आदमी का अनुपात
कवि: गिरिजा कुमार माथुर — विराट ब्रह्मांड के सामने आदमी का अनुपात क्या है?
यह पृष्ठ NCERT की NEP पुस्तक के Educational Galaxy नोट्स का हिंदी संस्करण है, जो बिहार बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए तैयार किया गया है। बिहार बोर्ड द्वारा इस पुस्तक को निर्धारित किए जाने का दावा नहीं किया जाता।
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 8 • Hindi • पुस्तक: मल्हार — एनईपी मिरर (हिंदी)
आदमी का अनुपात — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: मल्हार (बिहार बोर्ड हिंदी संस्करण, कक्षा 8) | अध्याय 9 | कवि: गिरिजा कुमार माथुर | माध्यम: हिंदी

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): तराज़ू पर दिल और सोना। कविता के प्रतीक की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का दृश्य नहीं।

मदद करते लोग। परस्पर सहयोग की सामान्य तस्वीर।
कविता का सार
कविता एक सीढ़ी चढ़ाती है। दो व्यक्ति कमरे में हैं, और कमरे से छोटे हैं। कमरा है घर में, घर है मुहल्ले में, मुहल्ला नगर में, नगर है प्रदेश में, प्रदेश कई देश में, देश कई पृथ्वी पर, अनगिन नक्षत्रों में पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक ही। सबको समेटे है परिधि नभ गंगा की — आकाशगंगा की परिधि सबको समेटे है। लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक ब्रह्मांड है, और हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ, कितनी ही भूमियाँ, कितनी ही सृष्टियाँ हैं। यही है अनुपात आदमी का विराट से — ब्रह्मांड के सामने आदमी अत्यंत सूक्ष्म है।
कविता का दूसरा भाग व्यंग्य है। इतने छोटे होने के बावजूद आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है। वह संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है — गिनती से परे, असंख्य दीवारें खींचता है — और अपने को दूजे का स्वामी बताता है। देशों की कौन कहे, वह एक कमरे में दो दुनिया रचाता है। यानी जो आदमी ब्रह्मांड के सामने एक कण से भी छोटा है, वही अहंकार में दीवारें खड़ी करता है और दूसरों पर स्वामित्व जताता है। कविता का संदेश यही है कि अपनी लघुता को पहचानकर मनुष्य को विस्तार, सहअस्तित्व, सौहार्द, समावेशिता और सहनशीलता जैसे गुण अपनाने चाहिए, न कि ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ और अविश्वास में बँधना चाहिए।
कवि के बारे में
गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994) का जन्म अशोक नगर, मध्य प्रदेश में हुआ था। इनके पिता देवीचरण माथुर भी कविता लिखते थे। उन्होंने आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में कई महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने अनेक नाटक, गीत, कहानी, निबंध भी लिखे। उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हुईं, जिनमें मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले और मैं वक्त के हूँ सामने प्रमुख हैं। उन्होंने प्रसिद्ध भावांतर गीत 'होंगे कामयाब' भी लिखा है।
मुख्य शब्द
- अनुपात — दो चीज़ों के बीच का परिमाण-संबंध; यहाँ आदमी और ब्रह्मांड के बीच का अनुपात।
- विराट — अत्यंत विशाल, महान।
- नक्षत्र — तारा-समूह; यहाँ अनगिन तारों के अर्थ में।
- परिधि — घेरा, सीमा; यहाँ नभ गंगा (आकाशगंगा) की परिधि।
- ब्रह्मांड — समस्त सृष्टि का विस्तार।
