Chapter 4: नाखून क्यों बढ़ते हैं
नाखून बढ़ते हैं, तो बढ़ें — मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा। यही मनुष्यता की ओर बढ़ना है।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
नाखून क्यों बढ़ते हैं — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | गद्य खंड — अध्याय 4 | प्रकार: निबंध (हज़ारी प्रसाद द्विवेदी) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): हाथ, औज़ार और किताबें — मनुष्य की प्रगति का एक सामान्य प्रतीकात्मक चित्र।

सोचता हुआ विद्यार्थी — जिज्ञासा का एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह निबंध एक छोटे-से प्रश्न से शुरू होता है — नाखून क्यों बढ़ते हैं? लेखक के आगे यह प्रश्न तब उपस्थित हुआ, जब उसने अपने बढ़ते नाखूनों को देखा और सोचा कि प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाना चाहती है। बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को यह याद दिलाती है कि वह अभी भी पशुता से जुड़ा हुआ है — नाखून पशुओं के अस्त्र हैं, और मनुष्य के नाखून भी उसी पशुता की याद दिलाते हैं।
मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है? क्योंकि वह पशुता से मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहता है — वह अपने नाखूनों को अस्त्र के रूप में नहीं देखना चाहता, बल्कि सुकुमार विनोदों के लिए उनका उपयोग करना चाहता है। नख बढ़ाना और उन्हें काटना — दोनों ही मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं — एक पशुता की ओर खींचती है, दूसरी मनुष्यता की ओर।
लेखक पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है — पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? और उत्तर देता है कि मनुष्य मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है — क्योंकि वह अपने नाखूनों को बढ़ने नहीं देता। देश की आज़ादी के लिए प्रयुक्त शब्दों की अर्थ-मीमांसा भी लेखक करता है — 'स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता यह है कि वह मनुष्य की अपनी अधीनता से मुक्ति है। लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता यह है कि वह मनुष्यता की ओर बढ़ने की संस्कृति है — और प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में आशा जगती है कि मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे।
क्या सीखना है
नाखून बढ़ने का प्रश्न, प्रकृति की याद, पशुता बनाम मनुष्यता, स्वाधीनता और संस्कृति की विशेषता को समझें।
मुख्य शब्द
- नाखून — यहाँ पशुता का प्रतीक; मनुष्य के बढ़ते नाखून।
- सहजात वृत्ति — जन्मजात प्रवृत्ति; नख बढ़ाना और काटना दोनों।
- पशुता — पशुओं जैसी प्रवृत्ति; नाखूनों का अस्त्र-रूप।
- मनुष्यता — मानवीय गुण; नाखूनों को सुकुमार विनोदों में उपयोग करना।
- स्वाधीनता — अपनी अधीनता से मुक्ति; लेखक की अर्थ-मीमांसा।
याद रखें
- प्रश्न: नाखून क्यों बढ़ते हैं?
- प्रकृति की याद: मनुष्य अभी पशुता से जुड़ा है।
- मनुष्य नाखून काटता है — मनुष्यता की ओर बढ़ना।
- नख बढ़ाना और काटना — दोनों सहजात वृत्तियाँ।
- संस्कृति की विशेषता: मनुष्यता की ओर बढ़ना।
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी (1907–1979) हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक और उपन्यासकार थे। उनकी निबंध-शैली में हास्य, व्यंग्य और गहरी चिंतनशीलता का मिश्रण है। 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' उनका प्रसिद्ध ललित निबंध है।
यह निबंध जीव-विज्ञान का पाठ नहीं है — इसका केंद्र पशुता बनाम मनुष्यता का दार्शनिक प्रश्न है। उत्तर में यही केंद्र लिखें।
'मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है' और 'संस्कृति की विशेषता' — ये दो प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
Chart / Table: निबंध के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| प्रश्न | नाखून क्यों बढ़ते हैं? |
| प्रकृति की याद | मनुष्य अभी पशुता से जुड़ा है |
| मनुष्य का उत्तर | नाखून काटना — मनुष्यता की ओर बढ़ना |
| सहजात वृत्तियाँ | बढ़ाना और काटना — दोनों |
| स्वाधीनता | अपनी अधीनता से मुक्ति |
| संस्कृति | मनुष्यता की ओर बढ़ने की संस्कृति |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
संकेत: अपने बढ़ते नाखूनों को देखकर से सोचें। - बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?
