5: हिमालय (मानचित्र)।

पश्चिम से पूर्व तक स्थित क्षेत्रों के आधार पर भी हिमालय को विभाजित किया गया है; इस वर्गीकरण को नदी घाटियों की सीमा के आधार पर किया गया है: सतलुज एवं सिन्धु के बीच स्थित हिमालय के भाग को पंजाब हिमालय के नाम से जाना जाता है (कश्मीर हिमालय भी इसी के अन्तर्गत है); सतलुज तथा काली नदियों के बीच स्थित हिमाचल हिमालय के भाग को कुमायूँ हिमालय के नाम से जाना जाता है; काली तथा तिस्ता नदियाँ नेपाल हिमालय का एवं तिस्ता तथा दिहांग (ब्रह्मपुत्र) नदियाँ असम हिमालय का सीमांकन करती हैं।

तालिका — हिमालय का पश्चिम से पूर्व की ओर वर्गीकरण: 1. पंजाब हिमालय/कश्मीर हिमालय — सिन्धु एवं सतलुज नदी के बीच; 2. हिमाचल/कुमायूँ हिमालय — सतलुज एवं काली नदी के बीच; 3. नेपाल हिमालय — काली एवं तिस्ता नदी के बीच; 4. असम हिमालय — तिस्ता एवं दिहांग (ब्रह्मपुत्र) नदी के बीच। नोट: पुस्तक ने क्रमांक 2 दो बार छपा है (हिमाचल/कुमायूँ और नेपाल दोनों को 2) — पृष्ठ पर सही क्रम 1–4 दिया गया है।

ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय की सबसे पूर्वी सीमा बनाती है; दिहांग महाखड्ड (गॉर्ज) के बाद हिमालय दक्षिण की ओर एक तीखा मोड़ बनाते हुए भारत की पूर्वी सीमा के साथ फैल जाता है; इन्हें पूर्वांचल या पूर्वी पहाड़ियों के नाम से भी जाना जाता है। ये पहाड़ियाँ उत्तर-पूर्वी राज्यों में हैं तथा मज़बूत बलुआ पत्थरों, जो अवसादी शैल है, से बनी हैं; ये घने जंगलों से ढँकी हैं तथा अधिकतर समानान्तर श्रृंखलाओं एवं घाटियों के रूप में फैली हैं; पूर्वांचल में पटकोई, नागा तथा लुशाई मणिपुर की पहाड़ियाँ शामिल हैं।

हिमालय की दक्षिणी ढाल बहुत तीव्र है, जबकि उत्तरी ढाल अपेक्षाकृत मंद है; इसलिए उत्तरी ढाल पर दक्षिणी ढाल की अपेक्षा हिमानियों का विस्तार अधिक है।

भौतिक विभाग (ii) — उत्तर का विशाल मैदान

हिमालय पर्वत के दक्षिण और दक्षिणी पठार के उत्तर, तीन प्रमुख नदी प्रणालियों (सिन्धु, गंगा एवं ब्रह्मपुत्र) और उसकी सहायक नदियों से बना यह विशाल मैदान सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहा जाता है। यह मैदान जलोढ़ मिट्टी से बना है; यह भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान है।

लाखों वर्षों में हिमालय के गिरिपाद में स्थित बहुत बड़े बेसिन (द्रोणी) में जलोढ़ के निक्षेप से इस भाग का निर्माण हुआ है; यह 7 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैला है; पश्चिम से पूर्व इसकी लम्बाई लगभग 2400 कि.मी. है और 150 से 500 कि.मी. चौड़ा है; यह मैदान सामान्यतः समुद्र तल से 240 मीटर से अधिक ऊँचा नहीं है। पश्चिमी मैदान की ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम और पूर्वी मैदान का ढाल उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है।

1. पश्चिमी मैदान या पंजाब का मैदान — सिन्धु और इसकी सहायक नदियों के द्वारा बना भाग; इसका बहुत बड़ा भाग पाकिस्तान में स्थित है; भारत में पंजाब और हरियाणा का पश्चिम भाग इसमें सम्मिलित है; इस भाग में हिमालय से निकलकर प्रवाहित होने वाली सहायक नदियाँ — झेलम, चेनाब, रावी, व्यास तथा सतलुज हैं; रावी और व्यास के दोआब को ऊपरी बारी दोआब कहते हैं तथा व्यास और सतलुज के बीच के दोआब को बिस्त दोआब कहा जाता है; इस मैदान की औसत ऊँचाई 150 से 300 मीटर तक है तथा सामान्य ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण पश्चिम की ओर है।

