Chapter 10: खानपान की बदलती तस्वीर
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 7 • Hindi • Book: Vasant Bhag-2 (Nayi pustak — 2025 ke baad wali)
छोले-भटूरे से पीज़ा तक — हर दशक में बदला हमारा खाना, और उसके साथ हमारी आदतें भी।
खानपान की बदलती तस्वीर — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Vasant Bhag-2 (BSEB, कक्षा 7) | अध्याय 10 | लेखक/कवि: प्रयाग शुक्ल | माध्यम: Hindi
ये Educational Galaxy के अपने मूल notes हैं, पाठ्यपुस्तक नहीं, और यहाँ कोई आधिकारिक textbook PDF नहीं दिया जाता है। चित्र सामान्य तस्वीरें हैं, पुस्तक के चित्र नहीं।

Diagram (labels are printed on the image): संतुलित थाली — स्वस्थ खानपान की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का चित्र नहीं।

ताज़ी सब्ज़ियाँ और फल। स्वास्थ्य की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।
लेखक/कवि परिचय
इस निबंध के लेखक प्रयाग शुक्ल हैं। निबंध बताता है कि पिछले कुछ दशकों में हमारे खानपान की तस्वीर कैसे बदल गई है — जो चीज़ें पहले घर में बनती थीं, वे अब बाज़ार से आने लगी हैं, और जो चीज़ें पहले अनजान थीं, वे अब आम हो गई हैं।
लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित भी है। उसका कहना है कि पहले उत्तर भारत में जो चीज़ें गली-मुहल्लों की दुकानों में आम हुआ करती थीं, उन्हें अब खास दुकानों में तलाशा जाता है, और कई स्थानीय व्यंजनों को हमने तथाकथित आधुनिकता के चलते छोड़ दिया है।
सार — अपने शब्दों में
निबंध की शुरुआत घर के खाने से होती है — घर में क्या पकता है और क्या बनी-बनाई चीज़ बाज़ार से आती है, इसमें बड़ा बदलाव आया है। बाज़ार से आनेवाली कई चीज़ें माता-पिता के बचपन में घर में ही बनती थीं।
पिछली शताब्दी में खानपान की बदलती तस्वीर का खाका कुछ इस तरह है — सन् साठ के दशक में छोले-भटूरे, सन् सत्तर के दशक में इडली-डोसा, सन् अस्सी के दशक में तिब्बती (चीनी) भोजन और सन् नब्बे के दशक में पीज़ा-पाव-भाजी। हर दशक में कोई नया स्वाद आम हो गया।
लेखक का कहना है कि पश्चिम की नकल में हमने बहुत-सी ऐसी चीज़ें अपना ली हैं, जो स्वाद, स्वास्थ्य और सरसता के मामले में हमारे बहुत अनुकूल नहीं हैं। खानपान की मिश्रित संस्कृति में हम कई बार चीज़ों का असली और अलग स्वाद नहीं ले पा रहे हैं — प्रीतिभोजों और पार्टियों में एक साथ ढेरों चीज़ें रख दी जाती हैं और उनका स्वाद गड़बड़ होता रहता है।
लेखक यह भी कहता है कि हम अक्सर एक ही प्लेट में कई तरह के और कई बार तो बिल्कुल विपरीत प्रकृतिवाले व्यंजन परोस लेना चाहते हैं। इसलिए खानपान की जो मिश्रित-विविध संस्कृति बनी है — और लग यही रहा है कि वही और अधिक विकसित होनेवाली है — उसे तरह-तरह से जाँचते रहना ज़रूरी है।
निबंध का संदेश संतुलन का है — नया अपनाओ, पर अपने स्थानीय व्यंजनों और उनके असली स्वाद को मत छोड़ो। मिश्रित संस्कृति का लाभ तभी है, जब हर चीज़ का अपना स्वाद बचा रहे।
मुख्य शब्द
- मिश्रित संस्कृति — कई संस्कृतियों का मेल — यहाँ खानपान में देशी-विदेशी का मेल।
- स्थानीयता — अपने स्थान की विशेषता — स्थानीय व्यंजन, स्थानीय स्वाद।
- छौंक — तड़का — घी/तेल में मसाले भूनकर दाल-सब्ज़ी में डालना।
- सरसता — रसपूर्णता, स्वाद की मिठास।
- तथाकथित — नाम के लिए, कहने भर को।
- प्रीतिभोज — दावत, भोज।
भाषा-बिंदु
- द्वंद्व समास: ‘खानपान’ = खान + पान — बीच में ‘और’ छिपा है। ऐसे ही सीना-पिरोना, भला-बुरा, चलना-फिरना, लंबा-चौड़ा, कहा-सुनी, घास-फूस — इन्हें वाक्यों में प्रयोग करो और अर्थ बताओ।
- शब्द-कड़ी: ‘इडली—दक्षिण—केरल—ओणम्—त्योहार—छुट्टी—आराम…’ — एक शब्द के अंत से अगला शब्द शुरू होता है। अपनी शब्द-कड़ी बनाओ।
अभ्यास (Practice — पहले खुद कोशिश करो)
- खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का क्या मतलब है? अपने घर के उदाहरण देकर व्याख्या करो।
संकेत: सोचो — घर में क्या पकता है, बाज़ार से क्या आता है? - खानपान में बदलाव के कौन-से फ़ायदे हैं? फिर लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित क्यों है?
