Chapter 11: नौबतखाने में इबादत
शहनाई की इबादत — बिस्मिल्ला खाँ, जिनके लिए सुर ही खुदा की प्रार्थना था।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 10 • Hindi • Book: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
नौबतखाने में इबादत — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Godhuli Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 10) | गद्य खंड — अध्याय 11 | प्रकार: व्यक्तिचित्र (यतींद्र मिश्र) | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): सुबह के समय वाद्य बजाता संगीतकार — साधना के भाव का एक सामान्य चित्र, किताब का दृश्य नहीं।

वाद्य सीखते विद्यार्थी — एक सामान्य चित्र।
इस अध्याय के बारे में
यह व्यक्तिचित्र शहनाई के महान कलाकार बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और साधना को दर्शाता है। बिस्मिल्ला खाँ का जन्म 1916 में डुमराँव में हुआ था। डुमराँव की महत्ता इसीलिए है कि वहीं से उनकी संगीत-यात्रा शुरू हुई — बचपन में रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाने वाले रास्ते से कमरुद्दीन को जाना अच्छा लगता था, और उन्हीं गायिका बहनों को सुनकर उन्हें संगीत के प्रति आसक्ति हुई।
शहनाई का इतिहास भी इस पाठ में आता है — वैदिक इतिहास में शहनाई का कोई उल्लेख नहीं मिलता, इसे संगीत शास्त्रांतर्गत 'सुषिर-वाद्य' में गिना जाता है। अरब देश में फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य, जिसमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है, को 'नय' बोलते हैं, और शहनाई को 'शाहनय' अर्थात् सुषिर वाद्यों में शाह की उपाधि दी गई है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के तानसेन द्वारा रची बंदिश में शहनाई, मुरली, वंशी, बाँसुरी एवं मुरछंग का वर्णन आया है।
बिस्मिल्ला खाँ दशकों से सुर माँग रहे हैं — सच्चे सुर की कीमत, पाँचों वक्त की नमाज़, सुर की प्रार्थना में आँखों से अनगढ़ आँसू। उनको यकीन था कि कभी खुदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा। मुहर्रम का महीना वह होता है, जिसमें शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन एवं उनके कुछ वंशजों के प्रति अज़ादारी (शोक मनाना) मनाते हैं — और उनके खानदान का कोई व्यक्ति मुहर्रम के दिनों में न शहनाई बजाता, न किसी संगीत के कार्यक्रम में भाग लेता। काशी से बाहर जाते समय भी वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता था।
क्या सीखना है
बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, शहनाई के इतिहास, मुहर्रम से जुड़ाव और काशी के प्रति उनकी श्रद्धा को समझें।
मुख्य शब्द
- बिस्मिल्ला खाँ — शहनाई के महान कलाकार; व्यक्तिचित्र के केंद्रीय व्यक्ति।
- डुमराँव — बिस्मिल्ला खाँ का जन्म-स्थान (बिहार)।
- सुषिर-वाद्य — फूँककर बजाए जाने वाले वाद्य; शहनाई इसी वर्ग में आती है।
- शाहनय — शहनाई की उपाधि — सुषिर वाद्यों में शाह।
- मुहर्रम — शिया मुसलमानों का शोक का महीना (इमाम हुसैन की याद में)।
- अज़ादारी — शोक मनाना।
याद रखें
- बिस्मिल्ला खाँ का जन्म 1916 में डुमराँव में हुआ था।
- शहनाई सुषिर-वाद्य है; उसे 'शाहनय' की उपाधि दी गई है।
- मुहर्रम के दिनों में खानदान का कोई व्यक्ति शहनाई नहीं बजाता।
- बिस्मिल्ला खाँ पाँचों वक्त की नमाज़ के बाद सुर की प्रार्थना करते थे।
- काशी से बाहर भी वे विश्वनाथ-बालाजी की दिशा में मुँह करके शहनाई बजाते थे।
यतींद्र मिश्र का जन्म 1977 में अयोध्या, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और संगीत-चिंतक हैं। यह व्यक्तिचित्र बिस्मिल्ला खाँ के जीवन और साधना पर आधारित है।
यह पाठ केवल बिस्मिल्ला खाँ की जीवनी नहीं है — इसका केंद्र 'इबादत' है, यानी संगीत को प्रार्थना मानना। उत्तर में सुर की प्रार्थना, नमाज़ और काशी के प्रति श्रद्धा की बात लिखें।
'संगीतमय कचौड़ी' का अर्थ (कुलसुम की कचौड़ी डालते समय उठने वाली खाली आवाज़ में सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे) और 'बिस्मिल्ला खाँ का मतलब — बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई' वाला कथन — दोनों अवश्य तैयार रखें।
Chart / Table: व्यक्तिचित्र के मुख्य बिंदु
| विषय | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 1916, डुमराँव (बिहार) |
| शुरुआत | रसूलनबाई-बतूलनबाई को सुनकर संगीत से आसक्ति |
| शहनाई | सुषिर-वाद्य; 'शाहनय' की उपाधि |
| साधना | पाँचों वक्त की नमाज़ के बाद सुर की प्रार्थना |
| मुहर्रम | दस दिनों का शोक; कोई शहनाई नहीं बजाता |
| काशी | विश्वनाथ-बालाजी की दिशा में मुँह करके शहनाई |
अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)
- डुमराँव की महत्ता किस कारण से है?
