Chapter 14: बल्ब जलाओ जगमग-जगमग
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Science • Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
बल्ब जलाओ जगमग-जगमग — EG's own notes, in simple Hindi
Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali) | Chapter 14 | Medium: Hindi

Diagram (labels are printed on the image): सरल विद्युत परिपथ — सेल, तार, स्विच और बल्ब। यह सामान्य चित्र है, पुस्तक का चित्र नहीं।

स्विच दबाते ही परिपथ पूरा होता है और बल्ब जल उठता है। यह सामान्य चित्र है।
अध्याय के बारे में
सबीहा के अब्बा परेशान हो रहे थे। बार-बार टॉर्च को ठोक रहे थे। साथ ही कुछ बड़बड़ा भी रहे थे। "अरे, आज ही तो छुट्टन नया सेल (बैटरी) डलवाकर लाया है। फिर क्या हो गया इस कमबख्त टॉर्च को?" यह सुनकर सबीहा चुपचाप उनके हाथ से टॉर्च ले आई और एक कोने में बैठकर उसकी जाँच करने लगी। मन ही मन सोचती भी गई। "देखूँ, कहीं बल्ब तो फ्यूज नहीं हुआ? उफ, कैसी कसकर घुमाई है इसकी चूड़ी। हाँ, खुल गई। बल्ब निकालकर देखूँ। बल्ब तो बाहर से ठीक ही लग रहा है। इसे वापस वैसे ही लगा देती हूँ। सेल तो नए डाले हैं। फिर भी देख लेती हूँ। अरे, यह क्या? एक सेल तो उल्टा लगाया हुआ है। यह तो छुट्टन की ही करामात लगती है।" दो मिनट में सबीहा ने लौटकर जगमगाती हुई टॉर्च अब्बा के हाथ में थमाई। खुशी से उन्होंने उसकी पीठ पर हाथ रखा और तुरंत टॉर्च लेकर बाहर निकल गए। बोलिए, क्या आप भी टॉर्च ठीक कर सकते हैं? क्या बल्ब और सेल की सही पहचान है आपको? इस अध्याय में ऐसी कई बातों का अभ्यास आपको करवाया जाएगा। स्विच क्या होता है, विद्युत (बिजली) किन चीजों में से प्रवाहित हो पाती है और किन में से नहीं — ऐसे सवालों के उत्तर आपको मजेदार प्रयोगों से मिलेंगे। इसके अलावा आगे की कक्षाओं में भी आप विद्युत (बिजली) के और प्रयोग करेंगे।
सावधानी: यहाँ सब प्रयोग केवल टॉर्च या रेडियो में लगनेवाले सेल से किए जाएँगे। कहीं भूल से आप अपने घर, स्कूल या खेत में लगे बिजली कनेक्शन से प्रयोग न करें। वहाँ बिजली से छेड़छाड़ करना खतरनाक हो सकता है।
क्रियाकलाप-1 — सेल से बल्ब का नाता जोड़ें
एक सेल, टॉर्चवाला बल्ब, बल्ब होल्डर तथा तार के कुछ टुकड़े लीजिए। साइकिल ट्यूब का छल्ला भी रख लें। क्या इन्हें जोड़कर बल्ब जला सकते हैं? ठहरें, जल्दबाजी से काम नहीं चलेगा। हम सावधानी से ही एक-एक कदम आगे बढ़ेंगे। 1. तार को साफ करना: नए तार पर पूरा प्लास्टिक चढ़ा रहता है। तो सबसे पहले तार के दोनों सिरों से लगभग दो-दो से.मी. तक प्लास्टिक हटा दें। तार के दोनों सिरे साफ होने चाहिए। यदि सिरों पर पहले से ही प्लास्टिक हटा हुआ है और वे साफ नहीं है तो उन्हें रेगमाल, पत्थर या किसी अन्य खुरदरी चीज से घिसकर चमका लें। 