Educational Galaxy shield logo

Educational Galaxy

LEARN • THINK • SPEAK • GROW

Class 9 • Geography • Bharat Bhumi evam Log

Chapter 11: मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएं

मानवीय भूल से घटने वाली तीन बड़ी आपदाएँ — नाभिकीय, रासायनिक और जैविक — उनके कारण, उदाहरण और प्रबंधन। पुस्तक का शीर्षक 'मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ' है; नेविगेशन में साइट-शीर्षक ही रहता है।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Geography • Book: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

Print lets you save as PDF from the browser. This is not a textbook PDF.

मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएं — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Bharat Bhumi evam Log (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 9)  |  अध्याय 11  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — अध्याय का विषय-स्तरीय सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

मानवी गलतियों के कारण घटित आपदाएं : नाभिकीय, जैविक और रासायनिक के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): कारखाना, सुरक्षा सूट और चेतावनी — औद्योगिक आपदाओं से सुरक्षा का एक सामान्य चित्र। यह किताब का चित्र नहीं है।

मानवी गलतियों के कारण घटित आपदाएं : नाभिकीय, जैविक और रासायनिक के लिए चित्र

सुरक्षा सूट में औद्योगिक स्थल की जाँच करते कर्मी — एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

आपदा क्या है — और इसके दो वर्ग

आपदा वह त्रासदी है जो न सिर्फ मानव समुदाय वरन् जैविक समूहों के लिए भी अचानक तथा अप्रत्याशित रूप से एक ऐसी संकट की स्थिति उत्पन्न करती है, जब जान-माल की भारी क्षति हो जाती है।

सामान्य तौर पर आपदाओं को दो वर्गों में रखा जा सकता है — (अ) प्राकृतिक आपदाएँ तथा (ब) मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ। प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी विस्फोट, अति ओलावृष्टि, अप्रत्याशित हिमपात, भूस्खलन जैसी घटनाएँ आती हैं; इनके कारण, परिणाम और प्रबंध का अध्ययन अगली कक्षा (वर्ग X) में किया जायेगा।

इस कक्षा में मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाओं के कारण, परिणाम और प्रबंधन का अध्ययन किया जायेगा। औद्योगिक प्रतिस्पर्द्धा में मनुष्य ने सफलता की नयी ऊँचाइयों को हासिल किया है — चाँद तक छलाँग, मंगल पर पाँव रखने की तैयारी, भारत की महत्त्वाकांक्षी चंद्रयान योजना तथा मिसाइल और आणविक हथियारों के विकास ने मनुष्य को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है जहाँ विकास की यह गति जब-तब त्रासदी को भी जन्म देती है।

मानवीय भूल से घटित आपदाओं में नाभिकीय, रासायनिक और जैविक आपदायें सबसे प्रमुख हैं। इन तीनों ही आपदाओं के कारण वृहत् स्तर पर न सिर्फ मानवीय समूह का वरन् आस-पास के वन्य जीवों का भी विनाश हो जाता है या फिर उनके जीवन में अंग-भंग हो जाने के कारण स्थाई त्रासदी आ जाती है।

प्राकृतिक आपदाओं पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं हो सकता है; अनादि काल से इसे ईश्वर की कुदृष्टि कहा गया है। लेकिन हिरोशिमा पर बम विस्फोट और भोपाल के गैस रिसाव जैसी घटनाओं को ईश्वर की कुदृष्टि कहकर हम अपनी गलतियों से नहीं बच सकते हैं।

तकनीकी विकास का उद्देश्य जन-कल्याण, गरीबी निवारण तथा सभी को सुख तथा शांति से जीने का अवसर प्रदान करना था, लेकिन इन उद्देश्यों की आड़ में वैज्ञानिक ज्ञान का दूषित उपयोग मानवीय कारणों से घटनेवाली आपदाओं में लगातार वृद्धि करता जा रहा है। अगर इन आपदाओं पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तब प्राकृतिक आपदाओं के कारण मरनेवालों की संख्या से कहीं अधिक मौत मानवीय गलतियों से होनेवाली आपदाओं के कारण होगी।

11.1 नाभिकीय आपदा — ऊर्जा जो विकास भी है, विनाश भी

नाभिकीय ऊर्जा का विकास विज्ञान की विशिष्ट उपलब्धियों में से एक है। इसके अंतर्गत यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर रिएक्टर के माध्यम से नाभिकीय विखंडन कराया जाता है जिससे ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यह ऊर्जा आर्थिक-सामाजिक विकास को नई गति दे सकता है लेकिन जब इसका उपयोग परमाणु हथियार बनाने में होता है तब यही ऊर्जा आपदा का कारण बन जाता है।

वर्तमान समय में अनेक देशों ने परमाणु अस्त्र का निर्माण कर लिया है; भारत भी उनमें से एक है। राजस्थान मरुस्थल में प्रायोगिक तौर पर परमाणु अस्त्रों के विस्फोट के द्वारा भारत ने अपनी अभूतपूर्व सामरिक क्षमता का परिचय दिया है। भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान ने भी परमाणु अस्त्रों का निर्माण और विस्फोट कर अपनी सामरिक क्षमता का परिचय दिया है। चित्र-11.1 नाभिकीय रिएक्टर : परमाणु ऊर्जा का उत्पादन केन्द्र।

परमाणु बम का सर्वप्रथम विस्फोट 1945 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जापान के दो नगरों पर परमाणु बम गिराया गया था। सर्वप्रथम 6 अगस्त, 1945 में हवाई हमले के द्वारा हिरोशिमा पर तथा पुनः 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराये गये, इससे लाखों लोगों की मौत हुई। आलीशान भवनों और औद्योगिक इकाइयों के ये नगर कब्रिस्तान में तब्दील हो गये।

एक लाख से भी अधिक लोग घायल (अपंग) हुए जिन्हें परमाणु किरणों के प्रभाव से कैंसर, चर्म रोग जैसी बीमारियाँ हुईं। बचे हुए लोग अपने ही लोगों से बिछड़ गये जिससे मनोरोग की समस्या उत्पन्न हुई। परमाणु बम के हमले ने जापान को हिला दिया और इस अमानवीय कृत्य के सामने वह नतमस्तक हो गया। परमाणु बमों के विस्फोट के साथ अमेरिकी विजय मानव सभ्यता के लिए एक त्रासदी थी। चित्र-11.2 नाभिकीय विस्फोट : मानवीय विनाश का एक प्रमुख कारण।

