Chapter 6: कणों के निकाय तथा घूर्णी गति
द्रव्यमान केंद्र, कोणीय संवेग, बल आघूर्ण, जड़त्व आघूर्ण और लोटनिक गति — पुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों सहित।
Original notes — ready Educational Galaxy के अपने शब्दों में Bhautiki Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
कणों के निकाय तथा घूर्णी गति — EG के अपने शब्दों में सार
Book: Bhautiki Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11 Physics) | Chapter 6 | Medium: हिंदी (English technical शब्द साथ में)
द्रव्यमान केंद्र
किसी निकाय का द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु है जहाँ निकाय का पूरा द्रव्यमान केंद्रित माना जा सकता है। बाहरी बल निकाय के द्रव्यमान केंद्र की गति को ही बदलता है, भले ही निकाय के हिस्से अलग-अलग घूमें।
दो कणों के निकाय में द्रव्यमान केंद्र भारी कण के निकट होता है। सममित वस्तुओं में द्रव्यमान केंद्र ज्यामितीय केंद्र पर होता है।
घूर्णन की राशियाँ
रैखिक गति के समान घूर्णन में कोणीय विस्थापन, कोणीय वेग ω और कोणीय त्वरण α होते हैं। रैखिक वेग v = ωr से कोणीय वेग से जुड़ता है।
बल आघूर्ण (torque) τ = rF sin θ होता है और यह घूर्णन में बल की भूमिका निभाता है। जड़त्व आघूर्ण I घूर्णन में द्रव्यमान की भूमिका निभाता है।
कोणीय संवेग और संतुलन
कोणीय संवेग L = Iω होता है। बाहरी बल आघूर्ण न लगे तो कोणीय संवेग संरक्षित रहता है — इसीलिए बर्फ पर घूमता खिलाड़ी हाथ सिकोड़कर तेज़ घूमता है।
संतुलन के लिए कुल बल और कुल बल आघूर्ण दोनों शून्य होने चाहिए। लुढ़कती वस्तु में स्थानांतरीय और घूर्णी दोनों गतिज ऊर्जाएँ होती हैं।
इस अध्याय का विचार: किसी निकाय की गति को दो भागों में बाँटा जा सकता है — द्रव्यमान केंद्र की स्थानांतरीय गति (जो केवल बाह्य बलों से तय होती है) और द्रव्यमान केंद्र के परितः घूर्णी गति (जो बल आघूर्णों से तय होती है)। यही विभाजन लुढ़कती गेंद से लेकर ग्रहों तक हर गति को समझने की कुंजी है।
स्रोत-टिप्पणी (ईमानदारी से): BSTBPC की प्रति इस अध्याय में बीच में ही समाप्त हो जाती है (पुस्तक पृष्ठ 156 तक), इसलिए इस अध्याय का पुनर्निर्माण BSTBPC के उपलब्ध भाग (7.1–7.6 तक) और उसी अध्याय की DIKSHA NCERT-प्रति (जिसमें यह अध्याय 6.1–6.12 के रूप में, अभ्यास 6.1–6.20 सहित, पूर्ण है) के सहारे किया गया है। DIKSHA प्रति में पुराने 7.10 (लंबवत् एवं समानांतर अक्षों के प्रमेय) और 7.14 (लोटनिक गति) शीर्षक नहीं हैं — वे इस पुनर्निर्माण में DIKSHA प्रति से नहीं लिए गए हैं।
7.1–7.2 भूमिका और द्रव्यमान केंद्र
द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु है जहाँ निकाय का संपूर्ण द्रव्यमान केंद्रित माना जा सकता है। एकसमान घनत्व वाले गोले, बेलन, वलय और घन के लिए यह ज्यामितीय केंद्र पर होता है — पर यह आवश्यक नहीं कि वह पिंड के भीतर ही हो (वलय का केंद्र उसके खोखले भाग में है)।
7.3–7.4 द्रव्यमान केंद्र की गति और संवेग
