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BSEB • Class 12 • Accountancy

Chapter 1: अलाभकारी संस्थाओं के लिए लेखांकन

Book: Lekhashastra Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)  |  माध्यम: हिंदी

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 12 • Accountancy • Book: Lekhashastra Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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अलाभकारी संस्थाओं के लिए लेखांकन — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Lekhashastra Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 12)  |  अध्याय 1  |  माध्यम: हिंदी

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अलाभकारी संस्थाओं का लेखांकन — सार एक नज़र में

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): अलाभकारी संस्थाओं का लेखांकन — सार एक नज़र में। यह एक सामान्य शिक्षण चित्र है।

कुछ संस्थाएँ लाभ कमाने के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए चलाई जाती हैं — जैसे खेल क्लब, पुस्तकालय, विद्यालय, अस्पताल और धर्मार्थ ट्रस्ट। इन्हें अलाभकारी संस्थाएँ (Not-for-Profit Organisations) कहते हैं। इनका हिसाब-किताब व्यापारिक फर्मों से अलग होता है: यहाँ व्यापार खाता और लाभ-हानि खाता नहीं बनता, बल्कि तीन अलग खाते बनते हैं — प्राप्ति एवं भुगतान खाता, आय-व्यय खाता और तुलन-पत्र। इस अध्याय में यही तीनों खाते समझे जाते हैं, साथ में यह भी कि चंदा, सदस्यता शुल्क और अनुदान जैसी मदें किस खाते में और किस पक्ष में जाएँगी।

1. 1. अलाभकारी संस्था क्या है

अलाभकारी संस्था वह संगठन है जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों या समाज की सेवा करना होता है, लाभ कमाना नहीं। इसकी आय का मुख्य स्रोत सदस्यता शुल्क, चंदा, अनुदान, प्रवेश शुल्क और कभी-कभी लॉकर किराया या हॉल का किराया होता है। साल के अंत में आय ज़्यादा हो तो उसे लाभ नहीं, बचत (surplus) कहते हैं; व्यय ज़्यादा हो तो उसे घाटा (deficit) कहते हैं। बचत पूँजी निधि (capital fund) में जुड़ जाती है, घाटा उसमें से घट जाता है।

ऐसी संस्थाओं के खाते रखने की वजह भी सेवा ही है: सदस्यों और दानदाताओं को यह दिखाना होता है कि पैसा कहाँ से आया और कहाँ खर्च हुआ। इसलिए रोकड़ का पूरा हिसाब (प्राप्ति एवं भुगतान खाता), आय-व्यय का हिसाब (आय-व्यय खाता) और साल के अंत की स्थिति (तुलन-पत्र) — तीनों बनाए जाते हैं।

2. 2. तीन खाते — एक नज़र में

प्राप्ति एवं भुगतान खाता (Receipts and Payments Account) रोकड़ बही का सार है। इसमें साल भर की सारी रोकड़ प्राप्तियाँ डेबिट पक्ष में और सारे रोकड़ भुगतान क्रेडिट पक्ष में लिखे जाते हैं — चाहे वे पूँजीगत हों या आयगत, पिछले साल के हों या अगले साल के। यह खाता शुरुआती रोकड़/बैंक शेष से शुरू होता है और अंतिम रोकड़/बैंक शेष पर खत्म होता है।

आय-व्यय खाता (Income and Expenditure Account) लाभ-हानि खाते जैसा है, पर इसमें केवल चालू साल की आयगत (revenue) मदें आती हैं। इसमें बकाया, पूर्वदत्त, मूल्यह्रास जैसे समायोजन किए जाते हैं। इसका शेष बचत या घाटा होता है, जो पूँजी निधि में जाता है।

तुलन-पत्र (Balance Sheet) में एक ओर पूँजी निधि और विशेष कोष (जैसे भवन कोष) तथा दायित्व दिखाए जाते हैं, और दूसरी ओर स्थायी संपत्तियाँ, स्टॉक और अंतिम रोकड़/बैंक शेष दिखाए जाते हैं। पूँजी निधि = कुल संपत्तियाँ − कुल दायित्व, यही इसका मूल समीकरण है।