नाभिकीय दुर्घटनाएँ — चेर्नोबिल और नरोरा

यद्यपि इस त्रासदी के बाद अब तक किसी भी युद्ध में परमाणु अस्त्रों का उपयोग नहीं किया गया है लेकिन परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। कई परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने वाले केन्द्रों पर मानवीय भूल दुर्घटना का गवाह बन चुका है। 1986 ई० में तत्कालीन सोवियत संघ के चेर्नोबिल नगर में मानवीय भूल के कारण एक रिएक्टर से रेडियोधर्मिता के कारण सैकड़ों लोगों की जान गई और इसका प्रतिकूल प्रभाव इसके आस-पास के वातावरण पर वर्षों तक रहा। 1993 ई० में भारत के नरोरा केंद्र पर भी भयंकर दुर्घटना होते-होते बची।

परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने वाले सभी केंद्रों पर स्वतः रेडियेशन की प्रक्रिया कार्य करती है। अतः वहाँ कार्य करने वाले वैज्ञानिकों तथा श्रमिकों को रेडियेशन-प्रतिरोधी (Anti-Radiation) जैकेट का प्रयोग करना होता है। भारत जैसे औपचारिक श्रमिकों को न तो रेडियेशन से बचने की कोई जानकारी दी जाती है और न ही उनको विशेष प्रकार के जैकेट उपलब्ध कराये जाते हैं। भारत में ही तारापुर (महाराष्ट्र) आणविक ऊर्जा केन्द्र में इस प्रकार की अनभिज्ञता की रिपोर्टिंग कई बार की गई है; लगभग यही स्थिति कलपक्कम् परमाणु ऊर्जा केंद्र (चेन्नई) की भी है।

परमाणु कचरे (Nuclear waste) का सही ढंग से निष्पादन नहीं होने पर वह पुनः कुछ अंतराल के बाद रेडियेशन की प्रक्रिया प्रारंभ कर देता है। अतः परमाणु कचरों के निष्पादन के लिए आवश्यक है कि उसका संग्रह विशेष रूप से निर्मित संग्रह-गृह (Store House) में किया जाए या अत्यधिक गहराई पर डंप कर दिया जाय। मानवीय अधिवास के क्षेत्रों से दूर अधिक गहराई पर डंपिंग की जा सकती है। लेकिन इस प्रकार की सूचनायें मिलती हैं कि परमाणु ऊर्जा संपन्न देश इसके कचरे को या तो गरीब देशों के बंजर भूमि में डंप कर देते हैं या फिर समुद्र में फेंक देते हैं। इस प्रकार की भी सूचनायें हैं कि रूस और अमेरिका जैसे देश परमाणु ऊर्जा-चालित नौसैनिक सबमरीन पोतों के परमाणु रॉड का उपयोग समाप्त होने के बाद समुद्र में फेंक देते हैं।

नाभिकीय प्रबंधन — प्रतीक, सुदूर-स्थापना और तहखाने

प्रबंधन की आवश्यकता एवं लक्ष्य: परमाणु ऊर्जा का उपयोग सदैव विनाशकारी नहीं है। यही कारण है कि भारत ने अमेरिका के साथ इसी वर्ष परमाणु ऊर्जा संधि की है। विश्व के करीब 20 परमाणु ऊर्जा तकनीकी संपन्न देशों ने भारत को इस ऊर्जा उत्पादन हेतु संवर्द्धित यूरेनियम देने का आश्वासन दिया है। इस संदर्भ में भारत ने स्पष्ट किया है कि भारत द्वारा इस ऊर्जा का उत्पादन परमाणु बम के लिए नहीं वरन् विकास हेतु विद्युत ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जायेगा। अतः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक है कि सभी देश परमाणु अप्रसार की नीति से सहमत हों अर्थात् परमाणु बम न बनाने का निर्णय इस तकनीक को उपयोगी तथा विकास का दूत बना सकता है।

जापान पर परमाणु विस्फोट के बाद ही त्रासदी से बचने के लिए विवेकशील लोगों ने एकजुटता का परिचय प्रारंभ कर दिया था। इसी एकजुटता का परिणाम था कि एक ही वर्ष बाद अर्थात् 1946 ई० में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा रेडियोधर्मी आपदा से बचाव के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक विकसित किया गया है जो ऐसे संकट में सामूहिक एकता का प्रतीक है।

वस्तुतः परमाणु बम न बनाने का समझौता ही पर्याप्त नहीं है; परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने वाले केंद्रों द्वारा भी रेडियेशन के कुप्रभाव को रोकना आवश्यक है। संयंत्रों की खराबी और मानवीय भूल से बिना बम विस्फोट से भी लाखों लोगों की जान जा सकती है। अतः इन केंद्रों की स्थापना सघन बस्तियों से दूर की जा सकती है; भारत में कैगा परमाणु केंद्र इसका उदाहरण है। इसी प्रकार रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में भी परमाणु केंद्र सुदूर क्षेत्रों में स्थापित किये गये हैं।

ऐसे केंद्रों पर कार्य करने वाले लोगों की निश्चित अंतराल पर स्वास्थ्य परीक्षण आवश्यक है। कार्य करने वाले लोगों को रेडियेशन प्रतिरोधी जैकेट का प्रयोग अनिवार्य रूप से करना चाहिए। इतना ही नहीं, आसपास तथा शहर में रहनेवाले लोगों को भी दुर्घटना की स्थिति में इससे बचाव की पर्याप्त जानकारी देनी चाहिए। किसी भी त्रासदी की स्थिति में संभावित प्रभावित क्षेत्र के लोगों को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सूचना के माध्यम से सूचित करना चाहिए। बचाव की सूचना भी समय-समय पर दी जानी चाहिए।