निकाय का कुल रेखीय संवेग = M·V_cm। बाह्य बल शून्य हो तो द्रव्यमान केंद्र का वेग नियत रहता है — चाहे निकाय के भीतर कुछ भी हो (जैसे चलती ट्रॉली पर दौड़ता बच्चा: ट्रॉली की चाल बदलती है, पर निकाय के द्रव्यमान केंद्र की चाल वही रहती है)। आंतरिक बलों का ज्ञान द्रव्यमान केंद्र की गति के लिए आवश्यक नहीं है।
7.5–7.6 सदिश गुणनफल, कोणीय वेग और रेखीय वेग
सदिश गुणनफल a × b का परिमाण ab·sin θ और दिशा दक्षिणावर्त पेंच नियम से मिलती है। घूर्णन में v = ω × r — किसी कण का रेखीय वेग कोणीय वेग और स्थिति सदिश के गुणनफल से मिलता है। त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½|a × b| और समांतर षट्फलक का आयतन = |a·(b × c)| होता है।
7.7 बल आघूर्ण और कोणीय संवेग
बल आघूर्ण τ = r × F; कोणीय संवेग L = r × p। किसी कण के लिए L के घटक: L_x = y·p_z − z·p_y, L_y = z·p_x − x·p_z, L_z = x·p_y − y·p_x। यदि कण केवल x-y तल में गतिमान हो, तो कोणीय संवेग का केवल z-घटक होता है। कुल बाह्य बल आघूर्ण शून्य हो तो कुल कोणीय संवेग संरक्षित रहता है — यही कारण है कि हाथ सिकोड़ने पर घूमता बच्चा तेज़ हो जाता है।
7.8–7.9 दृढ़ पिंडों का संतुलन और जड़त्व आघूर्ण
संतुलन के लिए दो शर्तें: कुल बाह्य बल शून्य और कुल बाह्य बल आघूर्ण शून्य (दोनों स्वतंत्र शर्तें हैं — बलयुग्म में बल शून्य पर आघूर्ण अशून्य होता है)। जड़त्व आघूर्ण I = Σmr² — घूर्णन में वही भूमिका जो स्थानांतरण में द्रव्यमान की है: वलय का I = MR², ठोस बेलन का ½MR², ठोस गोले का ⅖MR²।
7.11–7.12 घूर्णन की गतिज ऊर्जा और कोणीय संवेग संरक्षण
घूर्णन गतिज ऊर्जा = ½Iω²; लोटनिक गति में कुल गतिज ऊर्जा = ½Mv² + ½Iω²। कोणीय संवेग संरक्षण के उदाहरण: हाथ फैलाकर घूमता बच्चा हाथ सिकोड़ने पर तेज़ होता है (I घटा तो ω बढ़ा), और बढ़ी हुई गतिज ऊर्जा बच्चे की मांसपेशियों द्वारा किए गए कार्य से आती है।
तालिका / चार्ट — एक नज़र में
| रैखिक राशि | घूर्णी समतुल्य |
|---|---|
| द्रव्यमान m | जड़त्व आघूर्ण I |
| बल F | बल आघूर्ण τ |
| संवेग mv | कोणीय संवेग Iω |
| गतिज ऊर्जा ½mv² | घूर्णी ऊर्जा ½Iω² |

चित्र 1: चित्र 1 में घूर्णन से जुड़ी पाँच राशियाँ केंद्र के चारों ओर दिखाई गई हैं।

चित्र 2: चित्र 2 में इस अध्याय की चार सबसे ज़रूरी बातें संक्षेप में दी गई हैं।

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): घूर्णी गति: v = ωr — घूमती चकती
मुख्य शब्द / Key Terms
- द्रव्यमान केंद्र: निकाय का भार-केंद्र बिंदु।
- बल आघूर्ण: घूर्णन पैदा करने वाला प्रभाव।
- जड़त्व आघूर्ण: घूर्णन के प्रति जड़त्व।
- कोणीय संवेग: Iω, घूर्णन का संवेग।
- संतुलन: कुल बल और कुल आघूर्ण शून्य।
- द्रव्यमान केंद्र: निकाय का वह बिंदु जहाँ संपूर्ण द्रव्यमान केंद्रित माना जा सके; बाह्य बल ही इसकी गति बदलता है।
- बल आघूर्ण: τ = r × F — घूर्णन पैदा करने की क्षमता; बलयुग्म में नेट बल शून्य पर आघूर्ण अशून्य होता है।
- जड़त्व आघूर्ण: I = Σmr² — घूर्णन के प्रति जड़त्व; अक्ष पर निर्भर करता है।
- कोणीय संवेग: L = Iω (नियत अक्ष के परितः); बाह्य बल आघूर्ण शून्य हो तो संरक्षित।
