Educational Galaxy shield logo

Educational Galaxy

LEARN • THINK • SPEAK • GROW

Chapter 3: स्वावलम्बनम्

अपने पैरों पर खड़े होना ही सच्चा सुख है — कृष्णमूर्ति के ‘आठ नौकरों’ की कहानी।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 7 • Sanskrit • Book: Ruchira Bhag-2 (NCERT) NCERT-verified (ghsk103)

Print lets you save as PDF from the browser. This is not a textbook PDF.

स्वावलम्बनम् — EG के अपने notes, सरल हिन्दी में

Book: Ruchira Bhag-2 (NCERT)  |  Chapter 3  |  Medium: Hindi

सत्यापन नोट: यह पाठ NCERT की रुचिरा भाग-2 के अध्याय 3 (ghsk103) के आधार पर जाँचा गया है। यहाँ पुस्तक की पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों नहीं दी गई हैं — भाव और अर्थ EG के अपने शब्दों में, हिन्दी में समझाए गए हैं। ये Educational Galaxy के अपने मूल notes हैं, पाठ्यपुस्तक नहीं, और यहाँ कोई आधिकारिक textbook PDF नहीं दिया जाता है।

Labelled diagram for स्वावलम्बनम्

Diagram (labels चित्र पर ही छपे हैं): अपने काम स्वयं करते बालक — स्वावलम्बन की सामान्य तस्वीर, पुस्तक का चित्र नहीं।

Illustration for स्वावलम्बनम्

दो मित्रों की बातचीत। सामान्य चित्र, पुस्तक का दृश्य नहीं।

पाठ का सार

कृष्णमूर्ति और श्रीकण्ठ दो मित्र थे। श्रीकण्ठ के पिता बहुत समृद्ध थे — उनका भवन विशाल था, जिसमें चार सौ स्तम्भ, अठारह प्रकोष्ठ, पाँच सौ गायें, चार सौ द्वार और छह सौ बिजली के पंखे थे, और वहाँ दस सेवक निरन्तर काम करते थे।

कृष्णमूर्ति के माता-पिता निर्धन किसान थे और उनका घर आडम्बरहीन, साधारण था। एक दिन श्रीकण्ठ प्रातः नौ बजे कृष्णमूर्ति के घर गया। कृष्णमूर्ति के माता-पिता ने अपनी शक्ति के अनुसार उसका आतिथ्य किया।

श्रीकण्ठ ने कहा कि तुम्हारे सत्कार से मैं संतुष्ट हूँ, पर मेरा दुःख यह है कि तुम्हारे घर एक भी भृत्य नहीं है, इसलिए तुम्हें मेरे सत्कार में बहुत कष्ट हुआ होगा — मेरे घर तो बहुत कर्मकर हैं। तब कृष्णमूर्ति ने वह उत्तर दिया, जो इस पाठ की जान है।

कृष्णमूर्ति का उत्तर — आठ कर्मकर

कृष्णमूर्ति ने कहा — मित्र, मेरे भी आठ कर्मकर हैं: दो पैर, दो हाथ, दो आँखें और दो कान। ये हर क्षण मेरी सहायता करते हैं। तुम्हारे भृत्य सदा सर्वत्र उपस्थित नहीं हो सकते, इसलिए जब वे अनुपस्थित होते हैं, तब तुम्हें कष्ट होता है।

उसने आगे कहा — स्वावलम्बन में सदा सुख ही है, कभी कष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति अपने काम स्वयं करता है, वह किसी की प्रतीक्षा में नहीं रहता और किसी पर निर्भर नहीं होता।

यह सुनकर श्रीकण्ठ के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई और उसने कहा कि अब से मैं भी अपने कार्य स्वयं करूँगा। फिर वह साढ़े बारह बजे अपने घर चला गया।

पाठ की विशेष बातें

इस पाठ में संख्या-शब्दों का अच्छा अभ्यास है — बीस से पचास तक की संख्याएँ, जैसे बीस, तीस, चालीस, पचास और बीच की संख्याएँ (अट्ठाईस, बत्तीस, सैंतालीस आदि)।

समय बताने का ढंग भी सिखाया गया है — जैसे ‘सार्धद्वादशवादनम्’ का अर्थ है साढ़े बारह बजे।

पाठ के अन्त में भारतीय महीनों और ऋतुओं की सूची भी दी गई है — चैत्र-वैशाख में वसन्त, ज्येष्ठ-आषाढ़ में ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद में वर्षा, आश्विन-कार्तिक में शरद्, मार्गशीर्ष-पौष में हेमन्त और माघ-फाल्गुन में शिशिर।

