Chapter 5: कार्य, ऊर्जा और शक्ति
कार्य-ऊर्जा प्रमेय, स्थितिज ऊर्जा वक्र, स्प्रिंग, शक्ति और प्रत्यास्थ/अप्रत्यास्थ संघट्ट — पुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों सहित।
Original notes — ready Educational Galaxy के अपने शब्दों में Bhautiki Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
कार्य, ऊर्जा और शक्ति — EG के अपने शब्दों में सार
Book: Bhautiki Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11 Physics) | Chapter 5 | Medium: हिंदी (English technical शब्द साथ में)
कार्य की परिभाषा
जब बल लगाने पर वस्तु बल की दिशा में विस्थापित हो, तो कार्य होता है: W = F s cos θ। यदि विस्थापन बल के लंबवत हो, तो कार्य शून्य होता है, जैसे समतल सड़क पर बैग उठाकर चलने में गुरुत्व के विरुद्ध कार्य शून्य होता है।
कार्य का SI मात्रक जूल है। बल और विस्थापन की दिशा समान हो तो कार्य धनात्मक, विपरीत हो तो ऋणात्मक होता है।
गतिज और स्थितिज ऊर्जा
गतिज ऊर्जा K = ½mv² होती है और कार्य-ऊर्जा प्रमेय कहता है कि कुल कार्य गतिज ऊर्जा में बदलाव के बराबर होता है।
स्थितिज ऊर्जा संचित ऊर्जा है — ऊँचाई पर रखी वस्तु में गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा mgh होती है और खिंची स्प्रिंग में प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा होती है।
ऊर्जा संरक्षण और शक्ति
संरक्षी बलों के अधीन यांत्रिक ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) स्थिर रहती है। घर्षण जैसे असंरक्षी बल ऊर्जा को ऊष्मा में बदल देते हैं, पर कुल ऊर्जा फिर भी संरक्षित रहती है।
शक्ति कार्य करने की दर है: P = W/t। इसका SI मात्रक वाट है। टक्करें प्रत्यास्थ (ऊर्जा बची रहे) या अप्रत्यास्थ (ऊर्जा का कुछ भाग नष्ट हो) हो सकती हैं।
इस अध्याय का विचार: बल कितना ‘काम’ करता है, इसका माप कार्य (W = F·s·cos θ) है; कार्य ही ऊर्जा का स्थानांतरण है। गतिज ऊर्जा में परिवर्तन कुल कार्य के बराबर होता है (कार्य-ऊर्जा प्रमेय), और संरक्षी बलों के अधीन यांत्रिक ऊर्जा (गतिज + स्थितिज) संरक्षित रहती है।
पुस्तक की संरचना: अध्याय कार्य की परिभाषा से शुरू होकर गतिज ऊर्जा, कार्य-ऊर्जा प्रमेय, स्थितिज ऊर्जा और उसके वक्र, स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा, ऊर्जा के रूपों, शक्ति और अंत में संघट्टों (प्रत्यास्थ/अप्रत्यास्थ) तक जाता है।
6.1–6.2 कार्य की धारणा
कार्य W = F·s·cos θ — केवल बल का विस्थापन की दिशा में घटक ही कार्य करता है। बल और विस्थापन एक ही दिशा में हों तो कार्य धनात्मक, विपरीत हों तो ऋणात्मक, और लंबवत हों तो शून्य होता है। ‘यांत्रिक कार्य’ का अर्थ दैनिक बोलचाल के ‘काम’ से भिन्न है — सिर पर बोझा लेकर खड़े रहने में थकान होती है, पर यांत्रिक कार्य शून्य है।
6.3–6.4 गतिज ऊर्जा और कार्य-ऊर्जा प्रमेय
गतिज ऊर्जा K = ½mv²। कार्य-ऊर्जा प्रमेय: किसी कण पर सभी बलों द्वारा किया गया कुल कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में परिवर्तन के बराबर होता है (W = ΔK)। यह प्रमेय चर बलों के लिए भी सत्य है — तब कार्य बल-विस्थापन वक्र के नीचे का क्षेत्रफल होता है।