2. बल्ब और होल्डर की जाँच: बल्ब के अंदर पतले तार का छोटा-सा कुंडल होता है। हैंडलेंस से देखिए कैसा है। अगर कुंडल टूटा हुआ हो, तो बल्ब नहीं जलेगा। ऐसे फ्यूज बल्ब को बदलना पड़ेगा। यह टॉर्च-बल्ब तो छोटा है, पर घर में लगा बल्ब बड़ा होता है। इसलिए उसमें कुंडल साफ दिखाई देता है। बल्ब के नीचे घुंडी को देखें। कुंडल के तार का एक सिरा अंदर ही अंदर घुंडी से जुड़ा होता है। कुंडल का दूसरा सिरा बल्ब की चूड़ी से जुड़ा है। इसलिए घुंडी और चूड़ी ही इस बल्ब के दो सिरे कहलाते हैं। (चित्र-14.1: टॉर्च के बल्ब का भीतरी दृश्य।) बल्ब को बल्ब होल्डर में कसकर फँसाया जाता है। इससे बल्ब की चूड़ी होल्डर की चूड़ी से जुड़ जाती है और बल्ब की घुंडी होल्डर की घुंडी से जुड़ जाती है। होल्डर की घुंडी और चूड़ी दोनों से एक-एक पत्ती जुड़ी रहती है जो बाहर को निकलती है। इन्हीं पत्तियों को होल्डर का सिरा कहते हैं। अगर तुम्हारे होल्डर के सिरों पर जंग लगी है तो उन्हें भी रेगमाल से घिसकर चमका लें। और फिर दोनों सिरों पर एक-एक तार का टुकड़ा कसकर जोड़ दें। 3. सेल के सिरे पहचानिए: सेल के भी दो सिरे होते हैं और दोनों के अलग-अलग नाम भी हैं। देखें, एक तरफ छोटी घुंडी बनी है। वहाँ क्या निशान बना है? यह (+) निशानवाला सिरा है 'धन' सिरा। और चपटी सतहवाला है 'ऋण' सिरा जिसका निशान (-) है। नुकसान से बचना: सेल के दोनों सिरों को तार से सीधे कभी मत जोड़ें। नहीं तो आपका सेल मिनटों में खत्म हो जाएगा। 4. बढ़िया-सा सेल होल्डर: सेल के तारों को कैसे जोड़ें? इसका एक आसान तरीका है। साइकिल ट्यूब के टुकड़े काटकर आप छल्ले बना सकते हैं। छल्ला इतना चौड़ा हो कि जब उसे सेल पर चढ़ाएँ तो सेल की घुंडी उससे ढँक जाए। बस, यही है आपका सेल होल्डर। 5. अब जलेगा अपना बल्ब: बल्ब होल्डर से जुड़े दोनों तारों को सेल से जोड़ना है। एक तार को सेल की घुंडी पर लगाना है और दूसरे तार को सेल के चपटे सिरे पर। तारों के सिरों को छल्ले के नीचे अच्छे से दबा दें। बस, ऐसा करते ही आपका बल्ब जगमगा उठा या नहीं? अगर बल्ब नहीं जला तो तारों के सिरों को साफ करके, ठीक से कसकर लगाएँ। फिर भी न जले तो शिक्षक को दिखाएँ। 6. अपना बल्ब बुझाएँगे कैसे? अपने सेल को फालतू में खर्च न करना हो तो क्या करें? बस, सेल में लगा एक तार हटा लें। अब सेल को अगर पलट कर लगा दें तो क्या होगा? करके देखें। (एक ही सेल वाले इस सरल परिपथ में सेल पलटने पर भी बल्ब जलेगा — बल्ब के कुंडल को धारा की दिशा से कोई फर्क नहीं पड़ता, वह किसी भी दिशा की धारा से गर्म होकर चमकता है। टॉर्च के दो सेलों वाली व्यवस्था अलग है — नीचे देखें।)
बिजली का परिपथ
बल्ब जल रहा है तो जाहिर है कि उसमें से विद्युत धारा (बिजली) बह रही है। तो, बल्ब को जलाने के लिए धारा कैसे पहुँची? बल्ब तक विद्युत धारा तार से पहुँचती है। सेल से तार में, तार से बल्ब में और फिर बल्ब में से होकर तार के ही जरिए सेल के दूसरे सिरे तक — धारा के प्रवाहित होने का यह एक पूरा चक्कर लगता है। विद्युत धारा के आने-जाने के इस चक्कर को परिपथ (सर्किट) कहते हैं। आपने भी बल्ब जलाने के लिए कई परिपथ बनाए हैं। धारा जब बहती है तो हम कहते हैं सर्किट पूरा या चालू है। सर्किट में विद्युत धारा नहीं बहती तो हम कहते हैं सर्किट अधूरा या कहीं से कटा हुआ है। हम कैसे पता कर सकते हैं कि किसी परिपथ में विद्युत धारा बह रही है या नहीं? (बल्ब ही बता देता है — बल्ब जल रहा है तो धारा बह रही है, नहीं जल रहा तो परिपथ कहीं अधूरा/कटा है।)
चित्र 14.2 — किस-किस का बल्ब जलेगा?