मुख्य शब्द (Key Terms)

  • स्वावलम्बनम् — अपने पैरों पर खड़ा होना, आत्मनिर्भरता।
  • भृत्यः / कर्मकरः — नौकर, सेवक।
  • समृद्धः — धनी, सम्पन्न।
  • निर्धनः — गरीब।
  • आतिथ्यम् — अतिथि-सत्कार।
  • शक्त्यानुसारम् — अपनी शक्ति के अनुसार।
  • आडम्बरहीनम् — बिना दिखावे का, साधारण।
  • प्रकोष्ठः — कमरा।

याद रखें (Remember)

  • दोनों मित्रों के घरों का अन्तर: श्रीकण्ठ का विशाल समृद्ध भवन, कृष्णमूर्ति का साधारण घर।
  • श्रीकण्ठ कब आया: प्रातः नौ बजे; कब लौटा: साढ़े बारह बजे।
  • कृष्णमूर्ति के आठ कर्मकर: दो पैर, दो हाथ, दो आँखें, दो कान।
  • स्वावलम्बन का तर्क: अपने अंग सदा साथ रहते हैं, पराए भृत्य सदा उपस्थित नहीं रहते।
  • संख्या-शब्द 20–50 और छह ऋतुओं के साथ भारतीय महीने।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: केवल ‘आठ नौकर’ याद रखना और उनके नाम भूल जाना। परीक्षा में आठों के नाम और स्वावलम्बन का तर्क — दोनों पूछे जाते हैं। साथ ही संख्या-शब्दों (जैसे अष्टाविंशतिः = 28) की भी तैयारी रखें।

NCERT अभ्यास में किस तरह के प्रश्न आते हैं

NCERT के अभ्यास में ये प्रकार आते हैं — संख्या-शब्दों का उच्चारण, प्रश्नों के उत्तर, चित्र गिनकर संख्या-शब्द लिखना, मञ्जूषा से अंकों के लिए शब्द चुनना, चित्र देखकर मञ्जूषा के शब्दों से वाक्य-रचना, समय-वाचन (जैसे 10:30, 7:00) और रिक्त स्थानों में संख्या-शब्द भरना।

तालिका: पाठ के मुख्य बिंदु

बिंदुविवरण
पाठ का प्रकारकथा-संवाद (दो मित्रों की बातचीत)
पात्रकृष्णमूर्ति, श्रीकण्ठ
श्रीकण्ठ का भवन400 स्तम्भ, 18 प्रकोष्ठ, 500 गायें, 400 द्वार, 600 पंखे, 10 सेवक
कृष्णमूर्ति का घरनिर्धन किसान परिवार का साधारण, आडम्बरहीन घर
सीखस्वावलम्बन में सदा सुख है, परनिर्भरता में कष्ट है

अभ्यास (Practice set — स्वयं कीजिए)

  1. श्रीकण्ठ के पिता के भवन की विशेषताएँ लिखिए।
    Hint: सोचें — स्तम्भ, प्रकोष्ठ, गायें, द्वार, पंखे, सेवक — संख्याओं सहित।
  2. कृष्णमूर्ति के घर की स्थिति कैसी थी?
    Hint: सोचें — माता-पिता का व्यवसाय और घर का स्वरूप।
  3. श्रीकण्ठ ने कृष्णमूर्ति के घर आकर क्या दुःख प्रकट किया?
    Hint: सोचें — भृत्य न होने से सत्कार में कष्ट की बात।
  4. कृष्णमूर्ति के आठ कर्मकर कौन-से हैं? सूची बनाइए।
    Hint: सोचें — शरीर के आठ अंग, जो सदा साथ रहते हैं।
  5. स्वावलम्बन क्यों सुखद है? कृष्णमूर्ति के तर्क से समझाइए।
    Hint: सोचें — पराए भृत्य कब अनुपस्थित होते हैं?

प्रश्न और उत्तर (Questions with Answers)