सामुदायिक स्तर पर यह बताना आवश्यक है कि दुर्घटना की स्थिति में क्या करें और क्या न करें — जैसे रेडियेशन प्रतिरोधी जैकेट तथा मास्क पहनें (चित्र-11.3), खुले भोजनालय का प्रयोग न करें, आग जलाने का कार्य न करें, इत्यादि। लोगों को तत्काल राहत सामग्री भी पहुँचायी जाय। ऐसे भोजन के पैकेट का वितरण किया जाना चाहिए जिसमें रेडियेशन का प्रभाव न हो। स्कूल में बच्चों को तथा स्वयंसेवी संस्था के द्वारा समय-समय पर बचाव और सुरक्षा की जानकारी दी जानी चाहिए। आस-पास के लोगों में जागरूकता को विकसित करना आवश्यक है। इन क्षेत्रों में तहखाने का पर्याप्त निर्माण किया जाना चाहिए और लोगों को चेतावनी मिलते ही उसके अंदर चले जाने का निर्देश — पूर्व से ही रहना चाहिए। निश्चित गहराई के बाद रेडियेशन का प्रभाव कम हो जाता है।

बॉक्स — बच्चों, क्या आप जानते हैं: 1. विश्व में पहला परमाणु विस्फोट कहाँ हुआ था? 2. भारत द्वारा ज़मीन के अन्दर प्रथम परमाणु विस्फोट कहाँ किया गया था? 3. भारत में पहली बार परमाणु ऊर्जा उत्पादन केन्द्र कहाँ स्थापित किया गया है? यदि नहीं जानते हैं तो अपने शिक्षक की मदद से इसकी जानकारी प्राप्त करें।

11.2 रासायनिक आपदा — तीन भाग

औद्योगिक विकास की उपलब्धियों के साथ कई प्रकार की समस्यायें भी प्रारंभ हुई हैं। औद्योगिक उत्पाद से जुड़ी समस्याओं में रासायनिक पदार्थों के उत्पाद से जुड़ी समस्याओं ने कई क्षेत्रों में आपदा का रूप ले लिया है। इस आपदा को तीन प्रमुख भागों में बाँट सकते हैं — (क) विषैले रासायनिक उत्पाद (Toxic Chemical Products) से उत्पन्न छिपी हुई आपदायें (Hidden Hazards), (ख) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदाएँ (Chemical Warfare Hazards), (ग) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदाएँ (Chemical material seepage and pollutant based Hazards)।

(क) छिपी हुई आपदाएँ: यह आपदा शीघ्र अनुभव नहीं की जाती है। इसका सर्वाधिक प्रभाव कृषि उत्पाद पर देखने को मिलता है। रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से न सिर्फ मृदा के सूक्ष्म जीवों का विनाश होता है वरन् उत्पाद विषैली हो जाती है। इसके लगातार उपयोग से कई प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जो जानलेवा साबित होती हैं। कभी-कभी कीटनाशक के प्रयोग से खेत और तालाब का जल ज़हरीला हो जाता है और पालतू पशु और यहाँ तक कि मनुष्य भी उसके शिकार हो जाते हैं। हरित क्रांति से जुड़ी यह आपदा भारतीय ग्रामीण समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है।

महानगरों की अप्रत्यक्ष आपदा मुख्यतः परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ऊर्जा के उपयोग से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड और मिथेन के प्रतिकूल प्रभाव से जुड़ी हुई है। इसका जानलेवा असर श्वसन नली, त्वचा, आँख और अन्य संवेदनशील अंगों पर पड़ता है। ऑक्सीजन की कमी से जानलेवा घुटन की समस्या उत्पन्न होती है। इस आपदा के लिए भी एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न विकसित किया गया है।

अम्लीय वर्षा भी अप्रत्यक्ष आपदा है। दामोदर घाटी प्रदेश में यह एक गंभीर समस्या है। इससे वनस्पति, मृदा और जल में अम्ल की मात्रा में भारी वृद्धि होती है। अम्लीय वर्षा का मूल कारण औद्योगिक उत्सर्जन के कारण वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड के प्रभाव से होती है। इससे मनुष्य के शरीर, फसल, वनस्पति, फल और मछलियों पर भी बुरा असर पड़ता है और इन सभी चीजों के उपयोग से लोगों में जानलेवा बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। अम्लीय वर्षा से वृक्ष के पत्ते मृतप्राय हो जाते हैं, नये पत्ते नहीं के बराबर निकलते हैं (चित्र 11.5)। चित्र 11.4 अम्लीय वर्षा के कारण, प्रक्रिया एवं परिणाम दर्शाता है — SO₂, NOₓ → H₂SO₄, HNO₃; शुष्क निक्षेप (ठोस एवं गैस) और नम निक्षेप (वर्षा एवं हिमपात)।

(ख) रासायनिक युद्ध सामग्री: द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही रासायनिक आयुधों का प्रयोग होता रहा है। जर्मनी द्वारा लाखों यहूदियों की हत्या सिर्फ गैस घर में कर दी गई। इराक पर संयुक्त राज्य अमेरिका के हमले का एक प्रमुख कारण यह बताया गया कि इराक द्वारा रासायनिक आयुधों का बड़े पैमाने पर संग्रह किया गया है। रासायनिक आयुध के अंतर्गत विविध ज़हरीले गैसों के प्रयोग के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थों में भी ऐसे गैस सन्निहित होते हैं जिसके प्रभाव से त्वचा में जलन और क्रमशः गलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। श्वसन द्वारा आंतरिक प्रभाव से घुटन, बेहोशी और मृत्यु की स्थिति भी उत्पन्न होती है।

(ग) रिसाव और कचरा: रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव भी बड़ी आपदा का रूप ले लेता है। भोपाल गैस त्रासदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — अगले खंड में विस्तार से।

