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बिहार बोर्ड (BSEB) • कक्षा 8 • हिंदी • मल्हार • एनईपी मिरर (हिंदी)

दो गौरैया

लेखक: भीष्म साहनी — घर सराय बना हुआ था, और उसके असली मालिक थे पक्षी-जीव।

यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Hindi • पुस्तक: मल्हार — एनईपी मिरर (हिंदी)

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दो गौरैया — EG के अपने शब्दों में सार

पुस्तक: मल्हार (बिहार बोर्ड हिंदी संस्करण, कक्षा 8)  |  अध्याय 2  |  लेखक: भीष्म साहनी  |  माध्यम: हिंदी

लेबल वाला चित्र: दो गौरैया

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): डाल पर बैठी दो गौरैया और उनका घोंसला। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

चित्र: दो गौरैया

आँगन में दाना चुगती गौरैया। छोटे जीवों के प्रति दया की सामान्य तस्वीर।

कहानी का सार

कहानी एक बच्चे की ज़ुबानी सुनाई गई है। उसके घर में तीन ही व्यक्ति रहते हैं — माँ, पिताजी और वह स्वयं। पर पिताजी कहते हैं कि घर सराय बना हुआ है; हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं। आँगन में आम का पेड़ है जिस पर तरह-तरह के पक्षी डेरा डाले रहते हैं — कभी तोते, कभी कौवे, कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। उनका शोर इतना होता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं। घर के अंदर भी यही हाल है — बीसियों चूहे रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते हैं, बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है और उसे सर्दी बहुत लगती है; दूसरा बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठता है, शायद उसे गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली घर में रहती तो नहीं, पर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार कसरत करने लगते हैं, दिन-भर कबूतरों की गुटर-गूँ सुनाई देती है, छिपकलियाँ, बर्र और चींटियों की तो जैसे फ़ौज ही छावनी डाले हुए है।

एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि वे मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थीं, वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद देखा गया कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है, सामान भी ले आई हैं और मज़े से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। ज़ाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था। माँ सिर हिलाकर बोलीं — अब तो ये नहीं उड़ेंगी; पहले इन्हें उड़ा देते तो उड़ जातीं, अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया — गौरैयाँ उनके आगे क्या चीज़ हैं, वे अभी निकाल बाहर करते हैं। माँ ने व्यंग्य से कहा कि चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे। माँ की हर व्यंग्य-भरी बात पर पिताजी उबल पड़ते, क्योंकि वे समझते कि माँ उनका मज़ाक उड़ा रही हैं। वे पंखे के नीचे जाकर ज़ोर से ताली बजाने लगे, मुँह से 'श...शू' करने लगे, बाँहें झुलाईं, खड़े-खड़े कूदने लगे। गौरैयाँ घोंसले से सिर निकालकर नीचे झाँकने लगीं और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं, और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं। माँ ने हँसकर कहा कि चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है। पिताजी और भी ऊँचा कूदने लगे। गौरैयाँ घोंसले से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं, मानो पिताजी का नाचना उन्हें बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसीं — ये निकलेंगी नहीं, अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।

पिताजी लाठी उठा लाए और पंखे के गोले को ठोकरा। गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं। माँ ने हँसकर कहा कि इतनी तकलीफ़ की क्या ज़रूरत थी, पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं। पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके; एक गौरैया किचन के दरवाज़े पर जा बैठी, दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाज़े पर। माँ फिर हँस दीं — तुम तो बड़े समझदार हो, सभी दरवाज़े खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो; एक दरवाज़ा खुला छोड़ो, बाकी बंद कर दो, तभी ये निकलेंगी। पिताजी ने बच्चे को झिड़ककर कहा कि दोनों दरवाज़े बंद कर दे; बच्चे ने भागकर दोनों दरवाज़े बंद कर दिए, केवल किचन वाला दरवाज़ा खुला रहा। पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया; एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाज़े से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं, पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे। उन्होंने हुक्म दिया कि आज दरवाज़े बंद रखो; एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी तो घर छोड़ देंगी।

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज़ सुनाई पड़ी और माँ खिलखिलाकर हँस दीं। सिर उठाकर देखा तो दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं — दरवाज़े के नीचे से आ गई थीं, क्योंकि दरवाज़ों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी। पिताजी को फिर गुस्सा आ गया, माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं। पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े — दरवाज़ों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कोई छेद बचा न रह जाए, और लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ फिर बाहर निकल गईं, पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं — इस बार रोशनदान में से आ गई थीं, जिसका एक शीशा टूटा हुआ था। माँ ने इस बार गंभीरता से कहा — देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे, अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी। पिताजी बोले — क्या मतलब, मैं कालीन बरबाद करवा लूँ? वे कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस आए और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं। इतने में रात पड़ गई; खाना खाकर सब ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले बच्चे ने आँगन में झाँककर देखा — चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं; उसने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी और अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।