6.5–6.7 स्थितिज ऊर्जा और उसके वक्र
संरक्षी बल के लिए स्थितिज ऊर्जा परिभाषित होती है: W = −ΔV। गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा mgh, स्प्रिंग की ½kx²। V(x) वक्र पर: जहाँ कुल ऊर्जा E < V(x) हो, वहाँ कण नहीं मिल सकता (वर्जित क्षेत्र); जहाँ V न्यूनतम हो, वहाँ साम्यावस्था स्थायी होती है। बल = −dV/dx (वक्र की ढाल का ऋणात्मक)।
6.8 स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा
स्प्रिंग का बल F = −kx (हुक का नियम) और स्थितिज ऊर्जा V = ½kx²। स्प्रिंग को खींचने या दबाने में किया गया कार्य इसी रूप में संचित होता है — यही ऊर्जा वापस गतिज ऊर्जा बनकर लौटती है।
6.9–6.10 ऊर्जा के रूप और शक्ति
ऊर्जा के रूप बदलते हैं पर कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है — रासायनिक, ऊष्मीय, विद्युत, नाभिकीय सब एक-दूसरे में रूपांतरित हो सकते हैं। शक्ति P = dW/dt = F·v — कार्य करने की दर; SI मात्रक वाट (1 W = 1 J/s)। स्थिर शक्ति के स्रोत के अधीन वेग t^1/2 से और विस्थापन t^3/2 से बढ़ता है।
6.11 संघट्ट
प्रत्यास्थ संघट्ट: संवेग और गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित। अप्रत्यास्थ संघट्ट: केवल संवेग संरक्षित, गतिज ऊर्जा का भाग ऊष्मा/विरूपण में चला जाता है (पर कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है)। समान द्रव्यमान की गेंदों के प्रत्यास्थ सम्मुख संघट्ट में वेगों का आदान-प्रदान हो जाता है — आने वाली गेंद रुक जाती है।
तालिका / चार्ट — एक नज़र में
| राशि | सूत्र |
|---|---|
| कार्य | W = Fs cos θ |
| गतिज ऊर्जा | K = ½mv² |
| गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा | U = mgh |
| शक्ति | P = W/t |

चित्र 1: चित्र 1 में कार्य से लेकर शक्ति तक का क्रम दिखाया गया है — यही ऊर्जा की कहानी है।

चित्र 2: चित्र 2 में इस अध्याय की चार सबसे ज़रूरी बातें संक्षेप में दी गई हैं।

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): कोण पर बल द्वारा किया गया कार्य: W = Fd cos θ
मुख्य शब्द / Key Terms
- कार्य: बल × बल की दिशा में विस्थापन।
- गतिज ऊर्जा: गति के कारण ऊर्जा।
- स्थितिज ऊर्जा: स्थिति के कारण संचित ऊर्जा।
- शक्ति: कार्य करने की दर।
- संरक्षी बल: जिसके विरुद्ध कार्य पथ पर निर्भर न करे।
- कार्य: W = F·s·cos θ; मात्रक जूल (1 J = 1 N·m)।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय: W_कुल = ΔK — किसी भी बल-प्रणाली के लिए सत्य।
- संरक्षी बल: बंद पथ पर कार्य शून्य (गुरुत्व, स्प्रिंग बल); असंरक्षी बल (घर्षण) के लिए ऐसा नहीं।
- शक्ति: P = F·v; 1 अश्वशक्ति ≈ 746 W।
- प्रत्यास्थ संघट्ट: संवेग + गतिज ऊर्जा दोनों संरक्षित; अप्रत्यास्थ में केवल संवेग।
याद रखें
- कार्य के लिए विस्थापन बल की दिशा में होना ज़रूरी है।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय संख्यात्मक प्रश्नों की कुंजी है।
- ऊर्जा का SI मात्रक जूल और शक्ति का वाट है।
- घर्षण की उपस्थिति में यांत्रिक ऊर्जा घटती है, कुल ऊर्जा नहीं।
- प्रत्यास्थ टक्कर में गतिज ऊर्जा भी संरक्षित रहती है।
परीक्षा टिप / आम गलती
