Chapter 7: ईशावास्यम् इदं सर्वम्
Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 7 • Sanskrit • Book: Deepakam — Part 2
प्रह्लाद का नाटक — ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं, सर्वत्र है; स्तम्भ से नरसिंह
ईशावास्यम् इदं सर्वम् — EG के अपने शब्दों में सार
Book: Deepakam — Part 2 (CBSE, Class 7) | Chapter 7 | Medium: Sanskrit (सरल Hindi व्याख्या सहित)

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): प्रकृति को निहारता बालक। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर है, पुस्तक का दृश्य नहीं।

पक्षियों और पौधों की देखभाल करते बच्चे। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर।
शीर्षक का अर्थ और पाठ का आरम्भ
शीर्षक का अर्थ है — ‘यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है।’ पाठ की शुरुआत में एक बालक कहता है कि ईश्वर देवालय (मन्दिर) में होता है। आचार्या पूछती हैं — क्या ईश्वर वृक्ष में, कक्षा में, शिला में, क्रीडाङ्गण में भी नहीं है? फिर वे ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ समझाती हैं — यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है, ईश्वर सर्वत्र है। इसके बाद वे एक छोटे बालक प्रह्लाद का प्रसङ्ग सुनाती हैं, जिसने ‘ईश्वर सर्वत्र है’ — यह बात स्वयं दिखा दी थी। फिर कक्षा में उसी प्रसङ्ग का अभिनय-सहित नाटक किया जाता है।
नाटक की कथा — क्रम से
- दैत्यराज हिरण्यकशिपु की सभा लगती है। वह अट्टहास करके कहता है — ‘मैं ही सर्वशक्तिमान् हूँ, मैं अमर हूँ।’ मन्त्री और पुरोहित कहते हैं कि सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर — सब उससे भयभीत हैं और देश में केवल उसी की पूजा होती है।
- परन्तु मन्त्री चुप हो जाता है — क्योंकि एक अपवाद है। हिरण्यकशिपु समझ जाता है: उसका पुत्र प्रह्लाद ही उसका शत्रु है — ‘कुलकलङ्क’ प्रह्लाद अहर्निश (दिन-रात) उसके शत्रु हरि का गुणगान करता है।
- प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयत्न होते हैं — होलिका के साथ अग्नि का प्रसङ्ग (नारायण की कृपा से प्रह्लाद रक्षित होता है), समुद्र में फेंकना, गज के पददलन (पैरों से कुचलना) का प्रयत्न, पर्वत से गिराना — परन्तु प्रह्लाद हर बार जीवित रहता है।
- अन्त में हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से पूछता है — ‘क्या तेरा हरि यहाँ है? वहाँ है? सोपानों (सीढ़ियों) पर है? अथवा इस स्तम्भ में है?’ प्रह्लाद उत्तर देता है — ‘हरि सर्वत्र है, इस स्तम्भ में भी है।’
- क्रोधित हिरण्यकशिपु खड्ग से स्तम्भ पर प्रहार करता है। महान् गर्जन के साथ स्तम्भ से नरसिंह (नर-सिंह रूप) बाहर आते हैं और हिरण्यकशिपु का वध करके प्रह्लाद की रक्षा करते हैं।
पाठ के विस्तार में बताया गया है कि यह घटना नरसिंहपुराण और श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित है, और उस प्रसङ्ग से जुड़ा विशाल स्तम्भ आज भी प्रसिद्ध है।
व्याकरण — तृतीया विभक्ति और ‘सह’
अभ्यास में तृतीया रूपों से रिक्त स्थान भरने हैं। नियम: ‘सह’ (साथ) के योग में भी तृतीया आती है — जैसे ‘बालिकाः शिक्षिकया सह चर्चां कुर्वन्ति’ (बालिकाएँ शिक्षिका के साथ चर्चा करती हैं)। और साधन/करण के लिए भी तृतीया — जैसे ‘हिरण्यकशिपुः खड्गेन स्तम्भं भञ्जयति’ (हिरण्यकशिपु खड्ग से स्तम्भ तोड़ता है)।
मुख्य शब्द
- ईशावास्यम् — ईश्वर से व्याप्त, ईश से आच्छादित।
- सर्वम् — सब कुछ, सम्पूर्ण।
- देवालयः — मन्दिर, देवता का घर।
- दैत्यराजः — दैत्यों का राजा (यहाँ हिरण्यकशिपु)।
- अहर्निशम् — दिन-रात, निरन्तर।
- स्तम्भः — खम्भा।
- खड्गः — तलवार।
- नरसिंहः — नर-सिंह रूप (विष्णु का अवतार)।
- सोपानम् — सीढ़ी।
- पददलनम् — पैरों से कुचलना।
‘ईश्वर केवल मन्दिर में है’ — यही वह भूल है जिसे पाठ सुधारता है। उत्तर में सर्वत्रता का प्रमाण दो — वृक्ष, कक्षा, शिला, क्रीडाङ्गण और स्तम्भ का उदाहरण।
- शीर्षक: यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है।
- हिरण्यकशिपु: अहंकारी दैत्यराज — ‘मैं ही सर्वशक्तिमान्, मैं अमर’।
- प्रह्लाद: अहर्निश हरि-गुणगान; अग्नि, समुद्र, गज, पर्वत — सब प्रयत्न विफल।
- स्तम्भ-प्रसङ्ग: ‘हरि इस स्तम्भ में भी है’ → खड्ग-प्रहार → नरसिंह प्रकट → रक्षा।
- तृतीया: खड्गेन (साधन), शिक्षिकया सह (साथ)।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- ईशावास्यम् इदं सर्वम् का भाव क्या है?
