Chapter 9: जंतुओं में गति
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Science • Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
जंतुओं में गति — EG's own notes, in simple Hindi
Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali) | Chapter 9 | Medium: Hindi

Diagram (labels are printed on the image): अलग-अलग जंतु अलग-अलग ढंग से गति करते हैं। यह सामान्य चित्र है, पुस्तक का चित्र नहीं।

दौड़ना भी गति का एक रूप है। यह सामान्य चित्र है।
अध्याय के बारे में
आप प्रतिदिन घर से विद्यालय जाते तथा विद्यालय से घर आते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि घर से विद्यालय आप किसके सहारे जाते हैं? इसमें आपके शरीर का कौन सा अंग सक्रिय होता है? जब आप कुछ लिखते हैं, तब शरीर का कौन सा भाग गति करता है? जब आप किसी को मुड़कर देखते हैं तो शरीर का कौन सा हिस्सा मुड़ने में सक्रिय होता है? आप कभी धीरे-धीरे चलकर, दौड़कर या कूदकर एक स्थान से दूसरे पर जाते हैं। आपने बाग-बगीचे, खेत-खलिहान में दौड़ते हुए जन्तुओं को देखे होंगे। आप यह अवलोकन करें कि ये सभी जन्तु शरीर के किस अंग का उपयोग गति करने में करते हैं तथा गति किस प्रकार करते हैं? आप जब एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं तो इस प्रकार की गति को गमन कहते हैं। आप किसी एक स्थान पर स्थिर होकर लिखते हैं, किसी को मुड़कर देखते हैं या किसी भी दिशा में शरीर को झुकाते हैं, तो इसे शरीर के अंगों की गति कहते हैं। क्या आपने कभी बैल, गाय तथा भैंस को एक जगह स्थिर रहते, उसे पूँछ हिलाते या जुगाली करते देखा है? इसे गमन कहेंगे या गति कहेंगे? — पूँछ हिलाना और जुगाली करना गति है, गमन नहीं, क्योंकि जानवर अपना स्थान नहीं बदल रहा है। अपने शरीर में होने वाली गतियों का अनुभव कीजिए तथा सूचीबद्ध कीजिए कि शरीर में किस प्रकार की गति हो रही है।
तालिका 9.1 — जन्तुओं में गमन के प्रकार
अपने मित्रों तथा अध्यापकों से चर्चा करते हुए तालिका 9.1 में दिए गये जन्तुओं में गमन करने में प्रयुक्त होने वाले अंगों तथा गमन के प्रकार को भरें। किताब में भरे हुए खाने हैं: गाय — पैर — चलती है; साँप — संपूर्ण शरीर — रेंगकर। बाकी खाने (घोड़ा, पक्षी, कीट, मछली, मेढक, छिपकली) किताब में खाली छोड़े गए हैं — उन्हें अपने अवलोकन से भरना है। इस पाठ के आगे के भागों से पक्षी, मछली और कीट (तिलचट्टा) की गति के कारण समझ में आ जाते हैं, जिनसे उनकी तालिका के खाने भी भरे जा सकते हैं। तालिका 9.1 में दिए गये जन्तुओं के गमन में विविधता है। अपने आस-पास अन्य जन्तु किस प्रकार से गति करते हैं तथा उसकी गति अथवा गमन करने में कौन से अंग भाग लेते हैं? उपर्युक्त दी गयी तालिका में भरें।
मानव शरीर में गतियाँ — तालिका 9.2
जन्तुओं की विविध गतियों पर ध्यान देने से पहले अपने शरीर की गतियों पर ध्यान दीजिए। विद्यालय में शारीरिक व्यायाम करते समय अपने शरीर की गति पर गौर कीजिए। अपने हाथ की अँगुली, कलाई को मोड़ने, बाँह एवं हाथ की गति पर ध्यान दीजिए तथा अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों से गति करने का प्रयास कीजिए। इसका अवलोकन कर तालिका 9.2 में नोट कीजिए। तालिका 9.2 के खाने हैं: शरीर का भाग | गति (पूर्णतः घूमता है | अंशतः घूमता/मुड़ता है | झुकता है | उठता है | गति बिल्कुल नहीं करता है)। किताब में भरे हुए खाने हैं: बाँह — पूर्णतः घूमता है (हाँ); कमर — अंशतः घूमता/मुड़ता है (हाँ)। बाकी भाग — हाथ की अँगुलियाँ, कलाई, कोहनी, गर्दन, एड़ी, घुटने, पैर की अँगुलियाँ, पीठ — अपने अवलोकन से भरने हैं। अपने शरीर की विभिन्न प्रकार की गतियों का अवलोकन करते समय आपने यह जानने का प्रयास किया कि कुछ अंग किसी भी दिशा में आसानी से घूम सकते हैं तथा कुछ अंग एक ही दिशा में घूमते हैं। शरीर के कुछ अंगों को हम नहीं घुमा सकते। शरीर के अंगों में इस तरह की गतियों के क्या कारण हैं?
संधि अथवा जोड़ — क्रियाकलाप-1
क्रियाकलाप-1: एक तख्ती को अपने हाथ पर चित्र में दर्शायी गयी स्थिति के अनुसार डोरी या रस्सी से अपने मित्रों की सहायता से बँधवा लीजिए तथा हाथ को मोड़ने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे मोड़ पाते हैं? — नहीं, तख्ती बँधी होने पर हाथ नहीं मुड़ता। इस प्रकार आप शरीर का ऐसा अंग जहाँ से वह मुड़ जाता है वहाँ पर इसे किसी छड़ या तख्ती को रखकर बँधवा लीजिए तथा मोड़ने का प्रयास कीजिए। क्या आप सभी अंग को मोड़ पाते हैं? — नहीं। शरीर के अंग जहाँ पर मुड़ते हैं, उस हिस्से को संधि या जोड़ कहते हैं। यदि शरीर में ये संधियाँ न हों तो हमारे शरीर में गति संभव होगी? — नहीं। हमारे शरीर की विभिन्न संधियाँ कैसी बनी हैं? आप अपनी अँगुली द्वारा शरीर के विभिन्न हिस्से जैसे — हाथ, पैर, अँगुली को दबाइए। इन हिस्सों को दबाने पर आप अनुभव करेंगे कि आपकी अँगुली किसी कठोर चीज को दबा रही है। ये कठोर संरचनाएँ अस्थियाँ हैं। शरीर के अंग जहाँ से मुड़ते हैं, वास्तव में वे अस्थियों का संधि स्थल है। अनेक अस्थियाँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। शरीर को मोड़ना, घुमाना, झुकाना इस बात पर निर्भर करता है कि संधि स्थल पर अस्थियाँ एक-दूसरे से किस प्रकार जुड़ी हुई हैं तथा संधि स्थल की बनावट क्या है?
