Chapter 16: जल
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Science • Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
जल — EG's own notes, in simple Hindi
Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali) | Chapter 16 | Medium: Hindi

Diagram (labels are printed on the image): जल चक्र — वाष्पन, संघनन और वर्षा से जल वापस आता है। यह सामान्य चित्र है, पुस्तक का चित्र नहीं।

कुआँ और हैंडपंप भूमिगत जल के स्रोत हैं। यह सामान्य चित्र है।
अध्याय के बारे में
आप रोज सवेरे उठते हैं तब विद्यालय जाने के पहले आप क्या-क्या करते हैं? उठने के बाद आप शौच करते हैं, मुँह धोते हैं, दाँतों की सफाई करते हैं, नहाते हैं तथा भोजन या नाश्ता करने के बाद विद्यालय जाते हैं। इस तरह की दैनिक क्रिया में जल का उपयोग अवश्य होता है। जब आपको प्यास लगती है तो जल पीते हैं। जब आपकी माँ या घर के लोग नाश्ता एवं भोजन तैयार करते हैं, तब आपने देखा होगा कि खाना बनते समय सब्जी को धोने में, चावल को पकाने में, आटा को गूँधने में और अन्य पकवान की तैयारी में जल का उपयोग किया जाता है। इनके अतिरिक्त घर में परिवार के लोग क्या-क्या कार्य करते हैं, जिसमें जल की आवश्यकता है? यदि जल नहीं रहे तो आप क्या-क्या सारी क्रियाकलाप कर पाएँगे? काफी लम्बे समय तक यदि जल उपलब्ध नहीं होगा, तो क्या होगा? बिना जल के बिना हम सभी जीवित रह सकते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि इन सभी क्रियाकलापों के लिए एक व्यक्ति को कितनी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है?
क्रियाकलाप-1 — एक दिन में कितना जल?
प्रतिदिन दैनिक क्रियाओं में जल की कितनी मात्रा का उपयोग आपके द्वारा किया जाता है? इसके लिए आप घर में रखे मग या किसी अन्य बर्तन में जल भरकर तौलकर किलोग्राम में या यदि लीटर का बर्तन मौजूद हो तो उसे जल से भरकर लीटर में मात्रा ज्ञात कर लीजिए। इसी इकाई मानकर एक बाल्टी में मग या लीटर से जल भरकर बाल्टी में भरे जल की मात्रा ज्ञात कीजिए। आपको अब यह ज्ञात हो चुका है कि मग व बाल्टी में कितनी मात्रा में जल है। यह मापन इसलिए किया जाता है कि आप दैनिक क्रिया में जल का उपयोग मग से व बाल्टी से करते हैं। दी गयी तालिका 16.1 में सुबह से रात के समय तक किये जानेवाले दैनिक क्रियाओं में जल की कितनी मात्रा का उपयोग करते हैं, इसे ज्ञात कर सकते हैं।
तालिका 16.1 — एक दिन में उपयोग होनेवाले जल की मात्रा
किताब में तालिका 16.1 खाली है — इसे अपने मापन से भरना है (हर विद्यार्थी का उत्तर अलग होगा):
| दैनिक क्रिया / अन्य क्रियाकलाप | उपयोग किये गये जल की मात्रा |
|---|---|
| पीने में | (अपने मापन से भरें) |
| ब्रश करने तथा मुँह धोने में | (अपने मापन से भरें) |
| शौचालय में | (अपने मापन से भरें) |
| नहाने में | (अपने मापन से भरें) |
| कपड़े धोने में | (अपने मापन से भरें) |
| अन्य कार्य में | (अपने मापन से भरें) |
| आपके द्वारा एक दिन में उपयोग किये गये जल की मात्रा | (सबका जोड़) |
अब यह ज्ञात करना आसान हो गया है कि आपके द्वारा कितना जल का उपयोग किया जाता है। इसी के आधार पर परिवार के अन्य लोग भी लगभग इतना ही जल का उपयोग करते होंगे। परिवार में जितने अधिक लोग होंगे, जल की उतनी ही ज्यादा मात्रा खर्च होगी। आप इसका अनुमान लगा सकते हैं। इसी प्रकार एक महीने तथा वर्षभर में आपके परिवार द्वारा कितनी मात्रा में जल का उपयोग होता है, इसका आकलन कर सकते हैं। यदि अपने गाँव या शहर की जनसंख्या मालूम हो तो उस आधार पर वहाँ के जल का कितना उपयोग होता है, इसे ज्ञात कर सकते हैं। क्या जल का उपयोग दी गयी तालिका के क्रियाकलाप तक ही सीमित है? इसके अलावा जल का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? इसकी एक सूची बनाकर जल के व्यय का अनुमान लगाइए। (खाना बनाना, बर्तन धोना, घर की सफाई, पशुओं को पानी, पौधों की सिंचाई, गाड़ी धोना आदि।) क्या आप दाँत की सफाई के समय नल खुला रखते हैं या नल को खुला छोड़ देते हैं? क्या आप इस दैनिक कार्य के लिए कुएँ से एक बाल्टी जल का उपयोग करते हैं? यदि मग का उपयोग किया जाए तो कम जल खर्च होगा। यदि सभी लोग इस तरह जल का व्यय करें तो गाँव या शहर में पानी के व्यय को कितना कम किया जा सकता है, इस सम्बन्ध में आप अनुमान लगा सकते हैं। अब आप यह सोचिए कि जहाँ जल की कमी रहती होगी वहाँ के लोग जल का किस तरह उपयोग करते होंगे।
जल के स्रोत
आप कुआँ, नल तथा चापाकल से भली भाँति परिचित होंगे। इसके अलावा जल के मुख्य स्रोत नदियाँ, झरने, तालाब, झील इत्यादि हैं। घर में हमें यह नल से प्राप्त होता है। आपने देखा होगा कि घर में नल का पाइप लगा होता है। यह पाइप कहाँ तक फैला हुआ है, इसका पता लगाना जरूरी होगा। घर से निकलकर यह पाइप जमीन के अन्दर से होते हुए मुख्य जल स्रोत जैसे झील, नदी, किसी कुएँ या जल मीनार तक जाता है। इस जल स्रोत के जल को विद्युत मोटर खींचकर आपके घर तक पहुँचा देता है। बहुत सी जगहों पर जमीन में बोरिंग किया जाता है, विद्युत मोटर जमीन के नीचे स्थित जल को उठाकर आपके नल की टोंटी तक पहुँचा देती है। आपने कई छतों पर टंकियाँ देखी होंगी। सबसे पहले इन टंकियों में जल भरता है, यह जल ऊपर से नीचे पाइप के माध्यम से घर के सभी हिस्सों में लगे नलों में आता है। इस तरह की व्यवस्था हमें शहरी क्षेत्र में मिलती है। गाँव में हम सभी कुओं तथा चापाकलों से जल प्राप्त करते हैं या आपने कहीं-कहीं बोरिंग से जल निकलते देखा होगा। (चित्र-16.1: जल के स्रोत के साथ नल, चापाकल तथा बोरिंग एवं टंकी।) तालाब, नदियाँ, झील, पोखर, झरने इत्यादि जल के स्रोत हैं, जहाँ से हमें जल प्राप्त होता है। क्या आप जानते हैं कि इन जल स्रोतों में जल कैसे भरता है तथा यह जल कहाँ से आता है? (वर्षा से — जल चक्र द्वारा, आगे देखें।)
पृथ्वी का 2/3 भाग जल — फिर भी कमी क्यों?