आम गलती: किसी वस्तु को उठाकर क्षैतिज चलने पर गुरुत्व के विरुद्ध कार्य को शून्य न मानना। वहाँ विस्थापन गुरुत्व के लंबवत है, इसलिए गुरुत्व द्वारा कार्य शून्य है।
कार्य धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है — यह बल और विस्थापन के बीच के कोण पर निर्भर करता है, बल के परिमाण पर नहीं। गुरुत्व ऊपर उठती बाल्टी पर ऋणात्मक कार्य करता है, जबकि उठाने वाला व्यक्ति धनात्मक कार्य करता है।
V(x) वक्र पर कण वहाँ कभी नहीं मिल सकता जहाँ V(x) > E हो, क्योंकि वहाँ गतिज ऊर्जा ऋणात्मक हो जाएगी — जो असंभव है। वक्र के शिखर और घाटी ही मोड़-बिंदु और साम्यावस्था तय करते हैं।
किसी भी संघट्ट के प्रश्न में सबसे पहले संवेग संरक्षण लिखो; फिर देखो कि संघट्ट प्रत्यास्थ है (गतिज ऊर्जा भी संरक्षित) या अप्रत्यास्थ (केवल संवेग)। दोनों समीकरण मिलकर ही वेग निकाल पाते हैं।
अभ्यास प्रश्न — खुद करके देखें
- कार्य का सूत्र लिखिए। संकेत: W = Fs cos θ।
- गतिज ऊर्जा का सूत्र क्या है? संकेत: K = ½mv²।
- शक्ति का SI मात्रक क्या है? संकेत: वाट।
- ऊर्जा संरक्षण का अर्थ बताइए। संकेत: ऊर्जा न बनती है, न नष्ट होती है, केवल रूप बदलती है।
- प्रत्यास्थ और अप्रत्यास्थ टक्कर में अंतर बताइए। संकेत: प्रत्यास्थ में गतिज ऊर्जा बचती है, अप्रत्यास्थ में नहीं।
मुख्य प्रश्नोत्तर — Core Q&A
- कार्य कब शून्य होता है, भले ही बल लगा हो? उत्तर: जब विस्थापन बल के लंबवत हो (जैसे वृत्तीय गति में अभिकेंद्र बल का कार्य) या विस्थापन ही शून्य हो।
- घर्षण बल संरक्षी क्यों नहीं है? उत्तर: क्योंकि बंद पथ पर भी घर्षण का कार्य ऋणात्मक (शून्य नहीं) होता है — ऊर्जा ऊष्मा में बदल जाती है और वापस नहीं मिलती।
- समान द्रव्यमान की गेंदों के प्रत्यास्थ सम्मुख संघट्ट में क्या होता है? उत्तर: वेगों का आदान-प्रदान — चलती गेंद रुक जाती है, रुकी हुई गेंद उसी वेग से चल पड़ती है।
- स्थिर शक्ति के स्रोत से चलती वस्तु का वेग समय के साथ कैसे बढ़ता है? उत्तर: v ∝ √t और विस्थापन ∝ t^3/2।
- बिजली का पंप 30% दक्षता पर 1.2×10⁷ J का कार्य 15 मिनट में करे तो कितनी विद्युत शक्ति लेगा? उत्तर: लगभग 44 kW (प्रश्न 6.15)।
उत्तर सहित प्रश्न — बोर्ड-पैटर्न अभ्यास
ये Educational Galaxy के अपने बोर्ड-पैटर्न अभ्यास प्रश्न हैं, बोर्ड प्रश्नों की शैली में लिखे गए हैं। ये असली पिछले वर्षों के प्रश्न होने का दावा नहीं करते।
- ऊपर उठी वस्तु को क्षैतिज ले जाने में गुरुत्व द्वारा कार्य कितना होगा? उत्तर: शून्य, क्योंकि विस्थापन बल के लंबवत है।
- m = 2 kg, v = 3 m/s हो तो गतिज ऊर्जा कितनी होगी? उत्तर: K = ½×2×9 = 9 J।
- कार्य-ऊर्जा प्रमेय का कथन लिखिए। उत्तर: कुल कार्य = गतिज ऊर्जा में बदलाव।
- घर्षण वाली सतह पर यांत्रिक ऊर्जा क्यों घटती है? उत्तर: क्योंकि कुछ ऊर्जा ऊष्मा में बदल जाती है।
- शक्ति और ऊर्जा में क्या संबंध है? उत्तर: शक्ति = ऊर्जा के बदलने की दर।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (मुख्य अभ्यास)
नीचे के प्रश्न पुस्तक के अभ्यास (मुख्य भाग) के प्रश्नों पर आधारित हैं, EG के अपने शब्दों में लिखे गए हैं; उत्तर स्वयं जाँचकर दिए गए हैं।