दूसरे दिन इतवार था। नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मज़े से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली; उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी। अब तो रोज़ यही कुछ होने लगा — दिन में वे बाहर निकाल दी जातीं, पर रात के वक्त जब सब सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं। पिताजी परेशान हो उठे। पिताजी बार-बार कहते कि वे हार मानने वाले आदमी नहीं हैं, पर आखिर वे भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई, तो वे कहने लगे कि वे गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे, और बाहर से एक स्टूल उठा लाए। घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फ़र्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए — किसी को सचमुच बाहर निकालना हो तो उसका घर तोड़ देना चाहिए। घोंसले से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, मानो गौरैयों ने सजावट के लिए झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा; दो तिनके घोंसले से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे। माँ हँसकर बोलीं — चलो, दो तिनके तो निकल गए, अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएँगे। तभी बच्चे ने बाहर आँगन की ओर देखा — दोनों गौरैयाँ चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं, अब वे चहक भी नहीं रही थीं। पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे; इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे, वे लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा ज़ोर की आवाज़ आई — 'चीं-चीं, चीं-चीं!' पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आई हैं? बच्चे ने झट से बाहर की ओर देखा — नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं। 'चीं-चीं, चीं-चीं!' फिर आवाज़ आई। बच्चे ने ऊपर देखा — पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँक जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं — हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं? बच्चा अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर उसने देखा कि पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाज़े खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ़-हाँफ़कर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं। उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और बच्चा उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

लेखक के बारे में

भीष्म साहनी (1915–2003) हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे। उन्होंने अपनी कहानियों में देश विभाजन और मानवीय मूल्यों की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास तमस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से अलंकृत किया था। बच्चों के लिए उन्होंने 'गुलेल का खेल' आदि कई कहानियाँ लिखी हैं।

मुख्य शब्द

  • सराय — मुसाफ़िरों के ठहरने की जगह; यहाँ घर के लिए कहा गया है, जहाँ जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं।
  • निरीक्षण — ध्यान से देखना-परखना कि कोई जगह रहने योग्य है या नहीं।
  • घोंसला — पक्षियों का बनाया हुआ घर, तिनकों और रुई से बनता है।
  • बिछावन — बिछाया हुआ बिस्तर या तिनकों का बिछौना।
  • चुग्गा — पक्षियों के बच्चों को दिया जाने वाला दाना।
  • व्यंग्य — सीधी बात न कहकर टेढ़े ढंग से कही गई बात; माँ की बातें अक्सर व्यंग्य में होती हैं।
  • दृष्टिकोण — किसी बात को देखने का नज़रिया; कहानी के अंत में पिताजी का दृष्टिकोण बदल जाता है।

याद रखें

  • घर में तीन व्यक्ति रहते हैं — माँ, पिताजी और बच्चा (कहानी सुनाने वाला)।
  • गौरैयाँ पहले मकान का निरीक्षण करती हैं, फिर पंखे के गोले में घोंसला बनाती हैं।
  • पिताजी उन्हें भगाने के लिए ताली, 'श...शू', कूदना, लाठी और दरवाज़े बंद करना — सब आज़माते हैं।
  • गौरैयाँ दरवाज़े के नीचे की जगह और टूटे शीशे वाले रोशनदान से लौट आती हैं।
  • घोंसला तोड़ते समय नन्हीं चिड़ियों की चीं-चीं सुनकर पिताजी के हाथ ठिठक जाते हैं और वे लाठी एक ओर रख देते हैं।
  • अंत में माँ सब दरवाज़े खोल देती हैं, माता-पिता चूज़ों को चुग्गा देते हैं और पिताजी केवल मुसकराते रहते हैं।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: पिताजी को केवल गुस्सैल लिख देना। अच्छे उत्तर में उनका बदलाव भी दिखाओ — अंत में वे ही व्यक्ति चुपचाप कुर्सी पर बैठकर मुसकराते हैं। माँ की भूमिका भी समझो — वे व्यंग्य और हँसी से पिताजी के प्रयत्नों की निरर्थकता दिखाती हैं और अंत में दरवाज़े खोलकर करुणा का परिचय देती हैं।

तालिका: पात्र और उनका स्वभाव

पात्रस्वभाव और भूमिका
पिताजीहार न मानने वाले, गुस्सैल पर अंत में पिघल जाने वाले; घोंसला तोड़ते समय रुक जाते हैं
माँव्यंग्य और हँसी से बात कहने वाली; अंत में गंभीर होकर चिड़ियों को रोकने से मना करती हैं और दरवाज़े खोल देती हैं
बच्चा (कथावाचक)घटना को अपनी आँखों से देखकर सुनाता है; दरवाज़े बंद करने में पिताजी की मदद भी करता है
दो गौरैयानिडर, हठी और अपने घर के प्रति समर्पित; बार-बार लौट आती हैं
नन्हीं चिड़ियाँघोंसले से झाँककर चीं-चीं करती हैं; उन्हीं की पुकार कहानी का मोड़ बदल देती है