कंकाल तंत्र और संधियों के प्रकार
विभिन्न गतिविधियों एवं विभिन्न प्रकार की गतियों के लिए हमारे शरीर की बनावट के अनुसार विभिन्न प्रकार की संधि होती है। हमारे शरीर के विभिन्न हिस्सों की संधि की बनावट अस्थियों के संधि स्थल पर, अस्थि की बनावट पर निर्भर करती है। शरीर को मुड़ने की प्रकृति इसी संधि पर निर्भर करती है। इस प्रकार हमारे शरीर में अस्थियों का बना ढाँचा पाया जाता है। इसे कंकाल या कंकाल तंत्र कहते हैं। शरीर की विभिन्न संधियों की संरचना के साथ हम कंकाल के विभिन्न हिस्सों को समझने का प्रयास करेंगे। (परिशिष्ट-1 में "अपनी हड्डियों को जाँचें" देखें।) अपनी पुस्तक के परिशिष्ट में से कंकाल के चित्र को काट लीजिए। प्रयोगों द्वारा जिन हड्डियों को आप महसूस कर सकें और पहचान सकें, उन्हें चित्र में रंग भरकर दिखाते जाइए।
(क) कंधे की संधि — कंदुक-खल्लिका संधि (बॉल एवं सॉकेट ज्वाइंट): क्रियाकलाप-2: कंधे की हड्डी और हाथ की हड्डी के जोड़ को समझने के लिए एक छोटे फ्यूज बल्ब को एक नारियल के खोल में रखकर चारों दिशाओं में घुमाने का प्रयास कीजिए अथवा एक कागज का बेलन बनाकर किसी पुराने छोटे रबड़ के गेंद के छेद में डालकर किसी कटोरे में घुमाने का प्रयास कीजिए। क्या बल्ब नारियल के खोल में या रबड़ का गेंद कटोरे में आसानी से सभी दिशाओं में घूमती है? — हाँ। कागज के बेलन की तुलना हाथ तथा गेंद को हाथ के एक सिरे से कर सकते हैं। कटोरी कंधे के खोल वाले हिस्से से तथा गेंद को हाथ की हड्डी के ऊपरी सिरे के गुम्बदनुमा हिस्से से तुलना कर सकते हैं। हाथ की हड्डी का ऊपरी गोल वाला हिस्सा कंधे की कटोरी रूपी खोल अर्थात् गुहिका में धँसा रहता है। हाथ की हड्डी का गोल हिस्सा कंधे की अस्थि गुहिका में स्वतंत्र रूप से घूमता है। आप अपने हाथ के कंधे वाले हिस्से को घुमाकर देखिए। क्या हाथ स्वतंत्र रूप से चारों दिशाओं में घूमता है? — हाँ। किसी क्रिकेटर की बॉल फेंकते हुए हाथों की गति का अवलोकन कीजिए।
कोहनी की संधि एवं घुटने की संधि — कब्जा संधि (हिन्ज ज्वाइंट): कोहनी की संधि पर से बाँह के अगले हिस्से को चारों ओर घुमाने की कोशिश कीजिए। क्या आप बाँह के अगले हिस्से को कोहनी की संधि से उसी प्रकार घुमा पाते हैं, जैसे — पूरी बाँह को कंधे की संधि से घुमा पाये थे? — नहीं। कंधे और कोहनी की संधि में अन्तर है। कोहनी से आगे बाँह को आप सिर्फ ऊपर की ओर मोड़ सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे दरवाजे में लगे कब्जे के कारण दरवाजा एक ही ओर खुलता है। इसे कब्जा संधि या हिन्ज ज्वाइंट कहते हैं। ऐसी ही संधि घुटने में मिलती है। इस तरह की संधि शरीर के और किस हिस्से में होती है, अवलोकन कीजिए।
धुराग्र संधि (पाइबोटल ज्वाइंट): गर्दन तथा सिर को जोड़ने वाली संधि को धुराग्र संधि कहते हैं। इसके द्वारा सिर को किसी भी झुकाव पर घुमा सकते हैं। सिर को आगे-पीछे या दायें एवं बायें घुमा सकते हैं। इन गतियों को करने का प्रयास कीजिए। यह गति हमारे हाथ की गति से किस प्रकार भिन्न है? इसका अनुभव करें।
अचल संधि (इम्मूवेबल ज्वाइंट): हमारी खोपड़ी कई अस्थियों के जुड़ने से बनी है। खोपड़ी के अन्दर मस्तिष्क सुरक्षित रहता है। खोपड़ी अन्दर से खोखली होती है। ये अस्थियाँ इन संधियों पर हिल नहीं सकतीं। ऐसी संधि को अचल संधि कहते हैं। आप मुँह खोलिए एवं बन्द कीजिए तथा निचले जबड़े को हाथ से नीचे बल लगाकर स्थिर कीजिए तथा ऊपरी जबड़े को हिलाने का प्रयास कीजिए। क्या आप ऊपरी जबड़े को गति दे पाते हैं? — नहीं। ऊपरी जबड़े एवं खोपड़ी अर्थात् कपाल के मध्य अचल संधि है।
कंकाल तंत्र एवं शरीर का ढाँचा — एक्स-रे
मकान बनते समय देखा होगा कि मकान का ढाँचा तैयार करने के लिए लोहे के छड़ों को एक दूसरे से बाँधा जाता है। मकान का स्तम्भ तथा छत तैयार करने में छड़ों का प्रयोग किया जाता है, तब इसे सीमेंट, बालू तथा गिट्टी के साथ मिलाकर इसके ऊपर डाला जाता है तथा मकान का निर्माण किया जाता है। क्या बिना छड़ के मकान स्थिर रह सकता है तथा इसे आकृति प्रदान की जा सकती है? — नहीं। क्या आपने मिट्टी के घर की छत को देखा है जिसमें खपड़ा बिछाने के पहले बाँस तथा बाँस की फट्टी को बाँधकर छप्पर के ऊपर छाजन किया जाता है। क्या इसके बिना छप्पर सम्भव है? मेले में जाकर पंडाल को देख सकते हैं तथा अनुमान लगा सकते हैं कि बिना बाँस के फ्रेम के पंडाल बन सकता है? हमारे शरीर की सभी अस्थियाँ ठीक इसी प्रकार शरीर को एक आकृति प्रदान करने के लिए ढाँचे का निर्माण करती हैं। इस ढाँचे को कंकाल या कंकाल तंत्र कहते हैं। हम अपने शरीर की अस्थियों तथा संधियों को दबाकर अनुभव कर सकते हैं। एक्स-रे चित्र से हमें शरीर की सभी कठोर अस्थियों की आकृति का पता चलता है। क्या आपके परिवार में किसी व्यक्ति को चोट लगने पर उसका एक्स-रे चिकित्सक की सलाह पर करवाया गया है। चिकित्सक एक्स-रे के चित्र से चोट के कारण का पता लगाता है। आप शरीर के विभिन्न हिस्सों के एक्स-रे चित्रों को इकट्ठा कर अस्थियों के ढाँचे को देख सकते हैं।