भोपाल गैस त्रासदी और तूतीकोरिन

भोपाल रासायनिक गैस रिसाव आपदा 2-3 दिसंबर 1984 को घटी थी जो औद्योगिक जगत की सबसे बड़ी आपदा है। इसके अंतर्गत हाइड्रोजन साइनाइड तथा अन्य अभिक्रिया उत्पादों सहित 45 टन मिथाइल आइसोसायनेट नामक अत्यंत ज़हरीली गैस यूनियन कार्बाइड में कीटनाशक कारखाने से लगभग मध्य रात्रि में रिसकर हवा के साथ आस-पास के क्षेत्रों में बह गई। इससे तत्काल करीब 2000 लोगों की मृत्यु हुई लेकिन 10,000 से भी अधिक लोग अपंग हो गये। इसके प्रभाव से मरने वालों की संख्या में 1989 तक वृद्धि होती रही। वर्तमान में मृतकों की संख्या लगभग 16,000 तथा घायलों की संख्या 50,000 तक पहुँच गई है। अपंग लोगों का श्वसन की समस्या, अक्सर बुखार आना, लगातार कफ होना, मानसिक अपंगता, डिप्रेशन जैसी बीमारियाँ सामान्य रूप से हो गई हैं।

इसी प्रकार से तमिलनाडु के तूतीकोरिन में 5 जुलाई, 1997 को ताँबा गलाने के कारखाने में गैस रिसाव से कार्य करनेवाली 90 लड़कियाँ प्रभावित हुईं; उन्हें उल्टी होना, छाती में जलन तथा निमोनिया जैसी बीमारी उत्पन्न हुई। इसी प्रकार से अधिकतर पटाखे फैक्ट्री तथा विस्फोटक पदार्थों के कारखानों में कार्य करने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर लगातार प्रतिकूल असर पड़ता है।

बॉक्स — बच्चों, क्या तुम जानते हो: 1. भोपाल गैस त्रासदी में किस गैस का रिसाव हुआ था? 2. कीटनाशक पदार्थों से क्या-क्या हानि होती है? 3. अम्लीय वर्षा का प्रभाव किस पर पड़ता है? इसकी विशेष जानकारी अपने वर्ग शिक्षक की मदद से संग्रहित करें।

रासायनिक प्रबंधन — तत्काल और दीर्घकालिक

प्रबंधन (तत्कालिक): सभी रासायनिक उत्पादक कारखानों के प्रांगण में पर्याप्त मात्रा में जल तथा अग्निशामकों की व्यवस्था होनी चाहिए; पुनः वायुमापन यंत्र को लगाकर रखना भी आवश्यक है; गैस रिसाव की स्थिति में वहाँ मौजूद लोगों को स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की ज़रूरत है कि वे वायु के उल्टी दिशा में जाएँ; भोपाल में इस प्रकार की सूचना न रहने के कारण ही इतने अधिक लोगों की मृत्यु हुई। रासायनिक कारखानों में कार्य करनेवाले लोगों को मॉस्क और ग्लव्स, विशिष्ट डिजाइन के ट्राउजर और जूते की सुविधा भी अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए। एक निश्चित अंतराल पर सभी लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण भी आवश्यक है। रासायनिक उद्योगों की स्थापना सघन बसे क्षेत्रों से दूर होनी चाहिए। इसके लिए वैसे तकनीकी का भी सतत् उपयोग किया जाना चाहिए जो रिसाव और दुर्घटनाओं को कम कर सके।

प्रबंधन (दीर्घसूत्री): रासायनिक आयुध के उत्पादन पर न सिर्फ प्रतिबंध की ज़रूरत है बल्कि इन आयुधों को रखने वाले देशों और उत्पादन करने वाले देशों को मिलकर ऐसी नीति बनाने की ज़रूरत है जो इसके प्रयोग की संभावनाओं को न्यून कर सके। वस्तुतः रासायनिक आयुधों को रासायनिक अस्त्रों के विशेषज्ञ जी० हैरिजेल ने (Weapons of Terror and Mass Destruction) आतंक और भारी विनाश का अस्त्र कहा है। अतः इसके उत्पाद और उपयोग पर विश्वव्यापी रोक ही इस आपदा से मानव जाति को बचा सकता है।

छिपी हुई आपदाओं से बचाव: रासायनिक खाद, कीटनाशक से उत्पन्न छिपी हुई आपदाओं से बचने के लिए एक दीर्घकालीन सतत् कृषि विकास (Long term sustainable agricultural development) की नीति बनाने की ज़रूरत है। रासायनिक खाद के बदले जैविक उर्वरक के उपयोग की ज़रूरत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा वर्तमान समय में भारत के 80% कीटनाशक को अत्यधिक ज़हरीली तथा मानवीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला बताया गया है। कीटनाशक के उपयोग के वृद्धि का संबंध नये संकर बीजों के उपयोग में वृद्धि से है। अतः परम्परागत बीजों के संरक्षण और संवर्धन की भी आवश्यकता है। प्रो० स्वामीनाथन के अनुसार ये प्रक्रिया हरितक्रांति को सतत् हरित क्रांति में बदल सकता है (Conversion of green revolution into ever green revolution)।

वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, मिथेन और अम्ल की मात्रा में लगातार हो रही वृद्धि न सिर्फ निम्न वायुमंडल के लिए वरन् संपूर्ण जीवमंडल पर विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है। इन विनाशकारी गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना उपलब्ध तकनीकी के लिए गंभीर चुनौती है। अतः इन गैसों को छोड़नेवाले औद्योगिक उत्पादों के लिए आवश्यक है कि वे ऐसे तकनीक का प्रयोग करें जिससे विषैली गैसों का न्यूनतम उत्सर्जन हो; नई तकनीक आधारित जेनरेटर इसका सुंदर उदाहरण है।

आपदा-प्रबंधन की पहली अनिवार्यता: प्रभावित क्षेत्र के आस-पास रहने वाले लोग उन्हें सुरक्षित स्थान, स्वच्छ जल और अनौपचारिक तथा आकस्मिक चिकित्सा उपलब्ध करायें; इसके बाद घायल और मूर्छित लोगों को निकटतम अस्पताल पहुँचायें; वे स्वयं भी मॉस्क और अन्य आवश्यक वस्तु धारण करें। इस प्रकार की तत्परता के लिए आस-पास के क्षेत्रों में स्वयंसेवी संगठनों द्वारा लोगों के बीच प्रशिक्षण और परामर्श (Counselling) की सुविधा दी जानी चाहिए। ऊपर वर्णित प्रक्रियाओं के द्वारा रासायनिक आपदा प्रबंधन का कार्य अनुकूलतम स्तर (Optimum Level) तक किया जा सकता है।