आपने समुद्र तथा महासागर का नाम सुना होगा। आप इसके लिए मानचित्र का अवलोकन कीजिए। आपको यह पता लगेगा कि पृथ्वी का अधिकांश हिस्सा समुद्र तथा महासागरों से घिरा है तथा पृथ्वी का 2/3 हिस्सा जल से घिरा है। (चित्र 16.2: पृथ्वी का 2/3 भाग जल से घिरा है।) जल की इतनी विशाल राशि के बावजूद जल के कम से कम तथा उचित उपयोग करने की बातें क्यों करते हैं? क्या आप नमक तथा जल को मिलाकर अपनी प्यास बुझा सकते हैं? समुद्र तथा महासागर का जल काफी नमकीन एवं खारा होता है। समुद्र तथा महासागर की विशाल जलराशि का उपयोग पीने में नहीं किया जा सकता है तथा इसका उपयोग कई दैनिक क्रियाकलापों में करना संभव नहीं है। आपने यह गीत जरूर सुना होगा: "सागर कितना गहरे प्यास है, मेरे जीवन में फिर भी प्यास है।" समुद्र और महासागर के जल का प्रत्यक्ष उपयोगिता तो नहीं है, लेकिन विशाल जलराशि वाले समुद्र और महासागर का जल ही उन तालाबों, झीलों, नदियों तथा कुओं को भरता है जिनका पानी स्वच्छ होता है। समुद्र तथा महासागर से जल इन जल स्रोतों में कैसे आता है तथा उन स्रोतों में आने के बाद स्वच्छ क्यों नहीं रहता है? (उत्तर जल चक्र में है — वाष्पन के समय नमक पीछे रह जाता है, इसलिए वर्षा का जल मीठा होता है।)
किताब का बॉक्स (अंक जाँचकर दिए गए हैं): पृथ्वी पर कुल जल की मात्रा का 97.5 प्रतिशत खारा जल है। स्वच्छ एवं मीठा जल 2.5 प्रतिशत, मानव एवं जीव-जन्तु के लिए पीने योग्य पानी की उपलब्धता 0.003 प्रतिशत ही है। इसीलिए उपयोग करने योग्य जल की मात्रा बहुत सीमित है और विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।
क्रियाकलाप-2 — जल कहाँ जाता है?
एक थाली में थोड़ा जल रखिए तथा कुछ घंटों तक इसे धूप में छोड़ दीजिए। अवलोकन करने पर पता चलेगा कि थाली में जल नहीं है। ऐसा क्यों होता है? जरा सोचिए। (जल वाष्प बनकर उड़ गया है — वाष्पन।) आपने हमेशा देखा होगा कि फर्श को जल से पोंछने के बाद जल सूख जाता है। भीगे हुए कपड़े को फैलाने पर सूख जाता है। किसी गीली जगह, कपड़ा तथा जमीन को सूखने में धूप तथा शुष्क हवा बहुत जरूरी है। (चित्र 16.3: थाली में रखा जल; चित्र 16.3: अलगनी पर सूखते कपड़े — किताब में दोनों चित्रों पर एक ही अंक 16.3 छपा है।) अब इस समझने के लिए कि जल को सूखने के लिए धूप तथा हवा जरूरी है, एक-एक थाली में थोड़ा-थोड़ा जल भर कर धूप में एवं खुली हवा में तथा छाया में रखकर यह तुलना कीजिए कि किस थाली का जल सबसे जल्दी सूखता है? (धूप और खुली हवा वाली थाली का जल सबसे जल्दी सूखेगा; छाया वाली का सबसे धीरे।) यह जल कैसे सूखता है? इसका उत्तर जानने के लिए एक प्रयोग करें।
क्रियाकलाप 3 — वाष्पन और संघनन
एक केतली में पानी भर ढक्कन से ढँक दीजिए तथा इसे चूल्हे पर चढ़ाकर गर्म कीजिए तथा अवलोकन कीजिए। कुछ देर बाद आप देखेंगे कि केतली की टोंटी से भाप निकल रही है तथा ऊपर की ओर भी जा रहा है। अब आप एक प्लेट को चिमटे से पकड़कर टोंटी के ऊपर लाकर रखिए। आप देखेंगे कि भाप प्लेट पर आते ही जल की छोटी-छोटी बूँदों में जमा होकर प्लेट से नीचे गिरने लगता है। (चित्र-16.4) जब जल को गर्म करते हैं तो गर्मी पाकर जल भाप (वाष्प) में बदल जाता है, इस क्रिया को वाष्पन कहते हैं तथा वाष्प पुनः ठंडा होकर जल में बदल जाता है इस क्रिया को हम संघनन कहते हैं। यदि आप केतली में थोड़ा नमक डालकर देखें तो आपको नमकीन या खारा लगेगा। इसे गर्म करने पर निकलने वाले वाष्प जो प्लेट पर जल कणिका एवं बूँद के रूप में जमा होता है, को चखें। क्या यह जल भी खारा है? (नहीं — वाष्प के साथ नमक नहीं उड़ता; संघनित जल मीठा होता है। यही कारण है कि समुद्र का खारा जल वाष्पन-संघनन के बाद वर्षा के रूप में मीठा हो जाता है।) नदियों, तालाबों, झरनों, झीलों, समुद्र तथा महासागर की विशाल जल राशि का वाष्पन होने से बादल का कितना बड़ा आकार होगा। इसके बारे में आप सोच सकते हैं। काफी ऊँचाई पर वाष्प के इकट्ठा होने से यह जल के छोटे-छोटे बूँद के रूप में एक-दूसरे के समीप आकर बादल का रूप लेता है।
बादल, वर्षा, ओला और वाष्पोत्सर्जन