3. 3. प्राप्ति एवं भुगतान खाता

इस खाते की चार पहचानें याद रखें: (1) यह रोकड़ आधार (cash basis) पर बनता है — जो पैसा सच में आया या गया, वही लिखा जाता है; (2) इसमें पूँजीगत और आयगत दोनों तरह की मदें आती हैं, जैसे भवन की बिक्री से प्राप्ति भी और सदस्यता शुल्क भी; (3) इसमें पिछले, चालू और अगले — तीनों सालों की रोकड़ मदें आ सकती हैं, क्योंकि रोकड़ जिस साल मिली, उसी साल लिखी जाती है; (4) इसमें गैर-रोकड़ मदें कभी नहीं आतीं — मूल्यह्रास, बकाया शुल्क या बकाया खर्च इसमें नहीं दिखते।

ध्यान दें: प्राप्ति एवं भुगतान खाते का अंतिम शेष हमेशा डेबिट होता है, क्योंकि यह अंतिम रोकड़/बैंक शेष है — रोकड़ शेष कभी क्रेडिट नहीं हो सकता। पर बैंक अधिविकर्ष (bank overdraft) की स्थिति में अंतिम शेष क्रेडिट भी हो सकता है, तब वह तुलन-पत्र के दायित्व पक्ष में दिखाया जाता है।

4. 4. आय-व्यय खाता और समायोजन

आय-व्यय खाते में केवल चालू साल की आयगत आय और व्यय आते हैं। इसलिए प्राप्ति एवं भुगतान खाते की हर मद सीधे यहाँ नहीं आती — पहले समायोजन किए जाते हैं। बकाया आय (जैसे बकाया सदस्यता शुल्क) आय में जोड़ी जाती है, पूर्वदत्त व्यय घटाया जाता है, बकाया व्यय जोड़ा जाता है, और स्थायी संपत्तियों पर मूल्यह्रास व्यय पक्ष में लिखा जाता है। पूँजीगत प्राप्तियाँ (जैसे भवन कोष के लिए चंदा) और पूँजीगत भुगतान (जैसे भवन खरीद) इस खाते में कभी नहीं आते — वे सीधे तुलन-पत्र में जाते हैं।

सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला समायोजन सदस्यता शुल्क का है: चालू साल की सदस्यता आय = साल में प्राप्त शुल्क + साल के अंत में बकाया शुल्क − साल की शुरुआत में बकाया शुल्क − अगले साल के लिए अग्रिम प्राप्त शुल्क + पिछले साल अग्रिम प्राप्त (इस साल का) शुल्क। इस सूत्र को उल्टा-पुल्टा न करें — बकाया अंत का जुड़ता है, बकाया शुरुआत का घटता है, अग्रिम अंत का घटता है, अग्रिम शुरुआत का जुड़ता है।

5. 5. विशेष मदें — कहाँ जाएँगी

सामान्य चंदा (general donation) अगर रकम छोटी और नियमित हो तो आयगत आय मानी जाती है और आय-व्यय खाते में आती है; बड़ी और एकमुश्त सामान्य चंदा पूँजीगत मानकर पूँजी निधि में जोड़ी जाती है। किसी विशेष उद्देश्य के लिए मिला चंदा (जैसे भवन कोष, टूर्नामेंट कोष) हमेशा पूँजीगत होता है — वह आय-व्यय खाते में नहीं, बल्कि तुलन-पत्र के दायित्व पक्ष में उसी कोष के नाम से दिखाया जाता है, और उससे होने वाला खर्च भी उसी कोष से घटाया जाता है।

