पाठ 13: वर्णोच्चारण-शिक्षा १
वर्णों के उच्चारण की शिक्षा, पहला भाग — वाणी कैसे बनती है, स्थान और करण।
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Sanskrit • पुस्तक: दीपकम् — एनईपी मिरर (हिंदी)
पाठ का सार — EG के अपने शब्दों में
यह पाठ कोई कथा-पाठ नहीं है — यह वर्णोच्चारण की शिक्षा का पहला भाग है। पिछले पाठ में हमने देखा था कि शब्दों का सम्यक् और शुद्ध उच्चारण नितान्त महत्त्वपूर्ण है। किसी शब्द के सम्यक् उच्चारण के लिए उसके प्रत्येक वर्ण का शुद्ध और निर्दोष उच्चारण होना चाहिए। अतः यहाँ हम जानेंगे कि प्रत्येक वर्ण का शुद्ध उच्चारण कैसे होता है।
वाणी की उत्पत्ति — चार तन्त्र — वर्णों के स्वर-व्यञ्जन आदि विविध भेद-उपभेदों के विषय में हम पिछली कक्षाओं में जान चुके हैं। वहाँ आस्य (मुख) के छह उच्चारण-स्थान भी देख चुके हैं। परन्तु वर्णों के उच्चारण में केवल आस्य का ही उपयोग होता है — ऐसा नहीं है। वर्णों के उच्चारण के लिए आस्य के साथ शरीर के अन्य अङ्गों का भी उपयोग होता है —
- नाभि-प्रदेश (मांसपेशी-बल-तन्त्र) — उदर की मांसपेशियाँ बल देती हैं।
- उरः (वायु-बल-तन्त्र) — छाती, फेफड़े और मध्यपट (डायफ्राम) वायु को ऊपर भेजते हैं।
- कण्ठ-बिल (ध्वनि-तन्त्र) — स्वर-यन्त्र (लैरिंक्स/वोकल-कॉर्ड्स) में ध्वनि बनती है।
- आस्य (उच्चारण-तन्त्र) — मुख और नासिका के भीतर वर्ण रूप लेते हैं।
वायु की यात्रा — जब हम किसी शब्द या वर्ण का उच्चारण करना चाहते हैं, तब पहले नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ उरः को नोदित (प्रेरित) करती हैं। उरः फिर श्वासकोश में स्थित वायु को ऊपर निःसारित करता है। वह वायु ऊपर सरककर कण्ठ-बिल को प्राप्त होती है। फिर वह वायु ऊपर सरककर आस्य में प्रवेश करती है। आस्य के भीतर प्रवेश करके, मुख और नासिका में स्थित छह उच्चारण-स्थानों में से वर्ण के अनुसार अपना स्थान पाकर, वह वायु उस स्थान पर वर्ण-रूप में प्रकट होती है।
वर्ण-उत्पत्ति के तीन तत्त्व — आस्य के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए वस्तुतः तीन तत्त्व आवश्यक हैं — (क) स्थानम्, (ख) करणम् और (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः। इस पाठ में स्थान और करण की चर्चा की गई है। आभ्यन्तर-प्रयत्न के विषय में अगली कक्षा में जानेंगे।
स्थानम् — वर्ण कहाँ प्रकट होता है
वर्ण के उच्चारण-समय, श्वासकोश से ऊपर सरकती हुई वायु, कण्ठ-बिल के माध्यम से आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ मुख में या नासिका में जिस स्थल पर वर्ण-रूप में प्रकट होती है, वह “स्थानम्” कहलाता है। आस्य में छह स्थान हैं — मुख में पाँच स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ) और नासिका में छठा स्थान (नासिका)।
मुरली का उदाहरण — स्थान के सम्यक् कार्य-निदर्शन के लिए मुरली उचित उदाहरण है। मुरली के अङ्गुलि-छिद्र आस्य के स्थानों के समान व्यवहार करते हैं। मुरली-नलिका से आती हुई वायु अङ्गुलि-छिद्रों में ही विविध ध्वनि-रूप में प्रकट होती है। जैसे मुरली में छिद्र बदलने से ध्वनि बदलती है, वैसे ही आस्य में स्थान बदलने से वर्ण बदलता है।
करणम् — वर्ण कैसे बनता है
वर्ण के उच्चारण-समय, आस्य का जो भाग स्थान को स्पर्श करता है या स्थान के समीप जाता है, वह भाग “करणम्” कहलाता है। मुरली के उदाहरण में — मुरली बजाते समय अङ्गुलियाँ आस्य के करणों के समान व्यवहार करती हैं। अङ्गुलियाँ जब अङ्गुलि-छिद्रों को विविध रूप से स्पर्श करती हैं या उनके समीप जाती हैं, तब उन छिद्रों में विविध ध्वनियाँ प्रकट होती हैं। वैसे ही आस्य में करण के स्पर्श या सामीप्य से वर्ण प्रकट होता है।

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): खाली पट्ट की ओर इशारा करता शिक्षक और बोलने का अभ्यास करते बच्चे। वर्णोच्चारण की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

कक्षा के सामने आत्मविश्वास से बोलता बच्चा। बोलने के अभ्यास की सामान्य तस्वीर।