2. राजस्थान का मैदान — दूसरा उपभाग; यह मुख्यतः अर्द्धशुष्क और शुष्क प्रदेश है; बालुका स्तूप यहाँ की प्रमुख स्थलाकृति है; पूर्वी भाग में यहाँ कई पहाड़ियाँ हैं, जिन्हें 'टोर' कहते हैं; लूनी इस प्रदेश की प्रमुख नदी है, जो वर्षा के दिनों में कच्छ के रन तक जाती है; इस प्रदेश में सांवर, डेगना, दिदवाना तथा कुचामन जैसे प्रसिद्ध खारे पानी के झील हैं।

3. मध्यवर्तीय मैदान या गंगा का मैदान — यमुना नदी से लेकर पूर्व में बंगलादेश की पश्चिमी सीमा तक फैला मैदान; यह घग्घर से तिस्ता नदी तक लगभग 1,400 किलोमीटर लम्बा है; इस मैदान की ढाल सामान्यतः उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर है; इसका विस्तार उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के कुछ भाग तथा पश्चिमी बंगाल में फैला है; इसके तीन उप-भाग — ऊपरी गंगा का मैदान (दिल्ली से इलाहाबाद तक का क्षेत्र), मध्यवर्ती गंगा का मैदान (इलाहाबाद से फरक्का तक) तथा निचली गंगा का मैदान (गंगा का डेल्टा प्रदेश, पश्चिम बंगाल राज्य में फैला है)।

4. ब्रह्मपुत्र का मैदान या पूर्वी मैदान — असम राज्य में सदिया के उत्तर-पूर्व से होकर धुबरी स्थान तक लगभग 650 कि.मी. लम्बा है; इस मैदान के पश्चिमी भाग को छोड़कर सभी ओर ऊँचे पहाड़ी भाग हैं; इस भाग का ढाल क्रमशः उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पूर्व की ओर होता जा रहा है; ब्रह्मपुत्र नदी इस मैदान के मध्य से गुजरती है; इस नदी के बीच स्थित माजोली द्वीप, विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है।

बिहार विशेष: उत्तरी-पश्चिम भाग की शिवालिक पहाड़ी और दक्षिण में छोट-फुट पहाड़ियों को छोड़कर बिहार राज्य का अधिकतर भाग गंगा और सहायक नदियों द्वारा लाई गयी जलोढ़ से बना है; यहाँ गंगा का मैदान दो भागों में बँटा है — उत्तरी गंगा का मैदान तथा दक्षिणी गंगा का मैदान।

उत्तरी गंगा के मैदान की प्रमुख नदियाँ: गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानन्दा; कोसी को 'बिहार का शोक' भी कहा जाता है; यहाँ की नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ आती है, जिसके कारण यहाँ 'छाड़न झील', 'दलदल' और 'चौर' भूमि का विस्तार होता रहता है।

दक्षिणी गंगा के मैदान की प्रमुख नदियाँ: सोन, पुनपुन, फल्गु तथा चानन; ये नदियाँ ग्रीष्मकाल में सूख जाती हैं या जल की पतली धारा के रूप में प्रवाहित होती हैं; निम्न क्षेत्र को यहाँ 'जल्ला' और 'टाल' कहा जाता है, जो नई जलोढ़ मिट्टी का क्षेत्र है।

भौतिक आकृतियों की भिन्नता के आधार पर विशाल मैदान के चार भाग: भाबर, तराई, बांगर, खादर। भाबर: नदियों द्वारा पर्वत से नीचे उतरते समय शिवालिक ढाल पर 8 से 16 कि.मी. की चौड़ी पट्टी में छोटे-बड़े पत्थरों के टुकड़े काफी मोटाई में जमा कर दिये हैं; इसी निक्षेप को 'भाबर' कहा जाता है; भाबर प्रदेश में छोटी-छोटी नदियाँ लुप्त हो जाती हैं। तराई: जब इस पट्टी के दक्षिण में नदियाँ या सरिताएँ पुनः प्रकट होती हैं और नम एवं दलदली क्षेत्र का निर्माण करती हैं, यह 'तराई' कहलाता है; यहाँ पर ऊँची घास और घने जंगल फैले हुए हैं, जो वन्य प्राणियों से भरा होता है। बांगर: गंगा के मैदान में जहाँ नदियों द्वारा पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैदान बन गए हैं, वहाँ नदियों के बाढ़ का जल नहीं पहुँच पाता है; उसे 'बांगर' कहते हैं; इस क्षेत्र की मृदा में चूनेदार निक्षेप पाए जाते हैं। खादर: नये कछारी भाग, जो निचले मैदान हैं और जहाँ बाढ़ का जल प्रतिवर्ष पहुँचकर नयी मिट्टी की परत जमा कर देता है, 'खादर' कहलाता है; इनका प्रत्येक वर्ष पुनर्वीकरण होता है, इसलिए यह उपजाऊ होते हैं और गहन कृषि के लिए आदर्श माना जाता है।