क्रियाकलाप-3, 4, 5 — अस्थियाँ गिनना, पसली पिंजर, उपास्थि
क्रियाकलाप-3: अपनी कोहनी को दूसरे हाथ से थोड़ा दबाइए और बाँह को मोड़िए और सीधा कीजिए। इस क्रिया को कई बार दोहराइए। इसी प्रकार अपनी कलाई को कसकर पकड़िए और हथेली को घुमाइए। अब अपनी एक अँगुली के किसी जोड़ को दूसरे हाथ के अँगूठे और अँगुली से कसकर पकड़िए और अँगुली को ऊपर-नीचे हिलाइए। इस क्रियाकलाप से क्या पता चलता है? क्या कंधे से लेकर अँगुली तक आपकी बाँह में एक ही हड्डी है? — नहीं, बाँह में कई हड्डियाँ हैं। यदि नहीं, तो बाँह और हाथ के अलग-अलग हिस्सों को मोड़कर या घुमाकर आप अधिक से अधिक कितनी अस्थियों को गिन सकते हैं? इसी तरह पैर की अस्थियों के बारे में पता करने का प्रयास कीजिए। आप देख चुके हैं कि अस्थियों को हिलाने-डुलाने के लिए उनके साथ पेशियाँ जुड़ी रहती हैं। ये पेशियाँ अस्थियों से एक विशेष प्रकार के रेशों से जुड़ी रहती हैं। इन रेशों को कंडरा (Tendon) कहते हैं। इसी प्रकार दो अस्थियाँ आपस में विशेष प्रकार के रेशों से जुड़ी रहती हैं। इन रेशों को स्नायु (Ligament) कहते हैं।
पसली पिंजर — क्रियाकलाप-4: गहरी साँस भरकर इसे कुछ समय तक रोककर रखिए। अपनी छाती एवं पीठ को दबा-दबाकर अपनी अस्थियों का अनुभव कीजिए। छाती की पसली अस्थियों को आप गिन सकते हैं। आप अनुभव करेंगे कि पसली की अस्थियाँ विशिष्ट रूप से मुड़ी हुई है तथा पीठ से होते हुए रीढ़ अर्थात् मेरुदण्ड तक चली गयी है। ये पसली पिंजर एक पिंजरा के तरह रचना बनाती है। आप पता कीजिए कि इस पसली पिंजर के अन्दर कौन-कौन से अंग हैं? — हृदय और फेफड़े। आप अपने मित्र को आगे की ओर बिना घुटना मुड़े झुकाइए तथा पाँव की अँगुलियों को छूने को कहिए। आप उसके पीठ के बीच ऊपर से नीचे थोड़ा दबाकर स्पर्श कीजिए। क्या आपको एक लम्बी एवं कठोर रचना का अनुभव होता है। आपके द्वारा अनुभव की गई संरचना उसका मेरुदण्ड है। यह अनेक छोटी-छोटी अस्थियों से बना है। इन छोटी-छोटी अस्थियों को कशेरुक कहते हैं। यदि यह मेरुदण्ड एक ही अस्थि का बना होता तो क्या आपके मित्र या आप झुक पाते? — नहीं, झुकना तभी संभव है जब मेरुदण्ड कई छोटी अस्थियों से बना हो। अपने मित्र को खड़े होकर हाथों से किसी दीवार को धक्का लगाने के लिए कहिए। आप देखेंगे जब आपका मित्र दीवार पर धक्का लगाता है तो उसके कंधों के समीप दो उभरी हुई अस्थियाँ दिखाई देती हैं। इन्हें कंधे की अस्थियाँ कहते हैं। कंधे की अस्थियों को अंश-अस्थियाँ कहते हैं। कमर की अस्थियाँ को श्रेणी अस्थियाँ कहते हैं। यह बॉक्स के समान एक ऐसी संरचना बनाती है, जो आमाशय के नीचे पाये जाने वाले विभिन्न अंगों की रक्षा करता है तथा इनको स्थिर रखने के लिए धरातल बनाता है। औरतों (माताओं) में यह थोड़ा बड़ा और ज्यादा कटोरानुमा होता है तथा माता के गर्भ में पल रहे शिशु को स्थिर रखता है।
उपास्थि — क्रियाकलाप-5: आप अपने कान को छूकर तथा नाक को हिलाकर देखिए। आप क्या अनुभव करते हैं? कान का ऊपरी तथा निचला हिस्सा आसानी से मोड़ा जा सकता है। ये अस्थि की तरह कठोर नहीं होते बल्कि लचीले होते हैं। इसे उपास्थि कहते हैं। आपने कंकाल के संदर्भ में शरीर की अस्थियों का अनुभव किया तथा यह भी जाना कि बाँह, कोहनी, पैर तथा घुटने की अस्थियों से मांसपेशी जुड़ी हुई है। जब आप हाथ को फैलाकर मोड़ते हैं तथा पादाँगुली के सहारे खड़े होते हैं तो बाँह या घुटने के पीछे की मांसपेशी संकुचित होकर फूल जाती है तथा सामान्य अवस्था में पूर्ववत् स्थिति में आ जाती है। पेशियों के संकुचन से अस्थियों की संधियों पर झुकाव होता है तथा शिथिलन से संधियाँ अपनी पहली स्थिति में आ जाती हैं। पेशियों के संकुचन तथा शिथिलन से शरीर में हलचल अथवा गति आती है। इसी मांसपेशी तथा अस्थियों के सहारे हम शरीर में गति या एक स्थान से दूसरे स्थान तक गमन करते हैं। अब तक आप जिन-जिन हड्डियों को ढूँढ पाए हैं उनको अपने कंकाल के चित्र में पेंसिल या रंग से भरा होगा। अपने साथियों के चित्र को देखकर पता लगाइए कि आपके अन्य साथियों ने कौन सी अतिरिक्त हड्डियाँ ढूँढ ली हैं। इन हड्डियों को भी अपने शरीर में ढूँढिए और अपने द्वारा बनाए गए चित्र में दिखाइए।