संकेत: जन्म-स्थान और संगीत की शुरुआत से सोचें। - सुषिर वाद्य किन्हें कहते हैं? 'शहनाई' शब्द की व्युत्पत्ति किस प्रकार हुई है?
संकेत: फूँककर बजाने और 'शाहनय' से सोचें। - बिस्मिल्ला खाँ सजदे में किस चीज़ के लिए गिड़गिड़ाते थे?
संकेत: सच्चे सुर से सोचें। - मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव का परिचय दीजिए।
संकेत: दस दिनों के शोक से सोचें। - 'संगीतमय कचौड़ी' का आप क्या अर्थ समझते हैं?
संकेत: कचौड़ी की आवाज़ में आरोह-अवरोह से सोचें।
प्रश्न और उत्तर
- इस व्यक्तिचित्र का केंद्रीय भाव क्या है?
केंद्रीय भाव यह है कि सच्ची इबादत केवल प्रार्थना-स्थल में नहीं होती — वह अपने काम में पूरी तरह डूब जाने में भी होती है। बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई बजाना ही खुदा की इबादत थी, और सच्चा सुर ही उनकी प्रार्थना का फल था। - बिस्मिल्ला खाँ कौन थे?
बिस्मिल्ला खाँ शहनाई के महान कलाकार थे, जिनका जन्म 1916 में डुमराँव (बिहार) में हुआ था। उन्होंने शहनाई को विश्व भर में पहचान दिलाई और काशी से उनका गहरा जुड़ाव था। - शहनाई को 'शाहनय' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि शहनाई सुषिर-वाद्य है — फूँककर बजाया जाने वाला वाद्य — और सुषिर वाद्यों में उसे शाह की उपाधि दी गई है, यानी वह वाद्यों का शाह है। - मुहर्रम से बिस्मिल्ला खाँ का क्या जुड़ाव था?
मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन और उनके वंशजों के प्रति अज़ादारी मनाते हैं। बिस्मिल्ला खाँ के खानदान का कोई व्यक्ति मुहर्रम के दिनों में न शहनाई बजाता था, न किसी संगीत के कार्यक्रम में भाग लेता था — यही उनकी परंपरा थी। - इस पाठ से क्या सीख मिलती है?
यही कि कला में सच्ची सफलता साधना, श्रद्धा और अपनी जड़ों से जुड़ाव से मिलती है — और कलाकार अपनी कला के माध्यम से ही खुदा की इबादत कर सकता है।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — बोध और अभ्यास (उत्तर सहित)
इस खंड में पुस्तक के ‘बोध और अभ्यास’ खंड के ‘पाठ के साथ’ / ‘कविता के साथ’ वाले 9 प्रश्नों के उत्तर EG के अपने शब्दों में दिए गए हैं। ‘पाठ/कविता के आस-पास’ और ‘भाषा की बात’ वाले कार्य कक्षा-कार्य के रूप में हैं — उन्हें अपने शिक्षक के साथ करें।
- डुमराँव की महत्ता किस कारण से है?
डुमराँव की महत्ता इस कारण से है कि वहीं बिस्मिल्ला खाँ का जन्म हुआ था और वहीं से उनकी संगीत-यात्रा शुरू हुई थी। बचपन में रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाने वाले रास्ते से कमरुद्दीन को जाना अच्छा लगता था, और उन्हीं गायिका बहनों को सुनकर उन्हें संगीत के प्रति आसक्ति हुई थी। - सुषिर वाद्य किन्हें कहते हैं? 'शहनाई' शब्द की व्युत्पत्ति किस प्रकार हुई है?
सुषिर वाद्य उन्हें कहते हैं, जो फूँककर बजाए जाते हैं और जिनमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है। अरब देश में ऐसे वाद्य को 'नय' बोलते हैं, और शहनाई को 'शाहनय' अर्थात् सुषिर वाद्यों में शाह की उपाधि दी गई है — इसी 'शाहनय' से 'शहनाई' शब्द बना है। - बिस्मिल्ला खाँ सजदे में किस चीज़ के लिए गिड़गिड़ाते थे? इससे उनके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष उद्घाटित होता है?