भौतिक विभाग (iii) — दक्षिण का पठार

दक्षिण का पठार या प्रायद्वीपीय पठार आकृति की दृष्टि से त्रिभुजाकार है तथा प्राचीन गोंडवाना भूमि का अंश है; यह उत्तर की ओर चौड़ा और दक्षिण में संकीर्ण है; इसकी औसत ऊँचाई 600 से 900 मीटर है। इसके उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल और सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं; पश्चिम में पश्चिमी घाट पर्वत और पूर्व में पूर्वी घाट की पहाड़ियाँ हैं; इस पठारी भाग में अनेक चौड़ी घाटियाँ एवं गुम्बदाकार पहाड़ियाँ हैं।

इस पठारी भाग के दो मुख्य भाग हैं — (क) मध्य उच्चभूमि, (ख) दक्कन का पठार।

(क) मध्य उच्चभूमि: अधिकतर भाग मालवा का पठार कहलाता है; यह पठारी भाग पूरब में महादेव श्रृंखला और उत्तर-पश्चिम में अरावली और मध्य में विंध्य श्रृंखला से घिरा हुआ है; इसके पश्चिम में राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र है; यहाँ बहने वाली नदियों में चंबल, सिंध, बेतवा तथा केन हैं; इसकी ढाल दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है; यह भाग पश्चिम में चौड़ा और पूरब में संकीर्ण है; इसके पूर्वी विस्तार को स्थानीय रूप से बुन्देलखण्ड तथा बघेलखण्ड के नाम से जाना जाता है; इसके सुदूर पूर्व के विस्तार को मुख्यतः दामोदर और स्वर्णरेखा नदियों द्वारा अपवाहित, छोटानागपुर का पठार कहा जाता है।

विन्ध्याचल के दक्षिण में इन्हीं के समानान्तर सतपुड़ा पर्वत तथा पूरब में अमरकंटक और छोटानागपुर का पठार है; सतपुड़ा की 1,350 मीटर ऊँची धूपगढ़ चोटी पंचमढ़ी पहाड़ी पर है। छोटानागपुर का पठार भी एक सुस्पष्ट पठारी इकाई है; इसका विस्तार बिहार राज्य के गया जिला के दक्षिणी सीमा तक है; इस पठारी भाग में बहने वाली नदियाँ दामोदर, सोन और स्वर्णरेखा हैं; इसका पश्चिमी मध्यवर्ती भाग 1,100 मीटर ऊँचा है, जो 'पात क्षेत्र' कहलाता है और छोटानागपुर (झारखंड) का सबसे ऊँचा पठारी क्षेत्र है; राँची का पठार इसके पूरब में है तथा उसकी ऊँचाई औसत 600 मीटर है; तीसरा पठार निचले हजारीबाग का पठार है, जिसकी ऊँचाई औसत 300 मीटर है; यहाँ पारसनाथ की पहाड़ी 1365 मीटर ऊँची है।

सतपुड़ा पर्वत के दक्षिण में तापी की घाटी है; नर्मदा और तापी दोनों नदियाँ भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं। अरावली की पहाड़ियाँ दक्षिण-पश्चिम में गुजरात से लेकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली तक फैली हैं; दिल्ली के निकट इसे दिल्ली की पहाड़ियाँ कहते हैं; अरावली की औसत ऊँचाई 300-920 मीटर तक है, किंतु दक्षिण-पश्चिम में आबू के निकट इनकी सबसे ऊँची चोटी माउण्ट आबू की गुरुशिखर 1,722 मीटर ऊँचा है। चित्र 2.6: प्रायद्वीपीय पठार (मानचित्र)।

(ख) दक्कन का पठार: दक्कन के पठार को दक्कन ट्रैप भी कहा जाता है; यह लावा द्वारा निर्मित है और लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है; इसके अन्तर्गत मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के अधिकांश भाग, पश्चिमी आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्य के अधिकतर भाग आते हैं; यहाँ लावा की अधिकतम अनुमानित गहराई 2,134 मीटर तक है, किंतु पूरब और उत्तर की ओर इसकी गहराई अपेक्षाकृत कम है।

पश्चिमी घाट पर्वत उत्तर में तापी नदी के बाएँ तट से प्रारम्भ होकर दक्षिण में कन्याकुमारी अन्तरीप तक 1,600 कि.मी. लम्बाई में फैला हुआ है; इसे सह्याद्रि की पहाड़ियाँ भी कहते हैं; यहाँ चार प्रमुख दर्रे उत्तर से दक्षिण क्रमशः थालघाट, भोरघाट, पालघाट और शिनकोटा हैं। दक्षिण की ओर पश्चिमी घाट पर्वत नीलगिरि की पहाड़ियों द्वारा पूर्वी घाट से मिल जाता है; यहाँ की सबसे ऊँची चोटी दोदा बेटा 2,670 मीटर ऊँची है; लेकिन दक्षिणी भारत की सर्वोच्च शिखर अन्नामुडी (2695 मी.) अन्नामलाई की पहाड़ी पर स्थित है।

