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Class 8 • Science • Vigyan-3 (BSEB)

Chapter 19: वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या

वायुमण्डल का संघटन, वायु प्रदूषण और उसके स्रोत, अम्ल वर्षा, ओज़ोन परत और CFC, हरित घर प्रभाव, वायु प्रदूषण रोकने के उपाय, जल प्रदूषण — जैविक और रासायनिक, जल शुद्धिकरण और प्रदूषण रोकने के उपाय।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Science • Book: Vigyan-3 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Vigyan-3 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 8)  |  अध्याय 19  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है और ये नोट्स पाठ्यपुस्तक का स्थान नहीं लेते।

वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): वायु और जल प्रदूषण से जुड़ा शिक्षण चित्र — लेबल चित्र पर ही छपे हैं।

वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या के लिए चित्र

प्रदूषण से जुड़ा सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

क्या कभी आपने सोचा है कि पृथ्वी पर ही जीवन क्यों है? क्या मंगल और चंद्रमा पर भी जीवन है — अगर नहीं है तो क्यों नहीं है?

जीवित रहने के लिए वायु और जल का होना पहली आवश्यकता है। पृथ्वी पर वायुमण्डल में अधिक मात्रा में हवा है, पानी है और इसी कारण यहाँ वृक्ष हैं, पशु हैं और मनुष्य हैं। क्या आप जानते हैं कि हमारे वायुमण्डल में कौन-कौन सी गैसें हैं जिनसे जीवन सुरक्षित है? या हवा जो हमारे आस-पास हमेशा ही है वह किन-किन गैसों से बनी है?

1. वायुमण्डल का संघटन

पृथ्वी के चारों ओर गैसों का एक आवरण है जिसे वायुमण्डल कहते हैं।

गैसों का नामउनके संकेतउनका प्रतिशत (आयतन के अनुसार)
नाइट्रोजनN278.06%
ऑक्सीजनO220.94%
कार्बनडाइऑक्साइडCO20.03%
अन्य गैसें, जैसे आर्गन (Ar), मिथेन (CH4), जलवाष्प (H2O)Ar, CH4, H2O0.97%

क्रियाकलाप-1: पूर्व पृष्ठ पर दी गई तालिका में गैसों का आयतन का प्रतिशत दिया गया है, जिसके आधार पर बगल में दिए गए गोले को भिन्न रंगों से भरिए और बताइए a, b, c, d में कौन-कौन सी गैसें हैं?

सुबह की ताज़ी हवा मिलती कहाँ है? सुबह की ताज़ी हवा महानगरों से ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों से भी गायब हो चुकी है। सड़कों पर दौड़ते वाहन, कल-कारखानों से निकलनेवाले धुएँ से आसमान काला पड़ने लगता है। हमारा बिहार भी इससे अछूता नहीं है। पटना के व्यस्ततम चौक-चौराहों पर खड़े रहना संभव नहीं है। बरौनी या हाथीदह जैसे इलाकों से कभी आपने सफ़र किया है?

क्रियाकलाप-2: आप कभी धुआँ उगलते ईंट के भट्ठे या अपने आस-पास के शहरों के व्यस्ततम इलाके से ज़रूर गुज़रे होंगे। वहाँ आपको खाँसी ज़रूर आई होगी। सिरदर्द ज़रूर हुआ होगा। आप खुद से अवलोकन कीजिए कि वातावरण एवं परिवेश में क्या-क्या परिवर्तन हुआ है? इसके लिए आप गाँव का बगीचा और वाहनों से भरा सड़क तथा कूड़े-करकटवाले इलाके और खुला मैदान में क्या महसूस करते हैं? अपने अवलोकन एवं अनुभव को तालिकाबद्ध कीजिए — तालिका: क्र.सं. | स्थान | स्थान — 1. गाँव के बगीचे का अनुभव | वाहनों से भरे सड़क का अनुभव; 2. कूड़े-करकट वाले इलाकों का अनुभव | खुले मैदान का अनुभव। आप कहाँ-कहाँ अच्छा अनुभव करते हैं?

आइए, कुछ विचार करें: कुछ क्षण निकालकर इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास कीजिए — क्या वृक्ष आपका सबसे अच्छा मित्र हो सकता है? क्या अधिक गर्म मौसम में या अधिक भीड़ में आपको अच्छा लगता है? यदि नदियों को पवित्र कहा जाता है तो व्यक्ति उन्हें गंदा क्यों करते हैं? इन प्रश्नों के द्वारा जो एक सामान्य विचार प्रकट होता है वह यह है कि मानव व्यवहार और पर्यावरण के बीच एक गहरा संबंध है।

प्रारंभ में जनसंख्या सीमित थी तथा प्राकृतिक संसाधन असीमित थे। परन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती गई हम औद्योगिक विकास की ओर तेज़ी से बढ़ने लगे। औद्योगिक तकनीक के आने से मानव की भौतिक आवश्यकताओं तथा सुविधाओं की मांग बढ़ी और प्राकृतिक स्रोतों का मानव द्वारा निर्ममता से शोषण किया जाने लगा और इस प्रकार प्रकृति में पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा पैदा हो गया।

2. वायु प्रदूषण

प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ गंदगी है। ऑक्सीजन मानव जीवन के लिए प्रकृति की एक महत्त्वपूर्ण देन है। किन्तु, आधुनिक यांत्रिक युग में कल कारखानों की चिमनियों से निकलनेवाली गैसों, स्वचालित वाहनों में पेट्रोल एवं डीज़ल के दहन तथा मनुष्य के अन्य क्रियाकलापों के कारण बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की वायु में धूलकण (dust particles), धुआँ (Smoke) और अनेक प्रकार की हानिकारक गैसें पर्याप्त मात्रा में उपस्थित होकर उसे गंदा कर देती हैं, यह वायु प्रदूषण कहलाता है। फलतः ऐसी वायु में साँस लेना भी आसान नहीं होता। यह सजीव और निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक होता है।

दो वास्तविक घटनाएँ

1. डेट्रॉइट के पास अम्ल वर्षा: कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका के एक औद्योगिक नगर डेट्रॉइट के पास के कस्बे में लोग एक दिन हैरान रह गए। उस दिन वहाँ अजीब बरसात हुई। बाहर सूखते कपड़े जल गए। जिस पर भी यह पानी पड़ा, वही चीख उठा। जाँचने पर पता चला वह पानी नहीं तेज़ाब था — गंधक का अम्ल। कारखानों की चिमनियों से हवा में इतनी सल्फर डाइऑक्साइड गैस जमा हो गई थी कि बादलों के साथ रासायनिक क्रिया करके दहकते हुए तेज़ाब की रिमझिम वर्षा कर दी।

2. भोपाल गैस काण्ड: दो और तीन दिसम्बर 1984 की मध्यरात्रि में एक ऐसी ही दुर्घटना मध्यप्रदेश के भोपाल में हुई थी। 'भोपाल गैस काण्ड' सारी दुनिया में औद्योगिक विकास के चेहरे पर गहरी कालिख पोत गया है। कीटनाशक दवा बनानेवाली यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी से मिथाइल आइसो साइनेट (MIC) नामक द्रव ताप बढ़ जाने से गैस बन गया। इसका रिसाव शुरू हुआ। यह गैस साँस के साथ फेफड़ों में गई। फेफड़ों में पानी भर गया। सांस फूली और दम घुट गई। हज़ारों लोग मारे गए तथा हज़ारों अपंग होकर आज भी कष्टदायक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। चित्र-19.1: वायु प्रदूषण (कारखानों की चिमनियाँ, बस, स्कूटर, घर की चिमनी से धुआँ)।

वायु कैसे प्रदूषित होती है?

वायु प्रदूषण पहले भी था। प्रकृति एकदम स्वच्छ कभी नहीं रही। समय-समय पर आँधी आती रहती है, जंगलों में आग लगती रही है, ज्वालामुखी विस्फोट होते रहे हैं जिससे विश्वभर के वायुमण्डल में उलट-फेर होता रहा है और अब भी हो रहा है। यह प्रकृति की लीला है इस पर किसी का वश नहीं। ये प्राकृतिक प्रदूषक कहलाते हैं। किन्तु सभ्य मानव ने अपने हाथों से जो किया है, उसने वैज्ञानिक विकास के द्वारा जो औद्योगिक क्रांति उत्पन्न की है उससे सभी प्रकार के प्रदूषण को बढ़ावा मिला है।

रासायनिक कारखानों, तेलशोधक संयंत्रों, उर्वरक, सीमेंट, काग़ज़, काँच इत्यादि के कारखानों में कई प्रकार के रासायनिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इनकी चिमनियों से निर्गत गैसों में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, धातु के महीन कण, कार्बन के कण आदि प्रमुख हैं, जो वायु में फैलकर वायु को प्रदूषित कर देते हैं।

जनसंख्या बढ़ने से यातायात के लिए मोटरगाड़ियों और अन्य वाहनों की संख्या में दिन प्रतिदिन वृद्धि हुई है। जीवाश्म ईंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है जो वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ाती है। एक मोटरगाड़ी एक मिनट में इतनी ऑक्सीजन नष्ट करती है, जितनी 1135 व्यक्तियों को श्वसन क्रिया के लिए चाहिए। इस प्रकार आप देख रहे हैं कि साठ प्रतिशत वायु प्रदूषण तो मोटर वाहनों से ही हो रहा है।

कार्बनयुक्त ईंधनों के अपूर्ण दहन से कार्बन मोनोक्साइड बनता है जो वायु में मिश्रित होकर उसे प्रदूषित कर देता है। कार्बन मोनोक्साइड एक विषैली गैस है। श्वसन क्रिया के द्वारा यह हमारे शरीर में रक्त के हीमोग्लोबिन के साथ संयोग कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है। इसके फलस्वरूप रक्त के हीमोग्लोबिन में शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में ऑक्सीजन पहुँचाने की क्षमता समाप्त हो जाती है। अतः ऑक्सीजन के अभाव में श्वसन संबंधी कठिनाइयाँ पैदा हो जाती हैं, दम घुटने लगता है तथा अंत में मृत्यु भी हो सकती है।

चेतावनी

बन्द कमरे में मोमबत्ती या डिबरी जलाकर सोना खतरे से खाली नहीं है। आप अपने आस-पड़ोस को इसके बारे में बताइए और खुद भी सोचिए। (बंद कमरे में कार्बन मोनोक्साइड जमा होकर विषाक्त हो सकती है — यही चेतावनी का कारण है।)

