पाठ 4: प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः
महान मन वाले देशभक्त गोपबन्धु — प्रणाम के योग्य जीवन।
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Sanskrit • पुस्तक: दीपकम् — एनईपी मिरर (हिंदी)
पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में
पाठ एक कक्षा-चर्चा से शुरू होता है। ओडिशा के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी में भयंकर जलप्लाव आया है। जलप्लाव से वासगृह नष्ट हो गए हैं, कुछ लोग अस्वस्थ होकर चिकित्सालय में मृत्यु से युद्ध कर रहे हैं, कुछ अनाहार से कष्ट सह रहे हैं और बहुत से गृहपालित पशु नदी के स्रोत में बह गए हैं। आचार्य कहते हैं — ऐसे दुःखियों की सहायता करनी चाहिए, जैसे उत्कलमणि गोपबन्धु ने जलप्लाव-पीड़ितों की अकुण्ठ सेवा करके आज भी जनमानस में सम्मान पाया है। फिर वे गोपबन्धु का चित्र दिखाकर उनका जीवन-परिचय देते हैं।
एक करुण प्रसंग — एक बार आचार्य हरिहरदास ने सत्यवादि-वनविद्यालय के सब अध्यापकों को भोजन के लिए आमन्त्रित किया। सब अतिथि हाथ-पैर धोकर आसनों पर बैठे। केले के पत्तों पर बहुत से सुस्वादु व्यञ्जन परोसे गए। हँसते हुए गोपबन्धु ने कहा कि भोजन का अत्यन्त दुर्लभ होना जीवन के लिए सुखप्रद है, इसलिए भोजन करो और शरीर पर दया मत करो — सब ज़ोर से हँस पड़े। तभी बाहर से एक करुण ध्वनि गोपबन्धु के कानों में पड़ी — एक भिक्षुक तीन दिन से भूखा था और भोजन माँग रहा था। दयाविगलित हृदय वाले गोपबन्धु की आँखें अश्रुपूर्ण हो गईं। बिना कुछ सोचे उन्होंने अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लेकर बाहर जाकर भिक्षुक को खिला दिया।
जीवन-परिचय — गोपबन्धु महान समाजसेवक थे। वे सत्यवादि-वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पञ्चमित्रों में से एक और स्वतन्त्रता-संग्रामी थे। उनका जन्म ओडिशा के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के समीप साउण्डो ग्राम में हुआ था। अध्ययन-काल से ही वे दरिद्रों और रोगियों की सेवा करते थे। सत्यवादि-वनविद्यालय में वे छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे। निरक्षरता दूर करने के लिए वे सतत यत्न करते थे। कार्पास-वस्त्र के निर्माण के लिए वे स्वयं सूत्र तैयार करते थे। जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर वे सदा चिन्ताकुल रहते थे। महात्मा गाँधी की प्रेरणा से उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता-आन्दोलन में भाग लिया और दो वर्ष तक कारावास पाया। कारागार में रहते हुए उन्होंने ओडिया भाषा में बहुत से प्रेरणादायक ग्रन्थ रचे — जिनमें बन्दी का आत्मकथा-लेखन, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य और नचिकेता-उपाख्यान जैसे ग्रन्थ हैं। वे सदा स्वदेश के ही वस्त्रों और वस्तुओं का उपयोग करते थे। मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर वे जलप्लाव-पीड़ित भारतमाता के हज़ारों पुत्रों को बचाने घर से बाहर निकल गए और समाज की सेवा की।
उनका प्रसिद्ध वचन — देशसेवा में तत्पर गोपबन्धु का प्रसिद्ध प्रेरणादायक वचन आज भी जनमानस में राष्ट्रभक्ति जगाता है। उसका भाव यह है — मेरा शरीर स्वदेश की भूमि में ही विलीन हो; देशवासी मेरा अनुसरण करें; स्वराज्य के मार्ग में जहाँ-जहाँ गर्त (गड्ढे) हों, वे मेरी अस्थियों और मांस से भर जाएँ। अर्थात् देश के स्वतन्त्रता-मार्ग की बाधाएँ मेरे त्याग से दूर हों।
संस्थापक के रूप में — गोपबन्धु सत्यवादि-वनविद्यालय, दरिद्रनारायण-सेवा-संघ, सत्यवादि-मुद्रणालय और समाज नामक दैनिक समाचार-पत्र के प्रतिष्ठाता थे। समाज नामक दिनपत्रिका सौ से अधिक वर्षों से आज भी चल रही है। इसी कारण पाठ का शीर्षक कहता है — महान मन वाले देशभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य हैं।

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): गाँव के चौक में ध्वज के साथ लोगों से बात करता देशभक्त। देशभक्ति की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

चौक में ध्वज के नीचे इकट्ठा गाँव। देश-प्रेम की सामान्य तस्वीर।
मुख्य शब्द — शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जलप्लावः | बाढ़ |
| उत्कलमणिः | उत्कल (ओडिशा) का मणि — गोपबन्धु की उपाधि |
| अकुण्ठम् | बिना रुकावट, पूरी तरह |
| दयाविगलितहृदयः | दया से द्रवित हृदय वाला |
| निःशुल्कम् | बिना शुल्क, मुफ़्त |
| निरक्षरता | अनपढ़ होना |
| स्वतन्त्रतासङ्ग्रामी | स्वतन्त्रता-आन्दोलन का सेनानी |
| कारावासः | जेलवास |
| प्रणम्यः | प्रणाम करने योग्य |
| महामनाः | महान मन वाला |
व्याकरण और अभ्यास-प्रकार — इस पाठ से
घटनाक्रम: पाठ के अभ्यास में घटनाओं को सही क्रम में फिर से लिखना है — बाढ़ की चर्चा, गोपबन्धु का परिचय, भोजन-प्रसंग, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, कारावास और संस्थाओं की स्थापना। क्रम लिखते समय समय-सूचक शब्दों (एकदा, तदानीम्, ततः) का सहारा लो।
चित्र-वर्णन: चित्र देखकर पाँच वाक्य बनाने हैं। वाक्य बनाते समय पहले चित्र में क्या है यह देखो, फिर कर्ता, क्रिया और स्थान को सही विभक्ति में रखो।
कोष्ठक-पद प्रयोग: कोष्ठक में दिए गए पदों का प्रयोग करके वाक्य बनाओ। पद का लिङ्ग, वचन और विभक्ति वाक्य की क्रिया से मिलनी चाहिए।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- जलप्लाव से क्या-क्या हानि हुई?