प्रवेश शुल्क (entrance fees) और आजीवन सदस्यता शुल्क (life membership fees) एक बार मिलने वाली, अनावर्ती प्राप्तियाँ हैं, इसलिए सामान्यतः पूँजीगत मानी जाती हैं और पूँजी निधि में जोड़ी जाती हैं — जब तक प्रश्न में स्पष्ट विपरीत निर्देश न दिया गया हो, तब तक यही मानें। वसीयत (legacy) से मिली रकम भी पूँजीगत होती है। पुरानी संपत्ति की बिक्री से प्राप्त रकम प्राप्ति एवं भुगतान खाते में आती है, पर बिक्री पर लाभ या हानि (विक्रय मूल्य − पुस्तक मूल्य) आय-व्यय खाते में लिखी जाती है।

उपभोग्य सामग्री (जैसे खेल सामग्री, दवाइयाँ) का खर्च निकालने का सूत्र है: शुरुआती स्टॉक + साल में खरीदी − अंतिम स्टॉक = साल में उपभोग। यही उपभोग आय-व्यय खाते के व्यय पक्ष में आता है, न कि पूरी खरीद। मानदेय (honorarium) किसी विशेषज्ञ को दिया गया आयगत व्यय है।

6. 6. पूँजी निधि और तुलन-पत्र

पूँजी निधि साल की शुरुआत में कुल संपत्तियों में से कुल दायित्व घटाकर निकाली जाती है। फिर साल के दौरान इसमें बचत जुड़ती है (या घाटा घटता है), और पूँजीगत प्राप्तियाँ जैसे प्रवेश शुल्क, आजीवन सदस्यता शुल्क और सामान्य पूँजीगत चंदा भी जुड़ते हैं। तुलन-पत्र के संपत्ति पक्ष में भवन, फर्नीचर, उपकरण (मूल्यह्रास घटाकर), स्टॉक, बकाया आय, पूर्वदत्त व्यय और अंतिम रोकड़/बैंक शेष आते हैं; दायित्व पक्ष में पूँजी निधि, विशेष कोष, बकाया व्यय और अग्रिम प्राप्त आय आती है।

एक ज़रूरी बात: विशेष कोष का अपना तुलन-पत्र-सा हिसाब होता है — कोष का शुरुआती शेष + साल में उस उद्देश्य के लिए प्राप्ति − उस उद्देश्य पर खर्च = कोष का अंतिम शेष। अगर खर्च प्राप्ति से ज़्यादा हो जाए, तो अधिक खर्च आय-व्यय खाते के व्यय पक्ष में चला जाता है, कोष का शेष ऋणात्मक नहीं दिखाया जाता।

7. 7. उदाहरण — सदस्यता आय और बचत निकालना

उदाहरण: एक क्लब को साल में सदस्यता शुल्क के ₹50,000 नकद मिले। साल की शुरुआत में बकाया शुल्क ₹5,000 था, साल के अंत में बकाया ₹8,000 है, पिछले साल अग्रिम प्राप्त शुल्क ₹3,000 था और इस साल अगले साल के लिए ₹4,000 अग्रिम मिले। चालू साल की सदस्यता आय = ₹50,000 + ₹8,000 − ₹5,000 − ₹4,000 + ₹3,000 = ₹52,000। यही ₹52,000 आय-व्यय खाते में आय पक्ष में आएगी।

उदाहरण: उसी क्लब की कुल आय ₹1,20,000 (सदस्यता ₹52,000, सामान्य चंदा ₹20,000, ब्याज ₹8,000, हॉल किराया ₹40,000) और कुल व्यय ₹95,000 (वेतन ₹60,000, किराया ₹20,000, मूल्यह्रास ₹10,000, विविध ₹5,000) है। बचत = ₹1,20,000 − ₹95,000 = ₹25,000। यह ₹25,000 पूँजी निधि में जुड़ जाएगी। अगर व्यय आय से ज़्यादा होता, तो अंतर घाटा कहलाता और पूँजी निधि से घटता।