अयस्कों और खनिजों से धातुओं के निष्कासन के क्रम में धूलकण एवं धुआँ निकलते हैं। उनमें लेड, क्रोमियम, जस्ता, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक इत्यादि वायु में प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। फसलों में लगे कीड़ों को मारने के लिए तथा मच्छरों एवं मक्खियों को नष्ट करने के लिए कई प्रकार के कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है, जो विषैले होते हैं। इनके कण वायु में प्रवेश कर उसे प्रदूषित कर देते हैं।

जंगलों के वृक्ष पर्यावरण को स्वतः शुद्ध करते रहते हैं। किन्तु आजकल जलावन की पूर्ति के लिए तथा अन्य कार्यों के लिए वृक्षों को बेतरतीब ढंग (धड़ल्ले) से काटा जा रहा है। इसका प्रभाव वर्षा पर पड़ता है। वर्षा अनियमित हो जाती है तथा अनावृष्टि की स्थिति पैदा हो जाती है।

3. ओज़ोन परत और CFC

अन्य मानव निर्मित गैसों में क्लोरोफ्लोरो कार्बन जिसे (CFC) कहा जाता है। ये अत्यधिक स्थायी, अज्वलनशील और हानिरहित (Nontoxic) पदार्थ हैं। इनका उपयोग रेफ्रीजरेटरों, एयर कण्डीशनर तथा ऐरोसोल फुहारों में होता है, परन्तु इनके स्थायी होने के चलते ये वायुमण्डल में लम्बे समय तक रहकर ऊपर की परत तक पहुँच जाते हैं जहाँ ओज़ोन होता है। सूर्य की पराबैंगनी किरण CFC को तोड़कर क्लोरीन बना देता है। क्लोरीन का एक परमाणु एक लाख ओज़ोन को नष्ट कर देता है। इससे ओज़ोन के आवरण में छिद्र हो गया है। आपने क्या इसके बारे में सुना है?

ओज़ोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है जिसमें ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं। इसका निर्माण वायुमण्डल की ऊपरी परत में पराबैंगनी प्रकाश द्वारा और बिजली के चमक द्वारा ऑक्सीजन गैस के टूटने से होता है। ओज़ोन परत पृथ्वी के चारों ओर एक लोचदार कवच बनाती है जिसे समुद्री सतह के वायुमण्डलीय दाब तक लाया जाय तो यह केवल कुछ मिलीमीटर की ही बचेगी। यह जानकारी 1970 के शुरुआती वर्षों में हुई। ओज़ोन की क्षति से पराबैंगनी किरणों में सीधे पृथ्वी पर वृद्धि होगी जिससे चमड़ी का कैंसर और उसके संक्रामक रोग, मोतियाबिन्द मरीज़ों की संख्या बढ़ेगी। चित्र-19.2: ओज़ोन लेयर (पृथ्वी के ऊपर ओज़ोन परत का चित्र)।

ओज़ोन परत के क्षीण होने की प्रक्रिया को रोकने के प्रयास में ओज़ोन फ्रेंडली तकनीकें खोजी जा रही हैं और CFC के उपयोग को कम किया जा रहा है। नए खोज के तहत क्लोरीन रहित महँगे फ्लोरोकार्बन विकसित दिए जा रहे हैं। इस दिशा में सभी देशों को समयबद्ध और योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाने होंगे जो वायुमण्डल में क्लोरीन की मात्रा कम करे और ओज़ोन परत को नुकसान कम पहुँचे।

4. कणिकाएँ (Particulates) और अम्ल वर्षा

वायुमण्डल में इन ढेर सारी गैसों के अलावा ऐसे ठोस पदार्थ भी होते हैं जो इन गैसों में मिलकर तैरते रहते हैं। ये कणिकाएँ कहलाती हैं। इन कणिकाओं (Particulates) का व्यास 0.02 से 100 माइक्रोमीटर तक रहता है। ये अत्यधिक समय तक वायु में निलम्बित रहने से दृश्यता को घटाते हैं, धुँध पैदा करते हैं। ये इस्पात निर्माण, खनन, ताप विद्युत संयंत्रों से, सीमेंट उद्योग से निकले प्रदूषक हैं।

क्रियाकलाप-3: अपने इलाके का सर्वेक्षण कीजिए। आप हवा में क्या-क्या अवलोकन एवं अनुभव करते हैं जिसके कारण से हवा प्रदूषित होती है। हवा में मिलनेवाले वह पदार्थ जो हवा को दूषित करता है, वायु प्रदूषक कहलाता है। आप हवा में उड़नेवाले धुएँ को क्या कहेंगे? इस तरह बहुत तरह के ऐसे पदार्थ जो हवा में नज़र आते हैं उसकी एक तालिका बनाइए जिसमें वायुप्रदूषक, उनके स्रोत और प्रभाव की चर्चा हो — तालिका: स्रोत | वायु मण्डल में मिलनेवाले पदार्थ | प्रभाव (स्वयं भरें)।

क्या आपको पता है कि कुछ फूलों के पराग-कण इतने छोटे-छोटे होते हैं कि वे हवा में तैरते रहते हैं। इन परागकणों से कई व्यक्ति दमा रोग से पीड़ित हो जाते हैं। इस प्रकार वायु में मिलनेवाली बहुत जहरीली गैसें हैं जो जीवों पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रही हैं। क्या आप अम्लीय वर्षा के बारे में जानते हैं?

क्रियाकलाप-4: क्या आपकी कक्षा में dust less chalk का इस्तेमाल होता है?

ताजमहल और अम्ल वर्षा

हमारा ताजमहल दुनिया में प्रसिद्ध है, बहुत दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं। आपको भी कभी मौका लगे तो ज़रूर आगरा जाइए। किन्तु इस विशाल एवं भव्य इमारत की सफ़ेदी खत्म हो रही है। यह चिन्ता का विषय बन चुका है। आगरा से 40 किलोमीटर की दूरी पर मथुरा का तेल शोधक कारखाना है, जिसकी स्थापना 1973 में की गई थी। प्रतिदिन 25–30 टन सल्फरडाइऑक्साइड वायुमण्डल को देता है। इसी कारण आगरा के वायुमण्डल में सल्फरडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ गई है। सल्फरडाइऑक्साइड के साथ-साथ नाइट्रोजन के ऑक्साइड भी तेलशोधक कारखाने से निकलते हैं। वायु में ये जलवाष्प से अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक अम्ल और नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं। ये वर्षा के जल अम्लीय बना देते हैं, जिसे हम अम्ल वर्षा कहते हैं। ताजमहल संगमरमर या चूनापत्थर का बना है। वर्षा जल में उपस्थित अम्ल संगमरमर या चूना-पत्थर से क्रिया करके ताजमहल की दीवारों एवं गुम्बज का क्षरण कर रहा है। इसकी सफ़ेदी फीकी पड़ रही है। इसे वैज्ञानिकों ने संगमरमर कैंसर या stone cancer भी नाम दिया है। अब तो राजस्थान में नए-नए उर्वरक कारखाना भी लगे हैं जिससे संभवतः ताजमहल की और अधिक क्षति हो रही है। अच्छा है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कुछ मानक तैयार किए गए हैं जो ताज की सुरक्षा में अपेक्षित कदम होगा। चित्र-19.3: ताजमहल।

अम्ल वर्षा से सबसे अधिक क्षति स्वीडन की 20 हज़ार झीलों को हुई जिनकी सारी मछलियाँ मर गईं। इसी तरह जर्मनी के जंगलों को अम्ल वर्षा से अपार क्षति पहुँची है। मिट्टी की होनेवाली क्षति को चूना डालकर दूर किया जा सकता है। अम्लवर्षा को समाप्त करने के लिए उद्योगों से निकलनेवाले गंधक और नाइट्रोजन की ऑक्साइडों की मात्रा में कमी लाना आवश्यक है। ऐसा अनुमान है कि पूरे विश्व में प्रतिवर्ष 80 मिलियन टन SO2 वायुमण्डल में मिल जाती है। आप यह भी समझें कि कोई गैस जहाँ से निकलती है वहीं के वायुमण्डल में नहीं रहती। यह एक देश से हवाओं द्वारा दूसरे देश में पहुँच सकती है। चित्र-19.4: अम्ल वर्षा चक्र (कारखानों से SO2, दल-दल क्षेत्र से H2S, बादलों में SO2 + जलवाष्प → सल्फेटों में → अम्ल वर्षा)।

अम्ल वर्षा पेड़-पौधों की पत्तियों को क्षति पहुँचाता है, इससे प्रकाश संश्लेषण की दर धीमी हो जाती है, लोहा जैसी धातुओं का क्षरण हो जाता है। वायुमण्डल में इनकी उपस्थिति से धूम कोहरा बनता है जिससे दृश्यता प्रभावित होती है।

5. कार्बन डाइऑक्साइड और हरित घर प्रभाव (Carbon Dioxide and Green House Effect)

कार्बन डाइऑक्साइड पानी में घुलनशील है। अतः यह माना गया है कि जीवाश्म ईंधनों से निकलनेवाली CO2 का अधिकांश भाग समुद्री जल में घुल जाएगा जिससे वायुमण्डल में इसकी मात्रा कम होगी किन्तु यदि मानवकृत कारण से समुद्र के जल की घोलक क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़े तो अगले 200 वर्षों में CO2 की मात्रा 8 गुनी हो जाएगी। CO2 प्राकृतिक और मानवकृत स्रोतों द्वारा वायुमण्डल में पहुँच रही है। प्राकृतिक रूप से कार्बनिक पदार्थों के विघटन, मिथेन के ऑक्सीकरण से और मानवकृत कारणों में ऊर्जा की प्राप्ति हेतु जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग प्रमुख है। एक घरेलू कार सालभर में अपने भार से 4 गुनी अधिक CO2 पैदा करती है। अटलांटिक सागर को लाँघनेवाले हर हवाई जहाज़ से प्रति यात्री एक टन CO2 छोड़ी जाती है। वायुमण्डल में अत्यधिक CO2 की उपस्थिति से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिसे हरित घर प्रभाव (Green house effect) कहते हैं। इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं था परन्तु वायु मण्डल में CO2 की अत्यधिक मात्रा जीवन के लिए खतरा बन गया है।