पूर्वी समुद्र तटीय मैदान के समान्तर महानदी की घाटी से दक्षिण में नीलगिरि तक दक्षिण पूर्वी दिशा में 1800 किलोमीटर की लम्बाई में पूर्वी घाट पर्वत फैले हैं; यह पश्चिमी घाट से बिल्कुल भिन्न है; यह अधिक कटा-छँटा है तथा पहाड़ियों के रूप में है। पूर्वी घाट की प्रमुख पहाड़ियाँ: उड़ीसा में महेन्द्रगिरि, आन्ध्रप्रदेश में नलामलाई, पालकोंडा तथा तमिलनाडु में अन्नामलाई, पचामलाई, शिवराय, पलनी तथा वेलीगिरि; ये पहाड़ियाँ महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा पृथक हैं; ये नदियाँ उपजाऊ मैदान तथा डेल्टा का निर्माण करती हैं।

दक्षिण के पठार के पूर्वी और पश्चिमी किनारे पर तटीय मैदानों का विकास हुआ है; पश्चिम में यह मैदान संकीर्ण एवं कटा-छँटा है, जबकि पूर्व में चौड़ा एवं समतल है; कच्छ के रन का मैदान समुद्री निक्षेप में उज्जमन (Upliftment) से बना है। उत्तर के विशाल मैदान के उत्तर-पश्चिम में शुष्क प्रदेश है, जो राजस्थान की मरुभूमि कहलाती है — थार मरुस्थल का एक भाग; यहाँ रेतों के अनेक टीले मिलते हैं, जो वायु की दिशा के अनुसार बनते हैं; दक्षिण भाग में जहाँ बहुत तेज हवाएँ चलती हैं, वहाँ बालू के टीलों का ढाल हवाओं की दिशा की ओर लम्बी, सरल और लहरदार है, दूसरी ओर इनका ढाल अधिक खड़ा होता है; इनकी ऊँचाई 120 से 150 मीटर तक होती है। चित्र 2.4: भारत — मुख्य भौगोलिक वितरण (ऊँचाई वर्ग सहित मानचित्र)।

भौतिक विभाग (iv) — तटीय मैदान

दक्षिण के पठार के दोनों किनारों पर तटीय मैदान का विस्तार है; इस मैदान का निर्माण समुद्री क्रियाओं द्वारा या नदियों के द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी के द्वारा हुआ है। इसके दो बड़े भाग हैं — पश्चिमी तटीय मैदान और पूर्वी तटीय मैदान।

पश्चिमी तटीय मैदान उत्तर में खम्भात की खाड़ी से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी (कोमोरिन) अन्तरीप तक फैला है; इसकी औसत चौड़ाई 10-60 कि.मी. के मध्य है; इस मैदानी भाग में बहने वाली नदियाँ अत्यधिक तीव्र गति से बहती हैं; इसलिए नदियों के द्वारा मिट्टी का जमाव अधिक नहीं हो पाता। इसके दक्षिणी भाग में कई 'लैगून' पाए जाते हैं; न्यू मैंगलूर और कोची के बन्दरगाह ऐसे ही लैगून पर स्थित हैं; यहाँ पर कुछ अवशिष्ट मैदान का भी निर्माण हुआ है, जिनमें सौराष्ट्र और कच्छ का तटीय मैदान मुख्य है।

पश्चिमी तटीय मैदान के उत्तरी भाग को कोंकण और दक्षिणी भाग को मालाबार तटीय मैदान कहते हैं; नदियों की गति तीव्र होने के कारण प्रायः सभी नदियों द्वारा मुहाने पर ज्वारनदमुख (एस्चुअरी) का विकास हुआ है; नदियों की तीव्र गति के कारण यह मैदान काफी कटा-छँटा है।

पूर्वी तटीय मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा अधिक चौड़ा है; इसकी चौड़ाई 160 से 350 कि.मी. तक है; यह भाग उत्तर में गंगा के मुहाने से दक्षिण में कन्याकुमारी (कोमोरिन) अन्तरीप तक फैला है। इस मैदान का निचला भाग डेल्टा है और ऊपरी भाग अधिकांशतः नदियों के निक्षेप से बना है; इसके निचले भाग में महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि नदियों ने पठार के नीचे भाग से अवसाद लाकर निक्षेपित किया है। इस मैदान में तट के निकट फैले रेत के टीलों से घिरा हुआ छिछला लैगून निर्मित है, जिसे झील की संज्ञा भी दी गयी है; इस तटीय मैदान के उत्तरी भाग को गोलकुण्डा तट तथा दक्षिणी भाग को कोरोमण्डल तट कहते हैं।