जन्तुओं में गति — केंचुआ, घोंघा, तिलचट्टा
कुछ जन्तु दौड़ते हैं, कुछ रेंगते हैं। आपने यह भी देखा है कि मछली जल में तैरती है। गमन करने की इतनी विविधता का क्या कारण है? क्रियाकलाप-6 (केंचुआ): खेतों या बगीचों में केंचुए को चलते हुए देखिए। उसे किसी काँच की पट्टी/टाइल/खपड़ा इत्यादि पर रखकर गौर से देखिए। केंचुए का शरीर एक सिरे से दूसरे सिरे तक अनेक छल्लों का बना हुआ प्रतीत होता है। केंचुए को थोड़ा दबाकर अनुभव कीजिए। यह मुलायम प्रतीत होता है। केंचुए के शरीर में अस्थियाँ नहीं होतीं। इसके शरीर में पेशियाँ होती हैं। इन पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन से इसका शरीर घटता-बढ़ता रहता है। चलने के दौरान केंचुआ अपना पिछले हिस्से (पश्च भाग) को भूमि में जकड़े रहता है तथा अगले हिस्से (अग्र भाग) को चलने की दिशा में फैलता है। इसके बाद वह अगले हिस्से से भूमि को पकड़ता है तथा पिछले हिस्से से जमीन की पकड़ को छोड़ देता है। इसके पश्चात् यह शरीर को संकुचित करता है तथा पिछले हिस्से को आगे की ओर खींचता है। इससे वह चलने की दिशा में आगे बढ़ता है। इस प्रक्रिया को केंचुआ बार-बार दोहराता है तथा चलने की दिशा में आगे बढ़ता चला जाता है। लेकिन यह आपको सोचना होगा कि केंचुआ शरीर के हिस्से से जमीन को कैसे पकड़े रहता है अथवा कैसे टिकाता है? इसके लिए आवर्धक लेंस की सहायता से केंचुए को उलटकर देखिए। आप देखेंगे कि केंचुए के शरीर पर छोटे-छोटे बाल जैसी आकृति होती है। इस बाल जैसी आकृतियों को शूक कहते हैं। ये शूक पेशियों से जुड़े होते हैं। ये शूक मिट्टी में उसकी पकड़ को मजबूत बनाते हैं। आप जानते हैं कि केंचुआ मिट्टी को खाता है। केंचुआ मिट्टी को भुरभुरा बनाता है जिससे वायु मिट्टी में प्रवेश कर जाती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है तथा फसलों की अच्छी पैदावार होती है। मिट्टी के भुरभुरा हो जाने से पौधे की जड़ों को पर्याप्त वायु एवं ऑक्सीजन मिलती है।
घोंघा — क्रियाकलाप-7: आपने खेत या बगीचे में घोंघा को चलते हुए देखा होगा। चलते हुए घोंघा का अवलोकन कीजिए। घोंघा का शरीर कठोर चीज से ढँका रहता है। इसे कवच कहते हैं और यह घोंघे का बाह्य-कंकाल है। यह कवच अस्थि से भिन्न है। इसमें कोई संधि नहीं होती है। चलते हुए घोंघा को जब आप देखेंगे तो कवच के नीचे जमीन पर फैली हुई मांसल संरचना होती है, जिसे पाद कहते हैं। पाद मांसल होता है तथा दृढ़-पेशियों का बना होता है। पाद में लहरदार गति के साथ चलने की दिशा में घोंघा आगे बढ़ता है। घोंघा के मांसल पाद को छूने से पाद सिकुड़ जाता है तथा घोंघा इसे कवच के अन्दर घुसा लेता है।
तिलचट्टा — क्रियाकलाप-8: क्या आपको पता है कि तिलचट्टा का वास-स्थान कहाँ है? इसके लिए अंधेरे एवं नमी वाले स्थानों का अवलोकन कीजिए। वहाँ पर ये झुण्ड-के-झुण्ड मिलते हैं या मिलने की सम्भावना रहती है। इन तिलचट्टों को गौर से देखिए। ये जमीन पर चलते हैं, दीवार पर चढ़ते हैं और हवा में उड़ते भी हैं। इनके तीन जोड़े पैर होते हैं जो चलने में सहायता करते हैं। इसका शरीर कठोर बाह्य कंकाल से ढँका रहता है। यह बाह्य कंकाल कई खण्डों में बँटा रहता है।
पक्षी, मछली, सर्प
पक्षी: आपने अपने आस-पास, खेत-खलिहानों तथा घर के मुँड़ेर पर कबूतर, कौआ, गौरैया तथा अन्य उड़ने वाले जन्तुओं को देखा होगा। ये सभी पक्षी हैं। पक्षी हवा में उड़ते हैं तथा जमीन पर चलते हैं। इनका शरीर उड़ने के लिए अनुकूलित होता है। उनकी अस्थियाँ खोखली परन्तु मजबूत होती हैं। अस्थियों के खोखले हिस्से को वायुप्रकोष्ठ कहते हैं, जिसमें हवा भरी रहती है। अस्थियों के वायुप्रकोष्ठ में हवा भरे रहने के कारण इसका शरीर हल्का रहता है। अग्रपाद की अस्थियाँ रूपान्तरित होकर पक्षी का डैना (पंख) बनाती हैं। वक्ष की अस्थियाँ नाव के आकार की होती है जिससे मोटी पेशी लगी रहती है। मांसपेशी से लगा कंडरा डैना की अस्थि से जुड़ा रहता है। मोटी मांसपेशी के खिंचाव से डैना फैलता है तथा शिथिलन से डैना सामान्य स्थिति में नीचे आ जाता है। इस तरह डैना के फैलने तथा नीचे गिरने से पक्षी हवा में उड़ते हैं। डैना जब नीचे आता है तो यह फैलकर हवा पर थपेड़े करता है तथा पक्षी ऊपर उठता है। ऊपर ले जाते समय डैना शरीर से सटा रहता है ताकि विपरीत दिशा में थपेड़े नहीं लगे। आप कुछ ऐसे पक्षियों का अवलोकन कीजिए जो पानी पर तैरते हैं तथा कुछ ऐसे पक्षी जो ज्यादा नहीं उड़ पाते हैं। इसकी एक सूची बनाइए।