काफी ऊँचाई पर बादल में जल की छोटी-छोटी बूँद (जल कणिका) तैरती रहती हैं। ये जल कणिकाएँ आपस में मिलकर बड़े आकार की जल-बूँद बनाती हैं। ये जल बूँदें इतनी भारी हो जाती हैं कि वे जमीन पर गिरने लगती हैं। प्रकृति में इस प्रकार के जल से वाष्प बनना तथा बादल बनाना तथा वर्षा के रूप में जल जमीन पर आना ही जल चक्र कहलाता है (चित्र 16.5)। इन गिरती हुई जल बूँदों को वर्षा कहते हैं। कभी-कभी ये जल कुछ स्थानों में तैरते रहते हैं तथा ज्यादा ठंडे होकर छोटे-छोटे बर्फ के कण बनाते हैं। जब इसका आकार बड़ा हो जाता है, तो ये वर्षा की बूँदों के साथ जमीन पर गिरने लगते हैं। बर्फ के इन टुकड़ों को ओला कहते हैं। इन जलाशयों तथा महासागरों के अलावा पेड़-पौधों की पत्तियों से जल वाष्प के रूप में निकलता रहता है। पत्तियों से निकलनेवाली वाष्प की क्रिया को वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। पता लगाएँ कि पत्तियों को जल कैसे प्राप्त होता है? (जड़ों से — पौधे मिट्टी से जल सोखकर तने के रास्ते पत्तियों तक पहुँचाते हैं।) (चित्र 16.5: जलचक्र।) क्या आपने वर्षा के जल को चखा है? चखने पर आपको पता चलेगा कि इसमें कोई खारापन नहीं है। वाष्पन एवं संघनन के क्रियाकलाप में आपने देखा कि नमकीन जल के वाष्पन के बाद प्लेट पर बने जल बूँदों में जरा भी खारापन नहीं रहता है। क्या इस तरह के अनुभव से समुद्र तथा महासागर के जल का वाष्पन तथा संघनन के पश्चात् वर्षा की बूँदों के साथ कोई अन्तर्सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं? (हाँ — समुद्र का खारा जल वाष्प बनकर नमक पीछे छोड़ देता है, संघनन से बादल बनते हैं, और वर्षा मीठे जल की होती है — यही जल चक्र समुद्र के खारे जल को मीठे वर्षा-जल में बदलता है और तालाब/झील/नदी/कुओं को भरता है।)
वर्षा का जल कहाँ जाता है? — तालिका 16.2
जब वर्षा होती है तो वर्षा जल धारा के रूप में बहकर कहाँ-कहाँ जाता है? इसकी एक सूची बनाइए। दी गयी तालिका 16.2 में वर्षा का जल कहाँ-कहाँ भरता है, लिखिए। किताब में इस तालिका की पहली पंक्ति (नदी) भरी है, बाकी पंक्तियाँ खाली हैं — नीचे दी गई भरी तालिका अध्याय में बताए गए स्रोतों से भरी गई है (किताब की छपी हुई भरी तालिका नहीं):
| वर्षा का जल जो जल स्रोत को भरता है | जल स्रोत |
|---|---|
| वर्षा का जल | 1. नदी (किताब में भरी हुई) |
| वर्षा का जल | 2. तालाब |
| वर्षा का जल | 3. झील |
| वर्षा का जल | 4. पोखर |
| वर्षा का जल | 5. झरना |
| वर्षा का जल | 6. कुआँ |
| वर्षा का जल | 7. भूमिगत जल (भूमि के नीचे रिसकर) |
भूमिगत जल
आपने देखा कि कुओं, चापाकल तथा बोरिंग में जल कहाँ से आता है। यह जल पर्याप्त मात्रा में भूमि के नीचे एक स्तर पर पाया जाता है। भूमि के अन्दर मिलनेवाले जल को भूमिगत जल कहते हैं। भूमि के अन्दर यह जल कहाँ से प्राप्त होता है? वर्षा के जल का कुछ भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है तथा कुछ वाष्पन तथा वाष्पोत्सर्जन द्वारा वायु में वापस चला जाता है। शेष जल धीरे-धीरे भूमि के नीचे रिसता चला जाता है। भूमि के अन्दर जल रिस-रिसकर जमा होता रहता है जो भूमि के अन्दर विशाल जल राशि का निर्माण कर देता है। यही जल कुओं से, चापाकल तथा बोरिंग से होकर घर के नलों में आता है। यह जल मुख्य रूप से पेयजल होता है तथा इस जल की मात्रा भूमि के अन्दर सीमित है। यदि हम इस जल का अत्यधिक व्यवहार करें तो क्या होगा? यदि वर्षा कम हो तो क्या होगा? आप अनुमान लगाइए। (भूमिगत जल का स्तर गिर जाएगा — कुओं का जल सूखेगा, चापाकल से जल नहीं आएगा, कभी-कभी नल की टोंटी से पानी नहीं आएगा।)
यदि भारी वर्षा हो तो क्या होगा? — बाढ़
अत्यधिक वर्षा होने से नदियों, झीलों तथा तालाबों का जलस्तर बढ़ सकता है। ऐसा होने पर जल एक बड़े क्षेत्र में फैलकर बाढ़ का कारण बन सकता है। यह खेतों, घरों, गाँवों को जलमग्न कर देता है। हमारे देश में बाढ़ से फसलें, पालतू जानवर, संपदा तथा मानव जीवन की काफी क्षति होती है। क्या आप जानते हैं कि केवल अत्यधिक वर्षा बाढ़ का कारण है? अधिक गर्मी पड़ने पर ऊँचे पर्वतों पर जमे बर्फ जिसको हिमनद या ग्लेशियर कहते हैं, इनके पिघलने से भी नदियों में जल का स्तर बढ़ जाता है, इस कारण भी बाढ़ आ सकती है।
यदि काफी समय वर्षा न हो तो क्या होगा? — सूखा