भौतिक विभाग (v) और (vi) — मरुस्थल और द्वीप समूह

राजस्थान के पश्चिम में एक बड़ा शुष्क प्रदेश है, जिसे भारतीय मरुस्थल या राजस्थान का मरुस्थल कहा जाता है; यह 644 कि.मी. लम्बा और 160 कि.मी. चौड़ा है; इसका कुल क्षेत्रफल 1,04,000 वर्ग कि.मी. है। यह प्रायः शुष्क जलवायु वाला क्षेत्र है; यहाँ वर्षा 15 से.मी. से भी कम होती है; बरसात के मौसम में कुछ नदियाँ नज़र आती हैं, जो कुछ समय के बाद बालू में विलीन हो जाती हैं। यहाँ बालू के टिब्बों एवं बरखान का विस्तार बहुत अधिक है; यहाँ की एक मात्र बड़ी नदी लूनी है; यह भारत में अन्तःप्रवाह की सबसे लम्बी नदी है; इस नदी का अन्त कच्छ के रन में हो जाता है।

भारत की समुद्र सीमा के अन्तर्गत 1256 द्वीप हैं; ये मुख्यतः दो समूहों में हैं; बंगाल की खाड़ी के द्वीप समूह में लगभग 572 द्वीप हैं, जिसके 36 द्वीपों पर आबादी पायी जाती है; अरब सागर में 47 द्वीप हैं। इसके अतिरिक्त गंगासागर और महानदी के डेल्टा में अनेक द्वीप स्थित हैं; भारत और श्रीलंका के बीच भी कई छोटे-छोटे द्वीप हैं; इसी प्रकार से गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और कर्नाटक के तट पर भी अनेक द्वीप स्थित हैं।

बंगाल की खाड़ी के बड़े द्वीप समूह को अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के नाम से जाना जाता है; इस द्वीप समूह को दस डिग्री चैनल दो भागों में बाँटती है; ये द्वीप जलमग्न पर्वतों के ऊपरी भाग हैं। भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु 'इन्दिरा प्वाइण्ट' (6°30' उत्तरी अक्षांश — देखें सावधानी) है; दिसम्बर 2004 में आयी सुनामी में पूर्णतः डूब गया; किन्तु फिर यह अपनी पूर्व स्थिति में प्रकट हो गया है।

अरब सागर के द्वीप में लक्षद्वीप और मिनिकाय शामिल हैं; पूरा द्वीप समूह प्रवाल निक्षेप से बना है और 11 डिग्री चैनल द्वारा दो भागों में बाँटा गया है।

निष्कर्ष और सावधानियाँ

भारत के प्राकृतिक विभाग का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि विषमताओं के साथ-साथ ये एक दूसरे के पूरक भी हैं और हमारे प्राकृतिक संसाधनों को समृद्ध बनाते हैं। उत्तर का पर्वतीय भाग, जल और वनों का बड़ा स्रोत है, तो विशाल मैदान अन्न का भंडार है। वर्तमान में एक भूगर्भीय सर्वेक्षण से पता लगा है कि बिहार के गंगा बेसिन (द्रोणी) में खनिज तेल का भी विशाल भंडार है।

विशाल मैदान प्राचीन सभ्यताओं के विकास का भी आधार रहा है; दक्षिणी पठारी भाग खनिज सम्पदाओं से भरा पड़ा है, जो हमारे औद्योगिक विकास में भरपूर सहायक है; तटीय मैदान चावल की कृषि और मत्स्य पालन के लिए उपयुक्त है; यहाँ पर अनेक पत्तनों का भी विकास हुआ है; इस प्रकार ये भौतिक विविधताएँ भारत की प्राकृतिक सम्पदा का भी आधार है।

सावधानी — इन्दिरा प्वाइंट का अक्षांश पुस्तक में दो जगह अलग-अलग है: अध्याय 1 में 6°45' उत्तर अक्षांश (द्वीपों सहित दक्षिण विस्तार), अध्याय 2 में 6°30' उत्तरी अक्षांश। दोनों readings अपने-अपने अध्याय के पृष्ठों पर दर्ज हैं; इस अध्याय के पृष्ठ पर 6°30' ही रहेगा, साथ में अध्याय-1 से भिन्नता का नोट।

सावधानी — शिवालिक की औसत ऊँचाई वाला वाक्य पुस्तक में गड़बड़ छपा है ('औसत ऊँचाई (900 से 1,500 मीटर के मध्य) 1200 कि.मी. है') — पृष्ठ पर ऊँचाई (900–1,500 मीटर) और लंबाई (1,200 कि.मी.) अलग-अलग तथ्यों के रूप में दिए गए हैं, वाक्य को ज्यों-का-त्यों नहीं दोहराया गया है।

सावधानी — वर्गीकरण तालिका में पुस्तक ने क्रमांक 2 दो बार छपा है (हिमाचल/कुमायूँ और नेपाल दोनों को 2) — पृष्ठ पर सही क्रम 1–4 दिया गया है, साथ में छपाई-त्रुटि का नोट।