11.3 जैविक आपदा — CDC के चार वर्ग

जैविक आपदा का मूल कारण वे जीव (Organism) तथा जीवों से प्राप्त पदार्थ हैं जिनका उपयोग या संपर्क मानव जीवन के लिए आपदा या त्रासदी का रूप ले सकता है। इसके अंतर्गत वे जैविक पदार्थ भी आते हैं जिससे मवेशियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय जैविक आपदा प्रतीक भी विकसित की गयी है। संयुक्त राज्य अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केन्द्र (Centre for Disease Control and Prevention) ने जैविक आपदा को चार वर्गों में विभाजित किया है।

(अ) प्रथम वर्ग: उन बीमारियों को रखा गया है जिसका कारण सूक्ष्म जीवाणु और वायरस होता है; ये वे जीवाणु और वायरस होते हैं जो चिकन पॉक्स, केनिन हेपाटाइटिस जैसी बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं; ये वो बीमारी है जो अति विनाशकारी नहीं होते हैं। इससे तात्कालिक बचाव के लिए कुछ सामान्य नियमों का पालन करना आवश्यक है, जैसे — ग्लब्स, मॉस्क जैसे सामानों का सतत् प्रयोग करना चाहिए। प्रदूषित पदार्थों (Contaminated Materials) के उपयोग से भी जैविक आपदा उत्पन्न होती है।

(ब) द्वितीय वर्ग: ऐसी बीमारियाँ जिनकी उत्पत्ति का कारण सूक्ष्म जीवाणु और वायरस है; इस वर्ग से उत्पन्न बीमारियों में हेपाटाइटिस A, B और C, इन्फ्लूएंजा, लाइम डिजिज, मिजिल्स, चिकेन-पॉक्स और एड्स जैसी बीमारियाँ संभव हैं। ऐसी बीमारियों से बचने के लिए समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण आवश्यक है। वायरस के प्रभाव से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनुशंसित स्वच्छ भोज्य पदार्थों और गर्म जल का प्रयोग आवश्यक है। चित्र 11.7 डेंगू मच्छर।

(स) तृतीय वर्ग: वैसे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस जो मानव समूह के लिए विनाशकारी आपदा ला सकता है; इसके अंतर्गत एंथ्रेक्स, पश्चिमी नील वायरस, वेनेजुएलियन एन्सेफलाइटिस, स्मॉल पॉक्स, ट्यूबोरक्लोसिस वायरस, रिफ्टवैली बुखार, येलो बुखार तथा मलेरिया, हैजा, डायरिया प्रमुख हैं। कालाजार बीमारी की आपदा मुख्यतः बिहार, प० बंगाल और उत्तर प्रदेश में देखने को मिलती है। यह बीमारी बालू मक्खी (Sand Fly) द्वारा संक्रमण से उत्पन्न होती है। इससे अनियमित बुखार, प्लीहा तथा लीवर के आकार में वृद्धि हो जाती है। भारत में 1992 ई० में इस संक्रमण से 77000 और 1995 में करीब 256000 व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। इसी वर्ग के अंतर्गत इन बीमारियों को उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म जीवाणु और वायरस अत्यंत ही खतरनाक होते हैं। अधिकतर गरीब देशों में ये बीमारियाँ जैविक आपदा का रूप लेती हैं।

(द) चौथा स्तर: अति विनाशकारी वायरस; इसमें आनेवाले वायरस बोलिवियन तथा अर्जेंटाइन बुखार तथा बर्ड फ्लू, एड्स (HIV) हैं; डेंगू बुखार, मारबर्ग बुखार, एबोला बुखार इत्यादि प्रमुख हैं। दिल्ली महानगरीय क्षेत्र में 1996 ई० में 423 लोग डेंगू से मरे; यह सर्वाधिक जोखिम भरा आपदा है। चित्र 11.8 में 1974 से 2002 के बीच डेंगू से पीड़ित लोगों तथा इससे हुई मृत्यु को एक आरेख द्वारा दिखाया गया है। यह एड्स की उत्पत्ति HIV (Human Immunodeficiency Virus) से होती है; भारत में इसका पता 1986 ई० में चला। यद्यपि इससे आकस्मिक त्रासदी नहीं होती है, लेकिन यह पारिवारिक स्तर पर जानलेवा आपदा है। इस वायरस का फैलाव वंशानुगत तथा दूषित खून को चढ़ाने तथा माता के द्वारा उसके बच्चों को एड्स हो सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत में करीब 25 लाख व्यक्ति इस संक्रमण से ग्रसित हैं। इस जानलेवा संक्रमण से प्रभावकारी बचाव की मेडिकल सुविधा अभी विकसित नहीं हो पाई है।

जैविक प्रबंधन और जैविक अस्त्र

सूक्ष्म जीवाणु और वायरस मूलतः विविध प्रकार के संक्रमण रोगों को उत्पन्न करता है जो महामारी का खौफनाक रूप ले लेता है। संक्रमण बीमारियाँ तेज़ी से अपने क्षेत्र में फैलती भी हैं। इन आपदाओं के तत्काल प्रबंधन की ज़रूरत है; अतः निम्नलिखित कार्य आवश्यक हैं — (1) यथासंभव गर्म जल और स्वच्छ तथा ताजा भोजन का उपयोग। (2) गंदे पानी को एक जगह नहीं रखना जिससे डेंगू के लार्वा उत्पन्न हो सके। (3) आस-पास के क्षेत्रों में लगातार सफाई एवं छिड़काव। (4) समय-समय पर खून जाँच कराना। (5) स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा लोगों को प्रशिक्षण एवं परामर्श देना। (6) डी०डी०टी० आदि का छिड़काव। (7) सार्वजनिक शौचालय केन्द्रों को स्वच्छ रखना। (8) विद्यालय में विद्यार्थियों को इस संदर्भ में आवश्यक जानकारी देना। (9) स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करना।