आपने अपना बल्ब तो जला लिया। पर मीनू, गोलू, शायरा, अतुल और मुनिया ने जिन अलग-अलग तरीकों से अपने बल्बों को तार से जोड़ा वे चित्र 14.2 में दिए गए हैं। सोचकर बताइए कि किस-किस का बल्ब जलेगा और किस-किस का नहीं जलेगा? अब खुद करके भी देखिए कि आपने सही सोचा था या नहीं। चित्र में तारों को ध्यान से देखने पर यह निष्कर्ष निकलता है — मीनू: नहीं जलेगा (केवल एक तार जुड़ा है — सेल के एक सिरे से बल्ब की एक पत्ती तक; बल्ब की दूसरी पत्ती और सेल का दूसरा सिरा खुले हैं, इसलिए परिपथ अधूरा है)। गोलू: जलेगा (दोनों तार जुड़े हैं — सेल के दोनों सिरे बल्ब की दोनों पत्तियों से जुड़े हैं, परिपथ पूरा है)। शायरा: जलेगा (दोनों तार जुड़े हैं, परिपथ पूरा है)। अतुल: जलेगा (एक तार सेल के एक सिरे से घूमकर बल्ब की एक पत्ती तक, दूसरा तार सेल के दूसरे सिरे से बल्ब की दूसरी पत्ती तक — परिपथ पूरा है)। मुनिया: जलेगा (दोनों तार जुड़े हैं, परिपथ पूरा है)। चित्र-14.2 में कौन-कौन से सर्किट अधूरे हैं? (केवल मीनू का — बाकी चारों के सर्किट पूरे हैं।) नोट: किताब स्वयं इस चित्र के उत्तर नहीं छापती — ऊपर दिया गया निष्कर्ष चित्र में तारों की जाँच से निकाला गया है। किताब का निर्देश है कि विद्यार्थी स्वयं करके जाँचें कि उसने सही सोचा था या नहीं।
कौन विद्युत का चालक, कौन कुचालक? — क्रियाकलाप-2
शुरू में हम खुले सिरों को चित्र-14.3 की तरह विद्युत परिपथ बनाएँगे फिर उसके तार काटकर कटे तार के सिरों के बीच में तरह-तरह की चीजें जोड़कर देखेंगे कि कब बल्ब जलता है और कब नहीं। जिस वस्तु या पदार्थ को बीच में जोड़ने से बल्ब जलता है उसे विद्युत चालक कहते हैं। विद्युत धारा के चालक धारा के बहने में इतनी कम रुकावट डालते हैं कि बल्ब जलता रहता है। पर कुछ चीजें ऐसी भी होती हैं जिनको सर्किट में रखने से बल्ब नहीं जलता। इन्हें कुचालक कहा जाता है। कुचालक धारा को बहने से रोकते हैं तथा बल्ब जल ही नहीं पाता है। (चित्र 14.4: विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से बल्ब का जलना एवं बुझना तथा कुचालक एवं सुचालक वस्तु की पहचान करना — खुले सिरों के बीच लोहे की चाबी जोड़ने पर बल्ब जलता है, रबड़ की वस्तु जोड़ने पर नहीं।) चलिए, हो जाएँ तैयार चालक और कुचालक पहचानने के लिए। लोहे की चाबी से शुरू करें। तारों के खुले सिरों के बीच चाबी को जोड़कर देखें कि बल्ब जलता है या नहीं। फिर तालिका में दी गई वस्तुओं को भी तार से जोड़कर पता कीजिए कि वह चालक है या कुचालक। और इस तालिका में भरिए।
तालिका 14.4 — चालक और कुचालक (अपेक्षित प्रयोग-परिणाम)
किताब में तालिका 14.4 के चालक/कुचालक खाने खाली हैं — विद्यार्थी को प्रयोग करके भरने हैं। नीचे दी गई भरी तालिका प्रयोग के अपेक्षित परिणाम हैं (किताब की छपी हुई भरी तालिका नहीं):
| क्र. | चीज | चालक है | कुचालक है |
|---|---|---|---|
| 1. | लोहे की चाबी | ✓ | |
| 2. | काँच की पट्टी | ✓ | |
| 3. | चॉक | ✓ | |
| 4. | पचास पैसे का सिक्का | ✓ (धातु का है) | |
| 5. | सूती धागा / कपड़ा | ✓ | |
| 6. | कागज | ✓ | |
| 7. | धातु की थाली | ✓ | |
| 8. | लोहे की कील | ✓ | |
| 9. | लकड़ी | ✓ | |
| 10. | रबड़ | ✓ | |
| 11. | ताँबे का तार | ✓ | |
| 12. | प्लास्टिक | ✓ | |
| 13. | पेंचकस की नोक | ✓ (लोहे की है) | |
| 14. | पेंचकस का हैंडल | ✓ | |
| 15. | बल्ब की काली चपड़ी | ✓ | |
| 16. | अल्युमिनियम की पन्नी | ✓ | |
| 17. | पेंसिल के सीसे का टुकड़ा | ✓ (ग्रेफाइट है — धातु नहीं फिर भी चालक) |
ढेर सारी चीजों से यह प्रयोग करना है। कुछ तालिका में लिखी है। और भी चीजें लेकर देखिए। जैसे — लकड़ी, रबड़, ताँबे का तार, प्लास्टिक, पेंचकस की नोक, पेंचकस का हैंडल, बल्ब की काली चपड़ी, अल्युमिनियम की पन्नी, पेंसिल के सीसे का टुकड़ा इत्यादि। आपने लोहे की कील से भी प्रयोग करके देखा है। लोहे की कोई भी चीज लें, जैसे चूड़ी, तार या लोहे की पत्ती, तो क्या नतीजा वही निकलता है? (हाँ — लोहे की हर चीज चालक निकलती है।) अब सोचकर लिखें कि सर्किट बनाने से पहले तार के सिरों से प्लास्टिक क्यों हटाते हैं? (क्योंकि प्लास्टिक कुचालक है — प्लास्टिक लगा रहने पर तार का धातु-से-धातु संपर्क ही नहीं बनेगा और धारा नहीं बहेगी।) बल्ब की काली चपड़ी चालक है या कुचालक? बल्ब में चपड़ी क्यों लगी होती है? (कुचालक है — वह कुचालक पदार्थ की होती है, इसलिए बल्ब के धातु के दोनों सिरों को एक-दूसरे से सटने से बचाती है और बल्ब को सुरक्षित पकड़ने/लगाने में सहारा देती है।) आपने तालिका में उन चीजों को देखा जो धातु की बनी हैं। यानी लोहा, ताँबा, एल्युमिनियम आदि की चीजें। क्या तालिका-14.4 के आधार पर आप धातुओं के बारे में कोई नतीजा निकाल सकते हैं? (हाँ — सभी धातुएँ विद्युत की चालक होती हैं।)
सुनीता की टोली — जंग क्यों रोकता है धारा?