- संख्यातीत — गिनती से परे, असंख्य; शंख = 100 पद्म की संख्या (10^17)।
- ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास — मनुष्य की नकारात्मक भावनाएँ, जिनमें वह डूबा रहता है।
- सहअस्तित्व, समावेशिता, सहनशीलता — वे गुण जो मनुष्य को ब्रह्मांड जैसा विस्तार दे सकते हैं।
याद रखें
- कविता में मुख्य रूप से दो चीज़ों का अनुपात दिखाया गया है — मानव और ब्रह्मांड का।
- ब्रह्मांड की तुलना में आदमी अत्यंत सूक्ष्म है — पृथ्वी पर सबसे बड़ा या प्रकृति का शासक नहीं।
- आदमी जिन भावनाओं में डूबा रहता है वे हैं — ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास।
- आदमी का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह अपने छोटेपन को भूलकर अहंकारी हो जाता है।
- 'संख्यातीत शंख सी दीवारें' = मनुष्य द्वारा खींची गई कृत्रिम सीमाएँ।
- 'पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक' = पृथ्वी की अल्पता और अनोखेपन की ओर संकेत।
- 'दो व्यक्ति कमरे में, कमरे से छोटे' = आदमी के संकुचित होने का प्रतीक।
- 'परिधि नभ गंगा की' = ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक।
- 'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' = सीमित स्थान में भी और अलगाव की प्रवृत्ति।
- 'शंख' भारतीय संख्या पद्धति में 100 पद्म की संख्या है, यानी 10^17।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: इस कविता को 'आदमी की कीमत उसके गुणों से होती है, धन-पद से नहीं' वाली कविता समझ लेना। यह उस कविता का विषय नहीं है। यह कविता आदमी की ब्रह्मांड के सामने लघुता और उसके अहंकार के व्यंग्य की है। दूसरी गलती: 'शंख' को केवल शंख (वाद्य) समझ लेना — यहाँ शंख एक संख्या है, 100 पद्म।
तालिका: कमरे से ब्रह्मांड तक की सीढ़ी
| स्तर | किसमें समाया है |
|---|---|
| दो व्यक्ति | कमरे में, और कमरे से छोटे |
| कमरा | घर में |
| घर | मुहल्ले में |
| मुहल्ला | नगर में |
| नगर | प्रदेश में |
| प्रदेश | कई देश में (देश कई पृथ्वी पर) |
| पृथ्वी | अनगिन नक्षत्रों में एक छोटी, करोड़ों में एक ही |
| सब कुछ | नभ गंगा की परिधि में समाया हुआ |
| ब्रह्मांड | लाखों ब्रह्मांडों में अपना एक; हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ, भूमियाँ, सृष्टियाँ |
तालिका: भारतीय संख्या पद्धति (संख्यातीत शंख के संदर्भ में)
| नाम | मान |
|---|---|
| एक (इकाई) | 1 = 10^0 |
| दस (दहाई) | 10 = 10^1 |
| सौ (सैकड़ा) | 100 = 10^2 |
| सहस्र (हज़ार) | 1,000 = 10^3 |
| दस हज़ार | 10,000 = 10^4 |
| लाख | 1,00,000 = 10^5 |
| दस लाख | 10,00,000 = 10^6 |
| करोड़ | 1,00,00,000 = 10^7 |
| दस करोड़ | 10,00,00,000 = 10^8 |
| अरब | 1,00,00,00,000 = 10^9 |
| दस अरब | 10,00,00,00,000 = 10^10 |
| खरब | 1,00,00,00,00,000 = 10^11 |
| दस खरब | 10,00,00,00,00,000 = 10^12 |
| नील | 1,00,00,00,00,00,000 = 10^13 |
| दस नील | 10,00,00,00,00,00,000 = 10^14 |
| पद्म | 1,00,00,00,00,00,00,000 = 10^15 |
| दस पद्म | 10,00,00,00,00,00,00,000 = 10^16 |
| शंख | 1,00,00,00,00,00,00,00,000 = 10^17 |
| दस शंख | 10,00,00,00,00,00,00,00,000 = 10^18 |
| महाशंख | 1,00,00,00,00,00,00,00,00,000 = 10^19 |
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- कविता के अनुसार ब्रह्मांड में आदमी का स्थान कैसा है?