मछली — क्रियाकलाप-9: आप कागज की नाव बनाना जानते होंगे। यदि नहीं जानते हैं तो अपने मित्रों से नाव बनवाकर पानी में तैराइए। नाव पानी में तैरने लगती है। नाव के अग्र भाग तथा पश्च भाग को देखिए तथा इसकी तुलना मछली के शरीर की बनावट से कीजिए। आपको दोनों में कुछ समानताएँ नजर आएँगी। मछली का अगला तथा पिछला हिस्सा नाव से मिलता-जुलता है। मछली के शरीर की यह आकृति उसे तैरने में मदद करती है। क्या पक्षियों का भी अगला तथा पिछला हिस्सा नुकीला होता है? इस तरह मछली को तैरने तथा पक्षी को उड़ने के लिए ऐसी बनावट क्यों जरूरी है? शरीर की ऐसी आकृति धारारेखीय कहलाती है। इसकी विशेष आकृति के कारण जल इधर-उधर बहकर निकल जाता है और मछली जल में सरलता से तैर सकती है। मछली के शरीर के अगले तथा पिछले हिस्से के निचले भाग में पक्ष लगे होते हैं। उसकी पूँछ पर भी पक्ष लगे होते हैं। मछली का कंकाल दृढ़ पेशियों से ढँका रहता है। मांसपेशियों के संकुचन तथा शिथिलन से ये पक्ष (FIN) को ऊपर-नीचे तथा अगल-बगल करती हैं तथा शरीर को थोड़ा तरंग गति देकर तैरने की दिशा में आगे बढ़ती हैं। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि गोताखोर अपने पैरों में इन पक्षों की तरह के 'फ्लिपर' पहनते हैं जो उन्हें जल में तैरने में सहायता करते हैं।
सर्प: आपने सँपेरा को साँप चलाते हुए देखा होगा। क्या यह सीधा चलता है? — नहीं, यह लहरदार गति से चलता है। सर्प का मेरुदण्ड लम्बा तथा बहुत लचीला होता है। साँप के शरीर में अनगिनत वलय होते हैं। ये वलय मांसपेशियों की मदद से लहरदार गति उत्पन्न करते हैं। लहरदार गति में शरीर के कुछ हिस्सों के वलयों का एक छोर संकुचित होता है तो दूसरा छोर फैलकर आगे बढ़ता है। पुनः फैला हुआ वलय का हिस्सा संकुचित होता है तो संकुचित हिस्सा फैलता है। इस तरह वलय आगे की ओर धक्का देता है। इस तरह आपने विभिन्न जन्तुओं को गति प्रदान करने वाली अस्थियों एवं पेशियों के बारे में जानकारी प्राप्त की और स्वयं की गति की भी जानकारी प्राप्त की।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
- गमन बनाम गति — स्थान बदलना गमन है; एक जगह स्थिर रहकर अंग हिलाना गति है (पूँछ हिलाना, जुगाली करना)।
- संधि की परिभाषा — अंग जहाँ मुड़ते हैं वह हिस्सा; बिना संधियों के गति संभव नहीं; गति संधि स्थल की बनावट पर निर्भर करती है।
- चार संधियाँ — कंदुक-खल्लिका (कंधा, चारों दिशा), कब्जा (कोहनी, घुटना, एक ही दिशा), धुराग्र (गर्दन-सिर), अचल (खोपड़ी, ऊपरी जबड़ा)।
- कंकाल के भाग — खोपड़ी, मेरुदण्ड (कशेरुक), पसलियाँ (पसली पिंजर), वक्ष की अस्थि, कंधे की अस्थियाँ (अंश-अस्थियाँ), कमर की अस्थियाँ (श्रेणी अस्थियाँ), हाथ-पाँव की अस्थियाँ; उपास्थि (कान, नाक) लचीली होती है।
- कंडरा बनाम स्नायु — पेशी को अस्थि से जोड़ने वाले रेशे कंडरा; दो अस्थियों को जोड़ने वाले रेशे स्नायु; पेशियों के संकुचन-शिथिलन से गति।
- जन्तुओं की गति — केंचुआ (पेशी संकुचन-शिथिलन + शूक की पकड़), घोंघा (पेशीय पाद, कवच बाह्य-कंकाल), तिलचट्टा (तीन जोड़ी पैर + बाह्य कंकाल), पक्षी (खोखली मजबूत अस्थियाँ + वायुप्रकोष्ठ + डैना), मछली (धारारेखीय शरीर + पक्ष), सर्प (लचीला मेरुदण्ड + वलयों की लहरदार गति)।
मुख्य शब्द
- गमन (Locomotion): एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना।
- गति: एक स्थान पर स्थिर रहकर शरीर के अंगों का हिलना-मुड़ना-झुकना।
- संधि / जोड़ (Joint): शरीर के अंग जहाँ पर मुड़ते हैं, वह हिस्सा — अस्थियों का संधि स्थल।
- अस्थि: शरीर की कठोर संरचना; दबाने पर कठोर महसूस होती है।
- कंकाल / कंकाल तंत्र (Skeleton): अस्थियों का बना ढाँचा — शरीर को आकृति देता है, चलने में सहायक है, आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता है।
- कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and Socket Joint): गोल सिरा कटोरी रूपी खोल में धँसा रहता है — चारों दिशाओं में गति, जैसे कंधा।
- कब्जा संधि (Hinge Joint): दरवाजे के कब्जे की तरह केवल एक ही दिशा में मुड़ना — जैसे कोहनी, घुटना।
- धुराग्र संधि (Pivotal Joint): गर्दन तथा सिर को जोड़ने वाली संधि — सिर को किसी भी झुकाव पर घुमाना।
- अचल संधि (Immovable Joint): जिस पर अस्थियाँ हिल नहीं सकतीं — जैसे खोपड़ी की अस्थियाँ, ऊपरी जबड़ा व कपाल।