- लोटनिक गति: स्थानांतरण + घूर्णन का योग; बिना फिसले लुढ़कने पर v = ωR।
याद रखें
- रैखिक और घूर्णी सूत्रों की तुलना करके याद करें।
- जड़त्व आघूर्ण द्रव्यमान के वितरण पर निर्भर करता है।
- कोणीय संवेग संरक्षण में बाहरी आघूर्ण शून्य होना चाहिए।
- लुढ़कन में दोनों प्रकार की गतिज ऊर्जा जुड़ती है।
- द्रव्यमान केंद्र की गति बाहरी बल से ही बदलती है।
परीक्षा टिप / आम गलती
आम गलती: जड़त्व आघूर्ण को केवल द्रव्यमान समझ लेना। समान द्रव्यमान की छड़ और गोले का जड़त्व आघूर्ण अलग होता है क्योंकि द्रव्यमान का वितरण अलग है।
किसी पिंड के संतुलन के लिए केवल नेट बल का शून्य होना पर्याप्त नहीं है — नेट बल आघूर्ण का भी शून्य होना आवश्यक है। बलयुग्म (जैसे स्टीयरिंग घुमाना) में नेट बल शून्य होता है पर आघूर्ण अशून्य होता है, इसलिए पिंड घूमता है।
एक ही पिंड का जड़त्व आघूर्ण भिन्न अक्षों के परितः भिन्न होता है। ‘वलय का I = MR²’ केवल सममित अक्ष के परितः सत्य है — किसी अन्य अक्ष के लिए लंबवत्/समानांतर अक्ष प्रमेय लगाना होगा।
लुढ़कते पिंड को रोकने के लिए किया गया कार्य उसकी कुल गतिज ऊर्जा के बराबर होता है — केवल ½Mv² नहीं, बल्कि ½Mv² + ½Iω²। वलय के लिए यह Mv² हो जाता है (प्रश्न 6.19)।
अभ्यास प्रश्न — खुद करके देखें
- द्रव्यमान केंद्र क्या है? संकेत: वह बिंदु जहाँ पूरा द्रव्यमान केंद्रित माना जा सके।
- बल आघूर्ण का सूत्र लिखिए। संकेत: τ = rF sin θ।
- कोणीय संवेग का सूत्र क्या है? संकेत: L = Iω।
- v और ω में क्या संबंध है? संकेत: v = ωr।
- संतुलन की शर्तें क्या हैं? संकेत: कुल बल और कुल आघूर्ण शून्य।
मुख्य प्रश्नोत्तर — Core Q&A
- द्रव्यमान केंद्र पिंड के बाहर भी हो सकता है? उत्तर: हाँ — वलय का केंद्र उसके खोखले भाग में होता है; द्रव्यमान केंद्र का पिंड के भीतर होना आवश्यक नहीं है।
- चलती ट्रॉली पर बच्चा दौड़े तो निकाय के द्रव्यमान केंद्र की चाल क्यों नहीं बदलती? उत्तर: क्योंकि दौड़ना आंतरिक क्रिया है; क्षैतिज बाह्य बल शून्य है, इसलिए द्रव्यमान केंद्र का वेग नियत रहता है।
- हाथ सिकोड़ने पर घूमता बच्चा तेज़ क्यों हो जाता है? उत्तर: कोणीय संवेग संरक्षित है (L = Iω नियत); I घटने पर ω बढ़ जाता है।
- समान बल आघूर्ण से खोखला बेलन और ठोस गोला — कौन तेज़ घूमेगा? उत्तर: ठोस गोला, क्योंकि उसका जड़त्व आघूर्ण (⅖MR²) बेलन (MR²) से कम है।
- लुढ़कते वलय को रोकने में कितना कार्य लगेगा? उत्तर: Mv² — स्थानांतरीय और घूर्णी गतिज ऊर्जा दोनों (प्रत्येक ½Mv²)।
उत्तर सहित प्रश्न — बोर्ड-पैटर्न अभ्यास
ये Educational Galaxy के अपने बोर्ड-पैटर्न अभ्यास प्रश्न हैं, बोर्ड प्रश्नों की शैली में लिखे गए हैं। ये असली पिछले वर्षों के प्रश्न होने का दावा नहीं करते।
- बर्फ का खिलाड़ी हाथ सिकोड़कर तेज़ क्यों घूमता है? उत्तर: जड़त्व आघूर्ण घटता है, कोणीय संवेग स्थिर रहता है, इसलिए ω बढ़ता है।
- छड़ का जड़त्व आघूर्ण अक्ष की स्थिति पर क्यों निर्भर करता है? उत्तर: क्योंकि द्रव्यमान की अक्ष से दूरी बदल जाती है।
- लुढ़कते पहिए की कुल गतिज ऊर्जा क्या होगी? उत्तर: ½mv² + ½Iω²।