संकेत: ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म, पृथ्वी पर सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण, सूर्य-चंद्र आदि सभी नक्षत्रों से बड़ा या समस्त प्रकृति पर शासन करने वाला — कौन-सा? - कविता में मुख्य रूप से किन दो चीज़ों का अनुपात दिखाया गया है?
संकेत: मानव और ब्रह्मांड, पृथ्वी और सूर्य, देश और नगर या घर और कमरा — कौन-सा? - आदमी किन भावनाओं और कार्यों में लगा रहता है?
संकेत: ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा; त्याग, ज्ञान और प्रेम; सेवा और परोपकार; उदारता, धर्म और न्याय — कौन-सा? - कविता के अनुसार आदमी का सबसे बड़ा दोष क्या है?
संकेत: वह अपने छोटेपन को भूलकर अहंकारी हो जाता है, वह अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को नहीं समझता, वह दूसरों पर शासन स्थापित करना चाहता है या वह प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है — कौन-सा? - 'संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है' — यहाँ 'शंख' से क्या आशय है?
संकेत: शंख (वाद्य), 100 पद्म की संख्या, शंख जैसी सफ़ेद दीवारें या शंखनाद — कौन-सा?
प्रश्न और उत्तर
- 'अनगिन नक्षत्रों में, पृथ्वी एक छोटी, करोड़ों में एक ही' — इन पंक्तियों का क्या अर्थ है?
अनगिनत तारों के बीच पृथ्वी एक छोटी-सी है, करोड़ों में एक ही। इसका अर्थ दोहरा है — एक ओर पृथ्वी की अल्पता (वह कितनी छोटी है) और दूसरी ओर उसका अनोखापन (करोड़ों में एक ही)। मनुष्य को यह याद दिलाया गया है कि जिस पृथ्वी पर वह रहता है, वह ब्रह्मांड में एक कण-सी है। - 'संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है, अपने को दूजे का स्वामी बताता है' — इन पंक्तियों का क्या अर्थ है?
आदमी गिनती से परे, असंख्य दीवारें खड़ी करता है — ये दीवारें कृत्रिम सीमाएँ हैं जो मनुष्य ने स्वयं खींची हैं। और वह अपने को दूसरे का स्वामी बताता है, यानी दूसरों पर शासन जताता है। कविता का व्यंग्य यही है कि जो आदमी ब्रह्मांड के सामने एक कण है, वही अहंकार में स्वामी बन बैठता है। - 'देशों की कौन कहे, एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' — इन पंक्तियों का क्या अर्थ है?
देशों के बीच दीवारों की बात तो छोड़ो, आदमी एक ही कमरे में दो दुनिया रचा देता है — यानी सीमित स्थान में भी वह अलगाव पैदा कर लेता है। यह मनुष्य की अलगाव-प्रवृत्ति का सबसे तीखा उदाहरण है: जहाँ जगह कम है, वहाँ भी वह बँटवारा कर लेता है। - कवि ने आदमी की सीमाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया है, पर कहीं भी क्रोध नहीं दिखाया है। कविता का भाव आपको कैसा लगा — व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और? क्यों?
कविता का भाव मुख्यतः व्यंग्य है, पर उसमें करुणा और चिंता भी मिली हुई है। व्यंग्य इसलिए कि आदमी के अहंकार पर हँसी आती है — इतना छोटा होकर भी वह स्वामी बनता है। करुणा इसलिए कि आदमी अपनी लघुता नहीं समझ पाता और चिंता इसलिए कि यही अहंकार दीवारें और बँटवारा पैदा करता है। - 'दीवारें उठाना' क्या केवल ईंट-पत्थर का काम है, या कुछ और भी हो सकता है? अपने विचार से समझाइए।
नहीं, दीवारें उठाना केवल ईंट-पत्थर का काम नहीं है। जाति, धर्म, भाषा, देश और अमीर-ग़रीब के भेद भी दीवारें हैं — जो मनुष्य अपने मन में और समाज में खड़ी करता है। एक कमरे में दो दुनिया रचाना भी ऐसी ही अदृश्य दीवार का उदाहरण है। इसलिए कविता की दीवारें मानसिक और सामाजिक भी हैं।
विस्तार — और गहराई से
- अनुपात की गतिविधि — ब्रह्मांड जैसा विस्तार कैसे पाएँ?
