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Deepakam • पाठ 11

Chapter 11: सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

अच्छे निमित्त के लिए त्याग श्रेष्ठ है — वीरवर की कथा, दूसरा भाग।

Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 8 • Sanskrit • Book: Deepakam

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पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में

क-भाग का स्मरण — ख-भाग क-भाग की कथा को संक्षेप में दोहराता है — वीरवर दिन-रात राजद्वार पर रक्षक के रूप में सेवा करता है। एक रात राजा के आदेश से वह किसी करुण क्रन्दन का अनुसरण करके नगर से बाहर जाता है और रोदन करती हुई एक दिव्य-आभरण-भूषित स्त्री को देखता है। पूछने पर जानता है कि वह राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी है। उसके वचन से जानता है कि शूद्रक की आयु केवल तीन दिन ही है। वह दीर्घायु का उपाय पूछता है। राजलक्ष्मी अत्यन्त दुःसाध्य उपाय बताती है — यदि वीरवर अपनी सर्वप्रिय वस्तु देवी सर्वमङ्गला को उपहार-रूप में समर्पित करे, तो राजा चिरकाल तक सौ वर्ष जिएगा और राजलक्ष्मी भी उसके साथ सुख से रहेगी। ऐसा कठिन उपाय बताकर राजलक्ष्मी वीरवर को किंकर्तव्यविमूढ़ करके अदृश्य हो जाती है। गुप्त रूप से वीरवर का अनुसरण करता हुआ राजा भी उन दोनों का संवाद सुनता है।

परिवार का निर्णय — राजपुत्र वीरवर अपने आवास पर जाकर निद्रा से अलसाई पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाता है और सम्पूर्ण राजलक्ष्मी-संवाद का वर्णन करता है। पुत्र शक्तिधर आनन्द से कहता है — हे पिता! मैं जानता हूँ कि आपकी सर्वप्रिय वस्तु क्या है। मैं ही आपका प्रियतम हूँ, यह सर्वविदित है। धन्य हूँ मैं यदि स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए मेरा विनियोग हो। फिर अब विलम्ब क्यों, तात? इस प्रकार के कर्म में राष्ट्र और राजा के हित के लिए मेरा सर्वस्व-विनियोग परम श्लाघ्य है। वह नीति-वचन भी कहता है कि धन और जीवन परार्थ (दूसरों के हित) के लिए छोड़ देने चाहिए; विनाश निश्चित होने पर अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है — यही इस पाठ का शीर्षक-भाव है। पत्नी वेदरता कहती है कि यदि हम कुल के अनुरूप आचरण न करें तो गृहीत स्वामी-वेतन से मुक्ति कैसे होगी? पुत्री वीरवती कहती है कि वह धन्य है जिसके ऐसे जनक और भ्राता हैं; फिर विलम्ब क्यों? यही गृहीत स्वामी-वेतन से मुक्ति का उपाय है। तब सब सर्वमङ्गला के आयतन (मन्दिर) गए।

त्याग और देवी का प्रसाद — वीरवर ने देवी की पूजा करके कहा — भगवति! प्रसन्न होइए, महाराज शूद्रक विजयी हों, मेरे दिए हुए इस उपहार को ग्रहण कीजिए। उसने अपने पुत्र का समर्पण किया। मन में उसने सोचा कि गृहीत स्वामी-वेतन से मुक्ति तो पुत्र-समर्पण से हो गई, परन्तु अब पुत्र-वियुक्त मेरा जीवन निष्फल है। तब उसने अपने आप को भी देवी को समर्पित कर दिया। उसके बाद उसकी पत्नी और पुत्री ने भी वही किया। राजा शूद्रक भी उन सबके इस आचरण को अदृश्य रहकर देख रहा था। तब उसने सोचा — मेरे जैसे क्षुद्र जन्तु जन्मते और मरते हैं, परन्तु इसके समान लोक में न कोई हुआ है और न होगा। ऐसे त्याग के सामने मेरे राज्य से भी क्या प्रयोजन? उसने देवी के सामने प्रकट होकर कहा — हे माता सर्वमङ्गले! मेरा सर्वस्व ग्रहण कीजिए; मुझे न राज्य चाहिए, न जीवन।