सावधानी — वस्तुनिष्ठ Q4 (सैडल चोटी की ऊँचाई) का उत्तर अध्याय के मुख्य पाठ में नहीं है; अभ्यास में प्रश्न को 'पाठ में उल्लेख नहीं' के नोट सहित दिया गया है। लघु Q4 (तटीय मैदान की तीन झीलें), ज्ञात करें Q3 (मसूरी/नैनीताल/रानीखेत के राज्य) और Q5 (सक्रिय ज्वालामुखी) के उत्तर भी अध्याय-पाठ में नहीं हैं; अभ्यास में उन्हें पाठ-बाह्य/सामान्य-ज्ञान उत्तर के रूप में चिह्नित किया गया है।

वर्तनियाँ पुस्तक के अनुसार हैं: तुजो विल्सन, गौरीनन्दा, बिआफो, बतूरा, शिपकीला, थागला, जालपला, पाटलीदून, बुटवाल, गुरुला मंधाता, शिनकोटा, गोलकुण्डा, कोरोमण्डल, मिनिकाय, प्वाइण्ट।

Key Terms — मुख्य शब्द

  • प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत — भूपर्पटी कई प्लेटों में विभाजित है; प्लेटों की गति से महाद्वीपों की स्थिति/आकार बदला; हिमालय इसी टकराव से बना।
  • पैंजिया / गोंडवाना लैंड / टेथिस — प्राचीन एकल भूखंड पैंजिया; उत्तरी भाग अंगारा लैंड, दक्षिणी भाग गोंडवाना लैंड; मध्य में टेथिस सागर।
  • हिमाद्रि — महान/आंतरिक हिमालय — सबसे सतत श्रृंखला, औसत ऊँचाई 6,100 मी., सभी प्रमुख शिखर इसी में।
  • लघु हिमालय — मध्य हिमालय — सबसे अधिक कटी-छँटी श्रृंखला, ऊँचाई 1,800–4,500 मी., चौड़ाई ~50 कि.मी.; मर्ग (गुलमर्ग आदि) यहीं।
  • शिवालिक — बाहरी/उपहिमालय — सबसे निचली व नवीन श्रृंखला, ऊँचाई 900–1,500 मी., चौड़ाई 10–50 कि.मी.; दून/द्वार घाटियाँ यहीं।
  • भाबर / तराई / बांगर / खादर — भाबर: शिवालिक ढाल पर पत्थरों की 8–16 कि.मी. पट्टी; तराई: नदियों के पुनः प्रकट होने से नम-दलदली क्षेत्र; बांगर: पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैदान; खादर: प्रतिवर्ष बाढ़ से नयी मिट्टी की परत।
  • दोआब — दो नदियों के बीच का मैदान — ऊपरी बारी दोआब (रावी-व्यास), बिस्त दोआब (व्यास-सतलुज)।
  • दक्कन ट्रैप — लावा द्वारा निर्मित दक्कन का पठार (~5 लाख वर्ग कि.मी., लावा की अधिकतम गहराई 2,134 मी.)।
  • सह्याद्रि — पश्चिमी घाट का दूसरा नाम — तापी से कन्याकुमारी तक 1,600 कि.मी.; दर्रे: थालघाट, भोरघाट, पालघाट, शिनकोटा।
  • माजोली द्वीप — ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित, विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप (असम)।
  • लैगून — तट के निकट रेत के टीलों से घिरा छिछला जल-क्षेत्र; पश्चिमी तट पर न्यू मैंगलूर/कोची के बन्दरगाह लैगून पर स्थित हैं।
  • दस डिग्री चैनल / 11 डिग्री चैनल — अंडमान-निकोबार को दो भागों में बाँटने वाली चैनल (दस डिग्री); लक्षद्वीप को दो भागों में बाँटने वाली चैनल (11 डिग्री)।