संकेत: सोचो — नया स्वाद भी, पुराना स्वाद भी। - खानपान के मामले में स्थानीयता का क्या अर्थ है?
संकेत: सोचो — अपने स्थान का अपना व्यंजन। - पिछली शताब्दी के चार दशकों के व्यंजन क्रम से लिखो।
संकेत: सोचो — साठ, सत्तर, अस्सी, नब्बे। - ‘खानपान’ का समास-विग्रह करो।
संकेत: सोचो — बीच में क्या छिपा है?
प्रश्न और उत्तर (Important Questions with Answers)
- खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का क्या मतलब है? अपने घर के उदाहरण देकर व्याख्या करो।
मिश्रित संस्कृति का मतलब है कि हमारे खाने में अब देशी और विदेशी, स्थानीय और बाहरी — सब कुछ मिल गया है। जैसे घर में दाल-रोटी भी बनती है और पीज़ा भी मँगाया जाता है; छौंक वाली दाल भी है और तिब्बती मोमो भी। यही मेल मिश्रित संस्कृति है। - खानपान में बदलाव के कौन-से फ़ायदे हैं? फिर लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित क्यों है?
फ़ायदे: नए-नए स्वाद मिलते हैं, खाने की विविधता बढ़ती है और दूसरे प्रदेशों-देशों का खाना जानने को मिलता है। चिंता इसलिए है, क्योंकि इस बदलाव में हमने कई स्थानीय व्यंजन छोड़ दिए हैं, पश्चिम की नकल में ऐसी चीज़ें अपना ली हैं जो स्वाद, स्वास्थ्य और सरसता के मामले में हमारे अनुकूल नहीं हैं, और एक ही प्लेट में विपरीत प्रकृतिवाले व्यंजन परोसकर उनका स्वाद गड़बड़ कर देते हैं। - खानपान के मामले में स्थानीयता का क्या अर्थ है?
स्थानीयता का अर्थ है अपने स्थान के अपने व्यंजन, अपने स्वाद और अपने तरीके — जैसे उत्तर भारत की दाल-रोटी, दक्षिण की इडली-डोसा, महाराष्ट्र की पाव-भाजी। स्थानीयता बचाए रखना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि हर स्थान का खाना वहाँ की जलवायु, फ़सल और शरीर के अनुकूल होता है। - पिछली शताब्दी में खानपान की बदलती तस्वीर का खाका क्या था?