Chart / Table

मदकहाँ लिखा जाता हैउदाहरण
सदस्यता शुल्क (चालू साल का)आय-व्यय खाता — आयसमायोजन के बाद ₹52,000
सामान्य चंदा (बड़ा/एकमुश्त)पूँजी निधि में जोड़ें₹1,00,000 का चंदा — पूँजीगत
विशेष कोष के लिए चंदातुलन-पत्र — दायित्व पक्ष (उसी कोष में)भवन कोष ₹2,00,000
प्रवेश शुल्क / आजीवन सदस्यता शुल्कपूँजी निधि में जोड़ेंप्रवेश शुल्क ₹10,000 — पूँजीगत
मूल्यह्रासआय-व्यय खाता — व्ययफर्नीचर पर 10% = ₹5,000
बचत / घाटापूँजी निधि में जोड़ें / घटाएँबचत ₹25,000 — पूँजी निधि में जोड़ें

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. साल में सदस्यता शुल्क के ₹40,000 मिले। शुरुआत में बकाया ₹4,000, अंत में बकाया ₹6,000, अग्रिम (अगले साल का) ₹2,000 है। चालू साल की सदस्यता आय कितनी होगी?
    संकेत: प्राप्ति + अंत का बकाया − शुरुआत का बकाया − अंत का अग्रिम।
  2. भवन कोष के लिए ₹50,000 चंदा मिला और भवन की मरम्मत पर ₹12,000 खर्च हुए। भवन कोष का अंतिम शेष कितना होगा?
    संकेत: कोष में प्राप्ति जुड़ती है, उसी उद्देश्य का खर्च घटता है।
  3. प्राप्ति एवं भुगतान खाते में मूल्यह्रास क्यों नहीं लिखा जाता?
    संकेत: सोचें — क्या मूल्यह्रास से रोकड़ आती-जाती है?
  4. एक संस्था की आय ₹80,000 और व्यय ₹95,000 है। बचत होगी या घाटा, और कितना?
    संकेत: आय − व्यय का चिह्न देखें।
  5. पुरानी अलमारी पुस्तक मूल्य ₹8,000 पर ₹6,500 में बिकी। हानि कितनी होगी और वह किस खाते में जाएगी?
    संकेत: विक्रय मूल्य − पुस्तक मूल्य; हानि व्यय पक्ष में आती है।

प्रश्न और उत्तर — Core Questions with Answers

  1. अलाभकारी संस्था किसे कहते हैं?
    वह संगठन जिसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अपने सदस्यों या समाज की सेवा करना होता है — जैसे खेल क्लब, पुस्तकालय, अस्पताल और धर्मार्थ ट्रस्ट। इसकी बचत को लाभ नहीं कहा जाता।
  2. अलाभकारी संस्थाओं के तीन खाते कौन-से हैं?
    प्राप्ति एवं भुगतान खाता (रोकड़ का सार), आय-व्यय खाता (चालू साल की आयगत आय-व्यय) और तुलन-पत्र (साल के अंत की स्थिति)।
  3. प्राप्ति एवं भुगतान खाता किस आधार पर बनता है?
    रोकड़ आधार पर — इसमें वही मदें आती हैं जो सच में नकद या बैंक से आईं या गईं। इसमें पूँजीगत और आयगत दोनों तरह की मदें आती हैं, पर मूल्यह्रास या बकाया जैसी गैर-रोकड़ मदें नहीं आतीं।
  4. आय-व्यय खाते में बचत और घाटा क्या है?
    आय ज़्यादा हो तो अंतर बचत (surplus) कहलाता है और पूँजी निधि में जुड़ता है; व्यय ज़्यादा हो तो अंतर घाटा (deficit) कहलाता है और पूँजी निधि से घटता है।
  5. विशेष कोष के लिए मिला चंदा कहाँ दिखाया जाता है?
    तुलन-पत्र के दायित्व पक्ष में उसी कोष के नाम से। वह आय-व्यय खाते की आय नहीं बनता, और उस उद्देश्य पर खर्च भी उसी कोष से घटाया जाता है।
  6. प्रवेश शुल्क और आजीवन सदस्यता शुल्क पूँजीगत क्यों माने जाते हैं?
    क्योंकि ये एक बार मिलने वाली, अनावर्ती प्राप्तियाँ हैं — हर साल नहीं मिलतीं। इसलिए इन्हें चालू साल की आय न मानकर पूँजी निधि में जोड़ा जाता है, जब तक प्रश्न में विपरीत निर्देश न हो।
  7. पूँजी निधि कैसे निकाली जाती है?
    साल की शुरुआत में कुल संपत्तियों में से कुल दायित्व घटाकर। फिर इसमें बचत और पूँजीगत प्राप्तियाँ जुड़ती हैं और घाटा घटता है।
  8. उपभोग्य सामग्री का खर्च कैसे निकाला जाता है?
    शुरुआती स्टॉक + साल में खरीदी − अंतिम स्टॉक = साल में उपभोग। यही उपभोग आय-व्यय खाते के व्यय पक्ष में लिखा जाता है, पूरी खरीद नहीं।

