भारति, जय, विजयकरे!
कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' — भारत देवी के रूप में; कनक-शस्य, गंगा-धारा और हिम-मुकुट की वंदना।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 9 • Hindi • Book: Ganga • काव्य खंड
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
भारति, जय, विजयकरे! — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Ganga (BSEB, कक्षा 9) | अध्याय 10 | कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): नदी और खेतों के ऊपर सुनहरा सूर्योदय — भारत की महिमा का सामान्य चित्र।

अँधेरे में जलती दीपक की लौ और पीछे भोर की रोशनी — आशा का प्रतीक चित्र।
कविता का सार
कविता के आरंभ में ही कवि 'भारति, जय, विजयकरे!' कहकर भारत को विजयश्री प्राप्त करने की कामना करता है। वह भारतभूमि को 'कनक-शस्य-कमलधरे!' कहकर संबोधित करता है, जो भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य को दर्शाता है। कविता में भारत की भौगोलिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो, जिसके चरणों को समुद्र अपने जल से धोता है। नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है। कवि भारत को एक चेतन सत्ता के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में 'ओंकार' की गूँज हो रही है और जो अनेक तरह के स्वरों और विचारों से समृद्ध है।
पंक्ति-दर-पंक्ति: "भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!" — हे भारती (भारत माता), तुम्हारी जय हो, तुम विजय करो; तुम सोने जैसी फ़सल और कमल धारण करने वाली हो — धन-धान्य संपन्नता का प्रतीक। "लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल, स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!" — तुम्हारे चरणों के तल में लंका कमल के समान है; गर्जना करती लहरों वाला सागर-जल तुम्हारे पवित्र चरण-युगल को धोता है — अनेक अर्थों से भरी हुई यह स्तुति है। "तरु-तृण-वन-लता वसन, अंचल में खचित समन; गंगा ज्योतिर्-जल-कण धवल धार हार गले।" — वृक्ष, तृण, वन और लताएँ तुम्हारे वस्त्र हैं; आँचल में फूल कढ़े हुए हैं; गंगा के ज्योतिपूर्ण जल-कणों की धवल धार तुम्हारे गले का हार है। "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!" — शुभ्र हिम-तुषार (हिमालय) तुम्हारा मुकुट है; ओंकार तुम्हारा प्राण है; उदार दिशाएँ ध्वनित हो रही हैं; सैकड़ों मुखों से सैकड़ों रव (ध्वनियाँ) मुखरित हैं — भारत अनेक स्वरों और विचारों से समृद्ध है।
कवि के बारे में
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1899–1961) का जन्म बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। वे हिंदी के महान कवि हैं — छायावाद के प्रमुख स्तंभ, जिनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है और जिनकी कविताओं में ओज, विद्रोह और मानवीय करुणा — तीनों मिलते हैं।
मुख्य शब्द
- भारति — भारत माता; भारतभूमि का देवी-रूप।
- कनक-शस्य — सोने जैसी फ़सल; धन-धान्य संपन्नता।
- शतदल — कमल (सौ पंखुड़ियों वाला); लंका पदतल में शतदल के समान है।
- गर्जितोर्मि — गर्जना करती लहरों वाला; सागर-जल का विशेषण।
- प्रणव (ओंकार) — ॐ; भारत का प्राण, उसकी आध्यात्मिक ध्वनि।
- शतमुख-शतरव-मुखरे — सैकड़ों मुखों से सैकड़ों ध्वनियाँ मुखरित; भारत की अनेकता में एकता और विचारों की समृद्धि।
याद रखें
- कवि भारत को देवी के रूप में देखता है; कामना: "भारति, जय, विजयकरे!"