आइए, अब इसके क्रियाकलाप और किस कारण बनाया जाता है इसको जानें — कुछ हरे पौधे गर्म वातावरण में ही पनपते हैं। उनके लिए शीशे की दीवारों से निर्मित घर बनाया जाता है जिसे हरितगृह या पौधघर (Green house) कहते हैं। शीशे की दीवारों द्वारा इनमें सूर्य से प्राप्त विकिरण प्रवेश करती हैं तथा पौधघर को गरम कर देती हैं। पौधघर की सतह गर्म होने के बाद मुख्यतः लम्बी तरंगदैर्ध्यवाली अवरक्त किरणें (Infra red ray) निकलती हैं जिन्हें शीशे की दीवारें परावर्तित कर देती हैं और पौधघर गर्म बना रहता है। यह गर्म वातावरण हरे पौधों को पनपने के लिए अनुकूल होता है जिससे वे बढ़ते हैं। चित्र-19.5: हरित घर।

वायुमण्डल में भी कार्बनडाइऑक्साइड की उपस्थिति के कारण पौधघर की ही तरह का प्रभाव उत्पन्न होता है और इसी कारण इसे पौधघर प्रभाव कहते हैं। चित्र-19.6: पृथ्वी का वातावरण (सामान्य बनाम ज़्यादा CO2)।

सूर्य की किरणें जब वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं तो ओज़ोन की परत द्वारा उसकी पराबैंगनी किरणें रुक जाती हैं। दृश्य विकिरण एवं कुछ छोटी तरंगदैर्ध्य वाली अवरक्त किरणें हवा से होती हुई पृथ्वी की सतह पर पहुँचती हैं और उसे गरम कर देती हैं। पृथ्वी की गरम सतह से मुख्यतः लम्बी तरंगदैर्ध्यवाली अवरक्त किरणें उत्सर्जित होती हैं। वायुमण्डल में CO2 गैस इन अवरक्त विकिरणों के अधिक भाग को अवशोषित कर पृथ्वी की सतह पर पुनः परावर्तित कर देती है जिससे पृथ्वी गर्म रहती है। वायुमण्डल में CO2 की अधिकता के कारण पौधघर प्रभाव अधिक उत्पन्न होता है जिससे पृथ्वी की सतह अधिक गर्म हो जाती है और हानिकारक प्रभाव उत्पन्न होते हैं। पौधघर प्रभाव के कारण पर्यावरण पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ने की संभावना है — 1. जलवायु में अवांछनीय परिवर्तन से सभी जीव प्रभावित होंगे। 2. पृथ्वी का ताप बढ़ जाने से बर्फ़ के पहाड़ पिघलने लगेंगे। अतः समुद्र जल की सतह बढ़ जाएगी और तट वाले क्षेत्र जल में डूब जाएँगे। 3. अत्यधिक गर्मी फसलों को हानि पहुँचाएगी जिससे कृषि उत्पादन में भारी क्षति होगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2030 तक पृथ्वी के तापमान में 2°C की वृद्धि हो सकती है।

6. वायु प्रदूषण रोकने के उपाय

आप को पता होगा कि दिल्ली सर्वाधिक वायु प्रदूषित शहर था किन्तु कुछ वर्षों के अथक प्रयास से वहाँ वाहनों में CNG का उपयोग होने लगा और आज दिल्ली में पहले की अपेक्षा कम प्रदूषण है। वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है, वाहनों को अच्छी हालत में रखने से अथवा ईंधन रहित वाहन चलाने से। घरों में धुआँ रहित चूल्हा प्रयोग करना चाहिए यानी ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ऐसे साधनों का प्रयोग करना होगा जिससे वायु प्रदूषण कम हो। ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ज्वारीय ऊर्जा आदि प्रमुख हैं। चित्र-19.7: CNG बस।

जैसा कि आप जान चुके हैं कि स्वचालित वाहनों में ईंधन के रूप में पेट्रोल या डीज़ल के अपूर्ण दहन से कार्बनमोनोक्साइड तथा कई अन्य विषैली गैसें निकलती हैं जो वायु को प्रदूषित करती रहती हैं। अतः इंजनों में ऐसी व्यवस्था हो कि ईंधन का पूर्णतः दहन हो सके। इसके अलावा गाड़ियों में उत्प्रेरक परिवर्तक लगाना चाहिए, यह एक विशेष प्रकार का संयंत्र है जिसमें CO और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों को उत्प्रेरक की उपस्थिति में CO2, H2O और नाइट्रोजन में परिणत किया जाता है परन्तु ऐसा करके भी हम प्रदूषकों को पूर्णतः रोक नहीं सकते। अतः इसके लिए न्यूनतम उपयोग और सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है। चित्र-19.8: 'पटाखे बंद करो / No Crackers' की रैली।

वायु प्रदूषण रोकने या उसे कम करने में वृक्षों का बहुत बड़ा हाथ है। एक हेक्टेयर में लगे पेड़ सालभर में 3 टन कार्बनडाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और 2 टन ऑक्सीजन बाहर निकालते हैं। अतः बड़ी संख्या में लगे पेड़ वायुमण्डल की CO2 का उपयोग करके 'पौधघर प्रभाव' को कम करने में सहायक हो सकते हैं। सदा हरे रहनेवाले, घनी पत्तियोंवाले ऐसे पेड़ लगाए जाएँ जो फ़ैक्टरी के प्रदूषण से आसानी से नष्ट न हों और उसे CO2 अवशोषित करने की क्षमता अधिक हो। चित्र-19.9: पौधा लगाते बच्चे।

अब जुलाई माह में प्रतिवर्ष 'वन महोत्सव' मनाया जाता है जिसके अन्तर्गत वृक्षारोपण किया जाता है।

7. जल प्रदूषण

पिछली कक्षा में आपने गंदे जल का निपटान पढ़ा। जल एक बहुत बड़ा संसाधन है जल हमारे लिए मूलभूत आवश्यकता है। आप एक सूची बनाइए और बताएँ कौन-कौन से काम के लिए इसकी आवश्यकता होती है।

इस तरह हम देखते हैं कि हमारे द्वारा किए गए दैनिक कार्य यथा नहाने, कपड़े धोने, खाना बनाने और अन्य कामों में जैसे उद्योग-धंधों एवं खेतों की सिंचाई में जल के उपयोग के बाद जल गंदा हो जाता है। क्या इन उपयोगों के बाद जल की गुणवत्ता पहले की ही तरह रहेगी? क्या उसे आप या हम पी सकेंगे? उत्तर होगा नहीं। अतः जब भी वाहित मल, विषैले रासायनिक पदार्थ यहाँ तक कि साबुन या डिटर्जेंटवाली झाग इसमें मिल जाती है तो इसके रंग और गंध भी बदल जाते हैं।

स्वच्छ जल सभी प्रकार के दोषों से मुक्त होते हैं किन्तु जब स्वच्छ जल के स्रोतों में ऐसे बाहरी पदार्थ मिल जाते हैं जो इसके गुणों में परिवर्तन लाकर इसे इस्तेमाल करनेवालों के लिए हानिकारक बना देते हैं तो वह जल प्रदूषण कहलाता है। जैसे निरन्तर बहनेवाली नदियों में शहरी कूड़ा-करकट गंदे पानी को छोड़ना — प्रदूषण का मुख्य कारण है।

क्रियाकलाप-5: विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जल के नमूनों को एकत्र कीजिए और इसकी गंध, रंग, अम्लीयता, क्षारीयता, कठोरता की तुलना कीजिए — तालिका: स्रोत | गंध | रंग | अम्लीय | क्षारीय | कठोरता (साबुन के साथ) — नल का जल, चापाकल का जल, तालाब का जल, कुएँ का जल, स्थानीय नदी का जल, गंगा का जल, झील का जल (स्वयं भरें)।

जल एक विलक्षण पदार्थ

गुणमान
सूत्रH2O
अणुभार18 g
घनत्व1 g / घन cm
गलनांक0°C
क्वथनांक100°C
गुप्त ऊष्माबर्फ़ और भाप की 80 और 536 Cal/g
गुणसर्वोत्तम विलायक (सभी को घुलाने की क्षमता)

जल कैसे प्रदूषित होता है?

जल वह प्राकृतिक उपहार है जिसका कोई विकल्प नहीं है इसीलिए आपने जगह-जगह लिखा हुआ पढ़ा होगा — "जल ही जीवन है"। मनुष्य को जिस वस्तु की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ती है, वह जल ही है और उसमें भी ताज़ा और मीठा जल। यह ताज़ा और मीठा जल ही पेय जल है। जल की आवश्यकतापूर्ति करने के उद्देश्य से ही मनुष्य प्रारम्भ से नदियों के किनारे निवास करता आया है। आज भी गंगा नदी के किनारे हमारे देश की एक तिहाई जनसंख्या निवास करती है। जनसंख्या की वृद्धि के साथ ही जल की आवश्यकता पीने तक ही सीमित न रहकर अन्य अनेक कार्यों में होने लगी है। इस तरह, अब जल का उपयोग पीने, घरेलू कार्यों, खेतों की सिंचाई, उद्योगों, नौका चालन, मनोरंजन आदि विभिन्न कार्यों के लिए होने लगा है। पृथ्वी की सतह के 70 प्रतिशत भाग में जल फैला है। यह सारा जल तरल रूप में नहीं है। कुछ भाग बर्फ़ के रूप में, कुछ वाष्प के रूप में वायुमण्डल में है, मिट्टी में भी जल है। जल का अधिकांश भाग सागर में है, जो पीने के योग्य नहीं है, क्योंकि यह खारा है। जल की पूरी मात्रा में से ताज़ा या पेय जल का अंश बहुत कम है केवल 2.8 प्रतिशत जिसमें से 2.2 प्रतिशत पृथ्वी की सतह पर है और शेष 0.6 प्रतिशत पृथ्वी के भीतर — भूमिगत जल के रूप में।

इतना ही नहीं पृथ्वी की सतह पर जितना जल है (2.2 प्रतिशत) उसमें से 2.15 प्रतिशत ग्लेशियर और हिमटोपी में है केवल 0.010 प्रतिशत झील और नदियों में है।