पुस्तक के अभ्यास — Extension Questions with Answers

  1. प्राप्ति एवं भुगतान खाते का अंतिम शेष डेबिट क्यों होता है?
    क्योंकि वह अंतिम रोकड़/बैंक शेष है — रोकड़ कभी क्रेडिट नहीं हो सकती। बैंक अधिविकर्ष की स्थिति अपवाद है, तब शेष क्रेडिट होता है और दायित्व पक्ष में दिखाया जाता है।
  2. बकाया सदस्यता शुल्क आय-व्यय खाते में क्यों जोड़ा जाता है, जबकि वह नकद नहीं मिला?
    क्योंकि आय-व्यय खाता उपार्जन आधार पर बनता है — चालू साल की कमाई चाहे नकद मिली हो या बकाया हो, वह चालू साल की आय है।
  3. विशेष कोष का खर्च प्राप्ति से ज़्यादा हो जाए तो क्या होगा?
    अधिक खर्च आय-व्यय खाते के व्यय पक्ष में चला जाएगा; कोष का शेष ऋणात्मक नहीं दिखाया जाता।
  4. सामान्य चंदा कब आयगत और कब पूँजीगत माना जाता है?
    छोटी और नियमित सामान्य चंदा आयगत (आय-व्यय खाते में) मानी जाती है; बड़ी और एकमुश्त सामान्य चंदा पूँजीगत (पूँजी निधि में) मानी जाती है।
  5. बिक्री पर लाभ या हानि किस खाते में जाती है?
    आय-व्यय खाते में — विक्रय मूल्य और पुस्तक मूल्य का अंतर लाभ हो तो आय पक्ष में, हानि हो तो व्यय पक्ष में। बिक्री से मिली पूरी रकम प्राप्ति एवं भुगतान खाते में आती है।

बोर्ड परीक्षा प्रश्न — बोर्ड-पैटर्न अभ्यास

ये Educational Galaxy के अपने बोर्ड-पैटर्न अभ्यास प्रश्न हैं, बोर्ड प्रश्नों की शैली में लिखे गए हैं। ये असली पिछले वर्षों के प्रश्न होने का दावा नहीं करते।