जैविक अस्त्र से उत्पन्न आपदा: नवीन युद्ध तकनीकी के अंतर्गत जैविक अस्त्रों को भी सम्मिलित किया गया है। इसे भारी विनाश का अस्त्र (Weapon of Mass Destruction) कहा गया है। जैविक अस्त्रों की तकनीक का विकास जापानियों द्वारा किया गया। किंतु जैविक अस्त्रों का वास्तविक प्रयोग 2001 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आतंकी हमले के बाद प्रारंभ हुआ। एंथ्रेक्स नाम के जीवाणु को अमेरिका के महत्त्वपूर्ण सामरिक क्षेत्रों में डाक सेवा के द्वारा अथवा अज्ञात व्यक्तियों द्वारा पहुँचाया जाने लगा। अमेरिकी प्रशासन द्वारा इराक पर हमले का एक प्रमुख कारण यह अवधारणा थी कि इराक द्वारा जैविक हथियारों का संग्रह किया गया है। यह वह सूक्ष्म जीवाणु है जो श्वसन क्रिया के द्वारा शरीर के अंदर ज़हर उत्पन्न करता है और एक त्रासदी को जन्म देते हैं। इसे गंदा बम (Dirty Bomb) भी कहा गया है।

एंथ्रेक्स के अलावे और भी कई जीवाणु जैविक अस्त्रों के अंतर्गत उपयोग में लाये जाते हैं। अन्य जीवाणुओं को रुग्णता लाने वाला जीवाणु (Disease Organism) कहा जाता है। इस युद्ध के खतरे से बचने के लिए तथा आमलोगों में जैविक अस्त्र की अवधारणा विकसित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक को भी विकसित किया गया है। यह प्रतीक चार छल्ले से बना हुआ है जो इस बात का प्रतीक है कि मिल-जुलकर इस आपदा के विरुद्ध काम करने से जैविक आपदा का समाधान होता है।

जैविक आपदा से बचाव के उपाय: आपदा जोखिम प्रबंधन की ज़रूरत है। इसके अंतर्गत गर्म जल पीना, स्वच्छ भोजन ग्रहण करना, छिड़काव और प्रशासनिक प्रतिबद्धता आवश्यक है। अनजान व्यक्ति द्वारा दिये गये किसी प्रकार के डिब्बे को हाथ लगाने या छूने की ज़रूरत नहीं है — इसमें एंथ्रेक्स की संभावना हो सकती है। इससे बचाव के लिए ग्लब्स का प्रयोग की जानी चाहिए। डॉग स्क्वायड की मदद से जैविक अस्त्रों के जगह की पहचान भी की जा सकती है। पुनः ऐसे सख्त कानून की भी ज़रूरत है जो जैविक अस्त्रों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा सके। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयास भी आवश्यक है।

सावधानियाँ — पुस्तक की अपनी असंगतियाँ

साइट-शीर्षक 'मानवी गलतियों के कारण घटित आपदाएं' है, पुस्तक का शीर्षक 'मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ' है — हीरो में पुस्तक-शीर्षक है, नेविगेशन में साइट-शीर्षक रहता है।

इस अध्याय में कोई सामूहिक अध्याय-अंतिम अभ्यास नहीं है — तीनों खंडों के अपने अभ्यास हैं (11.1 = 9, 11.2 = 7, 11.3 = 10; कुल 26)।

11.2 लघु प्रश्न 2 (कीटनाशक में किस रासायनिक पदार्थ का प्रयोग होता है?) का विशिष्ट उत्तर पाठ में नहीं है — अभ्यास में इसे 'पाठ में विशिष्ट नाम नहीं' के नोट सहित दिया गया है।

11.3 लघु प्रश्न 1 (प्लेग और हैजे का कारण) का सीधा उत्तर पाठ में नहीं मिला है — अभ्यास में इसे 'पाठ में सीधा उत्तर नहीं; सामान्य आधार — सूक्ष्म जीवाणु/वायरस जनित संक्रमण' के नोट सहित दिया गया है।

11.2 वस्तुनिष्ठ 2 (तूतीकोरिन) का विकल्प (ग) निकटतम है — पाठ में तीन लक्षण हैं (उल्टी, छाती में जलन, निमोनिया), विकल्प में दो ही हैं। 11.3 वस्तुनिष्ठ 2 (एंथ्रेक्स) — पाठ के अनुसार एंथ्रेक्स एक जीवाणु है जिसका अस्त्र के रूप में उपयोग होता है; विकल्प (क) 'अति सूक्ष्म जीव' निकटतम है।

पुस्तक के फ़ुटर असंगत हैं (कभी 'मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ', कभी 'भारत : भूमि एवं लोग') — पृष्ठ-संख्या के लिए यही क्रम माना गया है: PDF पृष्ठ 1 = पुस्तक पृष्ठ 144 … PDF पृष्ठ 17 = पुस्तक पृष्ठ 160।

सभी आँकड़े पुस्तक-काल के हैं (जैसे WHO के अनुसार भारत में एड्स से ग्रसित ~25 लाख, 1986 में भारत में एड्स का पता) — इन्हें वर्तमान आँकड़ा न समझें।

Key Terms — मुख्य शब्द

  • आपदा — अचानक तथा अप्रत्याशित रूप से उत्पन्न संकट की स्थिति, जब जान-माल की भारी क्षति हो जाती है।
  • नाभिकीय विखंडन — यूरेनियम/प्लूटोनियम को परिष्कृत कर रिएक्टर में विखंडन कराना, जिससे ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • रेडियेशन-प्रतिरोधी जैकेट — परमाणु केंद्रों पर काम करने वालों के लिए Anti-Radiation जैकेट और मास्क।
  • परमाणु अप्रसार — परमाणु बम न बनाने की नीति — अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक समझौता।
  • छिपी हुई आपदाएँ (Hidden Hazards) — विषैले रासायनिक उत्पादों से उत्पन्न आपदाएँ जो शीघ्र अनुभव नहीं होतीं — कृषि/कीटनाशक से जुड़ी।
  • अम्लीय वर्षा — SO₂ एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड से H₂SO₄/HNO₃ बनना; दामोदर घाटी में गंभीर समस्या।
  • मिथाइल आइसोसायनेट — भोपाल 1984 में रिसी अत्यंत ज़हरीली गैस (45 टन); तत्काल ~2000 मृत, बाद में ~16,000 मृत/50,000 घायल (पुस्तक के आँकड़े)।
  • CDC के चार वर्ग — संयुक्त राज्य अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केन्द्र द्वारा जैविक आपदा का चार वर्गों में विभाजन।
  • कालाजार — बालू मक्खी (Sand Fly) से फैलने वाली बीमारी — बिहार, प० बंगाल, उत्तर प्रदेश; 1992 में 77,000 और 1995 में ~2,56,000 मृत (पुस्तक)।
  • जैविक अस्त्र / गंदा बम — एंथ्रेक्स जैसे जीवाणु का अस्त्र-रूप में उपयोग; 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर हमले के बाद डाक से एंथ्रेक्स पहुँचाया गया।
  • सतत् हरित क्रांति — प्रो० स्वामीनाथन का विचार — जैविक उर्वरक और परम्परागत बीजों से हरित क्रांति को सतत् बनाना।
  • डेंगू आरेख 1974–2002 — चित्र 11.8 — दिल्ली में 1996 में डेंगू से 423 मृत; गंदे पानी को एक जगह न रखना बचाव का पहला नियम है।

