अध्याय 5: नहीं होना बीमार
Original notes — ready CBSE (NCERT, English Medium) • Class 7 • Hindi • Book: Malhar
स्कूल से बचने के लिए बीमारी का बहाना बनाने वाला बच्चा एक दिन में ही समझ जाता है — बीमार होना कोई ठाठ नहीं, बल्कि ऊब और भूख है।
नहीं होना बीमार — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Malhar (CBSE, कक्षा 7) | अध्याय 5 | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): पौष्टिक भोजन करता स्वस्थ बच्चा। पाठ के भाव की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

खेलते-कूदते स्वस्थ बच्चे। व्यायाम और स्वास्थ्य की सामान्य तस्वीर।
पाठ के बारे में
कहानी की शुरुआत अस्पताल से होती है। बच्चा नानीजी के साथ अपने पड़ोसी सुधाकर काका को देखने अस्पताल जाता है — अस्पताल जाने का यह उसका पहला अवसर था। वहाँ बड़े से वार्ड में कई एक-जैसे पलंग लाइन से लगे थे, सब पर एक-जैसी सफ़ेद चादर और लाल कंबल, सफ़ेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे परदे और फ़र्श एकदम चमकता हुआ। नानीजी काका के लिए साबूदाने की खीर बनाकर लाई थीं, जिसे नर्स के हाँ कहने पर उन्होंने चम्मच से धीरे-धीरे काका को खिलाया। काका ने बड़े स्वाद से खीर खाई।
यह देखकर बच्चे के मन में आया — क्या ठाठ हैं बीमारों के भी! ठाठ से साफ़-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो! काश, सुधाकर काका की जगह मैं होता! मैं कब बीमार पड़ूँगा! कुछ रोज़ बाद एक दिन उसका स्कूल जाने का मन नहीं किया — उसने होमवर्क भी नहीं किया था, और स्कूल जाता तो ज़रूर सज़ा मिलती। उसने सोचा कि बीमार पड़ने के लिए आज का दिन बिल्कुल ठीक रहेगा। चलो, बीमार पड़ जाते हैं।
वह रजाई से निकला ही नहीं। नानीजी के उठाने आने पर उसने कहा कि वह बीमार है — सिर में दर्द हो रहा है, पेट भी दुख रहा है और बुखार भी है। नानाजी ने माथा छुआ, पेट देखा और नब्ज़ देखने लगे; बुखार तो नहीं था, पर बच्चे ने कहा कि थर्मामीटर लगाकर देखें। बहुत ढूँढ़ा गया, पर थर्मामीटर मिला ही नहीं — शायद कोई माँगकर ले गया था। फिर नानाजी ने उसे कड़वी पुड़िया खिलाई और काढ़े जैसी चाय पिलाई, और कहा कि आज इसे कुछ खाने को मत देना, आराम करने दो, शाम को देखेंगे।
इसके बाद बच्चे का दिन ऊब, भूख और पछतावे में बीता। वह रजाई में पड़ा-पड़ा घर की गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा — छोटे मामा नहाकर निकले, कुसुम मौसी नाश्ता छोड़कर कॉलेज बस पकड़ने भागीं, मुन्नू अपना जूता ढूँढ़ रहा था — और फिर सब चले गए, घर में वह अकेला रह गया। लेटे-लेटे उसकी पीठ दुखने लगी। बाहर निकलने की तेज़ इच्छा हुई — गली की चहल-पहल देखना, चंदू भाई की दुकान, तेज़राम की दुकान पर ग्राहक, महेश घी सेंटर, टेलीफ़ोन के तारों पर बैठी चिड़ियाँ — पर मज़बूरी थी कि लेटे ही रहना था।
भूख के कारण उसे ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी और आँख लगती भी तो खाने ही खाने की चीज़ें दिखाई देतीं — गरमागरम खस्ता कचौड़ी, मावे की बर्फ़ी, बेसन की चिक्की, गोलगप्पे, और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर। शाम को सब लोग खाना खाने बैठे — दाल-चावल, तली हुई हरी मिर्च — और मुन्नू आम चूस रहा था। बच्चे को जलन, गुस्सा और कुढ़न हुई, पर वह कुछ कह नहीं सका। उस पूरे दिन उसे भूखे पेट ही रहना पड़ा। अंत में वह कहता है कि इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए उसने बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।
कहानी की भाषा भी ध्यान देने योग्य है: साधारण बातों को विशेष ढंग से लिखा गया है, जैसे ‘दबे पाँव दरवाज़े तक गया और चुपके से झाँककर देखा’। विराम चिह्नों का भी सुंदर प्रयोग है — पूर्ण विराम, अल्प विराम, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक और उद्धरण चिह्न। लेखक स्वयं प्रकाश हिंदी के जाने-माने लेखक थे; उनकी कहानियाँ बच्चों और बड़ों के दिलों को छू जाती हैं और ऐसा लगता है मानो वे हमारे ही जीवन की कहानियाँ हों।