संकेत: पशुता से सोचें। - मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है?
संकेत: मनुष्यता की ओर बढ़ने से सोचें। - लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है — पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर?
संकेत: नाखून काटने से सोचें। - लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है?
संकेत: मनुष्यता की ओर बढ़ने से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस निबंध का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य के बढ़ते नाखून उसे पशुता की याद दिलाते हैं, पर मनुष्य उन्हें बार-बार काटकर मनुष्यता की ओर बढ़ता है — और यही मनुष्य की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। - प्रकृति नाखूनों से क्या याद दिलाती है?
प्रकृति बढ़ते नाखूनों से मनुष्य को यह याद दिलाती है कि वह अभी भी पशुता से जुड़ा हुआ है — नाखून पशुओं के अस्त्र हैं, और मनुष्य के नाखून भी उसी पशुता की याद हैं। - मनुष्य नाखून क्यों काटता है?
क्योंकि वह पशुता से मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहता है — वह अपने नाखूनों को अस्त्र के रूप में नहीं देखना चाहता, बल्कि सुकुमार विनोदों के लिए उनका उपयोग करना चाहता है। - सहजात वृत्तियाँ क्या हैं?
नख बढ़ाना और उन्हें काटना — दोनों ही मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं — एक पशुता की ओर खींचती है, दूसरी मनुष्यता की ओर। - इस निबंध से क्या सीख मिलती है?
यही कि मनुष्य की संस्कृति ही उसे पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाती है — और यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 16 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
यह प्रश्न लेखक के आगे तब उपस्थित हुआ, जब उसने अपने बढ़ते नाखूनों को देखा और सोचा कि प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाना चाहती है — नाखूनों का बढ़ना ही इस प्रश्न का कारण बना। - बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?
बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को यह याद दिलाती है कि वह अभी भी पशुता से जुड़ा हुआ है — नाखून पशुओं के अस्त्र हैं, और मनुष्य के नाखून भी उसी पशुता की याद दिलाते हैं। - नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है?
नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना पशुओं के लिए संगत है, पर मनुष्य के लिए नहीं — क्योंकि मनुष्य ने नाखूनों का उपयोग अस्त्र के रूप में करना छोड़ दिया है, और वह उन्हें सुकुमार विनोदों के लिए उपयोग करता है। - मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है?
क्योंकि वह पशुता से मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहता है — वह अपने नाखूनों को बढ़ने नहीं देना चाहता, क्योंकि बढ़े हुए नाखून पशुता की निशानी हैं। - सुकुमार विनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है?
लेखक ने बताया है कि मनुष्य ने धीरे-धीरे नाखूनों का उपयोग अस्त्र के रूप में करना छोड़ दिया, और उन्हें सुकुमार विनोदों — जैसे वीणा बजाना, चित्र बनाना — के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया। यही मनुष्यता की ओर बढ़ना है। - नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?
नख बढ़ाना मनुष्य की सहजात वृत्ति है, क्योंकि वह प्रकृति से जुड़ा है — और उन्हें काटना भी सहजात वृत्ति है, क्योंकि वह मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहता है। अभिप्राय यह है कि मनुष्य में पशुता और मनुष्यता दोनों की प्रवृत्तियाँ जन्मजात हैं। - लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है — पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।
लेखक यह प्रश्न इसलिए पूछता है, क्योंकि नाखूनों का बढ़ना पशुता की ओर खींचता है, और उन्हें काटना मनुष्यता की ओर — और मनुष्य का भविष्य इसी पर निर्भर है कि वह किस ओर बढ़ता है। लेखक का उत्तर है कि मनुष्य मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है। - देश की आज़ादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ-मीमांसा लेखक करता है और निष्कर्ष क्या हैं?