Remember — याद रखें

  • क्षेत्रफल का बँटवारा: 11% पर्वतीय, 28% पठारी, 18% पहाड़ी, 43% मैदानी; पठार/पहाड़ी औसत ऊँचाई 300–900 मी., मैदान/तट 160 मी. से कम।
  • हिमालय: सिंधु से ब्रह्मपुत्र तक ~2,500 कि.मी., ~5 लाख वर्ग कि.मी.; चौड़ाई कश्मीर 500 कि.मी., अरुणाचल 160 कि.मी.; के2 (8,611 मी.) भारत का सबसे ऊँचा।
  • तीन श्रेणियाँ: हिमाद्रि (6,100 मी. औसत), लघु हिमालय (1,800–4,500 मी.), शिवालिक (900–1,500 मी.)।
  • विशाल मैदान: 7 लाख वर्ग कि.मी. से अधिक, 2,400 कि.मी. लंबा, 150–500 कि.मी. चौड़ा, ऊँचाई 240 मी. से अधिक नहीं।
  • दक्कन ट्रैप ~5 लाख वर्ग कि.मी.; पश्चिमी घाट 1,600 कि.मी., पूर्वी घाट 1,800 कि.मी.; दोदा बेटा 2,670 मी., अन्नामुडी 2,695 मी. (दक्षिणी भारत की सर्वोच्च)।
  • मरुस्थल: 644 × 160 कि.मी., 1,04,000 वर्ग कि.मी., वर्षा 15 सें.मी. से कम; लूनी अन्तःप्रवाह की सबसे लम्बी नदी।
  • द्वीप: कुल 1256; बंगाल की खाड़ी ~572 (36 पर आबादी), अरब सागर 47; इन्दिरा प्वाइण्ट इस अध्याय में 6°30' (अध्याय 1 में 6°45' — भिन्नता का नोट पृष्ठ पर है)।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सबसे बड़ी भूल: तीन हिमालय श्रेणियों की ऊँचाई आपस में मिला देना — हिमाद्रि 6,100 मी. औसत, लघु 1,800–4,500 मी., शिवालिक 900–1,500 मी.। दूसरी भूल: भाबर/तराई/बांगर/खादर की परिभाषाएँ उलट देना — भाबर पत्थरों की पट्टी, तराई दलदली, बांगर पुरानी मिट्टी, खादर नयी मिट्टी। तीसरी भूल: सैडल चोटी, तटीय झीलों के नाम, मसूरी/नैनीताल/रानीखेत के राज्य और सक्रिय ज्वालामुखी के उत्तरों को पुस्तक-पाठ का तथ्य लिखना — ये पाठ में नहीं हैं, पृष्ठ पर पाठ-बाह्य चिह्नित हैं। चौथी भूल: इन्दिरा प्वाइंट का अक्षांश — इस अध्याय में 6°30' है, अध्याय 1 में 6°45' है; दोनों अपने-अपने पृष्ठों पर नोट सहित हैं।

Chart / Table: हिमालय के कुछ ऊँचे शिखर (पुस्तक की तालिका)

शिखरदेश (पुस्तक)ऊँचाई (मीटर)
माउंट एवरेस्टनेपाल8,848
के2 (माउंट गाडविन आस्टिन)भारत8,611
कंचनजंगाभारत8,598
मकालूनेपाल8,481
धौलागिरिनेपाल8,172
नंगा पर्वतभारत8,124
अन्नपूर्णाभारत7,817
कामेटभारत7,756
नामचा बरुआभारत7,756
गुरुला मंधाताभारत7,728

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत क्या है? तीन प्रकार के प्लेट सीमान्तों के नाम लिखिए।
    संकेत: भूपर्पटी कई प्लेटों में विभाजित है; प्लेटों की गति से महाद्वीप बने। सीमान्त: विनाशी (करीब आना), निर्माणक (दूर जाना), संरक्षी (रगड़ते हुए विपरीत दिशा)।
  2. हिमालय की तीन समानान्तर श्रेणियों के नाम और ऊँचाई-सीमा लिखिए।
    संकेत: हिमाद्रि (औसत 6,100 मी.), लघु/मध्य हिमालय (1,800–4,500 मी.), शिवालिक (900–1,500 मी.)।
  3. भाबर, तराई, बांगर, खादर — चारों की एक-एक पंक्ति में परिभाषा लिखिए।
    संकेत: भाबर: पत्थरों की पट्टी; तराई: नम-दलदली क्षेत्र; बांगर: पुरानी मिट्टी के ऊँचे मैदान; खादर: प्रतिवर्ष बाढ़ से नयी मिट्टी।
  4. उत्तर के विशाल मैदान के चार उप-भागों के नाम और एक-एक विशेषता लिखिए।
    संकेत: पंजाब का मैदान (पाँच नदियाँ), राजस्थान का मैदान (बालुका स्तूप, लूनी), गंगा का मैदान (1,400 कि.मी.), ब्रह्मपुत्र का मैदान (माजोली द्वीप)।
  5. पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट में तीन अंतर लिखिए।
    संकेत: पश्चिमी: सतत, 1,600 कि.मी., सह्याद्रि; पूर्वी: कटा-छँटा/पहाड़ियों के रूप में, 1,800 कि.मी., नदियों द्वारा पृथक।