सुनीता की टोली का बल्ब जल ही नहीं रहा था। परेशान होकर उसने बगल में बैठी सोनी से मदद माँगी। सोनी ने देखते ही कहा — "ओहो, तुम्हारे बल्ब होल्डर की पत्तियों पर कितना जंग लगा है। इन्हें रेगमाल से घिसकर साफ तो करो।" सुनीता की टोलीवालों ने तुरंत इन पत्तियों को चमकाया और फिर उन्हें सेल और बल्ब होल्डर से जोड़ा। बस फिर क्या था, बल्ब झक्क से जल उठा। बल्ब होल्डर की पत्तियों पर जंग लगे होने से बल्ब क्यों नहीं जल रहा था? अपने शब्दों में समझाएँ। (जंग धातु पर चढ़ी कुचालक परत है — वह धातु-से-धातु का संपर्क टूटा देती है, इसलिए परिपथ अधूरा रहता है और धारा नहीं बहती। रेगमाल से साफ करने पर चमकदार धातु फिर से संपर्क में आती है और परिपथ पूरा हो जाता है।)
हवा — चालक या कुचालक?
काँच, रबड़, लोहा आदि के साथ तो आपने प्रयोग किया। अब अगर हम आपसे हवा के बारे में पूछें तो क्या आप बता सकते हैं कि वह चालक है या कुचालक? अरे, किस सोच में पड़ गए? आप हवा के साथ भी तो प्रयोग कर चुके हैं। चित्र-14.4 वाला परिपथ, जिसमें तार के सिरे खुले पड़े थे, तो आपने बनाया ही है। क्या ऐसे परिपथ में बल्ब जलता है? (नहीं।) इस परिपथ में तार के सिरों के बीच क्या वाकई कुछ भी मौजूद नहीं है? क्या हवा भी नहीं? जरा सोचकर उत्तर दीजिए। (तारों के बीच हवा ही मौजूद है — फिर भी बल्ब नहीं जलता, इसलिए हवा विद्युत धारा की कुचालक है।) तो अब हवा को क्या कहेंगे — विद्युत धारा का कुचालक या चालक? (कुचालक।) सोचिए तो, हवा का कुचालक होना हमारे लिए कितनी फायदे की बात है। कल्पना करके लिखें कि अगर हवा कुचालक न होती तो किस-किस तरह की गड़बड़ी हो जाती? (अगर हवा चालक होती तो खुले तारों के सिरों से धारा हवा में फैल जाती — हर खुला सिरा खतरनाक होता, बिना तार जोड़े भी परिपथ चलने लगता, और बिजली को काबू में रखना नामुमकिन हो जाता।)
टॉर्च में विद्युत सर्किट (विद्युत-परिपथ)
अध्याय के शुरू में आपने सबीहा और छुट्टन की कहानी पढ़ी थी। सबीहा ने टॉर्च की पूरी जाँच करके पाया था कि उसमें छुट्टन ने एक सेल उल्टा डाल रखा था। टॉर्च में दो सेलों को कैसे डालना चाहिए? सेलों से बल्ब तक का सर्किट कैसे पूरा होता है? चलें, हम भी समझें। टॉर्च के सेल: टॉर्च में दो सेल हमेशा इस तरह डालते हैं कि एक सेल की घुंडीवाला धन सिरा दूसरे सेल के चपटे ऋण सिरे को सीधे या किसी धातु के जरिए छूता रहे। अब सोचें कि छुट्टन ने क्या गलती की थी? हाँ, उसने सेलों को उल्टा जोड़ दिया था। इसलिए उसकी टॉर्च का बल्ब नहीं जल रहा था। (चित्र-14.5: बल्ब नहीं जल रहा है।) टॉर्च का बटन या स्विच: अब सबीहा के टॉर्च के सर्किट को हम ध्यान से देखेंगे। आप भी कहीं से एक टॉर्च लेकर साथ ही उसके अंदर का सर्किट पहचानने की कोशिश करें। याद है अपने सर्किट में आपने बल्ब बुझाने के लिए एक तार को हटा दिया था। पर टॉर्च के सर्किट में बल्ब को जलाने-बुझाने का क्या इंतजाम है? आइए इसे चित्र-14.6 की मदद से समझें। जैसा कि इन चित्रों में दिखाया गया है कि टॉर्च के बाहर एक बटन या स्विच लगा रहता है। इसी को दबाकर आगे खिसकाने पर बल्ब जल जाता है (चित्र-14.6)। स्विच को पीछे हटाने से बल्ब बुझ जाता है। यानी स्विच से ही सर्किट को पूरा या अधूरा किया जाता है। टॉर्च को अब खोलकर देखते हैं। बाहर से तो स्विच प्लास्टिक का था पर अंदर उसमें एक लोहे की पत्ती जुड़ी है। स्विच को आगे-पीछे करने पर यही पत्ती आगे-पीछे होती है। जब पत्ती आगे को जाती है तो बल्ब के एक सिरे से छू जाती है। क्या आप चित्र-14.6 और 14.7 की मदद से बता सकते हैं कि स्विच की पत्ती बल्ब के किस सिरे को छूती