लेखक देश की आज़ादी के लिए प्रयुक्त शब्दों — जैसे 'स्वाधीनता', 'स्वतंत्रता' — की अर्थ-मीमांसा करता है, और निष्कर्ष निकालता है कि स्वाधीनता का अर्थ अपनी अधीनता से मुक्ति है — न कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता। - किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती? अभिप्राय स्पष्ट करें।
लेखक ने यह बात उस प्रसंग में कही है, जहाँ वह मनुष्य और पशु के अंतर की बात करता है — बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती, क्योंकि मनुष्य की संस्कृति पशुता से अलग है — मनुष्य मनुष्यता की ओर बढ़ता है, पशुता की ओर नहीं। - 'स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है?
लेखक बताता है कि 'स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता यह है कि वह मनुष्य की अपनी अधीनता से मुक्ति है — अपनी इच्छाओं, अपनी पशुता और अपने बंधनों से मुक्ति ही सच्ची स्वाधीनता है। - निबंध में किस बूढ़े का ज़िक्र किया है? बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है?
निबंध में एक बूढ़े का ज़िक्र किया गया है, जो मनुष्य की प्रगति के बारे में अपने विचार रखता है। बूढ़े के कथनों की सार्थकता यह है कि वे मनुष्य की संस्कृति और उसकी मनुष्यता की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। - मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे — प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?
प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में यह आशा जगती है कि जैसे मनुष्य की पूँछ झड़ गई, वैसे ही एक दिन उसके नाखून भी झड़ जाएँगे — यानी मनुष्य पूरी तरह पशुता से मुक्त हो जाएगा और मनुष्यता की ओर बढ़ जाएगा। - 'सफलता' और 'चरितार्थता' शब्दों में अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है?
लेखक बताता है कि 'सफलता' का अर्थ किसी काम में सफल होना है, पर 'चरितार्थता' का अर्थ जीवन के उद्देश्य को पूरा करना है — सफलता बाहरी है, चरितार्थता आंतरिक है। - व्याख्या करें — निबंध के तीन कथनों के भाव अपने शब्दों में स्पष्ट करें।
इस प्रश्न में तीन कथनों के भाव पूछे गए हैं। इनका भाव अपने शब्दों में इस प्रकार है: पहला — नाखूनों को काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे, पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाज़िर — यानी नाखून बार-बार बढ़ आते हैं, जैसे अपराधी बार-बार अपराध करता है; दूसरा — मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ, यानी नाखूनों की पशुता देखकर लेखक को मनुष्य के भविष्य की चिंता होती है; तीसरा — कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़ें, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा, यानी मनुष्य पशुता को बढ़ने नहीं देगा, वह मनुष्यता की ओर ही बढ़ेगा। - लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है? स्पष्ट कीजिए।
लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता यह है कि वह मनुष्यता की ओर बढ़ने की संस्कृति है — वह मनुष्य को पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाती है, और यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। - निबंध का सारांश प्रस्तुत करें।
नाखूनों के बढ़ने के प्रश्न से शुरू होकर लेखक बताता है कि नाखून पशुता की याद दिलाते हैं, पर मनुष्य उन्हें काटकर मनुष्यता की ओर बढ़ता है। नख बढ़ाना और काटना दोनों सहजात वृत्तियाँ हैं। स्वाधीनता, सफलता और चरितार्थता की अर्थ-मीमांसा के बाद लेखक निष्कर्ष निकालता है कि हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता मनुष्यता की ओर बढ़ना है।
- लेखक हज़ारी प्रसाद द्विवेदी; ललित निबंध।
- प्रश्न: नाखून क्यों बढ़ते हैं?
- प्रकृति की याद: पशुता से जुड़ाव।
- मनुष्य का उत्तर: नाखून काटना — मनुष्यता की ओर।
- संस्कृति की विशेषता: मनुष्यता की ओर बढ़ना।
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