तब प्रत्यक्ष हुई भगवती सर्वमङ्गला ने राजा का हाथ पकड़कर कहा — वत्स! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, साहस बस करो। अब तुम्हारे राज्य का भङ्ग नहीं होगा। राजा ने साष्टाङ्ग प्रणाम करके कहा — भगवति! मुझे राज्य या जीवन का प्रयोजन नहीं है। यदि मुझ पर भगवती की कृपा हुई है, तो मेरी आयु के शेष भाग से भी राजपुत्र वीरवर अपने पुत्र, पत्नी और पुत्री सहित लौट आए; अन्यथा मुझे जैसी गति प्राप्त हो, वैसी ही गति से जाऊँगा, हे जगदम्बा! देवी ने कहा — वत्स! तुम्हारे इस सत्त्वोत्कर्ष और भृत्य-वात्सल्य से मैं परम प्रीत हूँ। इसलिए जाओ, विजयी होओ। यह सपरिवार राजपुत्र आदर्श-चरित्र वाला वीरवर भी जययुक्त हो। तब देवी अदर्शन को चली गईं। वीरवर सपरिवार आनन्द से अपने घर गया। राजा भी सबके अदृश्य ही अपने प्रासाद में प्रविष्ट हुआ। अगले दिन वीरवर फिर द्वार पर सेवा में निरत हुआ। राजा ने पूछा — क्या वार्ता है, राजपुत्र! वीरवर ने कहा — देव! वह रोदन करती नारी मेरे दर्शन से अदृश्य हो गई। स्वामिन्! अन्य कोई वार्ता नहीं है। तब परम प्रीति को प्राप्त राजा ने उसे पुरस्कार दिया।

Labelled diagram for सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): लकड़ी के पुल से बुजुर्ग को नदी पार कराता यात्री। मदद और त्याग की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

Illustration for सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

बारिश में एक छाता साझा करके साथ चलते मित्र। साथ और त्याग की सामान्य तस्वीर।

मुख्य शब्द — शब्दार्थ

शब्दअर्थ
किंकर्तव्यविमूढ़ःक्या करें, यह न जानने वाला
परार्थेदूसरों के हित के लिए
सन्निमित्ते वरं त्यागःअच्छे निमित्त के लिए त्याग श्रेष्ठ है
विनियोगःउपयोग, समर्पण
श्लाघ्यःप्रशंसनीय
आयतनम्मन्दिर, देवस्थान
पुत्रवियुक्तःपुत्र से वियुक्त
सत्त्वोत्कर्षःसत्त्व (साहस/चरित्र) की उत्कृष्टता
भृत्यवात्सल्यम्सेवक के प्रति स्नेह
अदृश्यःदिखाई न देने वाला, छिपा हुआ

व्याकरण और अभ्यास-प्रकार — इस पाठ से

सन्धियुक्त पद से रिक्त स्थान: पाठ के पदों को आधार बनाकर उदाहरण के अनुसार सन्धियुक्त पदों से रिक्त स्थान भरो। पहले उदाहरण की सन्धि पहचानो, फिर उसी नियम से नया पद बनाओ।

सन्धि-विच्छेद: दिए गए पदों का सन्धि-विच्छेद करो। पद को दो सार्थक भागों में तोड़ो और सन्धि का नाम लिखो — जैसे स्वर-सन्धि में दो स्वरों का मेल होता है।

सकर्मक-अकर्मक धातु: पाठ में अकर्मक धातु का लक्षण दिया गया है — जिस धातु के व्यापार का फल कर्ता में ही रहता है और कर्म की आवश्यकता नहीं होती, वह अकर्मक है। इसके विपरीत सकर्मक धातु को कर्म चाहिए। वाक्य पढ़कर पहले कर्म खोजो — कर्म मिले तो सकर्मक, न मिले तो अकर्मक।