- 6.1 कार्य के चिह्न: (a) कुएँ से रस्सी से बँधी बाल्टी बाहर निकालने में व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य धनात्मक (बल और विस्थापन ऊपर की ओर)। (b) उसी स्थिति में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक (भार नीचे, विस्थापन ऊपर)। (c) आनत तल पर फिसलती वस्तु पर घर्षण द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक (घर्षण गति के विपरीत)। (d) खुरदरे क्षैतिज तल पर एकसमान वेग से गतिमान वस्तु पर लगाए गए बल द्वारा किया गया कार्य धनात्मक (बल गति की दिशा में है, घर्षण को संतुलित करता है)। (e) दोलायमान लोलक को विराम में लाने के लिए वायु के प्रतिरोधी बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक।
- 6.2 2 kg की वस्तु विराम से 7 N के क्षैतिज बल से चलती है; मेज़ का गतिज-घर्षण गुणांक 0.1 है (g = 10 m/s²): घर्षण = 2 N, नेट बल = 5 N, त्वरण = 2.5 m/s²; 10 s में विस्थापन = 125 m। (a) लगाए गए बल द्वारा कार्य = 7 × 125 = 875 J। (b) घर्षण द्वारा कार्य = −2 × 125 = −250 J। (c) कुल बल द्वारा कार्य = 5 × 125 = 625 J। (d) गतिज ऊर्जा में परिवर्तन = 625 J — कार्य-ऊर्जा प्रमेय की पुष्टि (875 − 250 = 625)।
- 6.3 चित्र 6.11 के V(x) वक्रों के लिए — नियम: कण वहाँ नहीं मिल सकता जहाँ V(x) > E हो; न्यूनतम कुल ऊर्जा = V(x) का न्यूनतम मान। (i) सोपान-विभव: x > a वर्जित (V₀ > E); न्यूनतम ऊर्जा = 0। (ii) बहु-सोपान: E < V₀ है और V(x) ≥ V₀ सर्वत्र है, अतः दी गई ऊर्जा पर कण कहीं नहीं मिल सकता; न्यूनतम ऊर्जा = V₀। (iii) परिमित कुआँ: x < a और x > b वर्जित (कण कुएँ में आबद्ध है); न्यूनतम ऊर्जा = −V₁। (iv) दोहरा शिखर + केंद्रीय कुआँ: शिखरों के आसपास जहाँ V > E हो, वे क्षेत्र वर्जित हैं (चित्र में −b/2 से −a/2 तक और a/2 से b/2 तक); न्यूनतम ऊर्जा = −V₁। भौतिक संदर्भ: सोपान-विभव (धातु पृष्ठ से इलेक्ट्रॉन), परिमित कुआँ (नाभिक, क्वांटम डॉट), दोहरा शिखर (आणविक बंधन/टनलिंग)।
- 6.4 V(x) = kx²/2, k = 0.5 N/m; कुल ऊर्जा 1 J: मोड़-बिंदु वहाँ जहाँ V = E, अर्थात् x = ±√(2E/k) = ±√4 = ±2 m — कण को x = ±2 m पर अवश्य ही वापस लौटना होगा (वहाँ गतिज ऊर्जा शून्य हो जाती है)।
- 6.5 (a) रॉकेट के बाह्य आवरण के जलने के लिए आवश्यक ऊष्मीय ऊर्जा रॉकेट की अपनी (गतिज) ऊर्जा के व्यय से प्राप्त होती है, वातावरण की ऊर्जा से नहीं — घर्षण केवल रूपांतरण का माध्यम है। (b) धूमकेतु पर सूर्य का गुरुत्वीय बल वेग के लंबवत रहता है (लगभग वृत्तीय कक्षा), अतः पूरी कक्षा में गुरुत्वीय बल द्वारा किया गया कार्य शून्य है। (c) वायुमंडलीय प्रतिरोध से उपग्रह की कुल ऊर्जा धीरे-धीरे घटती है, पर वह नीचे सर्पिल होता है — स्थितिज ऊर्जा में कमी गतिज ऊर्जा में वृद्धि से अधिक होती है, इसलिए पृथ्वी के समीप आने पर उसकी चाल लगातार बढ़ती है। (d) 15 kg का द्रव्यमान 2 m ले जाना: (i) हाथों में लेकर चलने में कार्य शून्य (बल ऊर्ध्व, विस्थापन क्षैतिज); (ii) रस्सी-घिरनी से खींचकर ले जाने में कार्य = 15 × 10 × 2 = 300 J — अतः स्थिति (ii) में किया गया कार्य अधिक है।