- दो कणों में द्रव्यमान केंद्र किसके निकट होगा? उत्तर: भारी कण के निकट।
- बल आघूर्ण शून्य हो तो कोणीय संवेग कैसा रहेगा? उत्तर: स्थिर रहेगा।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (मुख्य अभ्यास)
नीचे के प्रश्न पुस्तक के अभ्यास (मुख्य भाग) के प्रश्नों पर आधारित हैं, EG के अपने शब्दों में लिखे गए हैं; उत्तर स्वयं जाँचकर दिए गए हैं।
- 6.1 एकसमान द्रव्यमान घनत्व वाले पिंडों के द्रव्यमान केंद्र: (a) गोला — केंद्र पर; (b) बेलन — अक्ष के मध्य-बिंदु पर; (c) वलय — केंद्र पर (पिंड के बाहर, खोखले भाग में); (d) घन — केंद्र पर (विकर्णों के प्रतिच्छेद पर)। साथ ही: नहीं — किसी पिंड का द्रव्यमान केंद्र आवश्यक रूप से पिंड के भीतर स्थित नहीं होता (वलय का केंद्र ही उसके खोखले भाग में है)।
- 6.2 HCl अणु: H और Cl के नाभिकों के बीच पृथक्करण 1.27 Å; Cl का परमाणु H से 35.5 गुना भारी है (संपूर्ण द्रव्यमान नाभिक पर केंद्रित मानकर): द्रव्यमान केंद्र H नाभिक से (35.5/36.5)×1.27 ≈ 1.24 Å और Cl नाभिक से (1/36.5)×1.27 ≈ 0.035 Å की दूरी पर है — अर्थात् लगभग Cl नाभिक पर ही।
- 6.3 बच्चा एकसमान चाल v से गतिमान लंबी ट्रॉली के एक सिरे पर बैठा है; बच्चा खड़ा होकर ट्रॉली पर किसी भी प्रकार से दौड़ने लगता है: ट्रॉली + बच्चा निकाय पर कोई क्षैतिज बाह्य बल नहीं है, अतः निकाय के द्रव्यमान केंद्र की चाल v ही बनी रहेगी (ट्रॉली की चाल भले ही बदल जाए)।
- 6.4 a और b के बीच बने त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½|a × b| — सिद्धि: |a × b| = ab·sin θ = आधार × ऊँचाई (समांतर चतुर्भुज का क्षेत्रफल), जिसका आधा त्रिभुज का क्षेत्रफल है।
- 6.5 |a·(b × c)| = a, b, c से बने समांतर षट्फलक का आयतन — सिद्धि: |b × c| = आधार का क्षेत्रफल, और a का (b × c) की दिशा में घटक = ऊँचाई; दोनों का गुणनफल आयतन देता है।
- 6.6 कण का स्थिति सदिश r = (x, y, z) और रेखीय संवेग p = (p_x, p_y, p_z) हो तो कोणीय संवेग L = r × p के घटक: L_x = y·p_z − z·p_y, L_y = z·p_x − x·p_z, L_z = x·p_y − y·p_x। यदि कण केवल x-y तल में गतिमान हो (z = 0, p_z = 0), तो L_x = 0 और L_y = 0 — केवल z-घटक होता है।
- 6.7 दो कण (प्रत्येक का द्रव्यमान m, चाल v) d दूरी पर समांतर रेखाओं के अनुदिश विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं: किसी भी बिंदु के परितः निकाय का सदिश कोणीय संवेग समान (mvd) रहता है, चाहे वह बिंदु कहीं भी हो — दोनों कणों के योगदान जुड़कर मूल-बिंदु पर निर्भरता निरस्त कर देते हैं।
- 6.8 W भार की असमांग छड़ दो रस्सियों से चित्र 6.33 के अनुसार लटकाकर विराम में रखी गई है; रस्सियाँ ऊर्ध्व से क्रमशः 36.9° और 53.1° का कोण बनाती हैं; छड़ 2 m लंबी है। संतुलन से: T₁·sin 36.9° = T₂·sin 53.1° (क्षैतिज) और T₁·cos 36.9° + T₂·cos 53.1° = W (ऊर्ध्व) → T₂ = 0.6W; बाएँ सिरे के परितः बल आघूर्ण से W·d = T₂·cos 53.1° × 2 → d = 0.72 m (बाएँ सिरे से) — छड़ का गुरुत्व केंद्र बाएँ सिरे से 72 cm पर है।