  1. एक क्लब को साल में ₹60,000 सदस्यता शुल्क मिला। शुरुआत में बकाया ₹6,000, अंत में बकाया ₹9,000, अगले साल के लिए अग्रिम ₹5,000 है। चालू साल की सदस्यता आय निकालिए। उत्तर: ₹60,000 + ₹9,000 − ₹6,000 − ₹5,000 = ₹58,000।
  2. प्राप्ति एवं भुगतान खाता और आय-व्यय खाता में दो अंतर लिखिए। उत्तर: (1) प्राप्ति एवं भुगतान खाता रोकड़ आधार पर बनता है, आय-व्यय खाता उपार्जन आधार पर। (2) प्राप्ति एवं भुगतान खाते में पूँजीगत और आयगत दोनों मदें आती हैं, आय-व्यय खाते में केवल चालू साल की आयगत मदें आती हैं।
  3. भवन कोष ₹1,00,000 है, साल में भवन के लिए ₹20,000 चंदा और मिला, भवन निर्माण पर ₹70,000 खर्च हुए। कोष का अंतिम शेष कितना होगा? उत्तर: ₹1,00,000 + ₹20,000 − ₹70,000 = ₹50,000।
  4. एक संस्था की आय ₹2,00,000 और व्यय ₹1,75,000 है। बचत कितनी होगी और वह कहाँ जाएगी? उत्तर: बचत = ₹25,000। यह पूँजी निधि में जुड़ जाएगी।
  5. प्रवेश शुल्क ₹15,000 और आजीवन सदस्यता शुल्क ₹25,000 प्राप्त हुए। इन्हें किस खाते में और किस पक्ष में दिखाएँगे? उत्तर: दोनों पूँजीगत प्राप्तियाँ हैं — तुलन-पत्र के दायित्व पक्ष में पूँजी निधि में जोड़कर दिखाएँगे।

मुख्य शब्द / Key Terms

  • अलाभकारी संस्था — सेवा के उद्देश्य से चलने वाला संगठन; लाभ के बजाय बचत/घाटा होता है।
  • प्राप्ति एवं भुगतान खाता — साल भर की सारी रोकड़ प्राप्तियों और भुगतानों का सार; रोकड़ आधार पर बनता है।
  • आय-व्यय खाता — चालू साल की केवल आयगत आय और व्यय का खाता; शेष बचत या घाटा होता है।
  • पूँजी निधि — संस्था की कुल संपत्तियों में से कुल दायित्व घटाकर निकली राशि; व्यापारिक फर्म की पूँजी जैसी।
  • बचत (Surplus) — आय का व्यय से अधिक होना; पूँजी निधि में जुड़ती है।
  • घाटा (Deficit) — व्यय का आय से अधिक होना; पूँजी निधि से घटता है।
  • विशेष कोष — किसी खास उद्देश्य के लिए रखा गया धन; उसी उद्देश्य का खर्च इसी से घटता है।
  • सदस्यता शुल्क समायोजन — प्राप्ति + अंत का बकाया − शुरुआत का बकाया − अंत का अग्रिम + शुरुआत का अग्रिम।

याद रखें

  • प्राप्ति एवं भुगतान खाता रोकड़ आधार पर; आय-व्यय खाता उपार्जन आधार पर बनता है।
  • मूल्यह्रास और बकाया मदें प्राप्ति एवं भुगतान खाते में कभी नहीं आतीं।
  • विशेष उद्देश्य का चंदा आय नहीं — वह तुलन-पत्र में उसी कोष के नाम से दिखता है।
  • प्रवेश शुल्क और आजीवन सदस्यता शुल्क सामान्यतः पूँजीगत होते हैं।
  • सदस्यता आय का सूत्र: प्राप्ति + अंत का बकाया − शुरुआत का बकाया − अंत का अग्रिम + शुरुआत का अग्रिम।

परीक्षा टिप / आम गलती

आम गलती: प्राप्ति एवं भुगतान खाते की हर मद को आय-व्यय खाते में उतार देना। सही तरीका: पहले देखें कि मद पूँजीगत है या आयगत, और किस साल की है — पूँजीगत मदें और दूसरे सालों की मदें आय-व्यय खाते में कभी नहीं आतीं। दूसरी आम गलती: सदस्यता शुल्क के समायोजन में बकाया और अग्रिम के चिह्न उल्टे लगा देना।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

Recap — सारांश

अलाभकारी संस्थाओं का लेखांकन तीन खातों पर टिका है: प्राप्ति एवं भुगतान खाता रोकड़ का सार देता है, आय-व्यय खाता चालू साल की आयगत आय-व्यय से बचत या घाटा निकालता है, और तुलन-पत्र में पूँजी निधि व विशेष कोषों के साथ साल के अंत की स्थिति दिखती है। चंदे, शुल्क और अनुदान की सही पहचान ही इस अध्याय की असली परीक्षा है।

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