सन् साठ के दशक में छोले-भटूरे, सन् सत्तर के दशक में इडली-डोसा, सन् अस्सी के दशक में तिब्बती (चीनी) भोजन और सन् नब्बे के दशक में पीज़ा-पाव-भाजी आम हुए। हर दशक में कोई नया स्वाद हमारी थाली में जुड़ गया। - फ़ास्ट फ़ूड के नफ़े-नुकसान पर अपने विचार लिखो।
नफ़ा: जल्दी मिलता है, स्वाद अच्छा लगता है, कभी-कभी खाना सुविधाजनक होता है। नुकसान: ज़्यादा तेल, नमक और चीनी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, स्थानीय व्यंजनों की आदत छूट जाती है और रोज़ खाने से मोटापा तथा बीमारियाँ बढ़ती हैं। इसलिए फ़ास्ट फ़ूड कभी-कभी ठीक है, रोज़ नहीं।
विस्तार — NCERT की गतिविधियों से
नीचे के प्रश्न NCERT की ‘निबंध से’, ‘निबंध से आगे’, ‘अनुमान और कल्पना’, ‘भाषा की बात’ तथा ‘कुछ करने को’ गतिविधियों के प्रश्न-प्रकारों को अपने शब्दों में कवर करते हैं।
- निबंध से आगे: घर में बातचीत करके पता करो कि आपके घर में क्या चीज़ें पकती हैं और क्या चीज़ें बनी-बनाई बाज़ार से आती हैं।
सूची बनाओ: घर में पकनेवाली — दाल, रोटी, चावल, सब्ज़ी। बाज़ार से आनेवाली — ब्रेड, नमकीन, अचार, मिठाई। फिर पूछो कि इनमें से बाज़ार की कौन-सी चीज़ें माता-पिता के बचपन में घर में बनती थीं। - निबंध से आगे: खाने, पकाने और स्वाद से संबंधित शब्दों का वर्गीकरण करो — उबालना, तलना, भूनना, सेंकना, दाल, भात, रोटी, पापड़, आलू, बैंगन, खट्टा, मीठा, तीखा, नमकीन, कसेला।
तीन खाने बनाओ — भोजन, कैसे पकाया, स्वाद। भोजन में: दाल, भात, रोटी, पापड़, आलू, बैंगन। कैसे पकाया में: उबालना, तलना, भूनना, सेंकना। स्वाद में: खट्टा, मीठा, तीखा, नमकीन, कसेला। - निबंध से आगे: छौंक, चावल, कढ़ी में क्या अंतर है? इन्हें बनाने के तरीके विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग हैं — पता करके लिखो।
छौंक तड़का है, चावल अन्न है, कढ़ी दही-बेसन की सब्ज़ी है। प्रांतों में अंतर: पंजाब की कढ़ी, राजस्थान की कढ़ी, गुजरात की कढ़ी — तीनों के मसाले और खटास अलग-अलग होते हैं। - निबंध से आगे: कपड़ों या पोशाकों की बदलती तस्वीर का खाका खींचो।
जैसे खाने का खाका है, वैसे कपड़ों का भी बनाओ — पहले धोती-कुर्ता, फिर पैंट-कमीज़, फिर जींस-टीशर्ट। हर दशक में क्या बदला, क्यों बदला — कारण भी लिखो। - अनुमान: मेहमान के लिए पारंपरिक भोजन की व्यंजन-सूची (मेन्यू) बनाओ।
मेन्यू में लिखो: शुरुआत में शरबत, फिर दाल, रोटी, चावल, दो सब्ज़ियाँ, पापड़, सलाद, अंत में मिठाई। पारंपरिक का अर्थ है अपने घर-प्रदेश का अपना खाना। - अनुमान: शहर या कस्बे का नक्शा बनाओ और ख़ास व्यंजन की जगहें दिखाओ।
नक्शे में बाज़ार, मशहूर दुकानें और उनके व्यंजन लिखो — जैसे किस दुकान की जलेबी मशहूर है, कहाँ के समोसे अच्छे मिलते हैं। - भाषा की बात: द्वंद्व समास के उदाहरणों को वाक्यों में प्रयोग करो — सीना-पिरोना, भला-बुरा, चलना-फिरना, लंबा-चौड़ा, कहा-सुनी, घास-फूस।
उदाहरण: माँ ने कपड़ा सीना-पिरोना सिखाया। भला-बुरा सोचे बिना मत बोलो। सुबह चलना-फिरना सेहत के लिए अच्छा है। - कुछ करने को: ठंडे पेय पदार्थों के विज्ञापन देखकर उनमें से स्वास्थ्य और सफ़ाई के ब्यौरे छाँटकर हक़ीक़त देखो।
विज्ञापन में दिखाए गए दावों (ताज़गी, ऊर्जा) को असली जानकारी (चीनी की मात्रा, रंग, संरक्षक) से मिलाओ। जो दावा गलत लगे, उसे अपनी कॉपी में लिखो।
- लेखक: प्रयाग शुक्ल; विधा: निबंध।
- दशक-खाका: साठ — छोले-भटूरे; सत्तर — इडली-डोसा; अस्सी — तिब्बती (चीनी) भोजन; नब्बे — पीज़ा-पाव-भाजी।
- लेखक की चिंता: स्थानीय व्यंजन छूट रहे हैं; पश्चिम की नकल; एक प्लेट में विपरीत व्यंजन; स्वाद गड़बड़।
- संदेश: मिश्रित संस्कृति को जाँचते रहो; स्थानीयता बचाओ।
- भाषा: द्वंद्व समास (खानपान = खान+पान); शब्द-कड़ी।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