कभी-कभी वाष्पन तथा वाष्पोत्सर्जन की सामान्य प्रक्रिया के बावजूद महासागरों के ऊपर बने बादलों को जिस स्थान पर जाकर बरसना चाहिए वहाँ हवा के विपरीत दिशा में चलने के कारण वर्षा नहीं होती है। वर्षा के नहीं होने से उस क्षेत्र में सभी जलाशय सूख जाते हैं। वाष्पन तथा वाष्पोत्सर्जन के कारण लगातार जल की क्षति होती रहती है क्योंकि जल को वर्षा द्वारा वापस नहीं लाया जा रहा है। इसलिए जमीन तथा मिट्टी सूख जाती है। वर्षा न होने के कारण भूमि के अन्दर जल का रिसाव नहीं हो पाता है तथा भूमिगत जल का स्तर काफी नीचे चला जाता है। वर्षा न होने की स्थिति में कुओं का जल सूखना, चापाकल के जल का नहीं आना तथा कभी-कभी नल की टोंटी से पानी नहीं आने का क्या कारण है? (भूमिगत जल का स्तर नीचे चला जाना — रिसाव से पुनः पूर्ति ही नहीं हुई।) वर्षा न होने के कारण सूखे की स्थिति में खाद्यान्न और चारा समाप्त होने लगता है। सूखे के कारण भुखमरी तथा अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
बाढ़ एवं सूखा — किताब का बॉक्स
जल चक्र में हमने देखा कि पृथ्वी पर जल का संरक्षण होता है। वर्षा ऋतु में धरती पर सभी जल स्रोत पहले भरते हैं तथा अधिक वर्षा से नदियों द्वारा जल समुद्र की ओर बढ़ता है। लेकिन यदि नदियों को बाँध दिया जाए तो नदियों के जल में जल-जमाव होने लगता है। अगर जल का स्तर एक-दो मीटर से ज्यादा हो जाए तो हमारे खेत-खलिहान, घर, सड़क, पुल-पुलिया जल में डूब जाते हैं। यह स्थिति बाढ़ कहलाती है। किसी खास क्षेत्र में अतिवृष्टि बाढ़ का प्रमुख कारण है। दूसरा प्रमुख कारण है वर्षा के जल के प्रवाह को अप्राकृतिक रूप से रोकना या बाँध देना। हमारे राज्य की उत्तरी सीमा हिमालय का तराई-क्षेत्र है तथा पहाड़ी क्षेत्र की नदियाँ वर्षा के मौसम में जल के साथ भू-स्खलन की मिट्टी, कंकड़, पत्थर, बालू लेकर बंगाल की खाड़ी में उतरती हैं तथा गंगा या अन्य नदियों के द्वारा समुद्र की ओर जाना चाहती हैं। पर रास्ते में हमने नदियों को बाँधने का कार्य किया है, अतः नदियों की धारा मुड़कर नये-नये क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती है। दक्षिण बिहार में नदियों का घना जाल नहीं है तथा वर्षा का परिमाण भी कम है, अतः कभी-कभी दक्षिण बिहार सूखे की चपेट में आता है। उत्तरी बिहार में बाढ़ की स्थिति रहती है। अतः हमें वैज्ञानिक जल-प्रबंधन करने की जरूरत है। और जहाँ जल की मात्रा ज्यादा है वहाँ से सूखे क्षेत्र में जल पहुँचाने की जरूरत है।
वर्षा के जल का संग्रहण
यदि वर्षा न हो तो वर्षा के जल के अभाव में खेत सूख जाते हैं। वर्षा का जल फसल-उत्पादन के लिए वरदान है। वर्षा के जल को एकत्रित कर इसका उपयोग गाँव में किस कार्य के लिए किया जा सकता है? इसके लिए वर्षा के जल को संग्रहित करने की जरूरत है। वर्षा के जल का उपयोग हम कपड़ा धोने में क्यों करते हैं? पता करें तथा वर्षा के जल के विभिन्न उपयोग की सूची बनाएँ। (वर्षा का जल मीठा और मुलायम होता है — उसमें खारापन नहीं होता, इसलिए कपड़े धोने में अच्छा रहता है।) हम सामान्य रूप से पीने में भूमिगत जल का व्यवहार इसलिए करते हैं कि वर्षा का जल भूमि में रिसते समय छन कर स्वच्छ हो जाता है साथ ही कुछ लवण इसमें घुल जाते हैं तथा ये लवण शरीर के लिए आवश्यक होते हैं। गिरते हुए वर्षा का पानी क्यों नहीं पीना चाहिए? (गिरता हुआ वर्षा-जल छत और हवा की गंदगी समेट लेता है — वह छना हुआ नहीं होता; भूमि में रिसकर छना हुआ जल ही स्वच्छ और पीने योग्य होता है।) वर्षा के जल को एकत्र करना और उसका संरक्षण करने के बाद उपयोग में लाना, जल की उपलब्धता में वृद्धि करने का उपाय है। इस उपाय द्वारा जल एकत्र करने को वर्षा जल संग्रहण कहते हैं। 1. गाँव में: गाँव में प्रायः घर मिट्टी, लकड़ी आदि से बने होते हैं तथा उन पर खपरैल की झुकी हुई छत होती है। जब वर्षा होती है तो वर्षा का पानी छत के छज्जे अथवा ओट से बहता रहता है। ओट का एक किनारा ही आधार भी कहलाता है। इस ओट के नीचे 'U' आकार का लम्बा बर्तन बनाकर टीन की छलनी लगाने से वर्षा के जल को छत से बहकर जमीन के गड्ढे में जल का एकत्रित किया जा सकता है। गाँव के सभी लोग अपने-अपने घर से इस तरह की छलनी बनाकर एक विशाल गड्ढा खोदकर जल का संग्रहण कर एक बड़े तालाब का निर्माण कर सकते हैं। आप गाँव में जलसंग्रहण के लिए मॉडल तैयार कर जल संरक्षण के उपाय बताने का प्रयास कीजिए कि जल संरक्षित कर इसका उपयोग खेत-खलिहानों तथा अन्य कार्यों में कैसे करेंगे? 2. शहरों में: शहरों में अधिकतर पक्के मकान होते हैं तथा कहीं-कहीं खपरैल छतवाले मकान भी होते हैं। पक्के मकान के छत पर एकत्रित वर्षा के जल को पाइप के माध्यम से टैंक में पहुँचाया जा सकता है। (चित्र 16.6: शहर में मकान की छत पर जमा वर्षा का जल पाइप की सहायता से टैंक में पहुँचाया जा रहा है।)
