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Chapter 5: सेवा हि परमो धर्मः

Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 7 • Sanskrit • Book: Deepakam — Part 2

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Deepakam — Part 2 • Chapter 5

नागार्जुन की परीक्षा — औषध बनाने वाला नहीं, रोगी की सेवा करने वाला चुना गया

सेवा हि परमो धर्मः — EG के अपने शब्दों में सार

Book: Deepakam — Part 2 (CBSE, Class 7)  |  Chapter 5  |  Medium: Sanskrit (सरल Hindi व्याख्या सहित)

Labelled diagram for सेवा हि परमो धर्मः

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): वृद्धों की सेवा करते बच्चे। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर है, पुस्तक का दृश्य नहीं।

Illustration for सेवा हि परमो धर्मः

वृद्ध की सहायता करता बच्चा। पाठ के विषय की सामान्य तस्वीर।

पाठ का आरम्भ — सफलता के लिए क्या चाहिए?

कक्षा में चर्चा होती है — जीवन में सफलता के लिए मनुष्य क्या-क्या अर्जित करे? बच्चे कहते हैं — विद्या, उपाधि (डिग्री), पदवी (पद), धन। आचार्य कहते हैं — ये सब आवश्यक हैं, परन्तु मानवीय गुण भी आवश्यक हैं। जैसे सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन और पद सब कुछ था, किन्तु मानवीय गुणों से ही वे महात्मा बुद्ध बने। मानवीय गुण हैं — सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार, अक्रोध (क्रोध न करना) आदि। आज इन्हीं गुणों से सम्बन्धित एक कथा पढ़ेंगे।

नागार्जुन की कथा — क्रम से

  1. नागार्जुन प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ और चिकित्सक थे। वे अहोरात्र (दिन-रात) प्रयोगशाला में कार्य करते थे।
  2. एक दिन उन्होंने महाराज से निवेदन किया — ‘मेरे चिकित्सा-कार्य के लिए एक सहायक चाहिए।’ राजा ने कहा — ‘कल कुछ योग्य युवक आएँगे; परीक्षा करके किसी एक योग्य को चुन लेना।’
  3. अगले दिन दो युवक आए। दोनों का विद्याभ्यास-विषय समान था। नागार्जुन ने दोनों से एक विशेष रसायन (औषध) बनाकर आने को कहा और दो दिन का समय दिया। जाते समय यह भी कहा — ‘राजमार्ग से जाना।’
  4. दो दिन बाद पहला युवक आया। उसने बताया — पिता को उदरवेदना थी, माता को ज्वर था, फिर भी वह सब छोड़कर औषध बनाकर लाया है। वह अपनी निष्ठा दिखाना चाहता था।
  5. दूसरा युवक खिन्न (दुःखी) आया। उसने कहा — ‘मैं औषध नहीं बना सका। राजमार्ग में मुझे एक रोगी मिला, उसकी परिस्थिति शोचनीय थी। मैं उसे अपने घर ले गया और दो दिन उसी की सेवा में लगा रहा। आज प्रातः वह स्वस्थ हुआ, और मैं सीधे यहाँ आया हूँ। औषध बनाने का समय ही नहीं मिला।’
  6. नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक के रूप में चुन लिया। राजा ने आश्चर्य से पूछा — ‘पहले ने औषध बनाई, दूसरे ने नहीं, फिर भी तुमने दूसरे को क्यों चुना?’
  7. नागार्जुन ने उत्तर दिया — ‘दूसरा भी औषध बनाने में कुशल है, परन्तु उसे समय नहीं मिला, क्योंकि वह सेवा में लगा था। उस रोगी को मैंने पहले ही मार्ग में देखा था, इसलिए मैंने ‘राजमार्ग से जाना’ कहा था — यह परीक्षा थी। पहला रोगी को देखकर भी आगे बढ़ गया; वह यन्त्रवत् कार्य करता है, उसमें सेवा-भावना नहीं है। सेवा-भावना के बिना चिकित्सक कैसे बनेगा? इसलिए मैंने दूसरे का चयन किया।’
पाठ का शीर्षक क्यों?