पृथ्वी के नीचे 0.6 प्रतिशत जल है उसमें से केवल 0.25 प्रतिशत ही निकालकर ऊपर लाया जा सकता है। अब सोचें कि जल की अनन्त राशि होते हुए भी मनुष्य के उपयोग के लिए जो जल उपलब्ध है, उसकी मात्रा सीमित है और ज़रा यह भी सोचिए कि अगर यह दूषित हो जाए तो फिर हमारे सारे कार्य रुक जाएँगे। चित्र-19.10: जल के वितरण का चित्र (सागर 97.25%, बर्फ़ 2.05%, भूमिगत जल 0.68% — चित्र के आँकड़े पाठ के 2.8/2.2/0.6 प्रतिशत से थोड़े भिन्न हैं; दोनों पुस्तक में ही दिए गए हैं)।

जल में आवश्यकता से अधिक खनिज पदार्थ, लवण, कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ, कल कारखानों से निकले कचरे, मलमूत्र, कूड़ा-करकट इत्यादि के मिल जाने से जल के लाभदायक गुण नष्ट हो जाते हैं और वह पीने योग्य नहीं रह जाता है ऐसा जल 'प्रदूषित जल' (polluted water) कहलाता है। ऐसे जल में जलीय जीव नष्ट होने लगते हैं। जल प्रदूषण का मुख्य कारण मनुष्य का क्रियाकलाप ही है।

क्रियाकलाप-6: अगर आपके गाँव या शहर में नदी या तालाब हों तो वहाँ जाइए और देखिए कौन-कौन से पदार्थ इसमें छोड़े जाते हैं। उनकी एक सूची तैयार कीजिए।

जैविक प्रदूषण

यद्यपि नदी-जल के प्रदूषण में उद्योगों की सबसे अधिक भागीदारी है, किन्तु नदियों में मलमूत्र बहाने तथा पशुओं को स्नान कराने आदि से भी जल प्रदूषण बढ़ा है। गंगा को पवित्र मानकर इसमें लाशें बहाने या अस्थि विसर्जन करने, नदी किनारे शौच जाने आदि से प्रदूषण बढ़ा है। अकेले गंगा नदी में अनेक शहरों का मल-जल बहाया जाता है। क्या इनकी कोई पहचान है?

मल के जीवाणु आसानी से पहचाने जा सकते हैं, अतः ये प्रदूषण के उत्तम सूचक हैं। ये जीवाणु हैं — इस्थेरेचिया कोलाई, कोलीफ़ार्म तथा मल स्ट्रेप्टोकोकाइ। जल में इनकी उपस्थिति से पेट की बीमारी जैसे हैज़ा, पेचिस आदि होती है। सामान्यतः विलयित ऑक्सीजन (Dissolved oxygen) तथा मल के कोलीफ़ार्म सूक्ष्म जीवों की संख्या को जल प्रदूषण का मानदण्ड बनाया जाता है।

क्या होता है — रासायनिक प्रदूषण?

जल एक अच्छा घोलक है। कई प्रकार के धात्विक पदार्थों जैसे, शीशा (Pb), मरकरी (Hg), कैडमियम (Cd), आदि नदियों, झीलों एवं तटीय सागर के जल को प्रदूषित करते हैं। जल में उपस्थित शीशा तथा मरकरी एन्जाइम से अभिक्रिया कर एन्जाइम की कार्यक्षमता को कम करते हैं, जिससे कई बीमारियाँ होती हैं। शीशा तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। कैडमियम से इटाई-इटाई तथा मरकरी से मिनिमाटा रोग होता है।

जल का प्रदूषण कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से होता है। वर्षा जल इन रसायनों को अपने में घुलाकर समीप में स्थित झीलों, तालाबों तथा नदियों में पहुँचा देता है और जल प्रदूषित हो जाता है। रासायनिक उर्वरकों में मुख्य रूप से यूरिया, अमोनियम सल्फेट आदि का प्रयोग होता है। जल में नाइट्रोजन तथा फ़ॉस्फोरस की मात्रा बढ़ने से जल में शैवाल (algae) की वृद्धि होती है। इसे इयूट्रोफिकेसन कहते हैं। शैवाल बैक्टीरिया द्वारा सड़ता है। इस सड़न प्रक्रिया में जल में घुली ऑक्सीजन का उपयोग होता है, जिससे जल में घुली ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने से जीव-जन्तुओं की मृत्यु हो जाती है।

क्रियाकलाप-7: • नदी के जल के प्रदूषकों की पहचान कीजिए। • नदी के शुद्धिकरण/तालाब के शुद्धिकरण के लिए आपस में चर्चा कीजिए।

8. जल का शुद्धिकरण

कभी-कभी ऐसा भी सुनने को मिलता है कि पानी पीने से लोग बीमार हो गए — ऐसा नहीं कि वह जल गंदा था या गंध वाला था, वह जल देखने में स्वच्छ था तथा उसमें कोई गंध भी नहीं थी परन्तु फिर भी लोग बीमार हो गए। निष्कर्ष यह निकाला जाता है कि जो जल स्वच्छ था, गंधहीन था उसमें सूक्ष्म जीव हो सकते हैं। अतः वह स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद नहीं है। इस तरह के जल को उबालकर स्वच्छ कर सकते हैं। उसे फ़िल्टर भी करके पी सकते हैं। उबालने से जल में उपस्थित जीवाणु मर जाते हैं। आप ब्लीचिंग पाउडर डालकर जल को पीने लायक बना सकते हैं। परन्तु ब्लीचिंग पाउडर या विरंजक चूर्ण भी एक निश्चित मात्रा ही मिलानी चाहिए।

जल प्रदूषण के दुष्प्रभाव

जल प्रदूषण से अनेक बीमारियों का प्रकोप हो सकता है। जैसे — हैज़ा (Cholera), टाइफ़ॉयड (Typhoid), पीलिया (Jaundice), अतिसार (Diarrhoea) इत्यादि। प्रदूषित जल पीने से पशुओं में भी बीमारी फैलती है। जल प्रदूषण के कारण जल में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे जलीय जन्तु मरने लगते हैं। पेड़-पौधों पर भी प्रदूषित जल का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनकी वृद्धि रुक जाती है। प्रदूषित जल से खेतों में लगी फसलों को भारी नुकसान पहुँचता है। प्रदूषित जल से सिंचाई करके उगाई गई फसलों भी प्रदूषित हो जाती हैं। इन फसलों, फलों एवं सब्जियों को खाने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

क्रियाकलाप-8: विभिन्न प्रदूषकों का एक तालिका बनाइए तथा इसका स्रोत और इसके प्रभाव को भी लिखिए — तालिका: स्रोत | जल प्रदूषक | प्रभाव (स्वयं भरें)।

9. जल प्रदूषण रोकने के उपाय

जल प्रदूषण को नियंत्रित कैसे किया जा सकता है? ऐसा जन जागरूकता अभियान चलाया जाए जिससे गाँवों एवं शहरों की नालियों के गंदे जल को तालाबों, नदियों आदि में न गिरने दिया जाए। ऐसे जल को शुद्ध करने के बाद ही तालाबों या नदियों में जाने दिया जाए। खाद्य पदार्थों के कचरों, काग़ज़ के टुकड़े, प्लास्टिक के थैले एवं उससे बनी चीज़ें सड़क के कूड़े-करकट को तालाबों या नदियों में नहीं फेंकना चाहिए। इन नदी और तालाबों के नज़दीक मलमूत्र नहीं त्यागना चाहिए। झीलों या नदियों के जल से शुद्ध करने के लिए शैवालों का प्रयोग करना चाहिए। समुद्र के जल को परमाणु-विस्फोट से सुरक्षित रखना चाहिए। कीटनाशकों का समुचित प्रयोग करना पड़ेगा, ताकि अत्यधिक कीटनाशक नदी या तालाब में न बह जाएँ।

अतिरिक्त पठन — विलक्षण अभियंता मोक्षगुण्डम् विश्वेश्वरैया

PDF के अंतिम पृष्ठ पर अध्याय से अलग एक जीवनी दी गई है — सर मोक्षगुण्डम् विश्वेश्वरैया आधुनिक भारत के विलक्षण अभियंता के रूप में जाने जाते हैं। इनका जन्म 15 सितम्बर 1860 ई० को मुदेनहल्ली, चिकबल्लापुर, तत्कालीन मैसूर राज्य, अब कर्नाटक में हुआ था। मद्रास विश्वविद्यालय से 1881 ई० में बी० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पूणे के सिविल अभियंत्रण महाविद्यालय से सिविल अभियंता की डिग्री ग्रहण की। अभियंता बनने के बाद उन्होंने तब बम्बई के पी०डब्ल्यू०डी० विभाग में नौकरी कर ली। वहाँ पर रहकर खड़कवासला के वेयर वाटर फ़्लड गेट की रूप-रेखा तैयार की तथा पूणे के जलाशय में इसे सफलतापूर्वक स्थापित किया। इसी प्रकार की पद्धति को टीगरा डैम ग्वालियर तथा कृष्णा सागर डैम माण्ड्य/मैसूर के जलाशय में स्थापित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1906–1907 में तत्कालीन भारतीय सरकार ने उन्हें अफ्रीका के इडेन में वाटर सप्लाई तथा ड्रेनेज सिद्धान्त का अध्ययन करने भेजा। उन्होंने परियोजना तैयार कर इसे इडेन में स्थापित भी करवाया। विश्वेश्वरैया द्वारा हैदराबाद के बाढ़ नियंत्रण पद्धति की रूप-रेखा तैयार कर इसे स्थापित करने के कारण उनकी ख्याति में चार चाँद लग गए। उन्होंने विशाखापत्तनम् बन्दरगाह को समुद्र में डूबने से बचाने के लिए एक पद्धति का निर्माण किया। 1912–1918 तक वे मैसूर राज्य के दीवान रहे। दीवान के रूप में उन्होंने उद्योग जगत के प्रसार में महती भूमिका निभायी। उन्होंने आधुनिक शिक्षा को भी काफ़ी आगे बढ़ाया। 1917 में बैंगलोर में सरकारी अभियंत्रण विद्यालय की स्थापना की, जो आज तक उत्कृष्ट शिक्षा का केन्द्र है। ब्रिटिश साम्राज्य ने उन्हें सर की उपाधि प्रदान किया। 1955 ई० में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। प्रत्येक वर्ष 15 सितम्बर उनके जन्म दिन को अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनकी मृत्यु 101 वर्ष की आयु में हुई। (यह जीवनी अध्याय के अभ्यास का भाग नहीं है — PDF के अंतिम पृष्ठ का अतिरिक्त पठन।)