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
- जल जीवन के लिए आवश्यक है।
- वायु में वाष्पन और वाष्पोत्सर्जन से जलवाष्प मिलती रहती है।
- जलवाष्प वायु में संघनित होकर छोटी-छोटी जल की बूँदें बनती हैं, जो बादल के रूप में दिखाई देती हैं। बहुत सी छोटी जल की कणिकाएँ मिलकर जल बूँदें बनती हैं तथा वर्षा, हिम अथवा ओले के रूप में गिरती हैं।
- वर्षा द्वारा झीलों, तालाबों, कुओं तथा मिट्टी में जल की पुनः पूर्ति होती है।
- महासागरों तथा जलाशयों के जल से बादल बनना तथा वर्षा के रूप में जल का पुनः धरती पर लौटना जल चक्र कहलाता है।
- अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आती है जबकि लम्बे समय तक वर्षा न होने से सूखा पड़ जाता है।
- पृथ्वी पर उपयोग करने योग्य जल की मात्रा सीमित है इसलिए जल के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।
- वर्षा का जल भूमि में रिसकर छनता है, उसमें आवश्यक लवण घुलते हैं — वही भूमिगत जल मुख्यतः पेयजल होता है।
मुख्य शब्द
- दैनिक क्रिया (Daily Course): रोज के काम — पीना, ब्रश/मुँह धोना, शौचालय, नहाना, कपड़े धोना — जिनमें जल खर्च होता है।
- बोरिंग (Boring): जमीन में गहरा छेद करके नीचे के जल को मोटर से उठाने की व्यवस्था।
- वाष्पन (Evaporation): जल का गर्मी पाकर भाप (वाष्प) में बदलना — धूप में थाली का जल सूखना इसी से होता है।
- संघनन (Condensation): वाष्प का ठंडा होकर फिर जल में बदलना — केतली की भाप का प्लेट पर बूँद बनना।
- जलाशय (Water Reservoir): जल के स्रोत — तालाब, झील, नदी, पोखर, झरना, कुआँ।
- भूमिगत जल (Underground Water): भूमि के अन्दर रिसकर जमा हुआ जल — कुओं, चापाकल और बोरिंग से मिलता है, मुख्यतः पेयजल।
- वाष्पोत्सर्जन (Transpiration): पत्तियों से जल का वाष्प के रूप में निकलना।
- जल संग्रहण (Water harvesting): वर्षा के जल को एकत्र करके संरक्षण के बाद उपयोग में लाना — छत से पाइप/छलनी द्वारा टैंक या गड्ढे/तालाब में।
- जल चक्र: जल से वाष्प बनना, बादल बनना, वर्षा के रूप में जल का जमीन पर आना — यही चक्र समुद्र के खारे जल को मीठे वर्षा-जल में बदलता है।
- वर्षा: बादल की भारी जल-बूँदों का जमीन पर गिरना।
- ओला: ज्यादा ठंडे होकर बने बर्फ के टुकड़े जो वर्षा की बूँदों के साथ गिरते हैं।
- बाढ़: अत्यधिक वर्षा (या हिमनद पिघलने) से जलस्तर बढ़कर खेत-घर-गाँव का जलमग्न हो जाना; नदियों को बाँधना भी कारण बनता है।
- सूखा: लम्बे समय तक वर्षा न होने से जलाशयों का सूखना, भूमिगत जल-स्तर का नीचे जाना, खाद्यान्न/चारे की कमी, भुखमरी/अकाल की स्थिति।
- हिमनद / ग्लेशियर: ऊँचे पर्वतों पर जमा बर्फ — अधिक गर्मी में पिघलकर नदियों का जलस्तर बढ़ा देता है।
याद रखें
- जल जीवन के लिए आवश्यक है।
- वायु में वाष्पन और वाष्पोत्सर्जन से जलवाष्प मिलती रहती है।
- जलवाष्प वायु में संघनित होकर छोटी-छोटी जल की बूँदें बनती हैं, जो बादल के रूप में दिखाई देती हैं। बहुत सी छोटी जल की कणिकाएँ मिलकर जल बूँदें बनती हैं तथा वर्षा, हिम अथवा ओले के रूप में गिरती हैं।
- वर्षा द्वारा झीलों, तालाबों, कुओं तथा मिट्टी में जल की पुनः पूर्ति होती है।
- महासागरों तथा जलाशयों के जल से बादल बनना तथा वर्षा के रूप में जल का पुनः धरती पर लौटना जल चक्र कहलाता है।
- अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आती है जबकि लम्बे समय तक वर्षा न होने से सूखा पड़ जाता है।
- पृथ्वी पर उपयोग करने योग्य जल की मात्रा सीमित है इसलिए जल के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।
- पृथ्वी का 2/3 भाग जल से घिरा है, फिर भी 97.5 प्रतिशत जल खारा है, मीठा जल केवल 2.5 प्रतिशत और पीने योग्य उपलब्धता केवल 0.003 प्रतिशत है।
- वाष्पन के समय नमक पीछे रह जाता है — इसलिए समुद्र के खारे जल से बनी वर्षा मीठी होती है।
- गिरता हुआ वर्षा-जल सीधे नहीं पीना चाहिए — पीने योग्य जल वह है जो भूमि में रिसकर छन गया हो।
परीक्षा टिप