- "कनक-शस्य-कमलधरे" — भारत की धन-धान्य संपन्नता और कृषि-परंपरा।
- चरण: लंका पदतल शतदल; सागर-जल शुचि चरण युगल धोता है।
- वस्त्र: तरु-तृण-वन-लता; आँचल में खचित सुमन; गले का हार: गंगा की धवल धार।
- मुकुट: शुभ्र हिम-तुषार (हिमालय); प्राण: प्रणव ओंकार; दिशाएँ: ध्वनित और उदार।
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त; भाव: भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: कविता को केवल "भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति" लिख देना। सही उत्तर: भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा। और "कनक-शस्य-कमलधरे" का भावार्थ "भारत की धन-धान्य संपन्नता" है — नदियों का सौंदर्य, लोक-जीवन की सुंदरता या सैन्य शक्ति नहीं।
तालिका: भारत का देवी-रूप
| अंग | कविता में रूप |
|---|---|
| चरण | लंका पदतल शतदल; सागर-जल शुचि चरण युगल धोता है |
| वस्त्र | तरु-तृण-वन-लता; आँचल में खचित सुमन |
| हार | गंगा ज्योतिर्-जल-कण की धवल धार |
| मुकुट | शुभ्र हिम-तुषार (हिमालय) |
| प्राण | प्रणव ओंकार; ध्वनित दिशाएँ उदार |
| स्वर | शतमुख-शतरव-मुखरे — अनेक स्वरों और विचारों की समृद्धि |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- "भारति, जय, विजयकरे" कविता में विशेष रूप से —
संकेत: भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा के बारे में सोचो। - "कनक-शस्य-कमलधरे" पंक्ति का भावार्थ क्या है?
संकेत: भारत की धन-धान्य संपन्नता के बारे में सोचो। - समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ कौन-सी हैं?
संकेत: "भारति, जय, विजयकरे / कनक-शस्य-कमलधरे!" के बारे में सोचो। - कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
संकेत: संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त के बारे में सोचो। - भारत के वस्त्रों में 'तरु-तृण-वन-लता' और गले में 'गंगा-धारा' को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
संकेत: पर्यावरणीय और सांस्कृतिक चेतना के बारे में सोचो।
प्रश्न और उत्तर
- "लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!" — पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए।
अर्थ: भारत माता के चरणों के तल में लंका कमल के समान स्थित है; गर्जना करती लहरों वाला सागर-जल उनके पवित्र चरण-युगल को धोता है। भाव: भारत का भौगोलिक वैभव — दक्षिण में लंका तक फैला भूगोल, तीन ओर समुद्र — और भारत की पवित्रता। समुद्र का चरण धोना आदर का प्रतीक है; भारत कोई निर्जीव भूखंड नहीं, वंदनीय देवी है। - "प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!" — पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए।
अर्थ: ओंकार भारत का प्राण है; उदार दिशाएँ ध्वनित हो रही हैं; सैकड़ों मुखों से सैकड़ों ध्वनियाँ मुखरित हैं। भाव: भारत की आध्यात्मिक और वैचारिक समृद्धि — एक ही प्राण (ओंकार) से जुड़े अनेक स्वर, अनेक विचार, अनेक भाषाएँ। यही अनेकता में एकता है; भारत की उदारता ही उसकी दिशाओं को ध्वनित करती है। - कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
राष्ट्र-प्रेम, गौरव और विजय-कामना की भावना। कवि भारत की प्रशंसा ही नहीं करता, उसके लिए विजयश्री की कामना करता है — "जय, विजयकरे!" यह भावना केवल अतीत के गौरव की नहीं, भविष्य की आशा की भी है। - कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
प्रकृति को वस्त्राभूषण बनाया गया है — तरु-तृण-वन-लता वस्त्र हैं, गंगा हार है, हिमालय मुकुट है। प्रकृति भारत का शृंगार ही नहीं, उसका प्राण है। हाँ, प्रकृति का संरक्षण देशप्रेम का काम है — क्योंकि जिस गंगा, वन और हिमालय की वंदना की जाती है, उन्हें नष्ट करना उसी देवी का अपमान है। देशप्रेम का अर्थ केवल नारे नहीं, अपने प्राकृतिक वैभव की रक्षा भी है। - "कनक-शस्य-कमलधरे!" पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है? और "मुकुट शुभ्र हिम-तुषार" पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट क्यों बताया गया है?