है? चूड़ीवाले सिरे को या घुंडीवाले सिरे को? (चूड़ीवाले सिरे को — बल्ब का घुंडीवाला सिरा सीधे ही सेल की घुंडी को छूता है, और स्विच की पत्ती बल्ब के चूड़ीवाले सिरे से जुड़कर परिपथ पूरा करती है।) अब देखें कि टॉर्च में सेल और बल्ब का सर्किट कैसे बनता है। जब टॉर्च को बंद करते हैं तो बल्ब का घुंडीवाला सिरा सीधे ही सेल की घुंडी को छूता है। बल्ब का यह सिरा और दोनों सेल आपस में कसकर सटा रहने चाहिए। इसलिए इस टॉर्च के निचले ढक्कन में एक मोटे तार का स्प्रिंग है। स्प्रिंग होने से बल्ब की घुंडी और दोनों सेल आपस में सटकर जुड़े रहते हैं। देखें, स्प्रिंगवाला तार टॉर्च के किनारे-किनारे ऊपर जा रहा है। ऊपर इस तार के साथ स्विच की पत्ती जुड़ी है। बस, यही है टॉर्च का सर्किट। स्विच को ऊपर दबाएँ तो पत्ती ऊपर जाकर बल्ब के एक सिरे को छूती है। सर्किट पूरा होता है और बल्ब जल उठता है। (चित्र-14.7: बल्ब, प्लास्टिक के आवरण, स्लाइड स्विच, विद्युत सेल।) सोचकर बताएँ: सबीहा की प्लास्टिक की टॉर्च का सर्किट तो आपने देखा। पर मीना की टॉर्च स्टील की है। उस टॉर्च में नीचे से ऊपर को आता हुआ कोई तार नहीं है। बताएँ कि स्टील की टॉर्च में सेल के नीचे से लेकर स्विच तक का सर्किट कैसे बनता है? (स्टील की बॉडी ही धातु की चालक है — नीचे के स्प्रिंग से स्विच तक धारा स्टील की बॉडी से होकर जाती है; बॉडी ही तार का काम करती है, इसलिए अलग तार की जरूरत नहीं पड़ती।) अगर आपके पास प्लास्टिक की टॉर्च है तो देखें कि उसकी बनावट सबीहा की टॉर्च से मिलती है या नहीं। यदि नहीं, तो यह पता करने की कोशिश करें कि उसमें सर्किट कैसे बनता है।
बल्ब में रोशनी कहाँ से आई?
कभी सोचा है बल्ब में रोशनी कैसे होती है? गैस या मिट्टी के तेल के लैम्प में तो आग जलाने से रोशनी होती है। पर बल्ब के पतले से तार के कुंडल में क्या होता है? वहाँ तो कोई आग नहीं जलती। जलते हुए बल्ब को जरा छूकर तो देखें। क्या बल्ब कुछ गर्म लगा? आपने देखा कि बल्ब जलते समय काफी गर्म हो जाता है। हम तो सिर्फ बल्ब का काँच ही छूकर देख पाते हैं। जब बल्ब का काँच ही इतना गर्म है, तो जरा सोचें कि बल्ब का कुंडल जिसमें से बिजली बहती है कितना अधिक गर्म हो जाता होगा। क्या आपने लोहार के यहाँ लोहा गर्म होते देखा है? भट्टी में तपने से लोहा इतना ज्यादा गर्म हो जाता है कि उससे से लाल प्रकाश निकलने लगता है। ऐसा ही कुछ जलते हुए बल्ब के साथ भी होता है। विद्युत धारा से बल्ब का कुंडल इतना अधिक गर्म हो जाता है कि उसमें से भी रोशनी निकलने लगती है और बल्ब जगमगा उठता है।
बल्ब का आविष्कार — एडीसन की कहानी
बड़ी ही मजेदार कहानी है बल्ब के आविष्कार की। हमें भले ही बल्ब बड़ा ही सरल सा उपकरण लगे, बस बटन दबाएँ और बल्ब जल उठता है, पर जानते हैं कितने ही वैज्ञानिकों की सालों की कड़ी मेहनत इस सरल से उपकरण में छिपी हुई है। बिजली का बल्ब बनाने की कोशिशें लगभग डेढ़ सौ साल पहले शुरू हुई थीं। तब तक वैज्ञानिक अपने प्रयोगों द्वारा यह जान चुके थे कि किसी तार में से बिजली बहाएँ तो वह गर्म हो जाता है। और कुछ तार में तो बिजली बहने से इतने अधिक गर्म हो उठते हैं कि उनमें से प्रकाश निकलने लगता है। पर ऐसे तारों के साथ एक बड़ी समस्या थी। वह यह कि ऐसे तार कुछ ही पल में जलकर टूट जाते थे। जब तक यह समस्या न सुलझती, बल्ब बना पाना तो नामुमकिन ही था। बस इसी चुनौती से निपटने में उस समय दुनिया भर के कई नामी-गिरामी वैज्ञानिक जुटे हुए थे। उनमें से एक खोजी थॉमस एडीसन भी थे। बिजली का बल्ब सबसे पहले बनाने का श्रेय एडीसन को जाता है। एडीसन की जीवनी बड़ी ही