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बिहार बोर्ड (BSEB) • कक्षा 8 • संस्कृत • दीपकम् • एनईपी मिरर (हिंदी)

पाठ 3: सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

आठ सुभाषित — अच्छी वाणी का रस पीकर जीवन सफल बनाओ।

यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Sanskrit • पुस्तक: दीपकम् — एनईपी मिरर (हिंदी)

Print से browser से PDF save कर सकते हैं। यह textbook PDF नहीं है।

पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में

सुभाषित का अर्थ है — सुष्ठु भाषित, अर्थात् शोभन वचन। ऐसे वचन सदा लोगों के हित के लिए होते हैं। सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है। जो व्यक्ति सुभाषित पढ़कर कार्य-क्षेत्र में उसके ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है। सुभाषित अपने कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए सबको अवश्य सुभाषित पढ़ने चाहिए, जीवन का रहस्य समझना चाहिए और जीवन सुखमय बनाना चाहिए। इस पाठ में आठ सुभाषित दिए गए हैं; नीचे प्रत्येक का भाव अपने शब्दों में दिया गया है।

आठ सुभाषितों का भाव (अपने शब्दों में)

1. भारतभूमि धन्य है — जो मनुष्य इस भारतभूमि में जन्म पाते हैं, वे धन्य हैं — ऐसा देवता भी गीत गाते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के मार्गभूत इस भूखण्ड में देवता भी देवत्व छोड़कर मनुष्य-रूप में जन्म लेने की अभिलाषा करते हैं। अतः हम सब भारतीय भाग्यशाली हैं।

2. गुणी ही गुण जानता है — गुणवान व्यक्ति ही दूसरों के सद्गुणों को जान सकता है; गुणहीन नहीं जान सकता। बलवान ही दूसरों का बल जान सकता है; बलहीन नहीं। वसन्त आने पर कोयल वसन्त के गुण के रूप में कूजन करती है, पर कौआ मधुर नहीं गा सकता। हाथी सिंह का बल जानता है, पर चूहा नहीं जान सकता। अतः योग्य ही महत्त्व जानने में समर्थ होता है, अयोग्य नहीं।

3. विनम्रता परोपकारियों का स्वभाव है — वृक्ष फलों के आने से झुक जाते हैं; नए जल से भरे मेघ दूर से नीचे झुक आते हैं और वर्षा करते हैं। वैसे ही सत्पुरुष समृद्धि के समय उद्धत नहीं होते; वे सहृदय और विनम्र रहते हुए सदा परोपकार के लिए यत्नशील रहते हैं। परोपकार को वे व्रत के रूप में धारण करते हैं।

4. मनुष्य की परीक्षा चार प्रकार से — जैसे सोने की शुद्धता जानने के लिए स्वर्णकार पहले निकष-प्रस्तर पर घिसता है, फिर काटता है, फिर अग्नि में तपाता है और अन्त में प्रहार करता है — इन चार उपायों से सोने की पूर्ण शुद्धता जानी जाती है। वैसे ही मनुष्य भी चार बातों से परखा जाता है — वह किस कुल में जन्मा, उसका स्वभाव कैसा है, वह किन गुणों से युक्त है और किस कर्म से वह सर्वत्र समादृत होता है।

5. मनुष्य को दीप्त करने वाले आठ गुण — विशेष ज्ञान (प्रज्ञा), कुलीनता, संयम (दम), शास्त्र-ज्ञान (श्रुत), पराक्रम, अल्पभाषिता, सामर्थ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता — ये आठ गुण मनुष्य को समाज में सम्मान दिलाते हैं। उत्तम गुणों का आश्रय लेकर ही मनुष्य सम्मानित होता है।

6. सभा, वृद्ध, धर्म और सत्य — वह सभा ही सभा नहीं जिसमें वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्ध लोग न हों। वे वृद्ध ही वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें। वह धर्म ही धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो। और वह सत्य ही सत्य नहीं जो छल से युक्त हो। सफल सभा में ज्ञानवृद्ध धर्म की चर्चा करें और उस चर्चा में तथ्ययुक्त सत्य ही कहा जाए, छलयुक्त नहीं।