बहाने का एक दिन — क्रम से
- अस्पताल में सुधाकर काका को देखकर बच्चे को बीमारों के ‘ठाठ’ अच्छे लगे।
- स्कूल न जाने और होमवर्क की सज़ा से बचने के लिए उसने बीमार पड़ने का निश्चय किया।
- रजाई से न निकलना; सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार का बहाना बनाना।
- थर्मामीटर न मिलना; कड़वी पुड़िया खाना और काढ़े जैसी चाय पीना।
- ‘आज इसे कुछ खाने को मत देना’ — पूरे दिन भूखे रहना।
- ऊब, पीठ का दर्द, गली की चहल-पहल की चाह; शाम को दूसरों का खाना देखकर पछतावा।
- निष्कर्ष: इसके बाद बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।
मुख्य शब्द
- वार्ड — अस्पताल का बड़ा कमरा, जहाँ कई पलंग लगे हों।
- नर्स — रोगियों की देखभाल करने वाली सेविका।
- रजाई — रुई भरा दोहरा ओढ़ना।
- थर्मामीटर — शरीर का तापमान (जैसे बुखार) नापने का छोटा यंत्र।
- काढ़ा — औषधियों को उबालकर बनाया गया पेय।
- साबूदाना — हल्का सुपाच्य खाद्य, जिससे खीर बनती है।
- विराम चिह्न — । , ? ! “ ” — वाक्य में रुकने और भाव बताने वाले चिह्न।
याद रखें
- लेखक: स्वयं प्रकाश (1947–2019)।
- बच्चा नानीजी के साथ सुधाकर काका को देखने अस्पताल गया था।
- स्कूल न जाने का असली कारण: होमवर्क नहीं किया था, सज़ा का डर था।
- बहाना: सिरदर्द, पेटदर्द, बुखार; थर्मामीटर नहीं मिला।
- इलाज: कड़वी पुड़िया + काढ़े जैसी चाय + पूरे दिन कुछ न खाना।
- परिणाम: ऊब, भूख, पछतावा — और फिर कभी बहाना नहीं बनाया।
तालिका: समस्या और समाधान
| विषय | विवरण | विवरण |
|---|---|---|
| बच्चे की समस्या | होमवर्क नहीं किया; स्कूल जाने पर सज़ा का डर | बीमारी का बहाना बनाकर रजाई में पड़े रहना |
| नानीजी-नानाजी की समस्या | बच्चा बीमार बता रहा है, पर बुखार नहीं दिख रहा | माथा-पेट-नब्ज़ देखना, पुड़िया देना, आराम और उपवास कराना |
| बहाने का परिणाम | स्कूल से बचना था | पूरे दिन अकेले, ऊब और भूखे रहना पड़ा |
| अंतिम सीख | बहाना आसान लगता है | बहाने की कीमत ऊब और पछतावा होती है |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- बच्चे के विद्यालय न जाने का मुख्य कारण क्या था?
संकेत: होमवर्क और सज़ा के बारे में सोचो — बुखार असली नहीं था। - अस्पताल का वातावरण बच्चे को कैसा लगा और क्यों?
संकेत: वार्ड, चादर-कंबल, खिड़कियों और शांति का वर्णन याद करो। - नानाजी ने बच्चे की बीमारी की जाँच कैसे की?
संकेत: माथा, पेट, नब्ज़ और थर्मामीटर वाली बातों को क्रम से लिखो। - बच्चे को दिन भर में सबसे ज़्यादा क्या सताया — ऊब या भूख? उदाहरण देकर लिखो।
संकेत: पीठ का दर्द, गली की चाह और खाने की खुशबू वाली बातों से उत्तर दो। - कहानी का नाम ‘नहीं होना बीमार’ उपयुक्त है या नहीं? कारण सहित लिखो।
संकेत: सोचो — अंत में बच्चा क्या तय करता है?
प्रश्न और उत्तर
- बच्चे के विद्यालय न जाने का मुख्य कारण क्या था?
मुख्य कारण यह था कि उसका विद्यालय जाने का मन नहीं था और उसने गृहकार्य भी नहीं किया था — स्कूल जाता तो ज़रूर सज़ा मिलती। उसे सचमुच बुखार नहीं हुआ था; बुखार बहाना था। - कहानी के अंत में बच्चे ने बीमारी का बहाना फिर कभी न बनाने का निर्णय क्यों लिया?
क्योंकि इस बहाने के कारण उसे दिनभर अकेले और भूखे रहना पड़ा था। घर में रहने के बजाय विद्यालय जाना अधिक रोचक है, यह बात उसे अपने अनुभव से समझ आ गई — साबूदाने की खीर भी नहीं मिली, बल्कि कड़वी पुड़िया और भूख मिली। - ‘लेटे-लेटे पीठ दुखने लगी’ — इस बात से बच्चे के बारे में क्या पता चलता है?
इससे पता चलता है कि उसे बिस्तर पर लेटे रहने के कारण ऊब हो गई थी। वह बिस्तर पर आराम का आनंद नहीं ले रहा था; वह बाहर निकलकर गली की चहल-पहल देखना चाहता था। - ‘क्या ठाठ हैं बीमारों के भी!’ — बच्चे के मन में यह बात क्यों आई?