मुख्य शब्द — शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वर्णः | अक्षर, ध्वनि-इकाई |
| स्वरः | स्वतन्त्र वर्ण (अ, आ, इ, ई…) |
| व्यञ्जनम् | स्वर की सहायता से बोला जाने वाला वर्ण |
| स्थानम् | वायु के वर्ण-रूप में प्रकट होने का स्थल |
| करणम् | स्थान को स्पर्श करने या समीप जाने वाला भाग |
| आभ्यन्तर-प्रयत्नः | भीतरी प्रयत्न (अगली कक्षा में) |
| आस्यम् | मुख, मुँह का भीतरी भाग |
| कण्ठ-बिलः | स्वर-यन्त्र (वॉइस-बॉक्स) |
| उरः | छाती |
| नाभि-प्रदेशः | नाभि के आस-पास का भाग |
| स्पर्श-वर्णः | स्पर्श से उच्चारित वर्गीय वर्ण |
| अन्तःस्थः | स्वर और व्यञ्जन के बीच स्थित वर्ण (य्, र्, ल्, व्) |
| ऊष्मा | घर्षण से उच्चारित वर्ण (श्, ष्, स्, ह्) |
| अयोगवाहः | अनुस्वार-विसर्ग जैसे विशेष वर्ण |
आस्य के छह उच्चारण-स्थान
| क्रम | स्थान | इससे बने वर्ण कहलाते हैं |
|---|---|---|
| 1 | कण्ठः | कण्ठ्य |
| 2 | तालु | तालव्य |
| 3 | मूर्धा | मूर्धन्य |
| 4 | दन्तः | दन्त्य |
| 5 | ओष्ठः | ओष्ठ्य |
| 6 | नासिका | नासिक्य |
मुख में पाँच स्थान हैं और नासिका छठा स्थान है। वर्णमाला में स्पर्श-वर्णों और ऊष्म-वर्णों के बीच स्थित वर्ण अन्तःस्थ कहलाते हैं। संयुक्त व्यञ्जन दो या अधिक व्यञ्जनों के मिलने से बनते हैं।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- वाणी की उत्पत्ति में चार तन्त्र कौन-से हैं?
संकेत: नाभि, उरः, कण्ठ-बिल और आस्य के क्रम से सोचो। - वायु की यात्रा क्रम से लिखो।
संकेत: नाभि की मांसपेशी से शुरू करके आस्य तक जाओ। - स्थान और करण में क्या अन्तर है?
संकेत: मुरली के छिद्र और अङ्गुली का उदाहरण सोचो। - आस्य के छह स्थान कौन-से हैं?
संकेत: मुख के पाँच + नासिका = छह की बात सोचो। - किसी एक कथन पर आम् या न लिखकर उचित भाव दिखाओ।
संकेत: कथन की पाठ से तुलना करो, फिर आम्/न लिखो।
प्रश्न और उत्तर
- शब्द के सम्यक् उच्चारण के लिए क्या आवश्यक है?
शब्द के प्रत्येक वर्ण का शुद्ध और निर्दोष उच्चारण आवश्यक है — तभी शब्द का सम्यक् उच्चारण होता है। - वर्ण-उत्पत्ति के तीन तत्त्व कौन-से हैं?
स्थानम्, करणम् और आभ्यन्तर-प्रयत्नः। इस पाठ में स्थान और करण की चर्चा है; आभ्यन्तर-प्रयत्न अगली कक्षा में पढ़ाया जाएगा। - स्थानम् किसे कहते हैं?
वर्ण के उच्चारण-समय वायु मुख या नासिका में जिस स्थल पर वर्ण-रूप में प्रकट होती है, वह स्थान कहलाता है। - करणम् किसे कहते हैं?
वर्ण के उच्चारण-समय आस्य का जो भाग स्थान को स्पर्श करता है या उसके समीप जाता है, वह करण कहलाता है। - आस्य के छह स्थान कौन-से हैं?
कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ (मुख के पाँच) और नासिका (छठा) — ये छह उच्चारण-स्थान हैं।
विस्तार — और गहराई से
- स्वर और व्यञ्जन की परिभाषा-वाक्यों का मेलन करो।
स्वर स्वतन्त्र वर्ण है; व्यञ्जन स्वर की सहायता से बोला जाता है — परिभाषा-वाक्य को सही पद से मिलाओ। - मुरली-उदाहरण से स्थान और करण को समझाओ।
छिद्र बदलने से ध्वनि बदलती है (स्थान) और अङ्गुली के स्पर्श से ध्वनि प्रकट होती है (करण) — इस तुलना को अपने शब्दों में लिखो। - वर्णमाला के भेद लिखो — स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्मा, अयोगवाह।
प्रत्येक भेद का एक-एक उदाहरण दो और बताओ कि वह भेद किस आधार पर बना है। - अपने उच्चारण का परीक्षण करो — किसी एक वर्ण का स्थान और करण बताओ।
जैसे कण्ठ्य वर्ण बोलते समय कण्ठ स्थान है — बोलकर देखो और स्थान का अनुभव लिखो। - अगली कक्षा के लिए प्रश्न बनाओ — आभ्यन्तर-प्रयत्न क्या हो सकता है?
इस पाठ में जो नहीं बताया गया, उस पर अपना जिज्ञासा-प्रश्न लिखो — उत्तर का अनुमान मत लगाओ, केवल प्रश्न लिखो।
- वाणी-यात्रा: नाभि-मांसपेशी → उरः-वायु → कण्ठ-बिल-ध्वनि → आस्य-वर्ण।
- तीन तत्त्व: स्थान, करण, आभ्यन्तर-प्रयत्न (इस पाठ में पहले दो)।
- छह स्थान: कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका।
- मुरली-उदाहरण: छिद्र = स्थान, अङ्गुली = करण।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।