इस अध्याय में चार बातें बार-बार पूछी जाती हैं: (1) परिभाषाएँ — वाष्पन (जल → वाष्प), संघनन (वाष्प → जल), वाष्पोत्सर्जन (पत्तियों से वाष्प), जल चक्र (वाष्प → बादल → वर्षा → जमीन → फिर वाष्प); (2) संख्याएँ — पृथ्वी का 2/3 भाग जल, 97.5 प्रतिशत खारा, 2.5 प्रतिशत मीठा, 0.003 प्रतिशत पीने योग्य उपलब्धता; (3) बाढ़ बनाम सूखा — अत्यधिक वर्षा/हिमनद पिघलना/नदियों को बाँधना → बाढ़; लम्बे समय तक वर्षा न होना → सूखा; बिहार का उदाहरण — उत्तरी बिहार में बाढ़, दक्षिण बिहार में सूखा; (4) वर्षा जल संग्रहण की दो विधियाँ — गाँव (खपरैल छत, ओट के नीचे U-आकार का बर्तन + टीन की छलनी → गड्ढा/तालाब) और शहर (पक्की छत → पाइप → टैंक)। तालिका 16.1 अपने मापन से भरनी है — उसका कोई एक सही उत्तर नहीं है।
सारणी — जल चक्र और बाढ़-सूखा
| चरण | क्या होता है | उदाहरण / प्रमाण |
|---|---|---|
| वाष्पन | जल गर्मी पाकर वाष्प बनता है | धूप में थाली का जल सूखना; केतली की टोंटी से भाप |
| वाष्पोत्सर्जन | पत्तियों से वाष्प निकलता है | पौधों की पत्तियों से लगातार वाष्प निकलना |
| संघनन | वाष्प ठंडी होकर जल-बूँद बनती है | केतली की भाप का प्लेट पर बूँद बनना; सर्दियों में कोहरा |
| बादल | छोटी बूँदें/कणिकाएँ मिलकर बादल बनती हैं | ऊँचाई पर वाष्प का इकट्ठा होना |
| वर्षा / हिम / ओला | भारी बूँदें जमीन पर गिरती हैं | वर्षा की बूँदें; ठंड में बर्फ के टुकड़े (ओले) |
| रिसाव / पुनः पूर्ति | वर्षा का जल भूमि में रिसकर भूमिगत जल बनता है | कुआँ, चापाकल, बोरिंग का जल |
| स्थिति | कारण | परिणाम |
|---|---|---|
| बाढ़ | अत्यधिक वर्षा; हिमनद का पिघलना; नदियों को बाँधना | जलस्तर एक-दो मीटर से ज्यादा बढ़कर खेत-घर-सड़क-पुल डूबना; फसल/पशु/संपदा/जीवन की क्षति |
| सूखा | लम्बे समय तक वर्षा न होना (हवा की विपरीत दिशा से बादल न बरसना) | जलाशय सूखना; भूमिगत स्तर नीचे जाना; कुएँ सूखना, चापाकल/नल बंद; खाद्यान्न/चारा समाप्त; भुखमरी/अकाल |
अभ्यास — खुद करके देखो
- क्रियाकलाप-1 करके तालिका 16.1 भरो — मग/लीटर से अपने एक दिन के जल-उपयोग को मापो, फिर परिवार, महीना, वर्ष और गाँव/शहर का अनुमान लगाओ। संकेत: हर विद्यार्थी का उत्तर अलग होगा; मापन की विधि ही महत्वपूर्ण है — मग/बाल्टी की मात्रा पहले ज्ञात करो, फिर गिनती से जोड़ लगाओ।
- क्रियाकलाप-2 की थाली-तुलना करो — तीन थालियों में थोड़ा-थोड़ा जल भरकर एक को धूप में, एक को खुली हवा में, एक को छाया में रखो और बताओ किसका जल सबसे जल्दी सूखता है और क्यों। संकेत: धूप + खुली हवा वाली थाली सबसे जल्दी सूखेगी — सूखने में धूप और शुष्क हवा जरूरी है।
- क्रियाकलाप-3 का केतली-प्रयोग करो — भाप को प्लेट पर संघनित करके दिखाओ, फिर नमक वाले जल से यही प्रयोग दोहराकर बताओ संघनित जल खारा क्यों नहीं होता। संकेत: वाष्प के साथ नमक नहीं उड़ता — इसीलिए समुद्र के खारे जल से बनी वर्षा मीठी होती है।
- तालिका 16.2 भरो — वर्षा का जल किन-किन स्रोतों को भरता है, अध्याय के स्रोतों से सूची बनाओ। संकेत: नदी (किताब में भरी है), तालाब, झील, पोखर, झरना, कुआँ, भूमिगत जल।
- अपने गाँव/मोहल्ले के लिए वर्षा जल संग्रहण का मॉडल बनाओ — गाँव की विधि (खपरैल छत, ओट के नीचे U-आकार का बर्तन + टीन की छलनी → गड्ढा/तालाब) या शहर की विधि (पक्की छत → पाइप → टैंक) — और बताओ संग्रहित जल का उपयोग खेत-खलिहानों तथा अन्य कार्यों में कैसे करोगे। संकेत: मॉडल के साथ यह भी बताओ कि संग्रहित जल से भूमिगत जल की उपलब्धता कैसे बढ़ेगी।
प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: जल के मुख्य स्रोत कौन-से हैं? घर तक जल कैसे पहुँचता है — शहर और गाँव की व्यवस्था में क्या अंतर है?
उत्तर: मुख्य स्रोत — नदियाँ, झरने, तालाब, झील, पोखर, कुआँ, चापाकल, बोरिंग। घर में जल नल से मिलता है — घर का पाइप जमीन के अन्दर से होते हुए मुख्य जल स्रोत (झील, नदी, कुआँ या जल मीनार) तक जाता है और विद्युत मोटर स्रोत का जल खींचकर घर तक पहुँचाती है। शहरों में छतों पर टंकियाँ होती हैं — पहले टंकियों में जल भरता है, फिर ऊपर से नीचे पाइप से घर के सभी नलों में आता है। गाँव में लोग कुओं तथा चापाकलों से जल लेते हैं, कहीं-कहीं बोरिंग से भी। - प्रश्न: पृथ्वी का 2/3 भाग जल से घिरा है, फिर भी जल की कमी की बात क्यों की जाती है? समुद्र का खारा जल मीठे स्रोतों को कैसे भरता है?