क्योंकि उसने देखा कि बीमार व्यक्ति को आराम करने को मिलता है, अच्छे खाने (साबूदाने की खीर) का आनंद मिलता है, विद्यालय नहीं जाना पड़ता और अस्पताल में शांति से लेटा रहता है। यही देखकर उसे बीमार होना आकर्षक लगा था। - कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
संदेश यह है कि बहाना बनाकर ज़िम्मेदारी से बचना आसान लगता है, पर उसकी कीमत ऊब, अकेलापन और पछतावा होती है। सच बोलना और अपना काम समय पर करना ही आसान और सुखद रास्ता है।
विस्तार — NCERT अभ्यासों से
- शब्दों का अर्थ से मिलान करो — साबूदाना, वार्ड, नर्स, रजाई, थर्मामीटर, काढ़ा।
साबूदाना — हल्का सुपाच्य खाद्य जिससे खीर बनती है। वार्ड — अस्पताल का बड़ा कमरा जहाँ कई पलंग लगे हों। नर्स — रोगियों की देखभाल करने वाली सेविका। रजाई — रुई भरा दोहरा ओढ़ना। थर्मामीटर — शरीर का तापमान नापने का छोटा यंत्र। काढ़ा — औषधियों को उबालकर बनाया गया पेय। - विराम चिह्नों के प्रयोग बताओ — पूर्ण विराम, अल्प विराम, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक, उद्धरण चिह्न।
पूर्ण विराम (।) वाक्य के अंत में, अल्प विराम (,) वाक्य के भीतर थोड़े ठहराव के लिए, प्रश्नवाचक (?) प्रश्न के अंत में, विस्मयादिबोधक (!) आश्चर्य या तीव्र भाव के लिए, और उद्धरण चिह्न (“ ”) किसी के कहे शब्दों को दर्शाने के लिए लगते हैं। कहानी में ‘देखें!’ और ‘क्या हुआ?’ इसके उदाहरण हैं। - लेखन के अनोखे तरीके — साधारण बात को कहानी के विशेष ढंग में बदलकर लिखो: ‘मैं बिना आवाज़ किए दरवाज़े तक गया और ऐसे झाँका जिससे किसी को पता न चले कि मैं बिस्तर से उठ गया हूँ।’
कहानी में यह बात इस प्रकार लिखी गई है — ‘दबे पाँव दरवाज़े तक गया और चुपके से झाँककर देखा।’ साधारण बातों को कुछ अलग तरह से लिखने से लेखन की सुंदरता बढ़ जाती है। - खाने-पीने की पहेलियाँ बूझो — (1) रोटी जैसा, पर आलू से भरा-भरा; (2) दाल-चावल का मेल, दक्षिण में प्रसिद्ध, चटनी-सांभर संग; (3) महाराष्ट्र का नाश्ता, बटाटा मशहूर; (4) बेसन से बने, गुजरात में बड़ा बोल; (5) गोल-गोल, पानी से भरके, चटनी-सोंठ संग; (6) हरे साग संग, मक्खन संग, पीला आटा; (7) राजस्थान का उपहार, चूरमा संग; (8) गोल-गोल, श्वेत रंग, चाशनी में डूबा।
क्रम से: (1) आलू पराठा, (2) डोसा, (3) वडा पाव, (4) ढोकला, (5) गोलगप्पा (पानीपुरी), (6) मक्के की रोटी, (7) दाल बाटी चूरमा, (8) रसगुल्ला। - समस्या और समाधान बताओ — बच्चे के सामने क्या समस्या थी और उसने क्या समाधान निकाला? नानीजी-नानाजी के सामने क्या समस्या थी और उन्होंने क्या किया?
बच्चे की समस्या होमवर्क न करना और सज़ा का डर था; उसने बीमारी का बहाना बनाकर रजाई में पड़े रहने का समाधान निकाला। नानीजी-नानाजी की समस्या यह थी कि बच्चा बीमार बता रहा था, पर बुखार नहीं था; उन्होंने जाँच की, पुड़िया दी और आराम व उपवास कराया। - शीर्षक पर विचार करो — यदि तुम्हें इस कहानी को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या दोगे और क्यों?
उत्तर अपने शब्दों में होगा, पर उसका आधार कहानी का केंद्र होना चाहिए — जैसे ‘झूठा बहाना’ या ‘एक दिन की बीमारी’ — क्योंकि कहानी बहाने के आकर्षण और उसकी कीमत के बारे में है, सचमुच की बीमारी के बारे में नहीं।
- लेखक: स्वयं प्रकाश (1947–2019)।
- शुरुआत: अस्पताल में सुधाकर काका; साबूदाने की खीर।
- बहाना: होमवर्क नहीं, सज़ा का डर; सिरदर्द-पेटदर्द-बुखार।
- दिन: कड़वी पुड़िया, काढ़ा, भूख, ऊब, पछतावा।
- अंत: फिर कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाया।
- भाषा-बिंदु: विराम चिह्न; विशेष ढंग से लेखन; शब्द-अर्थ।
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