Key Terms — मुख्य शब्द

  • वायुमण्डल (Atmosphere) — पृथ्वी के चारों ओर गैसों का आवरण; नाइट्रोजन 78.06%, ऑक्सीजन 20.94%, कार्बनडाइऑक्साइड 0.03%, अन्य गैसें (आर्गन, मिथेन, जलवाष्प) 0.97%।
  • वायु प्रदूषण (Air Pollution) — वायु में धूलकण, धुआँ और हानिकारक गैसों की पर्याप्त मात्रा में उपस्थिति से वायु का गंदा होना; सजीव और निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक।
  • प्रदूषक (Pollutant) — ऐसे पदार्थ जो वायु और जल दोनों को संदूषित करते हैं; वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण ऐसा संदूषण है जिससे सजीव और निर्जीव दोनों पर हानिकारक प्रभाव होता है।
  • कणिकाएँ (Particulates) — वायुमण्डल में गैसों में मिलकर तैरते रहने वाले ठोस पदार्थ; व्यास 0.02 से 100 माइक्रोमीटर; लंबे समय तक निलम्बित रहने से दृश्यता घटाते हैं, धुँध पैदा करते हैं; स्रोत: इस्पात निर्माण, खनन, ताप विद्युत संयंत्र, सीमेंट उद्योग।
  • अम्ल वर्षा (Acid rain) — वायु में सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का जलवाष्प से अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक अम्ल व नाइट्रिक अम्ल बनाना; वर्षा का जल अम्लीय हो जाना।
  • संगमरमर कैंसर / stone cancer — अम्ल वर्षा से संगमरमर/चूना-पत्थर की इमारतों (जैसे ताजमहल) की दीवारों व गुम्बज का क्षरण और सफ़ेदी का फीका पड़ना।
  • ओज़ोन (Ozone) — ऑक्सीजन का ही एक रूप जिसमें ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं; वायुमण्डल की ऊपरी परत में पराबैंगनी प्रकाश व बिजली की चमक से ऑक्सीजन गैस के टूटने से बनता है; पृथ्वी के चारों ओर लोचदार कवच बनाता है।
  • क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC — Chloro Fluoro Carbon) — अत्यधिक स्थायी, अज्वलनशील, हानिरहित (Nontoxic) मानव-निर्मित गैस; रेफ्रीजरेटर, एयर कण्डीशनर, ऐरोसोल फुहारों में उपयोग; पराबैंगनी किरणें इसे तोड़कर क्लोरीन बनाती हैं; क्लोरीन का एक परमाणु एक लाख ओज़ोन नष्ट करता है — ओज़ोन आवरण में छिद्र का कारण।
  • पौधा घर प्रभाव (Green House Effect) — वायुमण्डल में CO2 की उपस्थिति से पौधघर जैसा प्रभाव: पृथ्वी की सतह से उत्सर्जित लम्बी तरंगदैर्ध्यवाली अवरक्त किरणों को CO2 अवशोषित कर पुनः परावर्तित करती है, जिससे पृथ्वी गर्म रहती है; CO2 की अधिकता से प्रभाव बढ़ता है।
  • हरितगृह / पौधघर (Green house) — शीशे की दीवारों से निर्मित घर; सूर्य का विकिरण प्रवेश कर पौधघर को गरम करता है; सतह गर्म होने पर निकली लम्बी तरंगदैर्ध्यवाली अवरक्त किरणों को शीशे की दीवारें परावर्तित कर देती हैं, जिससे पौधघर गर्म बना रहता है।
  • कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (Carboxyhaemoglobin) — कार्बन मोनोक्साइड के रक्त के हीमोग्लोबिन से संयोग से बना यौगिक; इसके कारण हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन पहुँचाने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
  • हानिरहित (Non toxic) — विषैला न होने वाला (पुस्तक में CFC के लिए प्रयुक्त)।
  • संक्षारित (Corroded) — क्षरण/खराब होना (पुस्तक के 'नये शब्द' में; जैसे अम्ल वर्षा से धातुओं व संगमरमर का क्षरण)।
  • प्रदूषित जल (Polluted water) — आवश्यकता से अधिक खनिज, लवण, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ, कारखानों के कचरे, मलमूत्र, कूड़ा-करकट मिलने से लाभदायक गुण नष्ट होकर पीने योग्य न रहा जल।
  • जैविक प्रदूषण (Biological pollution) — नदियों में मलमूत्र बहाने, पशुओं को स्नान कराने, लाशें बहाने/अस्थि विसर्जन, नदी किनारे शौच से बढ़ा जल प्रदूषण; सूचक जीवाणु: इस्थेरेचिया कोलाई, कोलीफ़ार्म, मल स्ट्रेप्टोकोकाइ।
  • रासायनिक प्रदूषण (Chemical pollution) — धात्विक पदार्थों (शीशा Pb, मरकरी Hg, कैडमियम Cd) व कृषि रसायनों (यूरिया, अमोनियम सल्फेट) से जल का प्रदूषण; नाइट्रोजन-फ़ॉस्फोरस बढ़ने से शैवाल वृद्धि = इयूट्रोफिकेसन; शैवाल के सड़ने में घुली ऑक्सीजन खर्च होती है → जलीय जन्तुओं की मृत्यु।
  • इयूट्रोफिकेसन (Eutrophication) — जल में नाइट्रोजन व फ़ॉस्फोरस की मात्रा बढ़ने से शैवाल की वृद्धि।
  • विलयित ऑक्सीजन (Dissolved oxygen) — जल में घुली ऑक्सीजन; मल के कोलीफ़ार्म सूक्ष्म जीवों की संख्या के साथ जल प्रदूषण का मानदण्ड।

Remember — याद रखें

  • प्रदूषक ऐसे पदार्थ हैं जो वायु और जल दोनों को संदूषित करते हैं। वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण ऐसा संदूषण है जिससे सजीव और निर्जीव दोनों पर हानिकारक प्रभाव होता है।
  • कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बनडाइऑक्साइड तथा सल्फर डाइऑक्साइड वायु के प्रमुख प्रदूषक हैं।
  • वाहित मल, कृषि रसायन तथा औद्योगिक अपशिष्ट कुछ प्रमुख जल प्रदूषक हैं।

Exam Tip / Common Mistake — परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: CO2 को ही एकमात्र वायु प्रदूषक मानना — प्रमुख वायु प्रदूषक CO, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, CO2 और SO2 चारों हैं, और कणिकाएँ (0.02–100 माइक्रोमीटर) भी प्रदूषक हैं। दूसरी गलती: स्वच्छ दिखने वाले पारदर्शी जल को सदैव पीने लायक मानना — उसमें अदृश्य सूक्ष्म जीव हो सकते हैं; उबालना, फ़िल्टर करना या निश्चित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर डालना ज़रूरी है। तीसरी गलती: अम्ल वर्षा को केवल ताजमहल तक सीमित समझना — स्वीडन की 20 हज़ार झीलों की मछलियाँ मर गईं, जर्मनी के जंगल क्षतिग्रस्त हुए, मिट्टी-फसल-पत्तियाँ-धातुएँ सभी प्रभावित होती हैं। चौथी गलती: पौधा घर प्रभाव को पूरी तरह हानिकारक मानना — इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं था; खतरा CO2 की अत्यधिक मात्रा से है।

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. वायुमण्डल के संघटन की तालिका लिखिए और समझाइए कि पृथ्वी पर ही जीवन क्यों है (वायु और जल की पहली आवश्यकता के साथ)।
  2. कार्बन मोनोक्साइड कैसे बनता है और यह शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति क्यों रोक देता है? बंद कमरे में मोमबत्ती/डिबरी जलाकर सोने की चेतावनी से जोड़कर समझाइए।
  3. अम्ल वर्षा का चक्र (SO2 + जलवाष्प → सल्फ्यूरिक/नाइट्रिक अम्ल) चित्र सहित समझाइए और ताजमहल के 'संगमरमर कैंसर' से जोड़िए।
  4. हरित घर प्रभाव को पौधघर (ग्रीन हाउस) के उदाहरण से समझाइए और इसके तीन पर्यावरणीय प्रभाव (जलवायु परिवर्तन, बर्फ़ पिघलना-समुद्र स्तर, फसल क्षति) लिखिए।
  5. जल के वितरण के आँकड़े (2.8% ताज़ा जल, 0.010% झील-नदियों में, 0.25% ही निकालने योग्य भूमिगत जल) से समझाइए कि उपलब्ध जल सीमित क्यों है।