- कंडरा (Tendon): पेशियों को अस्थियों से जोड़ने वाले विशेष रेशे।
- स्नायु (Ligament): दो अस्थियों को आपस में जोड़ने वाले विशेष रेशे।
- उपास्थि: अस्थि की तरह कठोर नहीं, लचीली संरचना — जैसे कान, नाक।
- मेरुदण्ड (Backbone): पीठ की लम्बी कठोर रचना — अनेक छोटी अस्थियों (कशेरुक) से बनी।
- कशेरुक: मेरुदण्ड की छोटी-छोटी अस्थियाँ।
- पसली पिंजर (Ribs): पसलियों की पिंजरे जैसी रचना — अंदर हृदय और फेफड़े सुरक्षित रहते हैं।
- अंश-अस्थियाँ (Pectoral Girdle): कंधे की अस्थियाँ।
- श्रेणी अस्थियाँ (Pelvic girdle): कमर की अस्थियाँ — बॉक्स जैसी संरचना, आमाशय के नीचे के अंगों की रक्षा।
- वायुप्रकोष्ठ: पक्षियों की अस्थियों के खोखले हिस्से जिनमें हवा भरी रहती है — शरीर हल्का रहता है।
- धारारेखीय शरीर (Streamline body): आगे-पीछे नुकीली आकृति जिससे जल/वायु इधर-उधर बहकर निकल जाए — मछली, पक्षी।
- पक्ष (Fin): मछली के शरीर के निचले भाग और पूँछ पर लगे पंख जैसे अंग।
- शूक: केंचुए के शरीर पर छोटे-छोटे बाल जैसी आकृतियाँ जो मिट्टी में पकड़ मजबूत बनाती हैं।
- पाद: घोंघे की जमीन पर फैली मांसल संरचना जिससे वह लहरदार गति से आगे बढ़ता है।
- कवच: घोंघे का कठोर बाह्य-कंकाल — अस्थि से भिन्न, इसमें कोई संधि नहीं होती।
- बाह्य-कंकाल: शरीर के बाहर का कठोर आवरण — जैसे घोंघे का कवच, तिलचट्टे का खण्डों वाला आवरण।
याद रखें
- अस्थि एवं उपास्थि मानव कंकाल बनाता है। यह शरीर का पिंजर बनाता है और इसे एक आकृति भी देता है। कंकाल चलने में सहायक है और आंतरिक अंगों की सुरक्षा करता है।
- मानव कंकाल खोपड़ी, मेरुदण्ड, पसलियों, वक्ष की अस्थि, कंधे एवं श्रेणी मेखला तथा हाथ एवं पाँव की अस्थियों से बनता है।
- पेशियों के जोड़े के एकांतर क्रम में सिकुड़ने एवं फैलने से अस्थियाँ गति करती हैं।
- अस्थियों की संधियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। यह उस संधि की प्रकृति एवं गति की दिशा पर निर्भर करती है।
- पक्षियों की दृढ़ पेशियाँ तथा हल्की अस्थियाँ मिलकर उन्हें उड़ने में सहायता करती हैं।
- सर्प अपने शरीर के दोनों ओर एकांतर क्रम में वलय बनाते हुए भूमि पर वलयाकार गति करता हुआ आगे की ओर फिसलता है। बहुत सारी अस्थियाँ एवं उससे जुड़ी पेशियाँ शरीर को आगे की ओर धक्का देती हैं।
- तिलचट्टे का शरीर एवं पैर कठोर आवरण से ढँके होते हैं जो बाह्य कंकाल बनाता है। वक्ष की पेशियाँ तीन जोड़ी पैरों एवं दो जोड़ी पंखों से जुड़ी होती हैं जो तिलचट्टे को चलने एवं उड़ने में सहायता करती हैं।
- केंचुए में गति शरीर की पेशियों के बारी-बारी से शिथिलन एवं संकुचन से होती है। शरीर की अधः सतह पर शूक केंचुए को भूमि पर पकड़ बनाने में सहायक है।
- घोंघा पेशीय पाद की सहायता से चलता है।
- तालिका 9.2 के किताब में भरे खाने: बाँह — पूर्णतः घूमता है; कमर — अंशतः घूमता/मुड़ता है।
परीक्षा टिप
सबसे आम गलती है चारों संधियों को उल्टा लिखना। तरकीब: कंधा = कंदुक-खल्लिका (गेंद कटोरी में — चारों दिशा); कोहनी/घुटना = कब्जा (दरवाजे का कब्जा — एक ही दिशा); गर्दन-सिर = धुराग्र (धुरी पर घूमना); खोपड़ी = अचल (हिलती ही नहीं)। दूसरी गलती: कंडरा और स्नायु को उल्टा लिखना — कंडरा = पेशी से अस्थि, स्नायु = अस्थि से अस्थि। तीसरी गलती: गमन और गति को एक समझना — गमन में स्थान बदलता है, गति में एक जगह रहकर अंग हिलता है।
सारणी — संधियों के प्रकार और जन्तुओं की गति
| संधि | कहाँ | गति | उदाहरण/तुलना |
|---|---|---|---|
| कंदुक-खल्लिका संधि (Ball and Socket Joint) | कंधा | चारों दिशाओं में स्वतंत्र | फ्यूज बल्ब नारियल के खोल में; गेंद कटोरे में |
| कब्जा संधि (Hinge Joint) | कोहनी, घुटना | केवल एक ही दिशा में | दरवाजे का कब्जा — दरवाजा एक ही ओर खुलता है |
| धुराग्र संधि (Pivotal Joint) | गर्दन-सिर | किसी भी झुकाव पर घुमाना | सिर आगे-पीछे, दायें-बायें |
| अचल संधि (Immovable Joint) | खोपड़ी, ऊपरी जबड़ा-कपाल | कोई गति नहीं | ऊपरी जबड़ा हिलाने पर भी नहीं हिलता |
| जन्तु | गति का साधन | गति का प्रकार |
|---|---|---|
| केंचुआ | पेशियों का संकुचन-शिथिलन + शूक की पकड़ | घटता-बढ़ता हुआ आगे बढ़ना |
| घोंघा | पेशीय पाद (कवच बाह्य-कंकाल) | लहरदार गति से धीरे-धीरे आगे बढ़ना |
| तिलचट्टा | तीन जोड़ी पैर + दो जोड़ी पंख (बाह्य कंकाल) | चलना, दीवार चढ़ना, उड़ना |
| पक्षी | डैना (अग्रपाद) + खोखली मजबूत अस्थियाँ | उड़ना, जमीन पर चलना |
| मछली | पक्ष (FIN) + धारारेखीय शरीर | तैरना |