संकेत: घर, स्वास्थ्य, भोजन और पशुओं की बात सोचो। - भोजन-प्रसंग में गोपबन्धु ने क्या किया?
संकेत: भिक्षुक की पुकार और अपने भोजन के बारे में सोचो। - गोपबन्धु किन संस्थाओं के प्रतिष्ठाता थे?
संकेत: विद्यालय, सेवा-संघ, मुद्रणालय और समाचार-पत्र — चार नाम सोचो। - घटनाओं को सही क्रम में लिखो।
संकेत: समय-सूचक शब्दों का सहारा लो। - चित्र देखकर पाँच वाक्य बनाओ।
संकेत: पहले चित्र की वस्तुएँ गिनो, फिर वाक्य बनाओ।
प्रश्न और उत्तर
- कक्षा-चर्चा किस प्रसंग से शुरू होती है?
ओडिशा के केन्द्रापड़ा जनपद में महानदी की भयंकर बाढ़ से शुरू होती है, जिसमें घर नष्ट हुए, लोग अस्वस्थ हुए और पशु बह गए। - गोपबन्धु कौन थे?
वे सत्यवादि-वनविद्यालय के अध्यापक, प्रसिद्ध पञ्चमित्रों में से एक, महान समाजसेवक और स्वतन्त्रता-संग्रामी थे। उनका जन्म पुरी जनपद के साक्षीगोपाल के समीप साउण्डो ग्राम में हुआ था। - भोजन-प्रसंग से गोपबन्धु के किस गुण का पता चलता है?
इससे उनकी तत्काल दया और त्याग का पता चलता है — तीन दिन से भूखे भिक्षुक की पुकार सुनकर उन्होंने अपना भोजन बिना सोचे उसे दे दिया। - गोपबन्धु ने स्वतन्त्रता-आन्दोलन में क्या सहा?
गाँधीजी की प्रेरणा से आन्दोलन में भाग लेकर उन्होंने दो वर्ष का कारावास पाया और कारागार में ओडिया में प्रेरणादायक ग्रन्थ रचे। - गोपबन्धु का प्रसिद्ध वचन किस भाव को जगाता है?
वह राष्ट्रभक्ति जगाता है — मेरा शरीर स्वदेश की मिट्टी में मिले, देशवासी मेरा अनुसरण करें और स्वराज्य-मार्ग की बाधाएँ मेरे त्याग से भर जाएँ।
विस्तार — और गहराई से
- “मरणासन्न पुत्र को छोड़कर बाढ़-पीड़ितों की सेवा” — इस प्रसंग का अर्थ स्पष्ट करो।
इससे पता चलता है कि गोपबन्धु के लिए समाज-सेवा व्यक्तिगत दुःख से ऊपर थी। यही त्याग उन्हें प्रणम्य बनाता है। - अपने प्रदेश के किसी स्वतन्त्रता-संग्रामी की सचित्र संक्षिप्त जीवनी लिखो।
नाम, जन्म-स्थान, मुख्य कार्य और एक प्रेरक प्रसंग — इन चार बिन्दुओं पर जीवनी लिखो और चित्र लगाओ। - जलप्लाव-पीड़ितों की सहायता के लिए अपनी एक कार्य-योजना लिखो।
भोजन, चिकित्सा, आश्रय और पढ़ाई — चार क्षेत्रों में क्या-क्या करोगे, क्रम से लिखो। - गोपबन्धु की स्वदेशी-भावना आज के जीवन में कैसे लागू हो सकती है?
स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, स्थानीय कारीगरों का सम्मान और अपने देश की भाषाओं का आदर — इन पर अपने विचार लिखो। - पाठ के शीर्षक का अर्थ समझाओ।
प्रणम्यः = प्रणाम योग्य, देशभक्तः = देश का भक्त, महामनाः = महान मन वाला — शीर्षक गोपबन्धु के तीन गुणों को एक साथ कहता है।
- प्रसंग: केन्द्रापड़ा बाढ़ → गोपबन्धु का परिचय → भोजन-प्रसंग → जीवन-कार्य।
- चार स्तम्भ: निःशुल्क शिक्षा, दरिद्र-रोगी-सेवा, स्वदेशी, स्वतन्त्रता-आन्दोलन (2 वर्ष कारावास)।
- संस्थाएँ: सत्यवादि-वनविद्यालय, दरिद्रनारायण-सेवा-संघ, सत्यवादि-मुद्रणालय, समाज दैनिक।
- अभ्यास-प्रकार: घटनाक्रम, चित्र-वर्णन, कोष्ठक-पद से वाक्य।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