प्रश्न और उत्तर — Questions with Answers

  1. प्रश्न: वायु प्रदूषण क्या है और इसके मुख्य स्रोत कौन-से हैं?
    उत्तर: प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ गंदगी है। कारखानों की चिमनियों से निकलनेवाली गैसों, वाहनों में पेट्रोल-डीज़ल के दहन और मनुष्य के अन्य क्रियाकलापों से बड़े नगरों के आस-पास की वायु में धूलकण, धुआँ और हानिकारक गैसें पर्याप्त मात्रा में मिलकर उसे गंदा कर देती हैं — यही वायु प्रदूषण है; ऐसी वायु में साँस लेना भी आसान नहीं होता और यह सजीव-निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक है। मुख्य प्रदूषक: कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बनडाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड; स्रोत: रासायनिक/तेलशोधक/उर्वरक/सीमेंट/काग़ज़/काँच कारखाने, मोटर वाहन (साठ प्रतिशत वायु प्रदूषण वाहनों से ही), खनन-धातु निष्कासन (लेड, क्रोमियम, जस्ता, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक), कीटनाशकों का छिड़काव, वृक्षों की बेतरतीब कटाई। प्राकृतिक प्रदूषक (आँधी, जंगल की आग, ज्वालामुखी) भी होते हैं, पर औद्योगिक क्रांति ने सभी प्रकार के प्रदूषण को बढ़ावा दिया है।
  2. प्रश्न: ओज़ोन परत क्या है और CFC उसे कैसे नुकसान पहुँचाता है?
    उत्तर: ओज़ोन ऑक्सीजन का ही एक रूप है जिसमें ऑक्सीजन के तीन परमाणु होते हैं; यह वायुमण्डल की ऊपरी परत में पराबैंगनी प्रकाश व बिजली की चमक से ऑक्सीजन गैस के टूटने से बनता है और पृथ्वी के चारों ओर एक लोचदार कवच बनाता है (समुद्री सतह के दाब तक लाने पर केवल कुछ मिलीमीटर)। CFC अत्यधिक स्थायी, अज्वलनशील, हानिरहित पदार्थ है (रेफ्रीजरेटर, एयर कण्डीशनर, ऐरोसोल फुहारों में उपयोग); स्थायी होने से यह लंबे समय तक वायुमण्डल में रहकर ऊपर की परत तक पहुँचता है, जहाँ सूर्य की पराबैंगनी किरणें इसे तोड़कर क्लोरीन बनाती हैं; क्लोरीन का एक परमाणु एक लाख ओज़ोन नष्ट करता है, जिससे ओज़ोन आवरण में छिद्र हो गया है। ओज़ोन क्षति से पराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी पर बढ़ेंगी, जिससे चमड़ी का कैंसर, संक्रामक रोग और मोतियाबिन्द के मरीज़ बढ़ेंगे। रोकथाम: ओज़ोन फ्रेंडली तकनीकें, CFC का कम उपयोग, क्लोरीन रहित फ्लोरोकार्बन, सभी देशों के समयबद्ध-योजनाबद्ध कार्यक्रम।
  3. प्रश्न: हरित घर प्रभाव क्या है और यह पृथ्वी को कैसे गर्म करता है?
    उत्तर: सूर्य की किरणें वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं तो ओज़ोन परत पराबैंगनी किरणें रोक लेती है; दृश्य विकिरण व कुछ छोटी तरंगदैर्ध्य वाली अवरक्त किरणें पृथ्वी की सतह पर पहुँचकर उसे गरम करती हैं; गरम सतह से मुख्यतः लम्बी तरंगदैर्ध्यवाली अवरक्त किरणें उत्सर्जित होती हैं; वायुमण्डल में CO2 इन अवरक्त विकिरणों के अधिक भाग को अवशोषित कर पृथ्वी की सतह पर पुनः परावर्तित कर देती है, जिससे पृथ्वी गर्म रहती है — यही पौधघर (ग्रीन हाउस) जैसा प्रभाव है, क्योंकि शीशे के पौधघर में भी सूर्य का विकिरण प्रवेश कर सतह को गरम करता है और निकली लम्बी अवरक्त किरणों को शीशे की दीवारें परावर्तित कर देती हैं। इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं था, पर CO2 की अधिकता से प्रभाव बढ़ता है: जलवायु में अवांछनीय परिवर्तन, बर्फ़ के पहाड़ पिघलकर समुद्र स्तर बढ़ना व तट डूबना, अत्यधिक गर्मी से फसलों को भारी क्षति; वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2030 तक पृथ्वी के तापमान में 2°C की वृद्धि हो सकती है।
  4. प्रश्न: जल प्रदूषण क्या है? जैविक और रासायनिक प्रदूषण में अंतर बताइए।
    उत्तर: स्वच्छ जल सभी दोषों से मुक्त होता है; जब उसके स्रोतों में बाहरी पदार्थ मिलकर उसके गुण बदलकर उसे उपयोगकर्ताओं के लिए हानिकारक बना देते हैं, तो वह जल प्रदूषण कहलाता है — जैसे निरन्तर बहनेवाली नदियों में शहरी कूड़ा-करकट और गंदा पानी छोड़ना। मुख्य कारण मनुष्य का क्रियाकलाप है। जैविक प्रदूषण: नदियों में मलमूत्र बहाना, पशुओं को स्नान कराना, गंगा में लाशें बहाना/अस्थि विसर्जन, नदी किनारे शौच — सूचक जीवाणु इस्थेरेचिया कोलाई, कोलीफ़ार्म, मल स्ट्रेप्टोकोकाइ (इनसे हैज़ा, पेचिस); मानदण्ड: विलयित ऑक्सीजन व मल कोलीफ़ार्म सूक्ष्म जीवों की संख्या। रासायनिक प्रदूषण: धात्विक पदार्थ (शीशा Pb, मरकरी Hg, कैडमियम Cd) — शीशा तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, कैडमियम से इटाई-इटाई, मरकरी से मिनिमाटा रोग; कृषि रसायन (यूरिया, अमोनियम सल्फेट) वर्षा जल से झीलों-तालाबों-नदियों में पहुँचते हैं; नाइट्रोजन-फ़ॉस्फोरस बढ़ने से शैवाल वृद्धि (इयूट्रोफिकेसन), शैवाल के सड़ने में घुली ऑक्सीजन खर्च होती है → जलीय जन्तुओं की मृत्यु।
  5. प्रश्न: जल को शुद्ध कैसे किया जाता है और जल प्रदूषण कैसे रोका जा सकता है?
    उत्तर: स्वच्छ दिखने वाले गंधहीन जल में भी सूक्ष्म जीव हो सकते हैं, इसलिए उसे उबालकर (जीवाणु मर जाते हैं), फ़िल्टर करके या निश्चित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर डालकर पीने लायक बनाया जा सकता है। रोकथाम: जन जागरूकता अभियान — गाँवों-शहरों की नालियों का गंदा जल शुद्ध किए बिना तालाबों-नदियों में न गिरने देना; खाद्य कचरे, काग़ज़ के टुकड़े, प्लास्टिक थैले व सड़क के कूड़े-करकट को तालाबों-नदियों में न फेंकना; नदी-तालाबों के नज़दीक मलमूत्र न त्यागना; झीलों-नदियों के जल को शुद्ध करने के लिए शैवालों का प्रयोग; समुद्र के जल को परमाणु-विस्फोट से सुरक्षित रखना; कीटनाशकों का समुचित प्रयोग ताकि अत्यधिक कीटनाशक नदी-तालाब में न बह जाएँ।