Hint: ईश्वर और सब कुछ के संबंध से सोचो। - सबमें एक शक्ति मानने से क्या भाव जागता है?
Hint: आदर की बात सोचो। - लोभ से क्या हानि होती है?
Hint: मन की अशान्ति से सोचो। - सन्तोष किसे कहते हैं?
Hint: जो मिला है उसी में तृप्ति से सोचो। - इस विचार से प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
Hint: पेड़ और पशुओं के प्रति आदर से सोचो।
प्रश्न और उत्तर
- ईशावास्यम् इदं सर्वम् का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है — यह सब कुछ ईश्वर से व्याप्त है। संसार की हर वस्तु और हर प्राणी में एक ही दिव्य शक्ति का वास है। - इस भाव से सबके प्रति आदर क्यों जागता है?
क्योंकि जब हम मानते हैं कि सबमें एक ही शक्ति है, तो कोई छोटा-बड़ा नहीं रहता। हर प्राणी का अपना मूल्य है, इसलिए सबके प्रति आदर जागता है। - इस विचार से सन्तोष की क्या सीख मिलती है?
सीख यह है कि जो कुछ मिला है, उसी में सन्तोष रखो और दूसरों की वस्तु का लोभ न करो। लोभ मन को अशान्त करता है, सन्तोष शान्ति देता है। - लोभ से क्यों बचना चाहिए?
लोभ से मन कभी तृप्त नहीं होता, ईर्ष्या बढ़ती है और मन अशान्त हो जाता है। सन्तोषी व्यक्ति शान्त और प्रसन्न रहता है। - इस पाठ से क्या सीख मिलती है?
इस पाठ से सीख मिलती है कि सबका आदर करो, किसी को हानि न पहुँचाओ और लोभ छोड़कर सन्तोष से जीवन जियो।
अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — NCERT अभ्यास के प्रकारों पर
- दैत्यराजः कः?
दैत्यराज हिरण्यकशिपु है। - के हिरण्यकशिपुं ध्यायन्ति और के भीताः तिष्ठन्ति?
सब लोग उसी का ध्यान करते हैं; सुर, असुर, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर — सब उससे भयभीत रहते हैं। - प्रह्लादः अहर्निशं किं करोति?
प्रह्लाद अहर्निश (दिन-रात) हरि का गुणगान करता है — इसीलिए हिरण्यकशिपु उसे अपना शत्रु मानता है। - प्रह्लादं मारने के कौन-कौन से प्रयत्न हुए?
होलिका के साथ अग्नि का प्रसङ्ग, समुद्र में फेंकना, गज के पददलन का प्रयत्न और पर्वत से गिराना — परन्तु नारायण की कृपा से प्रह्लाद हर बार रक्षित हुआ। - कस्य दलनेन अपि सः जीवति?
गज के पददलन (पैरों से कुचलने) पर भी प्रह्लाद जीवित रहता है। - हिरण्यकशिपुः केन स्तम्भं भङ्क्ष्यामि इति वदति?
हिरण्यकशिपु खड्ग से स्तम्भ तोड़ने को कहता है — ‘अनेन खड्गेन स्तम्भं भङ्क्ष्यामि’। - नरसिंहः कथं बहिः आगच्छति?
हिरण्यकशिपु के खड्ग-प्रहार पर महान् गर्जन के साथ नरसिंह स्तम्भ से बाहर आते हैं। - हरिः कुत्र अस्ति इति कः वदति?
‘हरि सर्वत्र है, इस स्तम्भ में भी है’ — यह प्रह्लाद कहता है। - ‘बालिकाः (शिक्षिका) सह चर्चां कुर्वन्ति’ — रिक्त स्थान में सही रूप लिखो।
‘बालिकाः शिक्षिकया सह चर्चां कुर्वन्ति’ — ‘सह’ के योग में तृतीया आती है, इसलिए ‘शिक्षिकया’ होगा।
परियोजना / कक्षा-कार्य: कक्षा के सब छात्र मिलकर इस नाटक का अभिनय करो; ‘ईश्वर सर्वत्र है’ — इस भाव पर अपनी मातृभाषा में पाँच पंक्तियाँ लिखो।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, तालिकाएँ बिना देखे दोहराओ, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

