अध्याय 9: चिड़िया
Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 7 • Hindi • Book: Malhar
पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया मानव को प्रेम-प्रीति की रीति और मुक्ति का मंत्र सिखलाती है — पक्षी लोभ के बिना, मिल-जुलकर, निर्भय जीते हैं।
चिड़िया — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Malhar (CBSE, कक्षा 7) | अध्याय 9 | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): सुबह पेड़ पर चहचहाती चिड़ियाँ। पाठ के भाव की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

चिड़ियों को दाना-पानी देता बच्चा। दया की सामान्य तस्वीर।
पाठ के बारे में
कविता पीपल की ऊँची डाली पर बैठी चिड़िया के गाने से शुरू होती है। कवि पूछते हैं — क्या तुम्हें ज्ञात है कि वह अपनी बोली में क्या संदेश सुनाती है? चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीति हमें सिखलाती है और जग के बंदी मानव को मुक्ति का मंत्र बतलाती है। वह घड़ी भर बैठकर, हमें चकित करके, गाकर फिर उड़ जाती है।
वन में जितने पक्षी हैं — खंजन, कपोत, चातक, कोकिल, काक, हंस, शुक आदि — वे सब आपस में हिल-मिलकर वास करते हैं। सब मिल-जुलकर रहते हैं, सब मिल-जुलकर खाते हैं; आसमान ही उनका घर है, जहाँ चाहते हैं, जाते हैं। रहते जहाँ हैं, वहाँ वे अपनी दुनिया एक बसाते हैं; दिन भर काम करते हैं और रात में पेड़ों पर सो जाते हैं।
पक्षियों के मन में लोभ नहीं है, पाप नहीं है, परवाह नहीं है; जग का सारा माल हड़पकर जाने की भी चाह नहीं है। जो मिलता है अपने श्रम से, उतना भर ले लेते हैं; जो बच जाता है, औरों के हित के लिए उसे छोड़ देते हैं। सीमा-हीन गगन में उड़ते हैं, निर्भय विचरण करते हैं; दूसरों की कमाई से अपना घर नहीं भरते।
अंत में पक्षी मानव से कहते हैं — मानव, सीखो तुम हमसे जीना जग में! हम स्वच्छंद हैं, और तुमने क्यों अपने पैर में बेड़ी डाल ली है? तुम हमें देखो, फिर अपनी सोने की कड़ियाँ तोड़ो; ओ मानव, तुम मानवता से द्रोह-भावना को छोड़ो! अर्थात मानव ने स्वयं को सोने की कड़ियों (धन और लोभ के बंधनों) में जकड़ लिया है, जबकि पक्षी स्वतंत्र और संतुष्ट जीवन जीते हैं।
कवि आरसी प्रसाद सिंह प्रकृति और जीवन-संघर्ष को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से चित्रित करने वाले कवि हैं। वे अपनी रचनाओं में प्रेम, करुणा, त्याग-बलिदान, मुक्ति और मिल-जुलकर एक सुंदर संसार रचने की कल्पना करते रहे हैं। उनके चर्चित कविता-संग्रह ‘कलापी’ और ‘आरसी’ हैं।
चिड़िया का संदेश — क्रम से
- पीपल की डाली पर चिड़िया का गाना — प्रेम-प्रीति की रीति और मुक्ति का मंत्र।
- वन के सभी पक्षी हिल-मिलकर रहते हैं, मिल-जुलकर खाते हैं।
- आसमान ही उनका घर है; दिन भर काम, रात में पेड़ों पर विश्राम।
- मन में लोभ नहीं, पाप नहीं; श्रम से जितना मिले, उतना ही लेते हैं।
- बचा हुआ औरों के हित के लिए छोड़ देते हैं; निर्भय विचरण करते हैं।
- मानव को संदेश: सोने की कड़ियाँ तोड़ो, मानवता से द्रोह छोड़ो, स्वच्छंद जियो।
मुख्य शब्द
- प्रीति — प्रेम, स्नेह।
- मुक्ति-मंत्र — स्वतंत्रता का संदेश।
- स्वच्छंद — स्वतंत्र, बिना बंधन के।
- बेड़ी — पैर में डालने वाली ज़ंजीर; यहाँ लोभ और बंधन का प्रतीक।
- सोने की कड़ियाँ — धन और लोभ के चमकीले बंधन।
- निर्भय विचरण — बिना डर के घूमना-फिरना।
