Chapter 5: गीता सुगीता कर्तव्या
गीता को सुगीता बनाओ — अच्छी तरह पढ़ो, समझो और जीवन में उतारो।
Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 8 • Sanskrit • Book: Deepakam
पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में
कुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव मनाया गया। वहाँ बहुत से लोग आए। रमेश भी अपने पिता के साथ वहाँ गया। कथावाचक गीता के विषय में वर्णन कर रहा था और उसने कहा कि गीता को सुगीता बनाना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन — क्योंकि गीता स्वयं पद्मनाभ (विष्णु) के मुख-कमल से निकली है। यह सुनकर रमेश ने पिता से पूछा — पिता! गीता क्या है? और सुगीता कैसे की जाती है?
पिता ने समझाया — बहुत वर्षों पहले कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों के बीच संग्राम हुआ था। उस युद्ध में अपने बान्धवों को देखकर अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहता था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध से पराङ्मुख अर्जुन को कर्तव्य-पालन के लिए उपदेश दिया। श्रीकृष्ण का वही उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में अमृत के समान उपदेश हैं।
रमेश ने पूछा — सुगीता का क्या आशय है? पिता ने कहा — इसका आशय है कि गीता का अभ्यास सम्यक् रूप से करना चाहिए। गीता उत्तम भाव से पढ़ी जानी चाहिए। कार्य-क्षेत्र और जीवन-क्षेत्र में गीता के उपदेशों का अनुपालन करना चाहिए। इस पाठ में हम गीता के कुछ श्लोक पढ़ते हैं और सब मिलकर गाते भी हैं। नीचे आठ श्लोकों का भाव अपने शब्दों में दिया गया है।
आठ श्लोकों का भाव (अपने शब्दों में)
1. स्थितधी मुनि — जो मनुष्य दुःखों में उद्विग्न मन वाला नहीं होता, सुखों में स्पृहारहित होता है, और राग, भय तथा क्रोध से मुक्त होता है, वह मौनी पुरुष स्थितप्रज्ञ (स्थितधी) कहलाता है।
2. क्रोध की शृंखला — क्रोध से सम्मोह (अविवेक) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति-विभ्रम होता है, स्मृति-भ्रंश से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य विनाश को प्राप्त होता है। इसलिए क्रोध को आरम्भ में ही रोकना चाहिए।
3. ज्ञान कैसे पाएँ — हे अर्जुन! गुरु के समीप जाकर यथार्थ ज्ञान पाने का प्रयास करो। विनीत और जिज्ञासु होकर गुरु की सेवा करो और बार-बार प्रश्न करके जानो। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी गुरु तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे, क्योंकि सत्य का दर्शन करने वाले ही यथार्थ ज्ञानी होते हैं।
4. श्रद्धावान ज्ञान पाता है — जो श्रद्धालु मनुष्य दिव्य ज्ञान पाने के लिए निरन्तर प्रयास करता है और जिसने इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है, वह दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा ज्ञान पाकर वह जीवन में अनन्त आनन्द और परम शान्ति पाता है, और वह भी शीघ्र ही।
5. भगवान का प्रिय भक्त — जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मित्रभाव और करुणा रखता है, ममता और अहङ्कार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है और क्षमाशील है — ऐसा पुरुष भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
6. सन्तुष्ट योगी — जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट रहता है, किसी वस्तु के अभाव से कभी असन्तुष्ट नहीं होता, मन और इन्द्रियों को जीतकर संयमी होता है, अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है और मन-बुद्धि को ईश्वर में समर्पित करता है — वह भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
7. जिससे लोक उद्विग्न न हो — जिस मनुष्य से कोई मनुष्य या प्राणी उद्विग्न नहीं होता, और जो स्वयं किसी से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिन्ता से रहित होता है — वह भी भगवान का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
8. वाङ्मय तप — जो वाक्य किसी को उद्वेग नहीं पहुँचाता, सत्य, प्रिय और हितकर होता है, और शास्त्रों का स्वाध्याय और अभ्यास — यही वाङ्मय तप कहलाता है। विद्यार्थियों के लिए यह विशेष स्मरणीय है: प्रिय वाक्य देने से सब जीव तुष्ट होते हैं, इसलिए वही बोलना चाहिए — वचन में कैसी दरिद्रता?