- 6.9 कार का भार 1800 kg; अगली और पिछली धुरियों के बीच दूरी 1.8 m; गुरुत्व केंद्र अगली धुरी से 1.05 m पीछे है। संतुलन से: अगली धुरियों पर कुल अभिलंब बल = 1800×10×0.75/1.8 = 7500 N, पिछली धुरियों पर = 1800×10×1.05/1.8 = 10,500 N — अतः प्रत्येक अगले पहिए पर 3750 N और प्रत्येक पिछले पहिए पर 5250 N (g = 10 m/s² से)।
- 6.10 समान द्रव्यमान और त्रिज्या वाले खोखले बेलन (I = MR²) और ठोस गोले (I = ⅖MR²) पर समान बल आघूर्ण लगाए गए हैं: कोणीय त्वरण α = τ/I — गोले का जड़त्व आघूर्ण कम है, इसलिए दिए गए समय के बाद ठोस गोला अधिक कोणीय चाल प्राप्त कर लेगा।
- 6.11 20 kg का ठोस बेलन अपने अक्ष के परितः 100 rad/s से घूम रहा है; त्रिज्या 0.25 m: I = ½MR² = 0.625 kg·m²; घूर्णन गतिज ऊर्जा = ½Iω² = 3125 J; कोणीय संवेग का परिमाण = Iω = 62.5 kg·m²/s।
- 6.12 (a) बच्चा घूर्णिका पर भुजाएँ फैलाकर खड़ा है; घूर्णिका 40 rev/min से घूम रही है; बच्चा हाथ सिकोड़कर अपना जड़त्व आघूर्ण आरंभिक का 2/5 कर लेता है: कोणीय संवेग संरक्षण से ω′ = 40 × 5/2 = 100 rev/min। (b) नई घूर्णन गतिज ऊर्जा आरंभिक की 5/2 गुनी हो जाती है (K = L²/2I; I घटा तो K बढ़ा) — यह वृद्धि बच्चे की मांसपेशियों द्वारा हाथ सिकोड़ने में किए गए कार्य से आती है।
- 6.13 3 kg, 40 cm त्रिज्या के खोखले बेलन पर नगण्य द्रव्यमान की रस्सी लिपटी है; रस्सी को 30 N से खींचा जाता है (कोई फिसलन नहीं): बल आघूर्ण = 30 × 0.4 = 12 N·m; I = MR² = 0.48 kg·m²; कोणीय त्वरण = 12/0.48 = 25 rad/s²; रस्सी का रैखिक त्वरण = αR = 10 m/s²।
- 6.14 घूर्णक (रोटर) की 200 rad/s की एकसमान कोणीय चाल बनाए रखने के लिए इंजन को 180 N·m का बल आघूर्ण देना आवश्यक है (घर्षणी बल आघूर्ण को निरस्त करने के लिए): आवश्यक शक्ति = τω = 180 × 200 = 36,000 W = 36 kW (दक्षता 100% मानकर)।
- 6.15 R त्रिज्या की समांग डिस्क से R/2 त्रिज्या का वृत्ताकार भाग काटकर निकाला गया है; बने छिद्र का केंद्र मूल डिस्क के केंद्र से R/2 दूर है: अवशिष्ट डिस्क का गुरुत्व केंद्र = (M×0 − (M/4)×(R/2))/(M − M/4) = −R/6 — अर्थात् मूल केंद्र से छिद्र की विपरीत दिशा में R/6 की दूरी पर।
- 6.16 मीटर छड़ केंद्र के नीचे छुर-धार रखने पर संतुलित हो जाती है; 12.0 cm के चिह्न पर एक के ऊपर एक रखे दो सिक्के (प्रत्येक 5 g) रखने पर छड़ 45.0 cm के चिह्न पर संतुलित होती है: 45 cm के परितः बल आघूर्ण से 10 g × 33 cm = M × 5 cm → मीटर छड़ का द्रव्यमान M = 66 g।
- 6.17 एक ठोस गोला भिन्न नति के दो आनत तलों पर एक ही ऊँचाई से लुढ़कने दिया जाता है: (a) हाँ — दोनों बार तलहटी में चाल समान होगी (v = √(2gh/(1 + ⅖)), नति पर निर्भर नहीं)। (b) हाँ — एक तल पर लुढ़कने में दूसरे से अधिक समय लगेगा। (c) कम नति वाले तल पर अधिक समय लगेगा, क्योंकि त्वरण a = g·sin θ/(1 + ⅖) नति घटने पर घट जाता है।
- 6.18 2 m त्रिज्या का वलय (भार 100 kg) क्षैतिज फर्श पर इस प्रकार लोटनिक गति करता है कि उसके द्रव्यमान केंद्र की चाल 20 cm/s है: इसे रोकने के लिए किया गया कार्य = कुल गतिज ऊर्जा = ½Mv² + ½Iω² = ½Mv² + ½Mv² = Mv² = 100 × (0.2)² = 4 J।
