Chapter 3: माँ
एक माँ, जिसकी बेटी मंगू मानसिक रूप से बीमार है — और वह माँ, जो खुद भी उसी रास्ते पर चल पड़ती है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Varnika Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
माँ — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Varnika Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | वर्णिका भाग-2 — अध्याय 3 | प्रकार: कहानी (ईश्वर पेटलीकर) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): बच्चों को खाना परोसती माँ — मातृत्व के भाव का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

माँ से लिपटा बच्चा — स्नेह का एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
कहानी की केंद्रीय पात्र एक माँ है, जो अपनी बेटी मंगू के प्रति समर्पित है। मंगू जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी है। माँ के अन्य बच्चे हैं — शहर में नौकरी करने वाले दो बेटे और एक विवाहित बेटी — पर बहुएँ शिकायत करती हैं कि माँ मंगू से अपने पोते-पोतियों से ज़्यादा प्यार करती है।
कहानी में कुसुम नाम की एक और गाँव की लड़की का प्रसंग आता है, जो अस्पताल में ठीक हो जाती है — पहले महीने के अंत तक उसमें सुधार आता है, दूसरे महीने में वह ठीक हो जाती है, और डॉक्टर की सलाह पर तीसरा महीना भी वह अस्पताल में रहती है। गाँव वाले इसके बाद माँ से भी मंगू को अस्पताल में भर्ती कराने का आग्रह करते हैं। माँ लंबे समय तक विरोध करती है — अस्पताल उसे अपनी बच्ची को छोड़ देने जैसा लगता है, जैसे गौशाला में छोड़ देना — पर अंत में वह मान जाती है, नई आशा से और इसलिए भी कि वह बूढ़ी हो रही है और कोई बहू मंगू की देखभाल नहीं करेगी।
रेल-यात्रा में माँ को ताने सुनने पड़ते हैं। अस्पताल में एक नर्स की रोगी के प्रति दयालुता — बिना क्रोध के एक शिकायत करने वाले रोगी का चेहरा धोना — उसे विश्वास दिलाती है कि अस्पताल का स्टाफ केवल कुशल ही नहीं, संवेदनशील भी है। वह मंगू को वहाँ छोड़कर आती है, रात भर अपराध-बोध में बिताती है — उसका बेटा भी मंगू की देखभाल स्वयं करने की कसम खाता है — और सुबह वह चिल्लाती है कि मंगू को मार दिया गया है — और वह स्वयं भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है, उसी श्रेणी में आ जाती है, जिससे वह डरती थी।
क्या सीखना है
माँ, मंगू, कुसुम का प्रसंग, अस्पताल का निर्णय और कहानी के मार्मिक अंत को समझें।
मुख्य शब्द
- मंगू — माँ की बेटी; जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी।
- कुसुम — गाँव की दूसरी लड़की; अस्पताल में ठीक हो जाती है।
- अस्पताल — मानसिक रोगियों का अस्पताल, जहाँ मंगू भर्ती होती है।
- नर्स — अस्पताल की संवेदनशील नर्स, जो रोगी का चेहरा धोती है।
- गौशाला — गायों को छोड़ने का स्थान; माँ को अस्पताल वैसा ही लगता है।
याद रखें
- मंगू जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी है।
- बहुएँ शिकायत करती हैं कि माँ मंगू से ज़्यादा प्यार करती है।
- कुसुम अस्पताल में ठीक हो जाती है — पहले महीने में सुधार, दूसरे में ठीक।
- माँ लंबे समय तक अस्पताल का विरोध करती है।
- अंत: माँ स्वयं मानसिक संतुलन खो बैठती है।
ईश्वर पेटलीकर गुजराती के लोकप्रिय कहानीकार थे। उनकी प्रसिद्ध कहानी 'खून की सगाई' है और प्रसिद्ध उपन्यास 'काला पानी' है। यह कहानी गोपालदास नागर द्वारा संपादित-अनूदित संग्रह 'माँ' से ली गई है।
इस कहानी का विषय माँ के सामान्य प्रेम का निबंध नहीं है — इसका केंद्र मंगू की बीमारी, अस्पताल का निर्णय और माँ के मानसिक संतुलन खोने का मार्मिक अंत है। उत्तर में यही केंद्र लिखें।
'माँ अस्पताल में मंगू को भर्ती क्यों नहीं कराना चाहती' और 'शीर्षक की सार्थकता' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: कहानी के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| माँ | मंगू के प्रति समर्पित |
| मंगू | जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी |
| अन्य बच्चे | दो बेटे शहर में; एक विवाहित बेटी |
| कुसुम | अस्पताल में ठीक हुई लड़की |
| अस्पताल का निर्णय | लंबे विरोध के बाद माँ मान जाती है |
| अंत | माँ स्वयं मानसिक संतुलन खो बैठती है |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- माँ का मंगू के प्रति और परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति व्यवहार में क्या अंतर है? अपने शब्दों में लिखिए।
संकेत: समर्पण बनाम शिकायत से सोचें। - माँ मंगू को अस्पताल में भर्ती क्यों नहीं कराना चाहती? विचार कीजिए।
संकेत: छोड़ देने के भाव से सोचें। - कुसुम की बीमारी में सुधार देखकर माँ, परिवार और समाज की क्या प्रतिक्रिया हुई?