- 6.6 सही विकल्प: (a) घटती है — संरक्षी बल द्वारा धनात्मक कार्य करने पर स्थितिज ऊर्जा घटती है (W = −ΔV)। (b) गलत कथन का सही रूप: घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य वस्तु की गतिज/स्थितिज ऊर्जा में क्षय नहीं, बल्कि ऊष्मा (आंतरिक ऊर्जा) में रूपांतरण है। (c) बाह्य बल — बहुकण निकाय के कुल संवेग-परिवर्तन की दर बाह्य बल के बराबर होती है (आंतरिक बल निरस्त हो जाते हैं)। (d) कुल रेखीय संवेग — अप्रत्यास्थ संघट्ट में भी निकाय का कुल संवेग (और कुल ऊर्जा) नहीं बदलता; केवल गतिज ऊर्जा बदलती है।
- 6.7 (a) असत्य — प्रत्यास्थ संघट्ट में प्रत्येक पिंड का संवेग और ऊर्जा अलग-अलग संरक्षित नहीं होते, केवल निकाय के कुल संरक्षित होते हैं। (b) असत्य — बाह्य बल कार्य करके निकाय की कुल ऊर्जा बदल सकते हैं; ऊर्जा संरक्षण केवल विलगित निकाय के लिए है। (c) असत्य — बंद लूप में कार्य शून्य केवल संरक्षी बलों के लिए होता है; घर्षण जैसे असंरक्षी बल बंद पथ पर भी ऋणात्मक कार्य करते हैं। (d) सत्य — अप्रत्यास्थ संघट्ट में अंतिम गतिज ऊर्जा आरंभिक से हमेशा कम होती है (अंतर ऊष्मा/विरूपण में जाता है)।
- 6.8 (a) नहीं — दो बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट की अल्प अवधि में (जब वे संपर्क में हैं) कुल गतिज ऊर्जा संरक्षित नहीं रहती; उसका एक भाग गेंदों के विरूपण की स्थितिज ऊर्जा बन जाता है, जो संघट्ट के अंत में वापस गतिज ऊर्जा हो जाती है। (b) हाँ — उस अल्प अवधि में भी कुल रेखीय संवेग संरक्षित रहता है (बाह्य बल नगण्य हैं)। (c) अप्रत्यास्थ संघट्ट के लिए: (a) का उत्तर नहीं (गतिज ऊर्जा संघट्ट के बाद भी कम रहती है) और (b) का उत्तर हाँ (संवेग फिर भी संरक्षित है)। (d) यदि स्थितिज ऊर्जा केवल केंद्रों के बीच की पृथक्करण-दूरी पर निर्भर करती है, तो बल संरक्षी है और संघट्ट प्रत्यास्थ होगा।
- 6.9 विराम से अचर त्वरण a से एकविमीय गति: v = at; शक्ति P = Fv = ma·at = ma²t — अतः दी गई शक्ति (ii) t के अनुक्रमानुपाती है।
- 6.10 अचर शक्ति के स्रोत के अधीन: P = d(½mv²)/dt नियत → v² ∝ t → v ∝ t^1/2; विस्थापन s = ∫v dt ∝ (iii) t^3/2।
- 6.11 बल F = (−î + 2ĵ + 3k̂) N; वस्तु z-अक्ष के अनुदिश 4 m चलती है: कार्य = F·d = 3 × 4 = 12 J (केवल z-घटक कार्य करता है)।
- 6.12 इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा 10 keV, प्रोटॉन की 100 keV: v = √(2K/m) से vₑ/v_p = √[(10/9.11×10⁻³¹)/(100/1.67×10⁻²⁷)] ≈ 42.8 — इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन से लगभग 43 गुना तेज़ है, भले ही उसकी ऊर्जा कम है, क्योंकि वह लगभग 1836 गुना हल्का है।
- 6.13 वर्षा की बूँद: त्रिज्या 2 mm → द्रव्यमान ≈ 3.35×10⁻⁵ kg; 500 m गिरती है — पहले आधे भाग में घटते त्वरण से, फिर सीमांत चाल 10 m/s से एकसमान गति से। गुरुत्वीय बल द्वारा कार्य: पहले आधे भाग में = mg×250 ≈ 0.084 J, दूसरे आधे भाग में भी 0.084 J। संपूर्ण यात्रा में प्रतिरोधी बल द्वारा कार्य = ΔK − W_गुरुत्व = ½×3.35×10⁻⁵×100 − 3.35×10⁻⁵×10×500 ≈ −0.166 J।