‘सेवा हि परमो धर्मः’ — सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। कथा यही सिद्ध करती है: कार्य-कुशलता से बड़ी सेवा-भावना है। चिकित्सक का पहला गुण सेवा ही है।

व्याकरण — क्तवतु प्रत्यय (भूतकाल)

कथा में भूतकाल के लिए क्तवतु-प्रत्यय वाले रूप आते हैं — ‘पठितवान्’ (उसने पढ़ा, पुल्लिङ्ग), ‘पठितवती’ (उसने पढ़ी, स्त्रीलिङ्ग)। अभ्यास में पुंलिङ्ग रूपों से स्त्रीलिङ्ग रूप और लट् (वर्तमान) से भूतकाल में परिवर्तन करना है।

धातु-अर्थपुल्लिङ्ग एकवचनस्त्रीलिङ्ग एकवचनबहुवचन (पुं / स्त्री)
पठ् (पढ़ना)पठितवान्पठितवतीपठितवन्तः / पठितवत्यः
कृ (करना)कृतवान्कृतवतीकृतवन्तः / कृतवत्यः
दृश् (देखना)दृष्टवान्दृष्टवतीदृष्टवन्तः / दृष्टवत्यः
दा (देना)दत्तवान्दत्तवतीदत्तवन्तः / दत्तवत्यः

परिवर्तन का उदाहरण: ‘पिता कषायं पीतवान्’ (पिता ने काढ़ा पिया) → वर्तमान में ‘पिता कषायं पिबति’ (पिता काढ़ा पीता है)।

मुख्य शब्द

  • सेवा — दूसरों की भलाई के लिए किया गया निःस्वार्थ काम।
  • परमः — सबसे बड़ा, सर्वोच्च।
  • मानवीयाः गुणाः — मनुष्य में होने वाले गुण — सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार, अक्रोध।
  • उपाधिः — डिग्री, नामचिह्न।
  • पदवी — पद, पदनाम।
  • रसायनशास्त्रज्ञः — औषध-शास्त्र जानने वाला, रसायनज्ञ।
  • अहोरात्रम् — दिन-रात।
  • रुग्णः / रोगी — बीमार व्यक्ति।
  • शोचनीयः — दयनीय, बुरी दशा वाला।
  • यन्त्रवत् — मशीन की तरह, भावना के बिना।
सामान्य गलती

‘पहले युवक ने औषध बनाई, इसलिए वही योग्य था’ — यह उत्तर गलत है। नागार्जुन का निर्णय सेवा-भावना पर आधारित था, औषध पर नहीं। उत्तर में परीक्षा का रहस्य (राजमार्ग वाला निर्देश) अवश्य लिखो।

Recap — एक नज़र में
  • मानवीय गुण: सत्य, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार, अक्रोध।
  • नागार्जुन: प्रसिद्ध चिकित्सक; सहायक के लिए परीक्षा।
  • पहला युवक: माता-पिता की बीमारी छोड़कर भी औषध बनाई — पर सेवा-भावना नहीं।
  • दूसरा युवक: दो दिन रोगी की सेवा की, औषध न बना सका — वही चुना गया।
  • रहस्य: ‘राजमार्गेण गन्तव्यम्’ निर्देश ही परीक्षा थी।
  • क्तवतु: पठितवान् (पुं) / पठितवती (स्त्री)।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. सेवा किसे कहते हैं?
    Hint: निःस्वार्थ सहायता की बात सोचो।
  2. सेवा को परम धर्म क्यों कहा गया है?
    Hint: सबसे बड़े कर्तव्य की बात सोचो।
  3. सेवा के तीन रूप बताओ।
    Hint: भोजन, जल, शिक्षा या देखभाल में से चुनो।
  4. एक विद्यार्थी सेवा कैसे कर सकता है?
    Hint: विद्यालय या घर का उदाहरण दो।
  5. सेवा से मन को क्या लाभ होता है?
    Hint: शान्ति और सन्तोष की बात सोचो।