परीक्षा टिपख-भाग के उत्तर में तीन त्यागों का क्रम सही रखो — पहले पुत्र, फिर वीरवर स्वयं, फिर पत्नी और पुत्री। अन्त में राजा का आत्म-समर्पण और देवी का प्रसाद लिखो।
सामान्य गलतीयह समझ लेना कि वीरवर ने केवल पुत्र का त्याग किया। पाठ में पूरा परिवार क्रम से समर्पित होता है और राजा भी अपना सर्वस्व देने को तैयार होता है — तभी देवी प्रसन्न होती हैं।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. शक्तिधर ने क्या कहा?
    संकेत: सर्वप्रिय वस्तु और स्वामी-जीवन-रक्षा की बात सोचो।
  2. पत्नी और पुत्री ने क्या तर्क दिया?
    संकेत: कुल के अनुरूप आचरण और स्वामी-वेतन से मुक्ति की बात सोचो।
  3. वीरवर ने मन्दिर में क्या किया?
    संकेत: पूजा, उपहार-ग्रहण की प्रार्थना और समर्पण का क्रम सोचो।
  4. एक पद का सन्धि-विच्छेद करो।
    संकेत: पद को दो सार्थक भागों में तोड़ो।
  5. सकर्मक और अकर्मक में अन्तर एक उदाहरण से समझाओ।
    संकेत: वाक्य में कर्म खोजो — मिले तो सकर्मक, न मिले तो अकर्मक।

प्रश्न और उत्तर

  1. ख-भाग की शुरुआत में क्या दोहराया गया है?
    क-भाग का सार दोहराया गया है — द्वार-सेवा, आधी रात का रोदन, राजलक्ष्मी का दर्शन, तीन दिन की आयु और दुःसाध्य उपाय।
  2. शक्तिधर ने त्याग के लिए क्या तर्क दिया?
    उसने कहा कि वह पिता की सर्वप्रिय वस्तु है; स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए उसका विनियोग धन्य है; राष्ट्र और राजा के हित में सर्वस्व-विनियोग परम श्लाघ्य है।
  3. “सन्निमित्ते वरं त्यागः” का अर्थ क्या है?
    विनाश निश्चित होने पर अच्छे निमित्त के लिए त्याग ही श्रेष्ठ है। धन और जीवन परार्थ के लिए छोड़ देने चाहिए — यही शीर्षक का भाव है।
  4. देवी क्यों प्रसन्न हुईं?
    पूरे परिवार के क्रमिक त्याग और राजा के सत्त्वोत्कर्ष तथा भृत्य-वात्सल्य से देवी परम प्रीत हुईं।
  5. अन्त में क्या हुआ?
    देवी के प्रसाद से वीरवर सपरिवार लौट आया, राजा का राज्य-भङ्ग टल गया और अगले दिन वीरवर फिर द्वार पर सेवा में लगा; राजा ने प्रसन्न होकर उसे पुरस्कार दिया।

विस्तार — और गहराई से

  1. राजा के चरित्र का परिवर्तन समझाओ।
    पहले राजा ने वीरवर को लौटा दिया था; अन्त में वह वीरवर के लिए अपना सर्वस्व देने को तैयार है — यही भृत्य-वात्सल्य का विकास है।
  2. सन्धियुक्त पदों से दो रिक्त स्थान भरो।
    पाठ के उदाहरण का ढाँचा देखकर सन्धि-नियम से नए पद बनाओ और वाक्य में रखो।
  3. एक वाक्य में सकर्मक-अकर्मक की पहचान करो।
    वाक्य की क्रिया पढ़ो, कर्म खोजो और लक्षण के अनुसार भेद बताओ।
  4. परिवार के प्रत्येक सदस्य का एक-एक वाक्य में योगदान लिखो।
    शक्तिधर का स्वयं-समर्पण, वेदरता का कुल-तर्क, वीरवती का अनुमोदन और वीरवर का नेतृत्व — चार वाक्य लिखो।
  5. “परार्थे त्याग” पर अपने जीवन का एक उदाहरण लिखो।
    कोई ऐसा प्रसंग लिखो जहाँ तुमने दूसरों के हित के लिए अपनी कोई प्रिय वस्तु या समय दिया हो।
पुनरावलोकन — Recap
  • ख-भाग: परिवार का निर्णय → मन्दिर में क्रमिक त्याग → राजा का आत्म-समर्पण → देवी का प्रसाद → सपरिवार वापसी।
  • नीति: धन और जीवन परार्थ के लिए; विनाश निश्चित हो तो सन्निमित्त त्याग श्रेष्ठ है।
  • व्याकरण: सन्धियुक्त पद से रिक्त स्थान, सन्धि-विच्छेद, सकर्मक-अकर्मक धातु-लक्षण।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।