- 6.14 अणु 200 m/s से अभिलंब से 30° का कोण बनाता हुआ क्षैतिज दीवार से टकराकर उसी चाल से लौटता है: कण का अपना संवेग संरक्षित नहीं है (दीवार आवेग लगाती है), पर कण + दीवार निकाय का कुल संवेग संरक्षित है। चाल अपरिवर्तित है, अतः गतिज ऊर्जा भी अपरिवर्तित है — यह संघट्ट प्रत्यास्थ है।
- 6.15 पंप 30 m³ की टंकी (40 m ऊपर) को 15 मिनट में भरता है; दक्षता 30%: पानी का द्रव्यमान 30,000 kg; गुरुत्व के विरुद्ध कार्य = 30,000×10×40 = 1.2×10⁷ J; निर्गत शक्ति = 1.2×10⁷/900 ≈ 13,333 W; विद्युत शक्ति = 13,333/0.30 ≈ 44 kW।
- 6.16 दो समरूपी बिलियर्ड गेंदें विराम में संपर्क में हैं; तीसरी समरूपी गेंद v चाल से सम्मुख प्रत्यास्थ संघट्ट करती है (चित्र 6.14): संवेग और गतिज ऊर्जा दोनों के संरक्षण से केवल एक परिणाम संभव है — आने वाली गेंद विराम में आ जाती है और एक लक्ष्य गेंद v चाल से आगे बढ़ जाती है (वेगों का आदान-प्रदान)।
- 6.17 लोलक का गोलक A ऊर्ध्व से 30° पर से छोड़ा जाता है और विराम में रखे दूसरे गोलक B से प्रत्यास्थ टकराता है (चित्र 6.15): समान द्रव्यमानों के प्रत्यास्थ सम्मुख संघट्ट में वेगों का आदान-प्रदान होता है — अतः A अपना संपूर्ण वेग B को दे देता है और A बिल्कुल ऊपर नहीं उठता (0); B 30° तक ऊपर उठता है।
- 6.18 लोलक (लंबाई 1.5 m) का गोलक क्षैतिज अवस्था से छोड़ा जाता है; आरंभिक ऊर्जा का 5% वायु प्रतिरोध के विरुद्ध क्षय होता है: निम्नतम बिंदु पर चाल = √(2×10×1.5×0.95) = √28.5 ≈ 5.34 m/s।
- 6.19 300 kg की ट्रॉली 25 kg रेत का बोरा लेकर घर्षणरहित पथ पर 27 km/h = 7.5 m/s से चल रही है; रेत 0.05 kg/s की दर से छिद्र से निकलकर ट्रॉली के फर्श पर गिरती रहती है: रेत ट्रॉली निकाय से बाहर नहीं जाती (फर्श पर ही रहती है), क्षैतिज बाह्य बल शून्य है, अतः बोरा खाली होने के पश्चात् भी ट्रॉली की चाल 7.5 m/s ही रहेगी।
- 6.20 0.5 kg का कण v = a·x^3/2 वेग से चलता है (a = 5 m^1/2/s): x = 0 से x = 2 m तक कुल बल द्वारा किया गया कार्य = ΔK = ½×0.5×25×2³ = 50 J।
- 6.21 पवनचक्की के ब्लेड A क्षेत्रफल के वृत्त को स्पर्श करते हैं; हवा v वेग से लंबवत बहती है: (a) t समय में गुजरने वाली हवा का द्रव्यमान = ρAvt। (b) हवा की गतिज ऊर्जा = ½ρAv³t। (c) A = 30 m², v = 36 km/h = 10 m/s, ρ = 1.2 kg/m³ पर उपलब्ध शक्ति = ½×1.2×30×1000 = 18,000 W; 25% रूपांतरण से उत्पन्न विद्युत शक्ति = 4500 W।
- 6.22 व्यक्ति 10 kg के द्रव्यमान को 0.5 m ऊँचाई तक 1000 बार उठाता है: (a) गुरुत्वाकर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य = 1000×10×10×0.5 = 5×10⁴ J (नीचे लाने में खोई ऊर्जा गिनी नहीं गई है)। (b) वसा प्रति kg 3.8×10⁷ J देती है, 20% दक्षता से उपयोगी ऊर्जा 7.6×10⁶ J/kg — खर्च वसा = 5×10⁴/7.6×10⁶ ≈ 6.6 g।
- 6.23 परिवार 8 kW विद्युत शक्ति का उपयोग करता है; क्षैतिज सतह पर सीधे आपतित सौर ऊर्जा की औसत दर 200 W/m² है, 20% भाग विद्युत में बदलता है: आवश्यक क्षेत्रफल = 8000/(200×0.20) = 200 m²। (b) यह क्षेत्रफल किसी विशिष्ट भवन की छत के क्षेत्रफल के बराबर (तुलनीय) है — छत पर सौर पैनल लगाकर यह आपूर्ति संभव है।
पुस्तक के अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (अतिरिक्त भाग)
ये प्रश्न पुस्तक के ‘अतिरिक्त अभ्यास’ भाग से हैं, EG के अपने शब्दों में।