संकेत: आशा और आग्रह से सोचें। - कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
संकेत: माँ के समर्पण और अंत से सोचें। - कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।
संकेत: मंगू, कुसुम, अस्पताल, अंत से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस कहानी का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि एक माँ अपनी मानसिक रूप से बीमार बेटी के प्रति इतनी समर्पित होती है कि वह खुद भी उसी पीड़ा में डूब जाती है — और अंत में वह स्वयं भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है। माँ का प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ी कमज़ोरी दोनों है। - मंगू कौन थी?
मंगू माँ की बेटी थी, जो जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी थी। माँ उसके प्रति पूरी तरह समर्पित थी, और परिवार के अन्य सदस्य — बहुएँ — शिकायत करते थे कि माँ मंगू से अपने पोते-पोतियों से ज़्यादा प्यार करती है। - कुसुम का प्रसंग क्या कहता है?
कुसुम गाँव की एक और लड़की थी, जो अस्पताल में ठीक हो गई — पहले महीने के अंत तक उसमें सुधार आया, दूसरे महीने में वह ठीक हो गई। इस प्रसंग ने माँ को भी आशा दी और गाँव वालों को मंगू को अस्पताल भेजने का आग्रह करने का आधार दिया। - माँ अस्पताल का विरोध क्यों करती है?
क्योंकि अस्पताल उसे अपनी बच्ची को छोड़ देने जैसा लगता है — जैसे गौशाला में छोड़ देना। वह लंबे समय तक विरोध करती है, पर अंत में नई आशा से और इसलिए मान जाती है कि वह बूढ़ी हो रही है और कोई बहू मंगू की देखभाल नहीं करेगी। - इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
यही कि माँ का प्रेम असीम होता है, पर उसी प्रेम में डूबकर माँ खुद भी टूट सकती है — और मानसिक बीमारी के प्रति समाज की समझ और संवेदनशीलता कितनी ज़रूरी है।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 6 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- माँ का मंगू के प्रति और परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति व्यवहार में क्या अंतर है? अपने शब्दों में लिखिए।
माँ मंगू के प्रति पूरी तरह समर्पित है — वह उसी की देखभाल में अपना जीवन लगा देती है। परिवार के अन्य सदस्यों — बेटों, बेटी और बहुओं — के प्रति वह सामान्य माँ है, पर मंगू के प्रति उसका प्रेम विशेष है, क्योंकि मंगू को उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। बहुएँ इसी अंतर की शिकायत करती हैं। - माँ मंगू को अस्पताल में भर्ती क्यों नहीं कराना चाहती? विचार कीजिए।
माँ मंगू को अस्पताल में भर्ती इसलिए नहीं कराना चाहती, क्योंकि अस्पताल उसे अपनी बच्ची को छोड़ देने जैसा लगता है — जैसे गौशाला में छोड़ देना। उसे लगता है कि अस्पताल में मंगू अकेली हो जाएगी, और कोई उसकी देखभाल माँ की तरह नहीं करेगा। - कुसुम की बीमारी में सुधार देखकर माँ, परिवार और समाज की क्या प्रतिक्रिया हुई? अपने शब्दों में लिखिए।
कुसुम की बीमारी में सुधार देखकर माँ को नई आशा मिली, परिवार को भी लगा कि मंगू भी ठीक हो सकती है, और समाज — गाँव वाले — माँ से आग्रह करने लगे कि वह भी मंगू को अस्पताल में भर्ती कराए। कुसुम का ठीक होना सबके लिए आशा का प्रमाण बना। - कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।
शीर्षक सार्थक है क्योंकि पूरी कहानी एक माँ के इर्द-गिर्द घूमती है — उसकी बेटी के प्रति समर्पण, उसका विरोध, उसका निर्णय और अंत में उसका स्वयं टूट जाना — सब माँ के ही अनुभव हैं। 'माँ' शीर्षक ही कहानी का केंद्र है। - जिस अस्पताल में मंगू भर्ती होती है, उसका स्टाफ केवल कुशल है या संवेदनशील भी? विचार कीजिए।
अस्पताल का स्टाफ केवल कुशल ही नहीं, संवेदनशील भी है — इसका प्रमाण वह नर्स है, जो बिना क्रोध के एक शिकायत करने वाले रोगी का चेहरा धोती है। माँ इसी दयालुता को देखकर विश्वास करती है कि अस्पताल में मंगू की देखभाल संवेदनशीलता से होगी, न कि केवल कुशलता से। - कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।
एक माँ अपनी मानसिक रूप से बीमार और गूँगी बेटी मंगू के प्रति पूरी तरह समर्पित है। गाँव की लड़की कुसुम के अस्पताल में ठीक होने पर गाँव वाले माँ से भी मंगू को अस्पताल भेजने का आग्रह करते हैं। लंबे विरोध के बाद माँ मान जाती है, रेल-यात्रा में ताने सुनती है, अस्पताल की नर्स की दयालुता देखकर विश्वास करती है, और मंगू को वहाँ छोड़कर आती है। रात भर अपराध-बोध में बिताकर सुबह वह चिल्लाती है कि मंगू को मार दिया गया है — और वह स्वयं भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है।
- लेखक ईश्वर पेटलीकर; गुजराती कहानी; संग्रह 'माँ'।
- मंगू: जन्म से मानसिक रूप से बीमार और गूँगी।
- कुसुम: अस्पताल में ठीक हुई; माँ को आशा मिली।
- माँ लंबे विरोध के बाद मंगू को अस्पताल भेजती है।
- अंत: माँ स्वयं मानसिक संतुलन खो बैठती है।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