बिस्मिल्ला खाँ सजदे में सच्चे सुर के लिए गिड़गिड़ाते थे — वे नमाज़ के बाद सजदे में कहते थे कि मेरे मालिक, एक सुर बख्श दे। इससे उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष उद्घाटित होता है कि वे सुर को खुदा की देन मानते थे और अपनी कला को इबादत समझते थे — उनका अहंकार नहीं, बल्कि खुदा के प्रति समर्पण था। - मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव का परिचय पाठ के आधार पर दें।
मुहर्रम का महीना वह होता है, जिसमें शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन एवं उनके कुछ वंशजों के प्रति अज़ादारी (शोक मनाना) मनाते हैं — पूरे दस दिनों का शोक। बिस्मिल्ला खाँ के खानदान का कोई व्यक्ति मुहर्रम के दिनों में न तो शहनाई बजाता था, न ही किसी संगीत के कार्यक्रम में भाग लेता था — यही उनका मुहर्रम से जुड़ाव था। - 'संगीतमय कचौड़ी' का आप क्या अर्थ समझते हैं?
'संगीतमय कचौड़ी' का अर्थ है काशी की वह कचौड़ी, जिसमें संगीत घुला हुआ लगता है। लेखक बताता है कि कुलसुम जब कलकलाते घी में कचौड़ी डालती थी, तो उस समय उठने वाली खाली आवाज़ में सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे — यानी काशी के जीवन की हर चीज़, यहाँ तक कि कचौड़ी भी, संगीतमय लगती है। - बिस्मिल्ला खाँ जब काशी से बाहर प्रदर्शन करते थे तो क्या करते थे? इससे हमें क्या सीख मिलती है?
जब बिस्मिल्ला खाँ काशी से बाहर रहते थे, तब वे विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते थे — थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता था। इससे हमें यह सीख मिलती है कि कलाकार चाहे कहीं भी जाए, अपनी जड़ों और अपनी श्रद्धा से जुड़ा रहता है — काशी उनके लिए केवल शहर नहीं, बल्कि संस्कृति की पाठशाला थी। - 'बिस्मिल्ला खाँ का मतलब — बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई।' एक कलाकार के रूप में बिस्मिल्ला खाँ का परिचय पाठ के आधार पर दें।
बिस्मिल्ला खाँ का मतलब ही उनकी शहनाई है — वे और उनकी शहनाई एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। एक कलाकार के रूप में वे दशकों से सुर माँग रहे हैं, पाँचों वक्त की नमाज़ के बाद सुर की प्रार्थना करते हैं, और उनका यकीन है कि कभी खुदा उन पर मेहरबान होकर अपनी झोली से सुर का फल उनकी ओर उछालेगा। - आशय स्पष्ट करें — (क) फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सिल जाएगी। (ख) काशी संस्कृति की पाठशाला है।
(क) इसका आशय है कि बिस्मिल्ला खाँ खुदा से फटा सुर न बख्शने की प्रार्थना करते थे — लुंगिया फट जाए तो सिल जाएगी, पर सुर फटा तो वह ठीक नहीं होगा। यानी कलाकार के लिए सुर की शुद्धता सबसे बड़ी चीज़ है, बाकी सब ठीक हो सकता है। (ख) इसका आशय है कि काशी संस्कृति की पाठशाला है — वहाँ के मंदिर, संगीत, खान-पान और जीवन-शैली से संस्कृति सीखी जाती है, और बिस्मिल्ला खाँ जैसे कलाकार इसी पाठशाला के विद्यार्थी हैं। - बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का वर्णन पाठ के आधार पर दें।
बिस्मिल्ला खाँ का बचपन डुमराँव में बीता। वे रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाने वाले रास्ते से जाना पसंद करते थे, क्योंकि वहाँ से संगीत की आवाज़ आती थी। उन्हीं गायिका बहनों को सुनकर उन्हें संगीत के प्रति आसक्ति हुई — और यही आसक्ति बाद में शहनाई की साधना में बदल गई।
- लेखक यतींद्र मिश्र; व्यक्तिचित्र बिस्मिल्ला खाँ पर।
- जन्म 1916, डुमराँव; रसूलनबाई-बतूलनबाई से संगीत की आसक्ति।
- शहनाई सुषिर-वाद्य; 'शाहनय' की उपाधि।
- सुर की प्रार्थना: पाँचों वक्त की नमाज़ के बाद सजदे में सुर माँगना।
- मुहर्रम: दस दिनों का शोक; कोई शहनाई नहीं।
- काशी: संस्कृति की पाठशाला; बाहर भी विश्वनाथ की दिशा में मुँह।
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