प्रश्न और उत्तर

  1. सेवा हि परमो धर्मः का अर्थ क्या है?
    इसका अर्थ है — सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। दूसरों की भलाई के लिए निःस्वार्थ काम करना ही सच्चा धर्म है।
  2. धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ क्यों नहीं है?
    क्योंकि धर्म का अर्थ सही आचरण और कर्तव्य भी है। दूसरों की सहायता करना, सच बोलना और ईमानदारी से रहना भी धर्म के ही रूप हैं।
  3. सेवा के कुछ रूप बताओ।
    बीमार की देखभाल करना, भूखे को भोजन देना, प्यासे को जल देना, किसी को पढ़ाना और वृद्धों की सहायता करना — ये सब सेवा के रूप हैं।
  4. सेवा से समाज और मन को क्या लाभ होता है?
    सेवा से समाज मज़बूत होता है, लोगों में प्रेम बढ़ता है, और सेवा करने वाले के मन को शान्ति और सन्तोष मिलता है।
  5. एक विद्यार्थी सेवा का अभ्यास कैसे करे?
    एक विद्यार्थी अपने साथियों को पढ़ाकर, छोटे बच्चों की सहायता करके, सफाई में हाथ बँटाकर और बड़ों की सेवा करके सेवा का अभ्यास कर सकता है।

अतिरिक्त प्रश्न और उत्तर — NCERT अभ्यास के प्रकारों पर

  1. कः प्रसिद्धः चिकित्सकः आसीत् और सः कुत्र कार्यं करोति स्म?
    नागार्जुन प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ और चिकित्सक थे; वे अहोरात्र प्रयोगशाला में कार्य करते थे।
  2. नागार्जुनः महाराजं किं निवेदितवान्?
    नागार्जुन ने महाराज से निवेदन किया कि उनके चिकित्सा-कार्य के लिए एक सहायक चाहिए।
  3. अन्यस्मिन् दिवसे कौ आगतौ और नागार्जुन ने उन्हें क्या करने को कहा?
    अगले दिन दो युवक आए। नागार्जुन ने उनसे एक विशेष रसायन बनाकर आने को कहा, दो दिन का समय दिया और राजमार्ग से जाने को कहा।
  4. प्रथमः युवकः कथं कार्यं कृतवान्?
    पहले युवक ने बताया कि पिता को उदरवेदना और माता को ज्वर था, फिर भी वह सब छोड़कर औषध बनाकर लाया है — वह अपनी निष्ठा दिखाना चाहता था।
  5. द्वितीयः युवकः राजमार्गे रोगिणं दृष्ट्वा किं कृतवान्?
    दूसरे युवक ने रोगी को अपने घर ले जाकर दो दिन उसी की सेवा की; रोगी के स्वस्थ होने पर वह सीधे नागार्जुन के पास आया, इसलिए औषध बनाने का समय नहीं मिला।
  6. नागार्जुनः सहायकरूपेण कं चितवान् और क्यों?
    नागार्जुन ने दूसरे युवक को चुना, क्योंकि उसमें सेवा-भावना थी। पहला रोगी को देखकर भी आगे बढ़ गया था और यन्त्रवत् कार्य करता था।
  7. ‘राजमार्गेण गन्तव्यम्’ निर्देश का रहस्य क्या था?
    नागार्जुन ने उस रोगी को पहले ही मार्ग में देखा था; ‘राजमार्ग से जाना’ कहना ही परीक्षा थी — कौन रोगी की सेवा करता है, कौन आगे बढ़ जाता है।
  8. सेवायाः भावनां विना किं न भवेत्?
    सेवा की भावना के बिना (सच्चा) चिकित्सक नहीं बना जा सकता — यही नागार्जुन का उत्तर था।
  9. ‘दृष्टवती’ का पुल्लिङ्ग रूप क्या होगा?
    ‘दृष्टवती’ (स्त्रीलिङ्ग) का पुल्लिङ्ग रूप ‘दृष्टवान्’ होगा।

परियोजना / कक्षा-कार्य: अपने आस-पास किसी एक व्यक्ति की सेवा का एक छोटा कार्य करो और उसे संस्कृत के दो-तीन वाक्यों में लिखो; ‘पठितवान्/पठितवती’ जैसे पाँच क्तवतु रूपों की सूची बनाओ।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, तालिकाएँ बिना देखे दोहराओ, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

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