उत्तर: पृथ्वी के कुल जल का 97.5 प्रतिशत खारा है, मीठा जल केवल 2.5 प्रतिशत है और मानव एवं जीव-जन्तु के लिए पीने योग्य पानी की उपलब्धता केवल 0.003 प्रतिशत है — इसलिए उपयोग योग्य जल बहुत सीमित है। समुद्र का जल सीधे पीने/दैनिक कार्यों में उपयोग नहीं हो सकता, पर वही जल वाष्पन से वाष्प बनता है — वाष्प के साथ नमक नहीं उड़ता — संघनन से बादल बनते हैं और मीठी वर्षा होती है, जो तालाब, झील, नदी, कुओं और भूमिगत जल को भरती है। - प्रश्न: वाष्पन, संघनन और वाष्पोत्सर्जन में अंतर बताओ। बादल कैसे बनते हैं? वर्षा और ओला क्या हैं? जल चक्र की परिभाषा दो।
उत्तर: वाष्पन — जल का गर्मी पाकर भाप (वाष्प) में बदलना (धूप में थाली का जल सूखना)। संघनन — वाष्प का ठंडा होकर फिर जल में बदलना (केतली की भाप का प्लेट पर बूँद बनना)। वाष्पोत्सर्जन — पत्तियों से जल का वाष्प के रूप में निकलना (पत्तियों को जल जड़ों से मिट्टी से मिलता है)। बादल — काफी ऊँचाई पर वाष्प इकट्ठा होकर छोटी-छोटी बूँदों/कणिकाओं के रूप में एक-दूसरे के समीप आ जाता है, वही बादल है। कणिकाएँ मिलकर बड़ी बूँदें बनाती हैं, भारी होकर गिरती हैं — यही वर्षा है। ज्यादा ठंडे होकर बने बर्फ के टुकड़े जो वर्षा के साथ गिरते हैं, ओले कहलाते हैं। जल चक्र — जल से वाष्प बनना, बादल बनना, वर्षा के रूप में जल का जमीन पर आना और फिर से वाष्प बनना — यही चक्र है। - प्रश्न: भूमिगत जल क्या है और कैसे बनता है? इसका अत्यधिक उपयोग करने या वर्षा कम होने पर क्या होगा?
उत्तर: भूमि के अन्दर मिलनेवाला जल भूमिगत जल कहलाता है — यह भूमि के नीचे एक स्तर पर पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। वर्षा के जल का कुछ भाग भूमि सोख लेती है, कुछ वाष्पन/वाष्पोत्सर्जन से वायु में लौट जाता है, शेष धीरे-धीरे नीचे रिसकर जमा होता है और विशाल जल राशि बनाता है — यही जल कुओं, चापाकल और बोरिंग से होकर घर के नलों में आता है और मुख्यतः पेयजल होता है। इसकी मात्रा भूमि के अन्दर सीमित है — अत्यधिक उपयोग या कम वर्षा से इसका स्तर गिर जाएगा, कुएँ सूखेंगे, चापाकल से जल नहीं आएगा, कभी-कभी नल की टोंटी से पानी नहीं आएगा। - प्रश्न: बाढ़ और सूखा क्या हैं — कारण, प्रभाव और बिहार का उदाहरण सहित बताओ। वर्षा जल संग्रहण की गाँव और शहर की विधियाँ क्या हैं?
उत्तर: बाढ़ — अत्यधिक वर्षा से नदियों/झीलों/तालाबों का जलस्तर बढ़कर एक-दो मीटर से ज्यादा हो जाए तो खेत-खलिहान, घर, सड़क, पुल-पुलिया डूब जाते हैं; हिमनद के पिघलने और नदियों को बाँधने (प्रवाह रोकने) से भी बाढ़ आती है; फसल, पशु, संपदा और मानव जीवन की क्षति होती है। सूखा — लम्बे समय तक वर्षा न होने से जलाशय सूख जाते हैं, मिट्टी सूख जाती है, भूमिगत स्तर नीचे चला जाता है, खाद्यान्न/चारा समाप्त होकर भुखमरी/अकाल की स्थिति बन जाती है। बिहार — उत्तरी सीमा हिमालय का तराई-क्षेत्र है, पहाड़ी नदियाँ मिट्टी-कंकड़-पत्थर-बालू लेकर गंगा/अन्य नदियों से समुद्र की ओर जाती हैं, बाँधने से धारा मुड़कर नए क्षेत्रों में बाढ़ लाती है — उत्तरी बिहार में बाढ़ की स्थिति रहती है; दक्षिण बिहार में नदियों का घना जाल नहीं है और वर्षा भी कम है, इसलिए वहाँ कभी-कभी सूखा पड़ता है — इसीलिए वैज्ञानिक जल-प्रबंधन और अधिक जल वाले क्षेत्र से सूखे क्षेत्र में जल पहुँचाना जरूरी है। वर्षा जल संग्रहण — गाँव: खपरैल छत के ओट के नीचे U-आकार का बर्तन + टीन की छलनी लगाकर जल को गड्ढे/तालाब में एकत्र करना; शहर: पक्की छत का जल पाइप से टैंक में पहुँचाना।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें — (क) जल को वाष्प में बदलने की क्रिया को ............ कहते हैं। (ख) जलवाष्प को जल में बदलने की क्रिया को ............ कहते हैं। (ग) एक वर्ष या इससे अधिक समय तक वर्षा न होने से उस क्षेत्र में ............ होने की सम्भावना रहती है। (घ) अत्यधिक वर्षा से ............ आती है।
उत्तर: (क) वाष्पन। (ख) संघनन। (ग) सूखा। (घ) बाढ़। - प्रश्न: निम्नलिखित में से प्रत्येक का सम्बन्ध क्या वाष्पन अथवा संघनन से है। (क) गीले कपड़ों पर इस्त्री करते समय भाप का ऊपर उठना। (ख) सर्दियों में प्रातःकाल कोहरे का दिखना। (ग) गीले कपड़े से पोंछने के बाद श्याम पट्ट (ब्लैक बोर्ड) कुछ समय बाद सूख जाता है। (घ) गर्म छड़ पर जल छिड़कने से भाप बनकर ऊपर उठना।
उत्तर: (क) वाष्पन — इस्त्री की गर्मी से कपड़ों का जल वाष्प बनकर ऊपर उठता है। (ख) संघनन — रात की ठंड में वायु की जलवाष्प ठंडी होकर छोटी-छोटी बूँदों (कोहरे) में बदल जाती है। (ग) वाष्पन — पोंछने के बाद का जल धीरे-धीरे वाष्प बनकर उड़ जाता है, इसलिए बोर्ड सूख जाता है। (घ) वाष्पन — गर्म छड़ पर पड़ते ही जल गर्मी पाकर भाप बनकर ऊपर उठता है। - प्रश्न: बादल कैसे बनते हैं?