प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers

  1. भारत के भौतिक स्वरूप के निर्माण में प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत की भूमिका समझाइए।
    भूपर्पटी बड़ी/छोटी प्लेटों में विभाजित है। गोंडवाना लैंड का भारत 20 करोड़ वर्ष पूर्व सुदूर दक्षिण में था; संवहनीय धाराओं से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ा और ~7 करोड़ वर्ष पूर्व ऑलीगोसीन कल्प में यूरेशियन प्लेट से टकराया; टेथिस भू-सन्नति की अवसादी चट्टानों में वलन से हिमालय बना; टेथिस के शेष भाग के नीचे मुड़ने से बनी द्रोणी में नदियों के अवसाद से विशाल मैदान बना।
  2. हिमालय की तीनों समानान्तर श्रेणियों का वर्णन कीजिए।
    हिमाद्रि: सबसे उत्तरी, सबसे सतत, औसत 6,100 मी., सभी प्रमुख शिखर, वर्ष भर बर्फ। लघु/मध्य: सबसे अधिक कटी-छँटी, 1,800–4,500 मी., चौड़ाई ~50 कि.मी., मर्ग घास-मैदान, पर्यटन स्थल (शिमला, मसूरी, नैनीताल)। शिवालिक: सबसे दक्षिणी, सबसे निचली व नवीन, 900–1,500 मी., दून/द्वार घाटियाँ, बिहार में सोमेश्वर पहाड़ियाँ (856 वर्ग कि.मी.)।
  3. उत्तर के विशाल मैदान की विशेषताएँ लिखिए। भाबर, तराई, बांगर, खादर क्या हैं?
    सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान; जलोढ़ मिट्टी; विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ और घनी जनसंख्या वाला मैदान; 7 लाख वर्ग कि.मी. से अधिक, 2,400 कि.मी. लंबा, 150–500 कि.मी. चौड़ा, ऊँचाई 240 मी. से अधिक नहीं। चार उप-भाग: पंजाब, राजस्थान, गंगा, ब्रह्मपुत्र का मैदान। भाबर/तराई/बांगर/खादर की परिभाषाएँ अभ्यास में दी गयी हैं।
  4. दक्षिण के पठार का वर्णन कीजिए — मध्य उच्चभूमि और दक्कन का पठार।
    प्रायद्वीपीय पठार त्रिभुजाकार, गोंडवाना का अंश, औसत ऊँचाई 600–900 मी.। मध्य उच्चभूमि: मालवा पठार, विंध्य/सतपुड़ा/अरावली से घिरा, चंबल-सिंध-बेतवा-केन नदियाँ, बुंदेलखंड/बघेलखंड, छोटानागपुर (पात क्षेत्र 1,100 मी., पारसनाथ 1,365 मी.)। दक्कन: दक्कन ट्रैप (लावा, ~5 लाख वर्ग कि.मी.), पश्चिमी घाट (सह्याद्रि, 1,600 कि.मी.) और पूर्वी घाट (1,800 कि.मी., कटा-छँटा)।
  5. तटीय मैदान, मरुस्थल और द्वीप समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
    पश्चिमी तट: खम्भात से कन्याकुमारी, 10–60 कि.मी. चौड़ा, कोंकण (उत्तर)/मालाबार (दक्षिण), लैगून, एस्चुअरी। पूर्वी तट: गंगा मुहाने से कन्याकुमारी, 160–350 कि.मी. चौड़ा, गोलकुण्डा (उत्तर)/कोरोमण्डल (दक्षिण), डेल्टा। मरुस्थल: 644×160 कि.मी., 1,04,000 वर्ग कि.मी., वर्षा <15 सें.मी., लूनी। द्वीप: कुल 1256; अंडमान-निकोबार (दस डिग्री चैनल), लक्षद्वीप (11 डिग्री चैनल, प्रवाल निक्षेप)।
पुनरावलोकन — याद रखने योग्य बातें
  • निर्माण: प्लेट विवर्तनिक — गोंडवाना से अलग होकर यूरेशियन प्लेट से टकराव (~7 करोड़ वर्ष पूर्व) से हिमालय; द्रोणी में अवसाद से विशाल मैदान।
  • बँटवारा: 11% पर्वतीय, 28% पठारी, 18% पहाड़ी, 43% मैदानी।
  • हिमालय: तीन श्रेणियाँ (हिमाद्रि/लघु/शिवालिक) + पश्चिम-पूर्व वर्गीकरण (पंजाब/कुमायूँ/नेपाल/असम); के2 भारत का सबसे ऊँचा (8,611 मी.)।
  • मैदान: चार उप-भाग + भाबर/तराई/बांगर/खादर; बिहार: उत्तरी गंगा मैदान (कोसी = बिहार का शोक) और दक्षिणी गंगा मैदान।
  • पठार/तट/मरुस्थल/द्वीप: दक्कन ट्रैप, सह्याद्रि, कोंकण/मालाबार, गोलकुण्डा/कोरोमण्डल, थार, अंडमान-निकोबार व लक्षद्वीप।

अभ्यास — किताब के प्रश्न-प्रकार (उत्तर सहित)

नीचे अध्याय के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर दिए गए उत्तरों से मिलान करें।

अभ्यास — I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (5)

अभ्यास — II. लघु उत्तरीय प्रश्न (9)

अभ्यास — III. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (3)

अभ्यास — IV. ज्ञात करें (5)

अभ्यास — V. मानचित्र कार्य (4 समूह)

अभ्यास — VI. क्रिया कलाप (3)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।