Remember — याद रखें

  • आपदा के दो वर्ग: (अ) प्राकृतिक, (ब) मानवीय गलतियों से — इस अध्याय में केवल दूसरे वर्ग की तीन आपदाएँ (नाभिकीय, रासायनिक, जैविक)।
  • हिरोशिमा 6 अगस्त 1945, नागासाकी 9 अगस्त 1945; चेर्नोबिल 1986, नरोरा 1993 (बाल-बाल बची); अंतर्राष्ट्रीय रेडियोधर्मी प्रतीक 1946, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय।
  • भोपाल 2–3 दिसंबर 1984, 45 टन मिथाइल आइसोसायनेट; तत्काल ~2000 मृत, बाद में ~16,000 मृत/50,000 घायल (पुस्तक); तूतीकोरिन 5 जुलाई 1997, 90 लड़कियाँ प्रभावित।
  • अम्लीय वर्षा: SO₂ + नाइट्रोजन ऑक्साइड → H₂SO₄/HNO₃; सर्वाधिक प्रभाव दामोदर घाटी; WHO: भारत के 80% कीटनाशक अत्यधिक ज़हरीली।
  • जैविक चार वर्ग: (अ) चिकन पॉक्स/केनिन हेपाटाइटिस; (ब) हेपाटाइटिस A/B/C, इन्फ्लूएंजा, एड्स; (स) एंथ्रेक्स, मलेरिया, हैजा, कालाजार; (द) डेंगू, एबोला, मारबर्ग, बर्ड फ्लू।
  • तत्काल प्रबंधन के 9 कार्य: गर्म जल/स्वच्छ भोजन, गंदा पानी न रखना, सफाई-छिड़काव, खून जाँच, प्रशिक्षण-परामर्श, DDT छिड़काव, सार्वजनिक शौचालय स्वच्छ, विद्यालय जानकारी, स्वच्छ पेयजल।
  • इस अध्याय में कोई सामूहिक अध्याय-अंतिम अभ्यास नहीं है — तीनों खंडों के अभ्यास अलग-अलग हैं (9 + 7 + 10 = 26)।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सबसे बड़ी भूल: तीनों आपदाओं के उदाहरण आपस में मिला देना — नाभिकीय = हिरोशिमा/चेर्नोबिल, रासायनिक = भोपाल/तूतीकोरिन, जैविक = डेंगू/कालाजार/एंथ्रेक्स। दूसरी भूल: तूतीकोरिन और एंथ्रेक्स के वस्तुनिष्ठ उत्तरों को पाठ-तथ्य समझना — दोनों विकल्प-निकटतम हैं, पाठ में तीन लक्षण / जीवाणु-परिभाषा है। तीसरी भूल: कीटनाशक-रसायन और प्लेग-कारण वाले लघु प्रश्नों का उत्तर गढ़ना — दोनों का सीधा उत्तर पाठ में नहीं है, पृष्ठ पर नोट सहित हैं। चौथी भूल: पुस्तक-काल के आँकड़ों (एड्स ~25 लाख, 1986) को वर्तमान आँकड़ा लिखना।

Chart / Table: तीनों मानवीय आपदाएँ — एक दृष्टि में

आपदामुख्य कारणप्रमुख उदाहरण (पुस्तक)मुख्य बचाव
नाभिकीयपरमाणु हथियार; रिएक्टर में मानवीय भूल; कचरे का गलत निष्पादनहिरोशिमा/नागासाकी 1945; चेर्नोबिल 1986; नरोरा 1993अप्रसार नीति; सुदूर-स्थापना (कैगा); Anti-Radiation जैकेट/मास्क; तहखाने
रासायनिकविषैले उत्पाद (छिपी); युद्ध-सामग्री; रिसाव/कचराभोपाल 1984 (45 टन MIC); तूतीकोरिन 1997; अम्लीय वर्षा (दामोदर)वायु की उल्टी दिशा; मॉस्क/ग्लव्स; उद्योग सघन बस्तियों से दूर; जैविक उर्वरक
जैविकसूक्ष्म जीवाणु/वायरस; दूषित पदार्थ; जैविक अस्त्रकालाजार (बिहार); डेंगू दिल्ली 1996 (423 मृत); एंथ्रेक्स 2001गर्म जल/स्वच्छ भोजन; गंदा पानी न रखना; छिड़काव; खून जाँच; ग्लब्स