Extension — पुस्तक के अभ्यास के प्रश्न-प्रकार

  1. विस्तृत (1): प्रदूषण क्या है? — प्रदूषण का शाब्दिक अर्थ गंदगी है; प्रदूषक ऐसे पदार्थ हैं जो वायु और जल दोनों को संदूषित करते हैं; वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण ऐसा संदूषण है जिससे सजीव और निर्जीव दोनों पर हानिकारक प्रभाव होता है।
  2. टिप्पणी (2): क्या स्वच्छ पारदर्शी जल सदैव पीने लायक है? — नहीं। देखने में स्वच्छ और गंधहीन जल में भी सूक्ष्म जीव हो सकते हैं, इसलिए वह स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद नहीं होता; ऐसे जल को उबालकर, फ़िल्टर करके या निश्चित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर डालकर ही पीना चाहिए।
  3. चर्चा (3): क्या आपके आस-पास स्वच्छ जल की आपूर्ति हो रहा है? — इस पर प्रकाश डालिए (स्थानीय सर्वेक्षण-कार्य: अपने क्षेत्र के जल स्रोतों — नल, चापाकल, तालाब, कुआँ, नदी — के जल की गंध, रंग, अम्लीयता, क्षारीयता, कठोरता की तुलना क्रियाकलाप-5 की तालिका से कीजिए)।
  4. अंतर (4): शुद्ध वायु और प्रदूषित वायु में क्या अंतर है? — शुद्ध वायु का संघटन: नाइट्रोजन 78.06%, ऑक्सीजन 20.94%, कार्बनडाइऑक्साइड 0.03%, अन्य गैसें 0.97%; प्रदूषित वायु में इसके अतिरिक्त धूलकण, धुआँ, CO, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, SO2, धातु के महीन कण, कार्बन के कण पर्याप्त मात्रा में मिल जाते हैं — ऐसी वायु में साँस लेना भी आसान नहीं होता और यह सजीव-निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक है।
  5. टिप्पणी (5): अम्ल वर्षा कैसे होती है? प्रभाव की चर्चा — कारखानों की चिमनियों व वाहनों से निकले SO2 व नाइट्रोजन के ऑक्साइड वायु में जलवाष्प से अभिक्रिया कर सल्फ्यूरिक अम्ल व नाइट्रिक अम्ल बनाते हैं; वर्षा का जल अम्लीय हो जाता है। प्रभाव: स्वीडन की 20 हज़ार झीलों की सारी मछलियाँ मर गईं; जर्मनी के जंगल अपार क्षतिग्रस्त; मिट्टी की क्षति (चूना डालकर दूर की जा सकती है); पेड़-पौधों की पत्तियों को क्षति, प्रकाश संश्लेषण की दर धीमी; लोहा जैसी धातुओं का क्षरण; धूम कोहरा, दृश्यता प्रभावित; ताजमहल का संगमरमर कैंसर; विश्व में प्रतिवर्ष 80 मिलियन टन SO2 वायुमण्डल में मिलती है; गैस एक देश से हवाओं द्वारा दूसरे देश में पहुँच सकती है।
  6. MCQ (6): निम्नलिखित में से कौनसी पौधा घर गैस नहीं है? — (घ) नाइट्रोजन (कार्बन डाइऑक्साइड पौधा घर प्रभाव की मुख्य गैस है; मिथेन भी वायुमण्डलीय गैस है; सल्फर डाइऑक्साइड का मुख्य अध्याय-भूमिका अम्ल वर्षा है, पर स्पष्ट 'नहीं है' वाला विकल्प नाइट्रोजन है — वायुमण्डल का निष्क्रिय बहुमत घटक)।
  7. प्रकाश (7): ताजमहल की सुन्दरता को ग्रहण लग रहा है — आगरा से 40 किमी दूर मथुरा तेल शोधक कारखाना (स्थापना 1973) प्रतिदिन 25–30 टन SO2 वायुमण्डल को देता है; SO2 व नाइट्रोजन के ऑक्साइड जलवाष्प से सल्फ्यूरिक व नाइट्रिक अम्ल बनाते हैं → अम्ल वर्षा; ताजमहल संगमरमर/चूना-पत्थर का बना है — अम्ल दीवारों व गुम्बज का क्षरण कर रहा है, सफ़ेदी फीकी पड़ रही है (संगमरमर कैंसर/stone cancer); राजस्थान के नए उर्वरक कारखानों से और अधिक क्षति की संभावना; सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तैयार मानक ताज की सुरक्षा में अपेक्षित कदम होंगे।
  8. उपयोगिता व शुद्धिकरण (8): जल की उपयोगिता — पीने, घरेलू कार्यों, खेतों की सिंचाई, उद्योगों, नौका चालन, मनोरंजन; यह मूलभूत आवश्यकता है ('जल ही जीवन है'); शुद्धिकरण — उबालना (जीवाणु मर जाते हैं), फ़िल्टर करना, निश्चित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर डालना।
  9. परिणाम (9): यदि हम प्रदूषित जल पिएं तो क्या होगा? — हैज़ा, टाइफ़ॉयड, पीलिया, अतिसार जैसी बीमारियाँ; पशुओं में भी बीमारी; जल में ऑक्सीजन की कमी से जलीय जन्तुओं की मृत्यु; पेड़-पौधों की वृद्धि रुकना; प्रदूषित जल से सिंचित फसलों का प्रदूषित होना और उन्हें खाने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव।
  10. सही/गलत (10क): संसार की 25 प्रतिशत जनसंख्या को निरापद पेयजल नहीं मिलता है — अध्याय के पृष्ठों में यह आँकड़ा नहीं दिया गया है; पुस्तक के आधार पर T/F तय नहीं किया जा सकता — शिक्षक से पूछें (अनुमान से उत्तर नहीं दिया गया है)।
  11. सही/गलत (10ख): गर्म जल भी एक प्रदूषक होता है — सही (तापीय प्रदूषण के रूप में गर्म जल को प्रदूषक माना जाता है — यह उत्तर मानक अवधारणा से है; अध्याय में गर्म जल का उल्लेख नहीं है, यह QA में स्पष्ट किया गया है)।
  12. सही/गलत (10ग): जुलाई माह में प्रतिवर्ष वन महोत्सव मनाया जाता है — सही (अध्याय में स्पष्ट: जुलाई माह में प्रतिवर्ष 'वन महोत्सव' मनाया जाता है)।
  13. सही/गलत (10घ): अम्लीय वर्षा खेतों की मिट्टी को प्रभावित करता है — सही (मिट्टी की क्षति होती है, जिसे चूना डालकर दूर किया जा सकता है)।
  14. उपाय (11): वायु प्रदूषण रोकने के उपाय — वाहनों को अच्छी हालत में रखना, ईंधन रहित वाहन चलाना, CNG का उपयोग (दिल्ली का उदाहरण — पहले सर्वाधिक प्रदूषित, CNG के बाद पहले से कम प्रदूषण), घरों में धुआँ रहित चूल्हा, ऊर्जा के वैकल्पिक साधन (सौर, पवन, ज्वारीय ऊर्जा), इंजनों में पूर्ण दहन की व्यवस्था, उत्प्रेरक परिवर्तक (CO व नाइट्रोजन के ऑक्साइड → CO2, H2O, नाइट्रोजन; फिर भी प्रदूषक पूर्णतः नहीं रुकते), न्यूनतम उपयोग व सामूहिक प्रयास, वृक्षारोपण (एक हेक्टेयर के पेड़ सालभर में 3 टन CO2 ग्रहण, 2 टन O2 बाहर; सदा हरे, घनी पत्तियों वाले पेड़), जुलाई में 'वन महोत्सव'।
  15. रेखाचित्र (12): पौधा घर प्रभाव को दर्शाइए — सूर्य की किरणें वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं (ओज़ोन परत पराबैंगनी किरणें रोकती है); दृश्य व छोटी अवरक्त किरणें पृथ्वी की सतह को गरम करती हैं; गरम सतह से लम्बी अवरक्त किरणें उत्सर्जित होती हैं; CO2 इनके अधिक भाग को अवशोषित कर पुनः परावर्तित करती है → पृथ्वी गर्म रहती है; CO2 की अधिकता में प्रभाव बढ़ता है (चित्र-19.6: सामान्य बनाम ज़्यादा CO2 वाला वातावरण)।
  16. चर्चा (13): कणिकाओं द्वारा होनेवाले प्रदूषण की चर्चा — कणिकाएँ (Particulates) वायुमण्डल में तैरते ठोस पदार्थ, व्यास 0.02–100 माइक्रोमीटर; लंबे समय तक निलम्बित रहने से दृश्यता घटती है, धुँध पैदा करते हैं; स्रोत: इस्पात निर्माण, खनन, ताप विद्युत संयंत्र, सीमेंट उद्योग; फूलों के पराग-कण भी हवा में तैरते हैं और कई व्यक्तियों को दमा रोग से पीड़ित करते हैं; क्रियाकलाप-4: क्या आपकी कक्षा में dust less chalk का इस्तेमाल होता है?
  17. भोपाल गैस काण्ड (14): 2–3 दिसम्बर 1984 की मध्यरात्रि, मध्यप्रदेश के भोपाल में; कीटनाशक दवा बनानेवाली यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी से मिथाइल आइसो साइनेट (MIC) नामक द्रव ताप बढ़ जाने से गैस बन गया; रिसाव शुरू हुआ; गैस साँस के साथ फेफड़ों में गई, फेफड़ों में पानी भर गया, सांस फूली, दम घुट गई; हज़ारों लोग मारे गए, हज़ारों अपंग होकर आज भी कष्टदायक जीवन व्यतीत कर रहे हैं — औद्योगिक विकास के चेहरे पर गहरी कालिख।
  18. प्रकाश (15): पृथ्वी को बचाने के लिए पर्यावरण संरक्षण आवश्यक है — मानव व्यवहार और पर्यावरण के बीच गहरा संबंध है; प्रारंभ में जनसंख्या सीमित व संसाधन असीमित थे, पर जनसंख्या वृद्धि व औद्योगिक विकास से प्राकृतिक स्रोतों का निर्मम शोषण हुआ और पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा पैदा हुआ; वृक्ष पर्यावरण को स्वतः शुद्ध करते हैं, पर बेतरतीब कटाई से वर्षा अनियमित व अनावृष्टि; ओज़ोन फ्रेंडली तकनीकें, CFC का कम उपयोग, क्लोरीन रहित फ्लोरोकार्बन, सभी देशों के समयबद्ध-योजनाबद्ध कार्यक्रम; वृक्षारोपण व वन महोत्सव; न्यूनतम उपयोग व सामूहिक प्रयास — यही संरक्षण है।
  19. मिलान (16): कार्बन मोनोक्साइड — रक्त की ऑक्सीजन वाहन क्षमता घटती है (कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है); क्लोरीन — आंखों में जलन, खुजली (शेष जोड़ा; अध्याय में क्लोरीन का आँखों से सीधा संबंध नहीं दिया गया है — यह QA में स्पष्ट किया गया है); सल्फरडाइ ऑक्साइड — अम्लवाष्प, खाँसी (SO2 से अम्ल वर्षा व श्वसन-कष्ट); धूल कणिकाएँ — फेफड़ा का खराब होना (कणिकाएँ फेफड़ों को नुकसान पहुँचाती हैं, दृश्यता घटाती हैं)।
Recap — वायु एवं जल-प्रदूषण की समस्या
  • शुरुआत: पृथ्वी पर ही जीवन क्यों? मंगल-चंद्रमा पर क्यों नहीं? जीवित रहने के लिए वायु और जल पहली आवश्यकता; पृथ्वी के वायुमण्डल में हवा व पानी अधिक मात्रा में — इसलिए वृक्ष, पशु, मनुष्य हैं।