उत्तर: नदियों, तालाबों, झीलों, समुद्र और महासागर के जल का वाष्पन होता है और पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन से भी वायु में जलवाष्प मिलती है। काफी ऊँचाई पर यह वाष्प ठंडी होकर संघनित होती है — छोटी-छोटी जल की बूँदें/कणिकाएँ एक-दूसरे के समीप आकर बादल का रूप ले लेती हैं। कणिकाएँ मिलकर बड़ी बूँदें बनाती हैं और भारी होकर वर्षा के रूप में गिरती हैं। - प्रश्न: गाँव में जल का संग्रहण कैसे करेंगे?
उत्तर: गाँव के घरों की खपरैल की झुकी हुई छत से वर्षा का पानी छज्जे/ओट से बहता है। ओट के नीचे 'U' आकार का लम्बा बर्तन बनाकर टीन की छलनी लगाएँ — छत का जल छनकर गड्ढे में एकत्र होगा। गाँव के सभी लोग अपने-अपने घर से इस तरह की छलनी बनाकर एक विशाल गड्ढा खोदकर जल का संग्रहण कर एक बड़े तालाब का निर्माण कर सकते हैं। फिर इस संग्रहित जल का उपयोग खेत-खलिहानों तथा अन्य कार्यों में किया जा सकता है। मॉडल बनाकर जल संरक्षण के उपाय बताना भी इसी का भाग है। - प्रश्न: वर्षा के मौसम में कपड़े जल्दी क्यों नहीं सूखते हैं?
उत्तर: कपड़ों के सूखने में धूप और शुष्क हवा जरूरी है — सूखना वाष्पन से होता है। वर्षा के मौसम में धूप कम होती है और हवा में पहले से ही बहुत नमी (आर्द्रता) होती है, इसलिए वाष्पन धीमा हो जाता है और कपड़े जल्दी नहीं सूखते। - प्रश्न: (परियोजना 1) तीन क्रियाकलापों की सूची बनाइए जिससे आप जल बचा सकते हैं। प्रत्येक क्रियाकलाप को कैसे करेंगे, इसका उल्लेख कीजिए।
उत्तर: (1) दाँत साफ करते समय नल बंद रखना — ब्रश करते समय नल खुला छोड़ने के बजाय मग से जल लेना। (2) नहाने में बाल्टी का उपयोग — फव्वारे/खुले नल के बजाय बाल्टी-मग से नहाना। (3) रिसते नल/टोंटी को ठीक करवाना — बूँद-बूँद टपकता नल दिन भर में बहुत जल बर्बाद करता है; समय पर मरम्मत करवाना। - प्रश्न: (परियोजना 2) किसी पत्रिका या पुराने समाचार-पत्र से हाल ही में हुई बाढ़ या सूखे के चित्र एकत्र करके अपनी उत्तर पुस्तिका में चिपकाइए। उस क्षेत्र में रहनेवाले मनुष्यों ने जिन समस्याओं का सामना किया है, उन पर कुछ पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर: (कार्य-प्रश्न — उत्तर अपनी पुस्तिका में लिखना है।) समस्याओं के उदाहरण: घरों/खेतों का डूबना, फसल का नष्ट होना, पशुओं की हानि, पीने के पानी की कमी, सड़कों/पुलों का टूटना, बीमारियों का फैलना (बाढ़ में); सूखे में — कुओं का सूखना, फसल का सूखना, पशुओं के लिए चारे की कमी, खाद्यान्न की कमी। - प्रश्न: (परियोजना 3) जल की बचत के उपायों पर एक पोस्टर बनाइए और उसे अपने विद्यालय के सूचना पट्ट पर प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर: (कार्य-प्रश्न।) पोस्टर में ये उपाय दिखाएँ: नल बंद रखना, मग/बाल्टी का उपयोग, रिसते नल की मरम्मत, वर्षा जल संग्रहण, पौधों को सुबह/शाम ही पानी देना, जल को व्यर्थ न बहाना। - प्रश्न: (परियोजना 4) "जल की बचत" के विषय पर अपने से लिखिए।
उत्तर: (लेखन-प्रश्न — अपने शब्दों में लिखना है।) मुख्य बिंदु: जल जीवन के लिए आवश्यक है; पृथ्वी पर उपयोग योग्य जल केवल 0.003 प्रतिशत पीने योग्य उपलब्धता के साथ बहुत सीमित है; दैनिक कार्यों में मग/बाल्टी का उपयोग, नल बंद रखना, रिसाव रोकना, वर्षा जल संग्रहण और वैज्ञानिक जल-प्रबंधन ही बचत के उपाय हैं।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
इस पृष्ठ को पढ़ते समय पहले अपने एक दिन के जल-उपयोग (तालिका 16.1) को मापने की विधि समझें, फिर जल के स्रोतों और घर तक जल पहुँचने की व्यवस्था को पढ़ें। वाष्पन/संघनन/वाष्पोत्सर्जन की तीनों परिभाषाओं और जल चक्र के चरणों को क्रम से याद करें — केतली वाला प्रयोग ही इनका प्रमाण है। 2/3, 97.5, 2.5 और 0.003 की संख्याओं को बार-बार दोहराएँ। बाढ़ और सूखा के कारण-परिणाम और बिहार के उदाहरण को अलग-अलग याद करें। वर्षा जल संग्रहण की गाँव और शहर की विधियों का अंतर स्पष्ट रखें। अभ्यास के प्रश्न स्वयं करके देखें, फिर प्रश्नोत्तर से मिलान करें। किताब के अभ्यास के सभी प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं — परीक्षा से पहले उन्हें बिना देखे लिखने का अभ्यास करें।