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. आपदा की परिभाषा लिखिए और उसके दो वर्गों के नाम उदाहरण सहित दीजिए।
    संकेत: अचानक/अप्रत्याशित संकट जिससे जान-माल की भारी क्षति हो। (अ) प्राकृतिक — भूकंप, सुनामी; (ब) मानवीय गलतियों से — नाभिकीय, रासायनिक, जैविक।
  2. हिरोशिमा और नागासाकी की तिथियाँ तथा चेर्नोबिल और नरोरा की घटनाएँ लिखिए।
    संकेत: हिरोशिमा 6 अगस्त 1945, नागासाकी 9 अगस्त 1945; चेर्नोबिल 1986 (सैकड़ों मृत), नरोरा 1993 (दुर्घटना होते-होते बची)।
  3. भोपाल गैस त्रासदी की तिथि, गैस का नाम और तत्काल मृत्यु-संख्या लिखिए।
    संकेत: 2–3 दिसंबर 1984; 45 टन मिथाइल आइसोसायनेट; तत्काल ~2000 मृत (बाद में ~16,000 मृत/50,000 घायल — पुस्तक)।
  4. CDC के चार वर्गों में से प्रत्येक की एक-एक बीमारी लिखिए।
    संकेत: (अ) चिकन पॉक्स; (ब) हेपाटाइटिस; (स) मलेरिया/हैजा; (द) डेंगू/एबोला।
  5. गैस रिसाव होने पर तत्काल क्या करना चाहिए? तीन बातें लिखिए।
    संकेत: वायु की उल्टी दिशा में जाएँ; मॉस्क/ग्लव्स पहनें; सुरक्षित स्थान, स्वच्छ जल और आकस्मिक चिकित्सा उपलब्ध कराएँ।

प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers

  1. मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ कौन-सी हैं? प्राकृतिक आपदाओं से इनका अंतर स्पष्ट कीजिए।
    नाभिकीय, रासायनिक और जैविक आपदाएँ। प्राकृतिक आपदाओं (भूकंप, सुनामी) पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं है और उन्हें अनादि काल से ईश्वर की कुदृष्टि कहा गया है; हिरोशिमा और भोपाल जैसी घटनाओं को ईश्वर की कुदृष्टि कहकर अपनी गलतियों से नहीं बचा जा सकता — ये मानवीय भूल से उत्पन्न होती हैं।
  2. नाभिकीय ऊर्जा के लाभ और हानि दोनों बताइए। नाभिकीय प्रबंधन के चार उपाय लिखिए।
    लाभ: आर्थिक-सामाजिक विकास को नई गति, विकास हेतु विद्युत ऊर्जा उत्पादन। हानि: हथियार के रूप में विनाश (हिरोशिमा/नागासाकी), रेडियेशन से कैंसर/चर्म रोग/अपंगता/मनोरोग, कचरे का खतरा। प्रबंधन: अप्रसार नीति; सुदूर-स्थापना (कैगा); Anti-Radiation जैकेट/मास्क; तहखाने और इलेक्ट्रॉनिक चेतावनी।
  3. रासायनिक आपदा के तीन भागों का वर्णन कीजिए। अम्लीय वर्षा कैसे बनती है?
    (क) छिपी हुई — विषैले रासायनिक उत्पाद/कीटनाशक से कृषि और स्वास्थ्य पर धीमा प्रभाव; (ख) युद्ध-सामग्री — ज़हरीली गैसों का युद्ध में प्रयोग (जर्मनी द्वारा यहूदियों की हत्या); (ग) रिसाव/कचरा — भोपाल, तूतीकोरिन। अम्लीय वर्षा: औद्योगिक उत्सर्जन से SO₂ एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड वायुमंडल में H₂SO₄/HNO₃ बनाते हैं; दामोदर घाटी में गंभीर।
  4. जैविक आपदा के चार वर्गों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। कालाजार और डेंगू के आँकड़े लिखिए।
    (अ) अति विनाशकारी नहीं — चिकन पॉक्स, केनिन हेपाटाइटिस; (ब) हेपाटाइटिस A/B/C, इन्फ्लूएंजा, एड्स; (स) विनाशकारी — एंथ्रेक्स, मलेरिया, हैजा, कालाजार; (द) अति विनाशकारी — डेंगू, एबोला, मारबर्ग, बर्ड फ्लू। कालाजार: 1992 में 77,000 और 1995 में ~2,56,000 मृत (पुस्तक); डेंगू: दिल्ली 1996 में 423 मृत।
  5. जैविक आपदा से बचाव के पाँच तत्काल कार्य और जैविक अस्त्र से बचाव के दो उपाय लिखिए।
    तत्काल: गर्म जल/स्वच्छ भोजन; गंदा पानी न रखना; सफाई-छिड़काव; खून जाँच; स्वच्छ पेयजल। जैविक अस्त्र से: अनजान व्यक्ति के डिब्बे को न छूएँ, ग्लब्स पहनें; डॉग स्क्वायड से पहचान; अस्त्रों पर सख्त कानून और अंतर्राष्ट्रीय प्रयास।
पुनरावलोकन — याद रखने योग्य बातें
  • आपदा के दो वर्ग — प्राकृतिक (वर्ग X में) और मानवीय गलतियों से (इस अध्याय में: नाभिकीय, रासायनिक, जैविक)।
  • नाभिकीय: हिरोशिमा/नागासाकी 1945, चेर्नोबिल 1986, नरोरा 1993; प्रतीक 1946; कैगा सुदूर-स्थापना का उदाहरण।
  • रासायनिक: तीन भाग; भोपाल 1984 (45 टन MIC); तूतीकोरिन 1997; अम्लीय वर्षा दामोदर घाटी।
  • जैविक: CDC चार वर्ग; कालाजार, डेंगू (दिल्ली 1996: 423 मृत), एंथ्रेक्स/गंदा बम; 9 तत्काल प्रबंधन कार्य।
  • कोई सामूहिक अध्याय-अंतिम अभ्यास नहीं — तीन खंड-अभ्यास: 9 + 7 + 10 = 26 प्रश्न।

अभ्यास — किताब के प्रश्न-प्रकार (उत्तर सहित)

नीचे अध्याय के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार दिए गए हैं। पहले स्वयं उत्तर सोचें, फिर दिए गए उत्तरों से मिलान करें।

अभ्यास — 11.1 नाभिकीय आपदा (9 प्रश्न: वस्तुनिष्ठ 3 + लघु 3 + दीर्घ 2 + परियोजना 1)

अभ्यास — 11.2 रासायनिक आपदा (7 प्रश्न: वस्तुनिष्ठ 3 + लघु 2 + दीर्घ 2)

अभ्यास — 11.3 जैविक आपदा (10 प्रश्न: वस्तुनिष्ठ 3 + लघु 3 + दीर्घ 3 + परियोजना 1)

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।