7. दुर्जन से मैत्री नहीं — दुर्जन के साथ मैत्री और प्रीति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वह विश्वास के योग्य नहीं होता; उसके मुख में माधुर्य होता है पर हृदय में कपटता होती है। अङ्गार गरम हो तो हाथ जला देता है और ठण्डा हो तो भी हाथ को मलिन कर देता है। वैसे ही दुर्जन सदा ही अनिष्ट करता है। विद्या से अलंकृत होने पर भी दुर्जन का परिहार करना चाहिए।

8. प्रयत्न और भाग्य रथ के दो चक्र हैं — जैसे एक चक्र से रथ की गति नहीं होती, वैसे ही पुरुषकार (प्रयत्न) के बिना दैव (भाग्य) सिद्ध नहीं होता। भाग्य के होने पर भी फल उद्योग से ही मिलता है। प्रयत्न और भाग्य मानव-रथ के दो चक्र हैं। उद्यम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, केवल मनोरथों से नहीं।

लेबल वाला चित्र: सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पेड़ के नीचे किताब पढ़ता बच्चा और पास का दीपक। अच्छी वाणी की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

चित्र: सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु

मेज़ पर किताब, दीपक और फूल। पढ़ाई की सामान्य तस्वीर।

मुख्य शब्द — शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सुभाषितम्शोभन वचन, अच्छी बात
धन्याःप्रशंसनीय, भाग्यशाली
अपवर्गःमोक्ष
वेत्तिजानता है
निर्गुणःगुणरहित
पिकःकोयल
वायसःकौआ
करीहाथी
नम्राःझुके हुए, विनम्र
तरवःवृक्ष
अनुद्धताःअभिमान से रहित
कृतज्ञताउपकार को मानना

व्याकरण — इस पाठ से

सन्धि-समासयुक्त पद: पाठ में सन्धि और समास से युक्त पदों का विश्लेषण दिया गया है। जैसे न उद्धताः से बना रूप नञ्-तत्पुरुष समास का उदाहरण है — निषेध का भाव समास से ही आता है। और यथाशक्ति का विग्रह है शक्तिम् अनतिक्रम्य — यह अव्ययीभाव समास है, जिसमें पहला पद अव्यय होता है और अर्थ होता है “शक्ति के अनुसार”।

मेलन और रिक्त स्थान: स्तम्भों का मेलन करते समय पहले सुभाषित का भाव पहचानो, फिर उससे जुड़ा शब्द या वाक्यांश चुनो। मञ्जूषा से रिक्त स्थान भरते समय वाक्य के अर्थ और विभक्ति दोनों की जाँच करो।

नीतिविद्या: पाठ के अन्त में बताया गया है कि इस अध्ययन से छात्र नीतिविद्या और संस्कृतभाषा दोनों में निपुण होता है। नीति-वाक्यों को कण्ठस्थ करने से अधिक महत्त्व उनके प्रयोग का है।

परीक्षा टिपसुभाषित का उत्तर लिखते समय पहले उसका भाव एक वाक्य में लिखो, फिर उदाहरण या तुलना जोड़ो। जैसे चौथे सुभाषित में सोने की परीक्षा के चार उपाय क्रम से लिखो — घिसना, काटना, तपाना, प्रहार करना।
सामान्य गलतीसुभाषितों को आपस में मिला देना — जैसे गुणी-वाले सुभाषित का उदाहरण कोयल-कौआ है, हाथी-सिंह का उदाहरण भी उसी में है; सोने की परीक्षा वाला सुभाषित अलग है। क्रम और उदाहरण सही रखो।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. सुभाषित किसे कहते हैं?
    संकेत: सुष्ठु भाषित — शोभन वचन के अर्थ से सोचो।
  2. गुणी ही गुण क्यों जानता है?
    संकेत: कोयल-कौआ और हाथी-चूहे के उदाहरण सोचो।
  3. “यथाशक्ति” का विग्रह और समास-नाम लिखो।
    संकेत: अव्ययीभाव — पहला पद अव्यय होता है।
  4. दुर्जन से मैत्री क्यों नहीं करनी चाहिए?
    संकेत: अङ्गार के गरम और ठण्डे दोनों रूपों की बात सोचो।
  5. रथ के दो चक्रों से क्या समझाया गया है?
    संकेत: प्रयत्न और भाग्य — एक के बिना दूसरा अधूरा है।