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): वीणा और ढोल के साथ मिलकर गाते लोग। संगीत की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

विद्यालय के आँगन में वाद्ययंत्रों के साथ गाते बच्चे। सामूहिक गायन की सामान्य तस्वीर।
मुख्य शब्द — शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| महोत्सवः | बड़ा उत्सव, पर्व |
| कथावाचकः | कथा सुनाने वाला |
| सुगीता | अच्छी तरह गाई/पढ़ी हुई गीता |
| स्थितधीः | स्थिर बुद्धि वाला |
| सम्मोहः | अविवेक, व्यामोह |
| स्मृतिविभ्रमः | स्मृति का भ्रमित होना |
| प्रणिपातः | विनीत प्रणाम, शरणागति |
| परिप्रश्नः | बार-बार प्रश्न करना |
| श्रद्धावान् | श्रद्धा रखने वाला |
| वाङ्मयम् तपः | वाणी का तप |
| अद्वेष्टा | द्वेष न करने वाला |
व्याकरण और अभ्यास-प्रकार — इस पाठ से
पूर्णवाक्य-उत्तर: पाठ के अभ्यास में प्रश्नों के उत्तर पूर्ण वाक्य में लिखने हैं। उत्तर में श्लोक का भाव अपने शब्दों में लिखो, श्लोक की पंक्ति को ज्यों-का-त्यों उतारना उत्तर नहीं है।
कोष्ठक-पद से वाक्य: कोष्ठक में दिए गए पदों का प्रयोग करके रिक्त स्थान भरो — जैसे वाङ्मय तप वाले वाक्य में अनुद्वेगकर, सत्य, प्रियहित जैसे पद सही स्थान पर आते हैं। पद चुनते समय वाक्य के अर्थ की जाँच करो।
वाक्य-रचना: दिए गए पदों से अपने वाक्य बनाओ — जैसे परिप्रश्नेन, सेवया, श्रद्धावान् जैसे पदों को लेकर सरल संस्कृत वाक्य बनाओ।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- गीता क्या है?
संकेत: कुरुक्षेत्र, अर्जुन और कृष्ण के उपदेश की बात सोचो। - सुगीता का क्या आशय है?
संकेत: सम्यक् अभ्यास, उत्तम भाव से पठन और जीवन में अनुपालन — तीन बातें सोचो। - क्रोध की शृंखला क्रम से लिखो।
संकेत: सम्मोह से शुरू करके विनाश तक जाओ। - वाङ्मय तप किसे कहते हैं?
संकेत: उद्वेग-रहित, सत्य, प्रिय, हितकर वाक्य और स्वाध्याय की बात सोचो। - कोष्ठक-पद से एक वाक्य पूरा करो।
संकेत: वाक्य का अर्थ पढ़ो, फिर सही पद चुनो।
प्रश्न और उत्तर
- रमेश ने पिता से क्या पूछा?
रमेश ने पूछा — पिता! गीता क्या है और सुगीता कैसे की जाती है? पिता ने कुरुक्षेत्र के युद्ध और कृष्ण के उपदेश से गीता का परिचय दिया। - स्थितधी मुनि कौन कहलाता है?
जो दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में स्पृहारहित होता है और राग, भय, क्रोध से मुक्त होता है, वह स्थितधी मुनि कहलाता है। - ज्ञान पाने के तीन साधन कौन-से बताए गए हैं?
प्रणिपात (विनीत शरणागति), परिप्रश्न (बार-बार प्रश्न) और सेवा — इन तीनों से तत्त्वदर्शी ज्ञानी गुरु ज्ञान का उपदेश देते हैं। - श्रद्धावान को ज्ञान से क्या मिलता है?
श्रद्धावान, तत्पर और संयतेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान पाता है और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त होता है। - वाङ्मय तप का विद्यार्थी-जीवन में क्या महत्त्व है?
विद्यार्थी की वाणी उद्वेग-रहित, सत्य, प्रिय और हितकर होनी चाहिए और स्वाध्याय-अभ्यास करना चाहिए — यही वाणी का तप है।
विस्तार — और गहराई से
- गीता के विषय में पाँच वाक्य लिखो।
गीता का स्थान (कुरुक्षेत्र), वक्ता-श्रोता (कृष्ण-अर्जुन), प्रसंग (कर्तव्य-विमुखता), सार (कर्तव्य-पालन) और अपने जीवन में प्रयोग — इन पाँच बिन्दुओं पर वाक्य लिखो। - “स्थितधी” पर कक्षा में परिचर्चा करो — “मम जीवनलक्ष्यम्”।
स्थितधी के गुणों को अपने जीवन-लक्ष्य से जोड़कर चर्चा करो — दुःख में धैर्य और सुख में संयम का क्या अर्थ है? - विभिन्न धर्मों के धर्मग्रन्थों के नाम लिखकर किसी एक का विवरण लिखो।
पहले कई धर्मग्रन्थों के नाम सूचीबद्ध करो, फिर किसी एक ग्रन्थ का संक्षिप्त विवरण — उसका प्रसंग और मुख्य उपदेश — लिखो। - क्रोध की शृंखला को अपने जीवन के उदाहरण से समझाओ।
कोई ऐसा प्रसंग लिखो जहाँ क्रोध से भूल हुई हो, और बताओ कि किस चरण में रुकना सम्भव था। - प्रिय वाक्य के महत्त्व पर दो वाक्य लिखो।
प्रिय वाक्य से सब जीव तुष्ट होते हैं — इस भाव को अपने शब्दों में दो वाक्यों में लिखो।
- गीता = कुरुक्षेत्र में कृष्ण का अर्जुन को कर्तव्य-उपदेश; सुगीता = सम्यक् अभ्यास + उत्तम पठन + जीवन में अनुपालन।
- आठ भाव: स्थितधी; क्रोध-शृंखला; प्रणिपात-परिप्रश्न-सेवा; श्रद्धा; प्रिय भक्त (3 श्लोक); वाङ्मय तप।
- अभ्यास-प्रकार: पूर्णवाक्य-उत्तर, कोष्ठक-पद से वाक्य, वाक्य-रचना, पाँच वाक्यों में विवरण।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