| सर्प | लचीला मेरुदण्ड + वलय | लहरदार गति से रेंगना |
अभ्यास — खुद करके देखो
- अपनी बाँह पर तख्ती बाँधकर (क्रियाकलाप-1) हाथ मोड़ने का प्रयास करो — क्या हुआ और क्यों? फिर तख्ती हटाकर मोड़ो। दोनों का अंतर किस सिद्धांत को दिखाता है? संकेत: मुड़ने की जगह संधि है; तख्ती संधि को जकड़ देती है।
- फ्यूज बल्ब को नारियल के खोल में रखकर चारों दिशाओं में घुमाओ (क्रियाकलाप-2) — यह किस संधि का मॉडल है और कंधे से इसकी तुलना कैसे करोगे? संकेत: गेंद = हाथ की हड्डी का गोल सिरा; खोल = कंधे की गुहिका।
- अपनी कोहनी, घुटने, गर्दन और ऊपरी जबड़े की गति की जाँच करो और बताओ कि हर जगह कौन-सी संधि है — और क्यों? संकेत: कोहनी/घुटना एक दिशा, गर्दन-सिर धुरी पर, ऊपरी जबड़ा अचल।
- तालिका 9.2 को अपने अवलोकन से पूरा भरो — हाथ की अँगुलियाँ, कलाई, गर्दन, एड़ी, घुटने, पैर की अँगुलियाँ, पीठ — हर भाग के लिए गति का प्रकार लिखो। किताब में भरे खाने (बाँह — पूर्णतः; कमर — अंशतः) से मिलान करो।
- केंचुए की गति के चरणों को क्रम से लिखो — पिछले हिस्से की पकड़, अगले हिस्से का फैलना, पकड़ बदलना, शरीर का सिकुड़ना — और बताओ कि शूक की क्या भूमिका है? संकेत: शूक मिट्टी में पकड़ मजबूत बनाते हैं।
प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: गमन और गति में क्या अंतर है? एक-एक उदाहरण दो।
उत्तर: एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना गमन है — जैसे घर से विद्यालय चलकर जाना, मछली का तैरना। एक स्थान पर स्थिर रहकर शरीर के अंगों का हिलना-मुड़ना गति है — जैसे लिखना, मुड़कर देखना, बैल का पूँछ हिलाना या जुगाली करना। - प्रश्न: संधि किसे कहते हैं? यदि शरीर में संधियाँ न हों तो क्या होगा?
उत्तर: शरीर के अंग जहाँ पर मुड़ते हैं, उस हिस्से को संधि या जोड़ कहते हैं — वास्तव में यह अस्थियों का संधि स्थल है। यदि संधियाँ न हों तो शरीर में गति संभव नहीं होगी; शरीर को मोड़ना, घुमाना, झुकाना संधि स्थल की बनावट पर निर्भर करता है। - प्रश्न: कंदुक-खल्लिका संधि और कब्जा संधि में क्या अंतर है? उदाहरण सहित बताओ।
उत्तर: कंदुक-खल्लिका संधि में हड्डी का गोल सिरा कटोरी रूपी खोल (गुहिका) में धँसा रहता है और चारों दिशाओं में स्वतंत्र रूप से घूमता है — जैसे कंधा। कब्जा संधि में गति केवल एक ही दिशा में होती है, जैसे दरवाजे का कब्जा — जैसे कोहनी और घुटना (कोहनी से आगे बाँह सिर्फ ऊपर की ओर मोड़ सकते हैं)। - प्रश्न: कंडरा और स्नायु में क्या अंतर है?
उत्तर: पेशियों को अस्थियों से जोड़ने वाले विशेष रेशों को कंडरा (Tendon) कहते हैं; दो अस्थियों को आपस में जोड़ने वाले विशेष रेशों को स्नायु (Ligament) कहते हैं। - प्रश्न: केंचुए की गति कैसे होती है? शूक की भूमिका क्या है?
उत्तर: केंचुए के शरीर में अस्थियाँ नहीं होतीं, पेशियाँ होती हैं। पेशियों के संकुचन एवं शिथिलन से शरीर घटता-बढ़ता है — पहले पिछला हिस्सा भूमि में जकड़ा रहता है और अगला हिस्सा फैलता है, फिर अगला हिस्सा भूमि पकड़ता है और पिछला हिस्सा पकड़ छोड़कर सिकुड़कर आगे खिंचता है; यही प्रक्रिया बार-बार दोहराकर केंचुआ आगे बढ़ता है। शरीर पर छोटे-छोटे बाल जैसी आकृतियाँ — शूक — पेशियों से जुड़ी होती हैं और मिट्टी में उसकी पकड़ को मजबूत बनाती हैं।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: सही उत्तर चुनिए: (क) शरीर का अंग जहाँ से मुड़ता है, उसे कहते हैं — (i) संधि (ii) जोड़ (iii) (i) एवं (ii) दोनों (iv) इनमें से कोई नहीं। (ख) शरीर की अस्थियों का ढाँचा कहलाता है — (i) कंकाल तंत्र (ii) पेशी तंत्र (iii) पाचन तंत्र (iv) इनमें से कोई नहीं। (ग) ऊपरी जबड़े एवं खोपड़ी (कपाल) की संधि है — (i) चल संधि (ii) अचल संधि (iii) कब्जा संधि (iv) धुराग्र संधि। (घ) निम्न में किस जीव की अस्थियाँ खोखली किन्तु मजबूत होती हैं — (i) मनुष्य (ii) पक्षी (iii) मांसाहारी जानवर (iv) मछली। (ङ) निम्न में से कौन सा जीव मिट्टी खाता है — (i) साँप (ii) मछली (iii) केंचुआ (iv) छिपकली।
उत्तर: (क) (iii) (i) एवं (ii) दोनों — किताब में 'संधि अथवा जोड़' एक ही चीज़ के दो नाम हैं। (ख) (i) कंकाल तंत्र। (ग) (ii) अचल संधि। (घ) (ii) पक्षी — अस्थियों के खोखले हिस्से (वायुप्रकोष्ठ) में हवा भरी रहती है, इसलिए शरीर हल्का रहता है। (ङ) (iii) केंचुआ — केंचुआ मिट्टी खाता है और मिट्टी को भुरभुरा बनाता है। - प्रश्न: रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (कब्जा-संधि, मांसपेशियों, गति, कंकाल तंत्र): क. अस्थियों की संधियाँ शरीर की ...... में सहायता करती हैं। ख. अस्थियाँ एवं उपास्थि संयुक्त रूप से शरीर का ...... बनाती हैं। ग. कोहनी की अस्थियाँ ...... द्वारा जुड़ी होती हैं। घ. गति करते समय ...... के संकुचन से अस्थियाँ खिंचती हैं।