- 6.24 0.012 kg की गोली 70 m/s की क्षैतिज चाल से 0.4 kg के लकड़ी के गुटके (पतली तारों से छत से लटका) से टकराकर गुटके के सापेक्ष तुरंत विराम में आ जाती है: संवेग संरक्षण से गुटके की चाल = (0.012×70)/0.412 ≈ 2.04 m/s; गुटका जितनी ऊँचाई तक ऊपर उठता है = v²/(2g) ≈ 4.16/20 ≈ 0.21 m। गुटके में पैदा हुई ऊष्मा = गतिज ऊर्जा की हानि = ½×0.012×70² − ½×0.412×(2.04)² ≈ 29.4 − 0.86 ≈ 29 J।
- 6.25 दो घर्षणरहित आनत पथ A बिंदु पर मिलते हैं (चित्र 6.16); प्रत्येक पर एक-एक पत्थर विराम से नीचे सरकाया जाता है: दोनों पत्थर समान चाल से नीचे पहुँचेंगे (ऊर्जा संरक्षण: v = √(2gh)) — पर समान समय में नहीं; अधिक ढाल वाले पथ पर समय कम लगता है। θ₁ = 30°, θ₂ = 60°, h = 10 m के लिए: चाल = √200 ≈ 14.1 m/s (दोनों); समय = (1/sin θ)√(2h/g) से क्रमशः 2.83 s और 1.63 s।
- 6.26 1 kg का गुटका 37° के रूक्ष आनत तल पर है, 100 N/m के स्प्रिंग से चित्र 6.17 के अनुसार जुड़ा है; स्प्रिंग की बिना खिंची स्थिति से विराम से छोड़ा जाता है; गुटका विराम में आने से पहले आनत तल पर 10 cm नीचे खिसकता है। ऊर्जा संतुलन: mg sin 37° × 0.1 = ½×100×(0.1)² + μ·mg cos 37° × 0.1 → 0.6 = 0.5 + μ×0.8 → μ = 0.125 (स्प्रिंग का द्रव्यमान नगण्य, घिरनी घर्षणरहित मानी गई है)।
- 6.27 0.3 kg का बोल्ट 7 m/s की एकसमान चाल से नीचे आ रही लिफ्ट की छत से गिरता है; लिफ्ट की लंबाई 3 m है; बोल्ट फर्श से टकराकर वापस नहीं लौटता: लिफ्ट के सापेक्ष बोल्ट 3 m स्वतंत्र रूप से गिरता है — टक्कर के समय सापेक्ष चाल = √(2×10×3) ≈ 7.75 m/s; टक्कर द्वारा उत्पन्न ऊष्मा = ½×0.3×(7.75)² = 9 J। यदि लिफ्ट स्थिर होती, तो उत्तर भिन्न नहीं होता — क्योंकि लिफ्ट एकसमान चाल से चल रही है (त्वरण शून्य), सापेक्ष गति समान ही रहती है।
- 6.28 200 kg की ट्रॉली घर्षणरहित पथ पर 36 km/h = 10 m/s से चल रही है; 20 kg का बच्चा ट्रॉली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक (10 m दूर) ट्रॉली के सापेक्ष 4 m/s की चाल से ट्रॉली की गति की विपरीत दिशा में दौड़ता है और ट्रॉली से बाहर कूद जाता है: संवेग संरक्षण से 200V + 20(V − 4) = 220×10 → V = 10.36 m/s (ट्रॉली की अंतिम चाल)। दौड़ में लगा समय = 10/4 = 2.5 s; इस दौरान ट्रॉली द्वारा तय दूरी = 10.36 × 2.5 ≈ 25.9 m।
- 6.29 चित्र 6.18 के V(r) वक्रों में से दो बिलियर्ड गेंदों के प्रत्यास्थ संघट्ट का वर्णन केवल वक्र (v) कर सकता है — V(r) = 0 जब गेंदें संपर्क में नहीं हैं (r > 2R) और r घटने पर तीव्रता से बढ़ता प्रतिकर्षी विभव। अन्य वक्र नहीं कर सकते: (i) परिमित सोपान — पर्याप्त ऊर्जा वाली गेंदें एक-दूसरे में घुस जाएँगी; (ii) दूरी पर आकर्षण, संपर्क पर कोई प्रतिकर्षण नहीं; (iii) संपर्क पर शिखर के बाद भीतर V घटकर शून्य — गेंदें आर-पार निकल जाएँगी; (iv) भीतर ऋणात्मक (आकर्षी) कुआँ; (vi) दूरी पर भी V ≠ 0 (दूरस्थ अन्योन्यक्रिया) और भीतर परिमित मान।