- 6.19 ऑक्सीजन अणु का द्रव्यमान 5.30×10⁻²⁶ kg है; उसके केंद्र से होकर गुजरने वाली और दोनों परमाणुओं को मिलाने वाली रेखा के लंबवत् अक्ष के परितः जड़त्व आघूर्ण 1.94×10⁻⁴⁶ kg·m² है। गैस के ऐसे अणु की औसत चाल 500 m/s है और उसकी घूर्णन गतिज ऊर्जा, स्थानांतरण की गतिज ऊर्जा की दो तिहाई है: ½Iω² = (2/3)×½mv² से ω = v·√(2m/3I) = 500×√(2×5.30×10⁻²⁶/(3×1.94×10⁻⁴⁶)) ≈ 6.75×10¹² rad/s (औसत कोणीय वेग)।
- 6.20 एक बेलन 30° का कोण बनाते आनत तल पर लुढ़कता हुआ ऊपर चढ़ता है; आनत तल की तलहटी में बेलन के द्रव्यमान केंद्र की चाल 5 m/s है: (a) ऊर्जा संरक्षण से ऊँचाई h = v²(1 + ½)/(2g) = 1.875 m; तल पर चढ़ी दूरी = h/sin 30° = 3.75 m। (b) नीचे की ओर त्वरण = g·sin 30°/(1 + ½) ≈ 3.33 m/s²; ऊपर जाने में समय = 5/3.33 = 1.5 s — अतः तलहटी तक वापस लौटने में कुल समय = 3.0 s।
अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — गहराई से अभ्यास
- ‘द्रव्यमान केंद्र’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘द्रव्यमान केंद्र’ का अर्थ है — निकाय का भार-केंद्र बिंदु।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘बल आघूर्ण’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘बल आघूर्ण’ का अर्थ है — घूर्णन पैदा करने वाला प्रभाव।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘जड़त्व आघूर्ण’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘जड़त्व आघूर्ण’ का अर्थ है — घूर्णन के प्रति जड़त्व।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘कोणीय संवेग’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘कोणीय संवेग’ का अर्थ है — Iω, घूर्णन का संवेग।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘संतुलन’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘संतुलन’ का अर्थ है — कुल बल और कुल आघूर्ण शून्य।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘लोटनिक गति’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘लोटनिक गति’ का अर्थ है — स्थानांतरण + घूर्णन का योग; बिना फिसले लुढ़कने पर v = ωR।। ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके प्रसंगों और मुख्य शब्दों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल परिभाषाएँ और सार रट लेना, बिना प्रसंग समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘कणों के निकाय तथा घूर्णी गति’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है।
- द्रव्यमान केंद्र की गति केवल बाह्य बलों से तय होती है; आंतरिक बल उसे नहीं बदल सकते।
- कोणीय संवेग L = r × p; बाह्य बल आघूर्ण शून्य हो तो L संरक्षित — हाथ सिकोड़ने पर घूमता बच्चा तेज़ होता है।
- जड़त्व आघूर्ण अक्ष पर निर्भर है: वलय MR², ठोस बेलन ½MR², ठोस गोला ⅖MR² (सममित अक्ष के परितः)।
- लोटनिक गति की कुल गतिज ऊर्जा = ½Mv² + ½Iω²; वलय को रोकने में Mv² कार्य लगता है।
- संतुलन की दो स्वतंत्र शर्तें: नेट बल शून्य और नेट बल आघूर्ण शून्य — बलयुग्म दूसरी शर्त का उदाहरण है।