उत्तर: क. गति। ख. कंकाल तंत्र। ग. कब्जा-संधि। घ. मांसपेशियों। - प्रश्न: निम्न कथनों के आगे सत्य तथा असत्य को इंगित कीजिए: क. सभी जन्तुओं की गति एवं चलन बिल्कुल एक समान होता है। ख. उपास्थि अस्थि की अपेक्षा कठोर होती है। ग. अँगुलियों की अस्थियों में संधि नहीं होती। घ. अग्रभुजा में दो अस्थियाँ होती हैं। ङ. तिलचट्टों में बाह्य-कंकाल पाया जाता है।
उत्तर: क. असत्य — तालिका 9.1 में ही गमन में विविधता दिखती है (चलना, रेंगना, उड़ना, तैरना)। ख. असत्य — उपास्थि अस्थि की तरह कठोर नहीं, लचीली होती है (कान, नाक)। ग. असत्य — अँगुलियों में जोड़ होते हैं; क्रियाकलाप-3 में अँगुली के जोड़ को पकड़कर ऊपर-नीचे हिलाया गया है। घ. सत्य — अग्रभुजा (बाँह का निचला भाग) में दो अस्थियाँ होती हैं: बाहर वाली (बहिः प्रकोष्ठिका/Radius) और अंदर वाली (अंतः प्रकोष्ठिका/Ulna)। ङ. सत्य — तिलचट्टे का शरीर कठोर बाह्य कंकाल से ढँका रहता है जो कई खण्डों में बँटा रहता है। - प्रश्न: कॉलम 1 में दिए गए शब्दों का संबंध कॉलम 2 के एक अथवा अधिक कथन से जोड़िए: कॉलम 1 — ऊपरी जबड़ा; मछली; पसलियाँ; घोंघा; तिलचट्टा। कॉलम 2 — शरीर पर पक्ष होते हैं; बाह्य-कंकाल होता है; हवा में उड़ सकता है; एक अचल संधि है; हृदय की सुरक्षा करती है; बहुत धीमी गति से चलता है; का शरीर धारारेखीय होता है।
उत्तर: ऊपरी जबड़ा — एक अचल संधि है (ऊपरी जबड़े एवं कपाल के मध्य अचल संधि है)। मछली — शरीर पर पक्ष होते हैं; का शरीर धारारेखीय होता है। पसलियाँ — हृदय की सुरक्षा करती है (पसली पिंजर के अंदर हृदय और फेफड़े सुरक्षित रहते हैं)। घोंघा — बहुत धीमी गति से चलता है (पेशीय पाद की लहरदार गति से)। तिलचट्टा — बाह्य-कंकाल होता है; हवा में उड़ सकता है (तीन जोड़ी पैर चलने में और दो जोड़ी पंख उड़ने में सहायता करते हैं)। - प्रश्न: निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए: क. कंदुक-खल्लिका संधि क्या है? ख. कपाल की अस्थि कौन-सी गति करती है? ग. हमारी कोहनी पीछे की ओर क्यों नहीं मुड़ सकती? घ. हमारे शरीर में पायी जाने वाली उपास्थि के उदाहरण लिखिए।
उत्तर: क. कंदुक-खल्लिका संधि वह संधि है जिसमें एक हड्डी का गोल (गेंद जैसा) सिरा दूसरी हड्डी की कटोरी रूपी खोल (गुहिका) में धँसा रहता है और उसमें स्वतंत्र रूप से चारों दिशाओं में घूमता है — जैसे कंधे की संधि। ख. कपाल की अस्थियाँ अचल संधि से जुड़ी होती हैं — वे गति नहीं करतीं (केवल निचला जबड़ा हिलता है, ऊपरी जबड़ा नहीं)। ग. क्योंकि कोहनी कब्जा संधि है — दरवाजे के कब्जे की तरह यह केवल एक ही दिशा में (ऊपर की ओर) मुड़ सकती है, पीछे की ओर नहीं। घ. कान (ऊपरी तथा निचला हिस्सा आसानी से मोड़ा जा सकता है) और नाक — ये अस्थि की तरह कठोर नहीं, लचीले होते हैं। - प्रश्न: परियोजना कार्य: अपने आस-पास पाये जाने वाले विभिन्न जन्तुओं की गति का अवलोकन कर चित्र बनाइए व रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर: अपने आस-पास के जन्तुओं (जैसे गाय, कुत्ता, पक्षी, मछली, केंचुआ, घोंघा, तिलचट्टा, छिपकली) को देखकर हर एक के लिए लिखें: गमन में प्रयुक्त अंग, गमन का प्रकार (चलना/दौड़ना/रेंगना/उड़ना/तैरना/कूदना), और गति का कारण (संधि का प्रकार, पेशियों का संकुचन-शिथिलन, धारारेखीय शरीर, शूक, पाद आदि)। हर जन्तु का एक चित्र भी बनाएँ — यही आपकी रिपोर्ट बनेगी। तालिका 9.1 का ढाँचा (जन्तु | गमन में प्रयुक्त अंग | गमन के प्रकार) रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल करें।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
इस पृष्ठ को पढ़ते समय पहले 'अध्याय के बारे में' और 'तुम्हें क्या सीखना चाहिए' पढ़ें, फिर मुख्य शब्द और सारणी को ध्यान से देखें। अभ्यास के प्रश्न स्वयं करके देखें, फिर प्रश्नोत्तर से मिलान करें। किताब के अभ्यास के सभी प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं — परीक्षा से पहले उन्हें बिना देखे लिखने का अभ्यास करें। क्रियाकलाप करते समय सावधानी रखें — तख्ती बाँधने और अँगुली के जोड़ पकड़ने वाले प्रयोग मित्रों की सहायता से ही करें।