  1. कथा का सार अपने शब्दों में लिखिए।
    श्रीकण्ठ समृद्ध पिता का पुत्र था, जिसके विशाल भवन में दस सेवक काम करते थे। कृष्णमूर्ति निर्धन किसान का पुत्र था। एक दिन श्रीकण्ठ प्रातः नौ बजे कृष्णमूर्ति के घर गया और कहा कि भृत्य न होने से सत्कार में तुम्हें कष्ट हुआ होगा। कृष्णमूर्ति ने कहा कि मेरे भी आठ कर्मकर हैं — दो पैर, दो हाथ, दो आँखें, दो कान — जो सदा मेरी सहायता करते हैं। स्वावलम्बन में सदा सुख है। यह सुनकर श्रीकण्ठ ने भी अपने कार्य स्वयं करने का निश्चय किया।
  2. कृष्णमूर्ति के कितने कर्मकर हैं और कौन-कौन से?
    आठ कर्मकर हैं — दो पैर, दो हाथ, दो आँखें और दो कान।
  3. श्रीकण्ठ कृष्णमूर्ति के घर कब गया और कब लौटा?
    वह प्रातः नौ बजे गया और साढ़े बारह बजे अपने घर लौटा।
  4. कृष्णमूर्ति के अनुसार परनिर्भरता में कष्ट क्यों होता है?
    क्योंकि पराए भृत्य सदा सर्वत्र उपस्थित नहीं हो सकते। जब वे अनुपस्थित होते हैं, तब मनुष्य को कष्ट होता है। अपने अंग सदा साथ रहते हैं, इसलिए स्वावलम्बन में कभी कष्ट नहीं होता।
  5. इस पाठ से आप अपने जीवन में क्या बदलाव लाएँगे?
    मैं अपने छोटे-छोटे काम स्वयं करने का अभ्यास करूँगा — जैसे अपना बस्ता सँभालना, अपना कमरा व्यवस्थित करना और अपनी पढ़ाई की तैयारी स्वयं करना — ताकि किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

विस्तार: NCERT अभ्यास के अनुरूप (Extension)

  1. संख्या-शब्द: संस्कृत में लिखिए — 20, 30, 40, 50, 28, 32, 39, 47। उत्तर: विंशतिः, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, अष्टाविंशतिः, द्वात्रिंशत्, नवत्रिंशत्, सप्तचत्वारिंशत्।
  2. प्रश्न-उत्तर: (क) किसके भवन में सब सुख-साधन थे? (ख) किसके घर कोई भृत्य नहीं था? (ग) श्रीकण्ठ का आतिथ्य किसने किया? (घ) सदा कहाँ सुख है? (ङ) श्रीकण्ठ कृष्णमूर्ति के घर कब गया? (च) कृष्णमूर्ति के कितने कर्मकर हैं?
  3. समय-वाचन: संस्कृत में समय लिखिए — 10:30, 7:00, 5:00, 3:30, 2:30, 9:00, 11:00, 12:30, 4:30, 8:00, 1:30, 7:30। (संकेत: 10:30 = सार्धदशवादनम्, 12:30 = सार्धद्वादशवादनम्।)
  4. चित्र-वाक्य: मञ्जूषा के शब्दों से वाक्य बनाइए — कृषकः, कृषकौ, एते, धान्यम्, एषः, एतौ, क्षेत्रम्, कर्षति, रोपयन्ति, खननकार्यम् — इनसे तीन वाक्य बनाइए।
  5. रिक्त स्थान भरिए: मञ्जूषा — षट्, त्रिंशत्, एकत्रिंशत्, द्वौ, द्वादश, अष्टाविंशतिः — (क) ___ पादौ भवन्ति। (ख) मासाः ___ भवन्ति। (ग) एकस्मिन् मासे ___ अथवा ___ दिवसाः भवन्ति। (घ) फरवरी-मासे सामान्यतः ___ दिनानि भवन्ति। (ङ) मम शरीरे ___ हस्तौ स्तः।
  6. महीने और ऋतुएँ: भारतीय महीनों को ऋतुओं से मिलाइए — चैत्र-वैशाख, ज्येष्ठ-आषाढ़, श्रावण-भाद्रपद, आश्विन-कार्तिक, मार्गशीर्ष-पौष, माघ-फाल्गुन ↔ वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर।

पुनरावलोकन (Recap)

  • श्रीकण्ठ: समृद्ध, विशाल भवन, 10 सेवक। कृष्णमूर्ति: निर्धन किसान-पुत्र, साधारण घर।
  • आठ कर्मकर: दो पैर, दो हाथ, दो आँखें, दो कान।
  • तर्क: अपने अंग सदा साथ रहते हैं; पराए भृत्य सदा उपस्थित नहीं रहते।
  • परिणाम: श्रीकण्ठ ने भी अपने कार्य स्वयं करने का निश्चय किया।
  • व्याकरण: संख्या-शब्द 20–50, समय-वाचन, महीने-ऋतुएँ।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, फिर मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, अभ्यास बिना देखे कीजिए और अंत में प्रश्न-उत्तर से जाँच कीजिए। उत्तरों की जाँच अपने शिक्षक या अभिभावक से कराएँ।

← पिछला पाठ  |  अगला पाठ →