'मानव' और 'ब्रह्मांड' के उदाहरणों के माध्यम से कविता मनुष्य की अल्पता और सृष्टि की विशालता का अनुपात दिखाती है। अपने साथियों से चर्चा करो कि मनुष्य को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए किन-किन गुणों और मूल्यों की आवश्यकता है और उन गुणों को क्यों चुना गया है। शब्द-मेघ के शब्दों में से चुनो — सहअस्तित्व, विस्तार, सौहार्द, विविधता, वर्चस्व, ईर्ष्या, विशालता, सीमाबद्धता, विरोध, लघुता, अहंकार, संतुलन, मतभेद, समावेशिता, स्वार्थ, अविश्वास, स्वतंत्रता, सहनशीलता, शांति, सत्ता — और बताओ कि कौन-से शब्द विस्तार की ओर ले जाते हैं और कौन-से सीमाबद्धता की ओर। - सृजन — सीढ़ी और चित्र-श्रृंखला।
कविता के कमरे-से-ब्रह्मांड-तक विस्तार को अपने ढंग से एक रेखाचित्र, सीढ़ी या मानसिक-चित्रण (माइंड-मैप) के माध्यम से दिखाओ; प्रत्येक स्तर की एक-एक विशेषता भी लिखो — जैसे मुहल्ले की एक विशेष बात, नगर का कोई स्थान, देश की विविधता। नीचे एक पंक्ति में उत्तर दो — "मैं इस चित्र में कहाँ हूँ और क्यों?" फिर 'ब्रह्मांड में मानव' नाम से एक कहानी लिखने की शुरुआत कुछ पंक्तियों में करो। और 'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' को ध्यान से पढ़कर बताओ कि यदि तुम्हें बिना दीवारों की दुनिया बनानी हो तो वह कैसी होगी — उसका वर्णन करो। अंत में आदमी → कमरा → घर → पड़ोसी क्षेत्र → नगर → देश → पृथ्वी → ब्रह्मांड की चित्र-श्रृंखला बनाओ, जिसमें प्रत्येक चित्र में आकार का अनुपात दिखे ताकि यह स्पष्ट हो कि आदमी कितना छोटा है। - कविता की रचना — निर्देशक चिह्न।
कविता की आरंभिक पंक्तियों 'दो व्यक्ति कमरे में, कमरे से छोटे—' में '—' चिह्न आया है। क्या तुमने पहले भी यह चिह्न देखा है? इसे 'निर्देशक चिह्न' कहते हैं — यह एक प्रकार का विराम चिह्न है, जिसका प्रयोग किसी बात को आगे बढ़ाने या स्पष्ट करने के लिए किया जाता है; किसी विषय के बारे में अतिरिक्त जानकारी देने के लिए इसका प्रयोग होता है, जैसे व्याख्या, उदाहरण या उद्धरण। इस कविता में इसका प्रयोग एक ठहराव, विचार के संकेत और पाठक का ध्यान आगे आने वाले महत्त्वपूर्ण विचार की ओर खींचने के लिए किया गया है; यह संकेत देता है कि आगे कुछ ऐसा कहा जाने वाला है जो पाठक को सोचने पर विवश कर देगा। कविता की अन्य विशेषताओं की सूची बनाओ — जैसे अधिकांश पंक्तियों का अंतिम शब्द 'में' होना और बहुत-बहुत छोटी पंक्तियाँ होना — और कक्षा में साझा करो। दूसरी विशेषता-पंक्ति मिलान तालिका में से दो मिलान निश्चित हैं — विशेष क्रम में लगाए गए सरल वाक्य के शब्द → "कमरा है घर में"; मानव के अहंकार पर तीखा व्यंग्य → "अपने को दूजे का स्वामी बताता है"। बाकी चार जोड़ियों (मुहावरे का प्रयोग; छोटे से बड़े की ओर विस्तार के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति; प्रश्न शैली में व्यंग्य; अतिशयोक्ति से भरा कथन) को स्वयं मिलान करके कक्षा में चर्चा करो — यहाँ उनके उत्तर जानबूझकर नहीं दिए गए हैं। - कविता का सौंदर्य।