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है — क्यों?
    संकेत: घर में कौन-कौन रहता और आता-जाता है, इस बारे में सोचो।
  2. कहानी में 'घर के असली मालिक' किसे कहा गया है?
    संकेत: मकान किसका है और कौन उसमें वास्तव में रहता है — इस पर सोचो।
  3. गौरैयों के प्रति माँ और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं?
    संकेत: एक भगाना चाहता है, दूसरी हँसती और टोकती है — दोनों का अंतर बताओ।
  4. माँ बार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मज़ाक करती थीं — इससे क्या पता चलता है?
    संकेत: माँ को गौरैयों की गतिविधियों पर हँसी आती थी और पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे।
  5. कहानी में गौरैयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है?
    संकेत: हार मानने, निर्भर रहने, नए रास्ते अपनाने या प्रयास जारी रखने में से चुनो।

प्रश्न और उत्तर

  1. लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ बनाया? उसने घोंसला वहीं क्यों बनाया होगा?
    बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में। गौरैयाँ पहले मकान का निरीक्षण करके गई थीं — रोशनदान और खिड़की देखकर उन्हें यह जगह सुरक्षित, गर्म और रहने योग्य लगी, इसलिए दो दिन बाद वे सामान लेकर लौटीं और वहीं घोंसला बना लिया।
  2. गौरैयाँ घर में किन-किन स्थानों से प्रवेश करती थीं? सूची बनाइए।
    मुख्य द्वार और खुले दरवाज़े; दरवाज़ों के नीचे की थोड़ी-थोड़ी खाली जगह; टूटे शीशे वाला रोशनदान; खिड़की और रोशनदान पर बैठकर भी वे घर का निरीक्षण करती थीं। पिताजी जब एक रास्ता बंद करते, वे दूसरा रास्ता खोज लेती थीं।
  3. कहानी में गौरैयों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्यों आया?
    अंडे देने और चूज़े होने के बाद उनका व्यवहार बदल गया — पहले वे मज़े से बैठी मल्हार गाती थीं, बाद में वे चुपचाप दीवार पर बैठी रहतीं, कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं और चहक भी नहीं रही थीं। यह बदलाव मातृत्व की चिंता और बच्चों की देखभाल के कारण आया था।
  4. 'मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ' — इस कथन से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते हैं?
    हठ, दृढ़ता और हार न मानने की ज़िद। पिताजी बार-बार असफल होकर भी गौरैयों को भगाने का प्रयत्न करते हैं — ताली, लाठी, दरवाज़े बंद करना और अंत में घोंसला तोड़ना तक। यही ज़िद कहानी का हास्य भी बनाती है और अंत में उनके पिघलने को और प्रभावशाली बनाती है।
  5. माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?
    क्योंकि माँ समझ गई थीं कि गौरैयाँ अब यहाँ की हो गई हैं — उन्होंने घोंसला बना लिया है और अंडे दे दिए होंगे। जिस जीव ने घर बना लिया और बच्चे दे दिए, वह उसे छोड़कर नहीं जाता। माँ का यह अनुमान अंत में सही निकलता है।

विस्तार — और गहराई से

  1. इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?
    घर का बच्चा स्वयं सुना रहा है — कहानी उत्तम पुरुष में है ('मैंने भागकर दोनों दरवाज़े बंद कर दिए', 'मैंने आँगन में झाँककर देखा') और वह माँ-पिताजी के साथ घर में रहता है। इसीलिए घटना उसी की आँखों से देखी गई लगती है।
  2. वाद-विवाद का विषय: 'माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं।'
    इस विषय पर कक्षा में आधा समूह पक्ष में और आधा विपक्ष में तर्क दे सकता है। पक्ष के तर्क — माँ ने पिताजी को रास्ते बताए (एक दरवाज़ा खुला छोड़ो) और चिड़ियों के निकलने पर तालियाँ बजाईं। विपक्ष के तर्क — माँ ने व्यंग्य से पिताजी के प्रयत्नों का विरोध किया, अंत में गंभीरता से कहा कि चिड़ियों को मत निकालो और स्वयं सब दरवाज़े खोल दिए।
  3. भाषा की बात — हेर-फेर मात्रा का।
    एक मात्रा-भर के अंतर से शब्द का अर्थ बदल जाता है — जैसे 'ओर' (दिशा) और 'और' (तथा); 'उड़ा' (उड़ाना, सकर्मक) और 'उड़' (उड़ना)। इसी तरह नाच-नाचा-नचा, हार-हरा-हारा, पिता-पीता, चूक-चुक, नीचा-नीचे, सहसा-साहस — इन जोड़ों से अपने मन से वाक्य बनाकर अंतर समझा जा सकता है।
  4. कहानी की रचना — विशेष वाक्य।
    अंतिम वाक्य — कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे — विशेष वाक्य है, क्योंकि इसमें बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है।

पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है

दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें

  • घर सराय है — असली मालिक वहाँ रहने वाले जीव-जंतु हैं।
  • घोंसला पंखे के गोले में बना; गौरैयाँ दरवाज़े के नीचे की जगह और टूटे रोशनदान से लौटती रहीं।
  • माँ व्यंग्य और हँसी से, पिताजी लाठी और ज़िद से — दोनों का अपना तरीका है।
  • कहानी का मोड़ नन्हीं चिड़ियों की चीं-चीं है — पिताजी पिघल जाते हैं और केवल मुसकराते रहते हैं।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।