- 6.30 विराम में किसी मुक्त न्यूट्रॉन का क्षय n → p + e⁻ मानिए: द्विपिंड क्षय में ऊर्जा-संवेग संरक्षण से इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा नियत होनी चाहिए। परंतु प्रेक्षित β-क्षय स्पेक्ट्रम (चित्र 6.19) सतत है — इलेक्ट्रॉन कई ऊर्जाओं से उत्सर्जित होते हैं। अतः द्विपिंड क्षय सतत स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सकता; एक तीसरा कण (न्यूट्रिनो) अवश्य उत्सर्जित होता है जो शेष ऊर्जा ले जाता है — यही पाउली का तर्क था।
अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — गहराई से अभ्यास
- ‘कार्य’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘कार्य’ का अर्थ है — बल × बल की दिशा में विस्थापन।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘गतिज ऊर्जा’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘गतिज ऊर्जा’ का अर्थ है — गति के कारण ऊर्जा।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘स्थितिज ऊर्जा’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘स्थितिज ऊर्जा’ का अर्थ है — स्थिति के कारण संचित ऊर्जा।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘शक्ति’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘शक्ति’ का अर्थ है — कार्य करने की दर।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘संरक्षी बल’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘संरक्षी बल’ का अर्थ है — जिसके विरुद्ध कार्य पथ पर निर्भर न करे।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘कार्य-ऊर्जा प्रमेय’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए और ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में इसका महत्त्व बताइए।
‘कार्य-ऊर्जा प्रमेय’ का अर्थ है — W_कुल = ΔK — किसी भी बल-प्रणाली के लिए सत्य।। ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ में यह शब्द इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पाठ का केंद्रीय तर्क इसी धारणा से जुड़ा है। परीक्षा में इसका उत्तर लिखते समय पहले परिभाषा दें, फिर पाठ का प्रसंग बताएँ कि यह शब्द कहाँ और क्यों आता है, और अंत में एक वाक्य में इसका परिणाम या महत्त्व जोड़ें। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — यही पूर्ण उत्तर की तीन कड़ियाँ हैं। - ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके प्रसंगों और मुख्य शब्दों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल परिभाषाएँ और सार रट लेना, बिना प्रसंग समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘कार्य, ऊर्जा और शक्ति’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है।
- कार्य W = F·s·cos θ; कार्य-ऊर्जा प्रमेय: कुल कार्य = गतिज ऊर्जा में परिवर्तन।
- संरक्षी बलों के अधीन यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित: K + V = नियत; V(x) वक्र के वर्जित क्षेत्र में कण नहीं मिल सकता।
- स्प्रिंग की स्थितिज ऊर्जा ½kx²; शक्ति P = F·v; स्थिर शक्ति पर v ∝ √t, s ∝ t^3/2।
- संघट्ट: संवेग हमेशा संरक्षित; गतिज ऊर्जा केवल प्रत्यास्थ संघट्ट में संरक्षित; समान द्रव्यमानों में वेगों का आदान-प्रदान।
- β-क्षय का सतत स्पेक्ट्रम द्विपिंड क्षय से समझाया नहीं जा सकता — तीसरे कण (न्यूट्रिनो) की आवश्यकता पड़ती है।