रोचक है। उनसे बड़ा आविष्कारक मानव इतिहास में शायद ही कोई और होगा। लेकिन अपने पूरे जीवन में वे स्कूल लगभग तीन महीने के लिए ही गए थे। वे बचपन से ही खोजी प्रवृत्ति के थे और खुद प्रयोग कर-करके ही उन्होंने विज्ञान सीखा। किसी भी तकनीकी समस्या को समझने और उसका हल ढूँढ निकालने का सचमुच कमाल का हुनर था उनमें। क्या आप जानते हैं कि अपने पूरे जीवनकाल में उन्होंने एक हजार से अधिक आविष्कार किए। प्रतिभा के धनी और कड़ी मेहनत करने के बावजूद भी एडीसन को बल्ब बनाने में कई साल लगे। सबसे पहले उन्होंने प्लैटिनम धातु के एक धागे जैसे पतले तार में विद्युत बहाकर देखा। उन्होंने पाया कि तार गर्म होकर रोशनी देने लगता है। पर ऐसे तार कुछ ही पल बाद जलकर टूट गए। एडीसन ने सोचा कि अगर तार के आस-पास से हवा हटा दी जाए तो क्या तब भी तार इतनी जल्दी जलकर टूट जाएगा। बस, फिर क्या था, एडीसन जुट गए इसका जवाब खोजने में। उन्होंने सबसे पहले एक काँच का खोखला बल्ब बनाकर उसमें प्लैटिनम तार का एक कुंडल या फिलामेंट फिट कर दिया। और फिर उस बल्ब की सारी हवा निकाल दी। एडीसन ने जब उस फिलामेंट में बिजली बहाई तो बल्ब जलने लगा। खुशी की बात यह थी कि इस बार बल्ब लगातार आठ मिनट तक जलने के बाद ही फ्यूज हुआ। एडीसन समझ गए कि वे सही रास्ते पर हैं। शायद प्लैटिनम की जगह किसी और पदार्थ का फिलामेंट ज्यादा देर तक जले। इस उम्मीद में उन्होंने कई तरह के फिलामेंटों से प्रयोग किए। शुरू-शुरू में तो वे जो भी फिलामेंट लेते वह गर्म होकर भस्म हो जाया करता था। एडीसन चाहते थे कि फिलामेंट का तार लंबे समय तक रोशनी दे और साथ ही सस्ता भी हो। एक दिन उन्होंने सोचा कि क्यों न काजल पुते धागे (कार्बन-फिलामेंट) को फिलामेंट का इस्तेमाल किया जाए? उन्होंने जब ऐसे धागे फिलामेंट का बल्ब बनाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गए। यह फिलामेंट बिजली के बहने पर कुछ मिनट नहीं बल्कि पूरे पैंतालिस घंटों तक लगातार प्रकाश देता रहा। परिणाम वाकई काफी उत्साहवर्धक था। पर फिर भी इससे अच्छा और अधिक टिकाऊ फिलामेंट को खोजने की जरूरत थी। तो बस एडीसन चालू हो गए अलग-अलग किस्म के धागों के फिलामेंट बनाकर प्रयोग करने में। एक दिन उन्होंने गर्मी से बेहाल एक आदमी को बाँस के बने हाथ के पंखे का इस्तेमाल करते हुए देखा। तुरंत उनके खोजी दिमाग में एक विचार आया — क्यों न बाँस के रेशे का भी फिलामेंट बनाकर देखा जाए? उन्होंने वहीं उस आदमी से अनुरोध कर उसके पंखे से बाँस की एक चिप्पी निकाल ली। फिर उस चिप्पी से एक रेशा निकालकर रेशे के ऊपर धातु लेप चढ़ाकर उसका फिलामेंट बनाया और उसे एक बल्ब में जलाकर देखा। नतीजा कमाल का था। यह बल्ब बिना फ्यूज हुए कई दिनों तक जलता रहा। एडीसन अब कामयाबी के बिल्कुल करीब पहुँच चुके थे। वे अलग-अलग किस्म के बाँसों के फिलामेंट बनाकर प्रयोग करने लगे। इसमें उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। यहाँ तक कि एक अच्छा, सस्ता और टिकाऊ बल्ब बनाने की खातिर उन्होंने जापान में खास अपने लिए एक विशेष किस्म का बाँस उगवा कर आयात करवाना शुरू कर दिया। शीघ्र ही वे सूत के आधार पर एक ऐसा फिलामेंट बनाने में सफल हो गए जो बाँस के फिलामेंटों से भी बेहतर था। एडीसन की खोज अब पूरी हो चुकी थी और वे दुनिया को पहला विद्युत का बल्ब दिखाने के लिए तैयार थे। उनके इस आविष्कार की सबसे पहली खबर सन् 1879 के दिसंबर माह में अमेरिका के एक अखबार में छपी। इस खबर से पूरी दुनिया में तहलका मच गया। हर तरफ उनकी इस खोज की चर्चा होने लगी, पर कुछ लोग एडीसन के इस दावे को मानने को तैयार ही नहीं थे। तब करीब 3000 लोगों के सामने खूब धूमधाम से एडीसन ने बिजली के कई बल्बों को जलाकर अपनी खोज का प्रदर्शन किया और सभी को भरोसा हो गया। हम आज भी अपने घरों में कुछ वैसे ही बल्ब जलाते हैं। बस अंतर यही है कि हमारे बल्ब के कुंडल एक खास धातु के बने हुए होते हैं जिसका नाम टंगस्टन है।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