प्रश्न और उत्तर

  1. सुभाषित पढ़ने से क्या लाभ होता है?
    सुभाषित पढ़ने से आदर्श मानव-जीवन के निर्माण की प्रेरणा मिलती है और कर्तव्य-अकर्तव्य का स्पष्ट मार्गदर्शन मिलता है। जो इनका प्रयोग कार्य-क्षेत्र में करता है, वह बहुत लाभ पाता है।
  2. पहले सुभाषित के अनुसार भारतभूमि क्यों धन्य है?
    क्योंकि इस भूमि में जन्म पाने वाले धन्य कहलाते हैं और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के मार्गभूत इस भूखण्ड में देवता भी मनुष्य-रूप में जन्म की अभिलाषा करते हैं।
  3. मनुष्य को दीप्त करने वाले आठ गुण कौन-से हैं?
    प्रज्ञा, कौल्य (कुलीनता), दम (संयम), श्रुत (शास्त्र-ज्ञान), पराक्रम, अबहुभाषिता (अल्पभाषिता), यथाशक्ति दान और कृतज्ञता — ये आठ गुण मनुष्य को सम्मान दिलाते हैं।
  4. सच्ची सभा की क्या पहचान बताई गई है?
    सच्ची सभा में ज्ञानवृद्ध लोग हों, वे धर्म की बात कहें, धर्म में सत्य हो और सत्य छल से रहित हो।
  5. सोने और मनुष्य की परीक्षा में क्या समानता है?
    जैसे सोना घिसने, काटने, तपाने और प्रहार से परखा जाता है, वैसे ही मनुष्य कुल, शील, गुण और कर्म — इन चार बातों से परखा जाता है।

विस्तार — और गहराई से

  1. तीसरे सुभाषित से विनम्रता का क्या पाठ मिलता है?
    फल वाले वृक्ष झुक जाते हैं और जल भरे मेघ नीचे आते हैं; वैसे ही समृद्ध सत्पुरुष उद्धत नहीं होते, विनम्र रहकर परोपकार करते हैं।
  2. किसी एक नीतिवाक्य पर पाँच वाक्य संस्कृत में लिखो।
    पाठ के किसी एक सुभाषित का भाव चुनो और सरल संस्कृत में पाँच वाक्य लिखो — पहले भाव, फिर उदाहरण, फिर अपने जीवन से जोड़ो।
  3. स्तम्भ-मेलन का अभ्यास: सुभाषित और उसके उदाहरण को मिलाओ।
    जैसे गुणी-वाले सुभाषित से कोयल, परीक्षा-वाले से सोना, दुर्जन-वाले से अङ्गार, प्रयत्न-वाले से रथ के चक्र।
  4. “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः” — इसका अर्थ अपने शब्दों में लिखो।
    कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं — यह आठवें सुभाषित के भाव की पुष्टि करता है।
  5. अपने जीवन का एक सुभाषित चुनो और बताओ कि तुम उसे कहाँ लागू करोगे।
    जैसे परीक्षा में, खेल में, मित्रता में या घर में — एक सुभाषित चुनकर उसका व्यावहारिक प्रयोग लिखो।
पुनरावलोकन
  • सुभाषित = शोभन वचन; कर्तव्य-अकर्तव्य का मार्गदर्शन।
  • आठ भाव: भारतभूमि; गुणी; विनम्रता; चार से परीक्षा; आठ गुण; सभा-सत्य; दुर्जन; प्रयत्न-भाग्य।
  • व्याकरण: नञ्-तत्पुरुष, अव्ययीभाव (यथाशक्ति), मेलन, मञ्जूषा से रिक्त स्थान।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।