- क्रिया — वह शब्द जिससे कार्य करने या होने का बोध हो (जैसे गाती, सुनाती)।
याद रखें
- कवि: आरसी प्रसाद सिंह (1911–1996); संग्रह: ‘कलापी’ और ‘आरसी’।
- चिड़िया पीपल की ऊँची डाली पर बैठकर गाती है।
- पक्षी: खंजन, कपोत, चातक, कोकिल, काक, हंस, शुक — सब हिल-मिलकर रहते हैं।
- पक्षियों में लोभ नहीं; श्रम से जितना मिले, उतना ही लेते हैं; बचा हुआ औरों के लिए छोड़ देते हैं।
- संदेश: सोने की कड़ियाँ तोड़ो; मानवता से द्रोह-भावना छोड़ो।
- भाषा-बिंदु: क्रिया शब्दों की पहचान और उनसे नए वाक्य बनाना।
तालिका: पक्षियों का जीवन बनाम मानव का बंधन
| विषय | विवरण | विवरण |
|---|---|---|
| रहना | सब हिल-मिलकर, एक दुनिया बसाकर | अकेलेपन और बँटवारे में |
| खाना | मिल-जुलकर; श्रम से जितना मिले, उतना ही | जग का सारा माल हड़पने की चाह |
| घर | आसमान ही घर; जहाँ चाहें, जाएँ | सोने की कड़ियों में बँधा |
| मन | लोभ नहीं, पाप नहीं, परवाह नहीं | लोभ और द्रोह-भावना |
| गति | सीमा-हीन गगन में निर्भय विचरण | पैर में बेड़ी |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- चिड़िया अपनी बोली में क्या संदेश सुनाती है?
संकेत: प्रेम-प्रीति और मुक्ति-मंत्र की बात को याद करो। - वन के पक्षी कैसे रहते और खाते हैं? उदाहरण सहित लिखो।
संकेत: मिल-जुलकर रहने और खाने वाली पंक्तियों को याद करो। - पक्षियों के मन में क्या-क्या नहीं है?
संकेत: लोभ, पाप, परवाह और हड़पने की चाह — चारों को लिखो। - ‘हम स्वच्छंद और क्यों तुमने डाली है बेड़ी पग में?’ — इस पंक्ति का अर्थ समझाओ।
संकेत: पक्षियों की स्वतंत्रता और मानव के बंधनों की तुलना करो। - यदि तुम चिड़िया की भाषा समझ सकते तो उससे क्या बातें करते? लिखो।
संकेत: अपनी कल्पना से संवाद बनाओ — स्वतंत्रता, घर और भोजन के बारे में पूछो।
प्रश्न और उत्तर
- कविता के आधार पर बताओ कि इनमें से कौन-सा गुण पक्षियों के जीवन में नहीं पाया जाता है?
पक्षियों के जीवन में लोभ और पाप नहीं पाया जाता है। उनमें प्रेम-प्रीति, मिल-जुलकर रहना और निर्भय विचरण — ये तीनों गुण पाए जाते हैं; लोभ और पाप ही वह गुण है जो उनमें नहीं है। - ‘सब मिल-जुलकर रहते हैं वे, सब मिल-जुलकर खाते हैं’ — यह पंक्ति किन भावों की ओर संकेत करती है?
यह पंक्ति समानता और एकता की ओर संकेत करती है। यह असमानता और विभाजन, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष, या स्वार्थ और ईर्ष्या की ओर संकेत नहीं करती। - ‘वे कहते हैं, मानव! सीखो, तुम हमसे जीना जग में’ — कविता में पक्षी मनुष्य से कैसा जीवन जीने के लिए कहते हैं?
पक्षी मनुष्य से स्वच्छंद (स्वतंत्र) जीवन जीने के लिए कहते हैं। वे आकाश में उड़ते रहने, बंधन में रहने या संचय करने के लिए नहीं कहते — बल्कि लोभ के बंधनों से मुक्त होकर जीने के लिए कहते हैं। - ‘जो मिलता है, अपने श्रम से उतना भर ले लेते हैं’ — पक्षी अपनी आवश्यकता भर ही संचय करते हैं। मनुष्य का स्वभाव इससे भिन्न कैसे है?
मनुष्य का स्वभाव इससे भिन्न है, क्योंकि मनुष्य जग का सारा माल हड़पकर जाने की चाह रखता है — वह आवश्यकता से अधिक संचय करता है और दूसरों की कमाई से भी अपना घर भरना चाहता है। पक्षी श्रम से जितना मिलता है, उतने में संतुष्ट रहते हैं और बचा हुआ औरों के हित के लिए छोड़ देते हैं। - कविता का मुख्य संदेश क्या है?