- सेल के दो सिरे (ध्रुव) होते हैं — धन ध्रुव (+) और ऋण ध्रुव (-); बल्ब के भी दो सिरे होते हैं — घुंडी और चूड़ी।
- परिपथ — सेल के एक ध्रुव से तार द्वारा बल्ब और स्विच से होकर दूसरे ध्रुव तक विद्युत धारा का पूरा चक्कर; धारा बहे तो परिपथ पूरा/चालू, न बहे तो अधूरा/कटा हुआ।
- चालक धारा को कम रुकावट से बहने देते हैं (सभी धातुएँ चालक हैं); कुचालक धारा को रोकते हैं (काँच, रबड़, प्लास्टिक, लकड़ी, कागज, हवा)।
- स्विच से ही सर्किट को पूरा या अधूरा किया जाता है — स्विच की लोहे की पत्ती बल्ब के चूड़ीवाले सिरे को छूती है तो परिपथ पूरा होता है।
- टॉर्च में दो सेल इस तरह डालते हैं कि एक का धन सिरा दूसरे के ऋण सिरे को छुए; एक सेल उल्टा डालने पर टॉर्च का बल्ब नहीं जलता।
- बल्ब में रोशनी कुंडल के अत्यधिक गर्म होने से आती है — आग नहीं जलती, गर्म कुंडल से प्रकाश निकलता है।
मुख्य शब्द
- सेल: टॉर्च/रेडियो में लगनेवाला विद्युत का स्रोत; दो सिरे — धन सिरा (+) घुंडीवाला, ऋण सिरा (-) चपटा।
- बल्ब: काँच का खोखला गोला जिसके अंदर पतले तार का कुंडल (फिलामेंट) होता है; दो सिरे — घुंडी और चूड़ी।
- कुंडल / फिलामेंट (Coil): बल्ब के अंदर का पतला तार — धारा बहने पर इतना गर्म हो जाता है कि रोशनी देने लगता है; आजकल टंगस्टन का बना होता है।
- बल्ब होल्डर (Bulb Holder): जिसमें बल्ब कसकर फँसाया जाता है; उसकी घुंडी-चूड़ी से जुड़ी पत्तियाँ ही होल्डर के सिरे कहलाती हैं।
- परिपथ / सर्किट (Circuit): सेल से तार में, तार से बल्ब में, फिर बल्ब से होकर तार के जरिए सेल के दूसरे सिरे तक धारा के प्रवाह का पूरा चक्कर।
- स्विच (Switch): टॉर्च के बाहर का बटन — अंदर लोहे की पत्ती जुड़ी होती है; आगे खिसकाने पर पत्ती बल्ब के चूड़ीवाले सिरे को छूती है और सर्किट पूरा होता है, पीछे हटाने पर सर्किट अधूरा होकर बल्ब बुझ जाता है।
- चालक (Conductor): जिसे परिपथ में जोड़ने से बल्ब जलता है — धारा को कम रुकावट से बहने देता है; सभी धातुएँ चालक हैं।
- कुचालक (NonConductor): जिसे सर्किट में रखने से बल्ब नहीं जलता — धारा को बहने से रोकता है; जैसे काँच, रबड़, प्लास्टिक, लकड़ी, कागज, हवा।
- फ्यूज बल्ब: जिसका कुंडल टूट गया हो — परिपथ टूटने से धारा नहीं बहती और बल्ब नहीं जलता।
- टंगस्टन: आजकल बल्बों के फिलामेंट (कुंडल) इसी खास धातु के बने होते हैं।
याद रखें
- सेल के दो सिरे (ध्रुव) होते हैं: धन ध्रुव एवं ऋण ध्रुव।
- सेल के एक ध्रुव से तार द्वारा बल्ब और स्विच से होकर दूसरे ध्रुव तक विद्युत धारा प्रवाहित होती है तब इसे परिपथ का पूरा होना कहते हैं।
- बल्ब का आविष्कार थॉमस अल्वा एडीसन ने किया था।
- आजकल बल्बों के फिलामेंट (कुंडल) टंगस्टन के बने होते हैं।
- बल्ब के दो सिरे घुंडी और चूड़ी हैं — कुंडल का एक तार घुंडी से, दूसरा चूड़ी से जुड़ा होता है।
- तार के सिरों से लगभग दो-दो से.मी. प्लास्टिक हटाकर ही जोड़ें — प्लास्टिक कुचालक है।
- सेल के दोनों सिरों को तार से सीधे कभी मत जोड़ें — सेल मिनटों में खत्म हो जाएगा।
- जंग लगी पत्तियों को रेगमाल से साफ करें — जंग कुचालक परत है, संपर्क टूटने से बल्ब नहीं जलता।