"कनक-शस्य-कमलधरे" कृषि-परंपरा, श्रम के सौंदर्य और धन-धान्य संपन्नता की ओर संकेत करती है — भारत की धरती सोने जैसी फ़सल देती है और कमल जैसी पवित्रता धारण करती है। हिमालय को मुकुट इसलिए बताया गया है क्योंकि मुकुट सिर पर होता है और सबसे ऊँचा, शुभ्र और गौरवशाली होता है — हिमालय भी भारत के उत्तर में सिर की तरह स्थित है, शुभ्र हिम से ढका हुआ, और भारत की रक्षा और गौरव का प्रतीक है।
विस्तार — और गहराई से
- कविता का सौंदर्य: "भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!" — इन पंक्तियों के सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।
सौंदर्य समासयुक्त संस्कृतनिष्ठ शब्दों में है — 'कनक-शस्य-कमलधरे' एक ही विशेषण में फ़सल, सोना और कमल — तीन चित्र समेट लेता है। 'जय, विजयकरे' में कामना और आशीर्वाद दोनों हैं। छोटे-छोटे चरणों में बड़ी कल्पना — यही निराला की विशेषता है। - भारत के वस्त्राभूषण-रूपक का विस्तार कीजिए — यदि आपको भारत के लिए एक और आभूषण जोड़ना हो तो क्या जोड़ेंगे और क्यों?
अपना आभूषण चुनो — जैसे मानसून को कंगन, ऋतुओं को आँचल की रंगत, नदियों को करधनी — और कारण दो कि वह भारत की किस विशेषता को दर्शाता है। रूपक का नियम है कि आभूषण और अंग में संबंध स्पष्ट हो। - अपने देश के प्राकृतिक सौंदर्य पर एक छोटा अनुच्छेद लिखिए — नदी, पर्वत, वन, खेत में से किन्हीं दो को चुनकर, उन्हें किसी देवी-देवता या मनुष्य के अंगों से जोड़कर नहीं, अपने शब्दों में।
अपने गाँव/शहर के आस-पास की प्रकृति लिखो — गंगा या कोई नदी, खेत, पेड़ — और बताओ कि वे तुम्हें क्यों प्रिय हैं। प्रकृति-वर्णन में अपनी अनुभूति जोड़ना ही देशप्रेम का सच्चा रूप है।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है
- मेरे उत्तर मेरे तर्क: पाँच बहुविकल्पीय प्रश्न — कविता में विशेष रूप से क्या, "कनक-शस्य-कमलधरे" का भावार्थ, विश्व में भारत के महत्व की पंक्तियाँ, भाषा-शैली की विशेषता, तरु-तृण-वन-लता और गंगा-धारा की चेतना — उत्तर के साथ कारण भी बताना है।
- अर्थ और भाव: दो पंक्ति-समूहों का अर्थ और भाव — लंका-सागर वाली पंक्तियाँ और प्रणव-ओंकार वाली पंक्तियाँ।
- मेरी समझ मेरे विचार: चार चर्चा-प्रश्न — कवि की भावना, प्राकृतिक सौंदर्य और प्रकृति-संरक्षण, "कनक-शस्य-कमलधरे" की विशेषताएँ, हिमालय का मुकुट होना।
- कविता का सौंदर्य: आरंभिक पंक्तियों के सौंदर्य पर टिप्पणी।
दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें
- निराला: महिषादल (बंगाल) में जन्म, मूल गढ़ाकोला (उन्नाव)।
- कामना: "भारति, जय, विजयकरे!" — भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा।
- देवी-रूप: चरण (लंका-शतदल, सागर-जल), वस्त्र (तरु-तृण-वन-लता), हार (गंगा-धारा), मुकुट (हिम-तुषार), प्राण (प्रणव ओंकार)।
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ, समासयुक्त; चेतना: पर्यावरणीय और सांस्कृतिक।
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