  • वायुमण्डल का संघटन: नाइट्रोजन 78.06%, ऑक्सीजन 20.94%, कार्बनडाइऑक्साइड 0.03%, अन्य (आर्गन, मिथेन, जलवाष्प) 0.97%; क्रियाकलाप-1 (गोले को रंगों से भरना, a-b-c-d की गैसें बताना); सुबह की ताज़ी हवा महानगरों व छोटे शहरों से भी गायब (वाहनों व कारखानों के धुएँ से आसमान काला; पटना के व्यस्त चौराहे, बरौनी-हाथीदह); क्रियाकलाप-2 (ईंट के भट्ठे, व्यस्त इलाके — खाँसी, सिरदर्द; गाँव का बगीचा बनाम वाहनों भरी सड़क, कूड़े-करकट वाले इलाके बनाम खुला मैदान — अनुभव तालिका); विचार-प्रश्न (वृक्ष सबसे अच्छा मित्र? गर्म मौसम/भीड़ में अच्छा लगता है? नदियाँ पवित्र फिर भी गंदी क्यों?) → मानव व्यवहार व पर्यावरण के बीच गहरा संबंध; जनसंख्या वृद्धि + औद्योगिक विकास → संसाधनों का निर्मम शोषण → पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा।
  • वायु प्रदूषण: प्रदूषण = गंदगी; ऑक्सीजन प्रकृति की महत्त्वपूर्ण देन; कारखानों की चिमनियों, वाहनों में पेट्रोल-डीज़ल के दहन व अन्य क्रियाकलापों से बड़े नगरों की वायु में धूलकण, धुआँ, हानिकारक गैसें — ऐसी वायु में साँस लेना भी आसान नहीं, सजीव-निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक; दो वास्तविक घटनाएँ — डेट्रॉइट के पास अम्ल वर्षा (सल्फर डाइऑक्साइड + बादल → गंधक का अम्ल, कपड़े जले, लोग चीखे) और भोपाल गैस काण्ड (2–3 दिसम्बर 1984, यूनियन कार्बाइड, MIC गैस, फेफड़ों में पानी, दम घुटना, हज़ारों मरे-अपंग)।
  • वायु कैसे प्रदूषित होती है: प्राकृतिक प्रदूषक (आँधी, जंगल की आग, ज्वालामुखी — प्रकृति की लीला, किसी का वश नहीं); मानव-जनित बढ़ावा (औद्योगिक क्रांति); कारखानों की चिमनियों से CO, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, SO2, धातु के महीन कण, कार्बन के कण; वाहन (एक मोटरगाड़ी एक मिनट में 1135 व्यक्तियों के श्वसन जितनी ऑक्सीजन नष्ट करती है; साठ प्रतिशत वायु प्रदूषण वाहनों से); जीवाश्म ईंधन जलने से CO2 बढ़ती है; अपूर्ण दहन से CO — विषैली गैस, हीमोग्लोबिन से कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है, ऑक्सीजन पहुँचाने की क्षमता समाप्त, दम घुटना, मृत्यु तक; चेतावनी (बंद कमरे में मोमबत्ती/डिबरी जलाकर सोना खतरनाक); खनन से लेड, क्रोमियम, जस्ता, पारा, कैडमियम, आर्सेनिक; कीटनाशकों का छिड़काव; वृक्षों की बेतरतीब कटाई → वर्षा अनियमित, अनावृष्टि।
  • ओज़ोन व CFC: CFC अत्यधिक स्थायी, अज्वलनशील, हानिरहित (रेफ्रीजरेटर, AC, ऐरोसोल); लंबे समय तक वायुमण्डल में रहकर ऊपरी परत तक पहुँचता है; पराबैंगनी किरणें CFC तोड़कर क्लोरीन बनाती हैं; क्लोरीन का एक परमाणु एक लाख ओज़ोन नष्ट करता है → ओज़ोन आवरण में छिद्र; ओज़ोन = ऑक्सीजन का रूप (तीन परमाणु), ऊपरी परत में पराबैंगनी प्रकाश व बिजली की चमक से बनता है, पृथ्वी के चारों ओर लोचदार कवच (समुद्री दाब तक लाने पर केवल कुछ मिलीमीटर); जानकारी 1970 के शुरुआती वर्षों में; क्षति से पराबैंगनी किरणें सीधे बढ़ेंगी → चमड़ी का कैंसर, संक्रामक रोग, मोतियाबिन्द बढ़ेंगे; रोकथाम — ओज़ोन फ्रेंडली तकनीकें, CFC कम, क्लोरीन रहित फ्लोरोकार्बन, समयबद्ध-योजनाबद्ध कार्यक्रम।
  • कणिकाएँ व अम्ल वर्षा: कणिकाएँ (Particulates) — तैरते ठोस पदार्थ, व्यास 0.02–100 माइक्रोमीटर, लंबे समय तक निलम्बित → दृश्यता घटती है, धुँध; स्रोत: इस्पात, खनन, ताप विद्युत, सीमेंट; पराग-कण → दमा; क्रियाकलाप-3 (इलाके का सर्वेक्षण, वायुप्रदूषक-स्रोत-प्रभाव तालिका); क्रियाकलाप-4 (dust less chalk); ताजमहल व अम्ल वर्षा — मथुरा तेल शोधक (1973, आगरा से 40 किमी, प्रतिदिन 25–30 टन SO2), SO2 + नाइट्रोजन ऑक्साइड + जलवाष्प → सल्फ्यूरिक + नाइट्रिक अम्ल → अम्ल वर्षा; संगमरमर/चूना-पत्थर का क्षरण, सफ़ेदी फीकी (संगमरमर कैंसर/stone cancer); राजस्थान के उर्वरक कारखानों से और क्षति की संभावना; सर्वोच्च न्यायालय के मानक; स्वीडन की 20 हज़ार झीलों की मछलियाँ मरीं, जर्मनी के जंगल क्षतिग्रस्त; मिट्टी की क्षति चूना डालकर दूर; विश्व में प्रतिवर्ष 80 मिलियन टन SO2; गैस एक देश से हवाओं द्वारा दूसरे देश में पहुँच सकती है; अम्ल वर्षा से पत्तियों को क्षति, प्रकाश संश्लेषण धीमा, लोहे का क्षरण, धूम कोहरा, दृश्यता प्रभावित।
  • CO2 व हरित घर प्रभाव: CO2 पानी में घुलनशील — माना गया था अधिकांश भाग समुद्री जल में घुल जाएगा, पर समुद्र की घोलक क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़े तो अगले 200 वर्षों में CO2 8 गुनी; स्रोत — प्राकृतिक (कार्बनिक पदार्थों का विघटन, मिथेन का ऑक्सीकरण) व मानवकृत (जीवाश्म ईंधन); घरेलू कार सालभर में अपने भार से 4 गुनी अधिक CO2; अटलांटिक पार हवाई जहाज़ से प्रति यात्री एक टन CO2; अत्यधिक CO2 → हरित घर प्रभाव; इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं था, पर अधिकता जीवन के लिए खतरा; पौधघर (शीशे की दीवारों वाला घर) — सूर्य का विकिरण प्रवेश कर सतह गरम करता है, निकली लम्बी अवरक्त किरणों को शीशा परावर्तित करता है → पौधघर गर्म; वायुमण्डल में CO2 भी यही करती है; ओज़ोन परत पराबैंगनी किरणें रोकती है, दृश्य व छोटी अवरक्त किरणें सतह गरम करती हैं, सतह से लम्बी अवरक्त किरणें CO2 द्वारा अवशोषित-परावर्तित → पृथ्वी गर्म; प्रभाव — जलवायु में अवांछनीय परिवर्तन, बर्फ़ पिघलकर समुद्र स्तर बढ़ना व तट डूबना, अत्यधिक गर्मी से फसलों को भारी क्षति; 2030 तक तापमान में 2°C वृद्धि का अनुमान।
  • वायु प्रदूषण रोकने के उपाय: दिल्ली में CNG (पहले सर्वाधिक प्रदूषित, अब पहले से कम); वाहनों की अच्छी हालत, ईंधन रहित वाहन, घरों में धुआँ रहित चूल्हा, वैकल्पिक ऊर्जा (सौर, पवन, ज्वारीय); इंजनों में पूर्ण दहन, उत्प्रेरक परिवर्तक (CO व नाइट्रोजन ऑक्साइड → CO2, H2O, नाइट्रोजन; फिर भी पूर्ण रोक नहीं); न्यूनतम उपयोग व सामूहिक प्रयास; वृक्ष (एक हेक्टेयर के पेड़ सालभर में 3 टन CO2 ग्रहण, 2 टन O2 बाहर; सदा हरे, घनी पत्तियों वाले पेड़); जुलाई में प्रतिवर्ष 'वन महोत्सव'।
  • जल प्रदूषण: जल मूलभूत आवश्यकता ('जल ही जीवन है'); दैनिक कार्य (नहाना, कपड़े धोना, खाना बनाना) व उद्योग-सिंचाई के बाद जल गंदा; वाहित मल, विषैले रसायन, साबुन-डिटर्जेंट की झाग मिलने पर रंग-गंध बदलते हैं; स्वच्छ जल दोषों से मुक्त; बाहरी पदार्थों से गुण बदलकर हानिकारक बनना = जल प्रदूषण (नदियों में शहरी कूड़ा-गंदा पानी मुख्य कारण); क्रियाकलाप-5 (विभिन्न स्रोतों के जल की गंध-रंग-अम्लीयता-क्षारीयता-कठोरता की तुलना); जल एक विलक्षण पदार्थ (H2O, अणुभार 18 g, घनत्व 1 g/घन cm, गलनांक 0°C, क्वथनांक 100°C, गुप्त ऊष्मा बर्फ़ 80 व भाप 536 Cal/g, सर्वोत्तम विलायक); ताज़ा-मीठा जल ही पेय जल; गंगा किनारे देश की एक तिहाई जनसंख्या; उपयोग — पीना, घरेलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, नौका चालन, मनोरंजन; पृथ्वी की सतह के 70% भाग में जल (तरल ही नहीं — बर्फ़, वाष्प, मिट्टी में भी); अधिकांश सागर में (खारा, पीने योग्य नहीं); ताज़ा जल केवल 2.8% (2.2% सतह पर, 0.6% भूमिगत); सतह के जल में से 2.15% ग्लेशियर-हिमटोपी में, केवल 0.010% झील-नदियों में; भूमिगत 0.6% में से केवल 0.25% ही निकालकर ऊपर लाया जा सकता है — उपलब्ध जल सीमित है, दूषित होने पर सारे कार्य रुक जाएँगे; चित्र-19.10 के आँकड़े (सागर 97.25%, बर्फ़ 2.05%, भूमिगत 0.68%) पाठ के आँकड़ों से थोड़े भिन्न हैं, दोनों पुस्तक में ही दिए गए हैं।
  • प्रदूषित जल: खनिज, लवण, कार्बनिक-अकार्बनिक पदार्थ, कारखानों के कचरे, मलमूत्र, कूड़ा-करकट मिलने से लाभदायक गुण नष्ट, पीने योग्य नहीं; जलीय जीव नष्ट; मुख्य कारण मनुष्य का क्रियाकलाप; क्रियाकलाप-6 (नदी/तालाब में छोड़े जाने वाले पदार्थों की सूची); जैविक प्रदूषण (मलमूत्र, पशु-स्नान, लाशें/अस्थि विसर्जन, नदी किनारे शौच; गंगा में अनेक शहरों का मल-जल; सूचक जीवाणु — इस्थेरेचिया कोलाई, कोलीफ़ार्म, मल स्ट्रेप्टोकोकाइ; हैज़ा, पेचिस; मानदण्ड — विलयित ऑक्सीजन व मल कोलीफ़ार्म संख्या); रासायनिक प्रदूषण (शीशा Pb — तंत्रिका तंत्र; कैडमियम — इटाई-इटाई; मरकरी Hg — मिनिमाटा; एन्जाइम की कार्यक्षमता कम; यूरिया, अमोनियम सल्फेट वर्षा जल से झीलों-तालाबों-नदियों में; नाइट्रोजन-फ़ॉस्फोरस बढ़ने से शैवाल वृद्धि = इयूट्रोफिकेसन; शैवाल के सड़ने में घुली ऑक्सीजन खर्च → जलीय जन्तुओं की मृत्यु); क्रियाकलाप-7 (नदी के प्रदूषकों की पहचान, शुद्धिकरण पर चर्चा)।
  • शुद्धिकरण व दुष्प्रभाव व रोकथाम: स्वच्छ दिखने वाले गंधहीन जल में भी सूक्ष्म जीव हो सकते हैं — उबालना (जीवाणु मरते हैं), फ़िल्टर करना, निश्चित मात्रा में ब्लीचिंग पाउडर; दुष्प्रभाव — हैज़ा, टाइफ़ॉयड, पीलिया, अतिसार; पशुओं में बीमारी; ऑक्सीजन की कमी से जलीय जन्तुओं की मृत्यु; पेड़-पौधों की वृद्धि रुकना; प्रदूषित जल से सिंचित फसलों का प्रदूषित होना व उन्हें खाने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव; क्रियाकलाप-8 (प्रदूषक-स्रोत-प्रभाव तालिका); रोकथाम — जन जागरूकता अभियान (नालियों का गंदा जल शुद्ध किए बिना तालाबों-नदियों में न गिरे), खाद्य कचरे-काग़ज़-प्लास्टिक-सड़क के कूड़े को न फेंकना, नदी-तालाबों के नज़दीक मलमूत्र न त्यागना, झीलों-नदियों के शुद्धिकरण के लिए शैवालों का प्रयोग, समुद्र के जल को परमाणु-विस्फोट से सुरक्षित रखना, कीटनाशकों का समुचित प्रयोग।

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