संदेश यह है कि प्रेम-प्रीति, मिल-जुलकर रहना, श्रम से संतोष और निर्भयता ही सच्चा जीवन है। मानव को धन और लोभ की सोने की कड़ियाँ तोड़कर, मानवता से द्रोह-भावना छोड़कर, पक्षियों की तरह स्वतंत्र और संतुष्ट जीवन जीना चाहिए।
विस्तार — NCERT अभ्यासों से
- मिलान करो — चिड़िया की बोली / सोने की कड़ियाँ / निर्भय विचरण / मुक्ति-मंत्र / दिनभर काम।
क्रम से: प्रेम और स्वतंत्रता का संदेश; बंधन और लालच; स्वतंत्रता और निर्बाध जीवन; बंधन से मुक्ति; श्रम और संतोष। - पंक्तियों पर विचार करो — ‘चिड़िया बैठी प्रेम-प्रीति की रीति हमें सिखलाती है!’ / ‘उनके मन में लोभ नहीं है, पाप नहीं, परवाह नहीं’ / ‘सीमा-हीन गगन में उड़ते, निर्भय विचरण करते हैं’।
पहली पंक्ति कहती है कि चिड़िया का गाना केवल ध्वनि नहीं, बल्कि प्रेम से जीने की शिक्षा है। दूसरी पंक्ति पक्षियों के निर्मल मन को दर्शाती है — न लोभ, न पाप, न चिंता। तीसरी पंक्ति उनकी स्वतंत्रता को दर्शाती है — आकाश की कोई सीमा नहीं और उनके विचरण में कोई भय नहीं। - क्रिया शब्दों की पहचान करो और उनसे नए वाक्य बनाओ — गाती, सुनाती, रहते, खाते, उड़ते, विचरण करते।
क्रिया वह शब्द है जिससे कार्य करने या होने का बोध हो। उदाहरण: ‘चिड़िया गाती है’ में ‘गाती’ क्रिया है। नए वाक्य: ‘बच्चे मिल-जुलकर खेलते हैं’ (खेलते क्रिया), ‘हम श्रम से पढ़ते हैं’ (पढ़ते क्रिया)। - पक्षियों से जुड़ी पहेलियाँ बूझो — (1) दिखने में हरा-हरा, कहता सब खरा-खरा, खाता मिर्च लाल, कहते सब मिट्ठूलाल। (2) सुंदर काले नैन, श्वेत-श्याम डैन, उड़ता दिन-रैन, पानी में खेले तो आए चैन। (3) संदेश पहुँचाना काम, शांति का पैगाम, करता गुटर-गूँ।
(1) तोता (मिट्ठूलाल)। (2) हंस। (3) कबूतर। - भावों की बात — नीचे दिए दृश्यों पर कौन-से भाव आते हैं? (प्रेम, दया, करुणा, आनंद, ममता, शांति, आभार, उत्साह, चिंता, सहानुभूति में से चुनो): पक्षी का चहचहाना; शाम को पेड़ पर अनगिनत पक्षियों का चहचहाना; गाय का बच्चे को दूध पिलाना; ज़रूरतमंद भूखे को भोजन देना।
पक्षी का चहचहाना — आनंद, शांति। शाम को पेड़ पर पक्षियों का चहचहाना — आनंद, आश्चर्य। गाय का बच्चे को दूध पिलाना — ममता, प्रेम। ज़रूरतमंद भूखे को भोजन देना — दया, करुणा, सहानुभूति, आभार। - चिड़िया और मनुष्य का जीवन एक-दूसरे से कैसे भिन्न है? और यदि तुम्हें चिड़िया जैसी सुविधा हो तो तुम अपना घर कहाँ बनाना चाहोगे और क्यों?
चिड़िया का घर आसमान है — वह जहाँ चाहे जा सकती है, दिन भर काम करती है और रात में पेड़ों पर सो जाती है; मनुष्य धन और लोभ की कड़ियों में बँधा है। घर का उत्तर अपनी कल्पना से देना है, पर उसका कारण स्वतंत्रता, प्रकृति के निकटता या शांति से जुड़ा होना चाहिए।
- कवि: आरसी प्रसाद सिंह (1911–1996)।
- चिड़िया: पीपल की डाली पर; प्रेम-प्रीति की रीति; मुक्ति-मंत्र।
- पक्षी: हिल-मिलकर रहना, मिल-जुलकर खाना, श्रम से संतोष।
- मन में नहीं: लोभ, पाप, हड़पने की चाह।
- संदेश: सोने की कड़ियाँ तोड़ो; मानवता से द्रोह छोड़ो।
- भाषा-बिंदु: क्रिया; ‘सब मिल-जुलकर’ शैली।
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