अपने समूह में इन प्रश्नों के उत्तर खोजो — कविता में ब्रह्मांड की विशालता को व्यक्त करने के कौन-कौन से अलग-अलग तरीके अपनाए गए हैं? और तीन क्रिया-पंक्तियों — "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है", "अपने को दूजे का स्वामी बताता है", "एक कमरे में दो दुनिया रचाता है" — की तरह अपने ढंग से नई क्रियाओं का प्रयोग करके कविता की रचना करो।
पाठ्यपुस्तक अभ्यास — क्या-क्या है
- मेरी समझ से: चार बहुविकल्पीय प्रश्न — ब्रह्मांड में आदमी का स्थान, किन दो चीज़ों का अनुपात, आदमी किन भावनाओं में लगा रहता है और आदमी का सबसे बड़ा दोष; समूह में अपने उत्तर चुनने के कारण पर चर्चा।
- पंक्तियों पर चर्चा: पृथ्वी एक छोटी वाली पंक्तियाँ; संख्यातीत शंख सी दीवारें वाली पंक्तियाँ; एक कमरे में दो दुनिया वाली पंक्तियाँ।
- मिलकर करें मिलान: छह पंक्ति-भाव जोड़ियाँ — संख्यातीत शंख सी दीवारें, पृथ्वी एक छोटी, ईर्ष्या-अहं-स्वार्थ-घृणा, दो व्यक्ति कमरे में, परिधि नभ गंगा की, एक कमरे में दो दुनिया।
- अनुपात की गतिविधि: शब्द-मेघ से गुणों का चयन और चर्चा — मनुष्य को ब्रह्मांड जैसा विस्तार पाने के लिए कौन-से गुण चाहिए और क्यों।
- सोच-विचार के लिए: आदमी अपने को सीमाओं में क्यों बाँधता है; दीवार पर लिखने के लिए एक पंक्ति का चयन; कविता का भाव — व्यंग्य, करुणा, चिंता या कुछ और; दीवारें उठाना केवल ईंट-पत्थर का काम है या कुछ और; सहिष्णुता या सहयोग से समाज में आए बदलाव के उदाहरण।
- सृजन: कमरे-से-ब्रह्मांड-तक का रेखाचित्र, सीढ़ी या माइंड-मैप; 'ब्रह्मांड में मानव' कहानी की शुरुआत; बिना दीवारों की दुनिया का वर्णन; आदमी → ब्रह्मांड चित्र-श्रृंखला।
- कविता की रचना: निर्देशक चिह्न '—' का प्रयोग; अन्य विशेषताओं की सूची; विशेषता-पंक्ति मिलान (दो निश्चित मिलान दिए गए हैं, बाकी चार स्वयं मिलान के लिए)।
- कविता का सौंदर्य: ब्रह्मांड की विशालता व्यक्त करने के तरीके; नई क्रियाओं से कविता की रचना।
- संख्यातीत शंख: भारतीय संख्या पद्धति की तालिका — एक से महाशंख तक।
दोहराव — इस पाठ से क्या पक्का करें
- सीढ़ी: कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → ब्रह्मांड।
- अनुपात: आदमी विराट ब्रह्मांड के सामने अत्यंत सूक्ष्म है।
- व्यंग्य: फिर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में दीवारें उठाता है और स्वामी बनता है।
- एक कमरे में दो दुनिया — अलगाव की सबसे तीखी मिसाल।
- शंख = 100 पद्म = 10^17।
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