- हवा विद्युत धारा की कुचालक है — खुले सिरों के बीच हवा होने पर भी बल्ब नहीं जलता।
- घर/स्कूल/खेत के बिजली कनेक्शन से कभी प्रयोग न करें — वहाँ बिजली से छेड़छाड़ खतरनाक है।
परीक्षा टिप
इस अध्याय में चार बातें बार-बार पूछी जाती हैं: (1) परिपथ की परिभाषा — सेल के एक ध्रुव से तार-बल्ब-स्विच होते हुए दूसरे ध्रुव तक धारा का पूरा चक्कर; (2) चालक/कुचालक की पहचान — धातु = चालक, पर अपवाद याद रखें: पेंसिल का सीसा (ग्रेफाइट) धातु नहीं फिर भी चालक है, और हवा कुचालक है; (3) चित्र 14.2 जैसे प्रश्न — बल्ब तभी जलेगा जब परिपथ पूरा हो, यानी बल्ब के दोनों सिरे सेल के दोनों सिरों से जुड़े हों; एक तार वाला (मीनू) अधूरा है; (4) एडीसन की कहानी की संख्याएँ — स्कूल लगभग तीन महीने, 1000 से अधिक आविष्कार, प्लैटिनम तार कुछ पल में टूटा, हवा निकाले बल्ब में 8 मिनट, कार्बन-फिलामेंट 45 घंटे, बाँस का रेशा कई दिन, पहली खबर दिसंबर 1879, प्रदर्शन करीब 3000 लोगों के सामने, आज के कुंडल टंगस्टन के।
सारणी — परिपथ की जाँच
| स्थिति | परिपथ | बल्ब | कारण |
|---|---|---|---|
| दोनों तार जुड़े (सेल के दोनों सिरे ↔ बल्ब के दोनों सिरे) | पूरा / चालू | जलता है | धारा का पूरा चक्कर बनता है |
| केवल एक तार जुड़ा (मीनू — चित्र 14.2) | अधूरा | नहीं जलता | धारा का चक्कर पूरा नहीं होता |
| तार हटा दिया / स्विच पीछे | अधूरा | बुझ जाता है | परिपथ टूट गया |
| कुंडल टूटा (फ्यूज बल्ब) | कटा हुआ | नहीं जलता | बल्ब के अंदर ही रास्ता टूटा है |
| खुले सिरों के बीच हवा | अधूरा | नहीं जलता | हवा कुचालक है |
| खुले सिरों के बीच कुचालक वस्तु (रबड़/काँच/प्लास्टिक) | अधूरा | नहीं जलता | कुचालक धारा रोकता है |
| खुले सिरों के बीच चालक वस्तु (लोहे की चाबी/कील) | पूरा | जलता है | चालक धारा बहने देता है |
| टॉर्च में एक सेल उल्टा | टॉर्च का क्रम टूटा | नहीं जलता | धन-ऋण का सही क्रम नहीं बना |
अभ्यास — खुद करके देखो
- क्रियाकलाप-1 के छह चरण क्रम से लिखो और हर चरण का कारण एक पंक्ति में दो। संकेत: तार साफ करना (प्लास्टिक कुचालक है) → बल्ब/होल्डर की जाँच (टूटा कुंडल = फ्यूज) → सेल के सिरे पहचानना (+ धन घुंडी, - ऋण चपटा) → सेल होल्डर बनाना (साइकिल ट्यूब का छल्ला) → दोनों तार जोड़ना → एक तार हटाकर बुझाना।
- चित्र 14.2 के पाँचों बच्चों के परिपथों की जाँच करो — किसका बल्ब जलेगा, किसका नहीं, और क्यों? संकेत: मीनू का नहीं (केवल एक तार); गोलू, शायरा, अतुल, मुनिया का हाँ (दोनों सिरे जुड़े, परिपथ पूरा)। किताब स्वयं उत्तर नहीं छापती — स्वयं करके जाँचो।
- तालिका 14.4 की वस्तुओं में से किन्हीं 4 की चालक/कुचालक जाँच प्रयोग से करो और तालिका भरो। संकेत: लोहे की चाबी/कील/सिक्का/धातु की थाली = चालक; काँच/चॉक/कागज/सूती धागा = कुचालक।
- स्टील की टॉर्च में नीचे से ऊपर तक सर्किट कैसे बनता है, चित्र बनाकर समझाओ। संकेत: स्टील की बॉडी ही चालक है — वह स्प्रिंग से स्विच तक धारा पहुँचाती है, अलग तार की जरूरत नहीं।
- बड़ों की मदद से अपनी टॉर्च खोलकर देखो — स्विच की लोहे की पत्ती, स्प्रिंग और सेल के क्रम को पहचानो; स्विच आगे-पीछे करके बताओ परिपथ कब पूरा और कब अधूरा होता है। संकेत: पत्ती आगे = चूड़ीवाले सिरे से संपर्क = परिपथ पूरा = बल्ब जलता है; पत्ती पीछे = संपर्क टूटा = बल्ब बुझता है। घर के बिजली कनेक्शन से कोई प्रयोग नहीं करना है — केवल सेल वाली टॉर्च से।
प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: विद्युत परिपथ (सर्किट) क्या है? परिपथ कब 'पूरा/चालू' और कब 'अधूरा/कटा हुआ' कहलाता है? परिपथ में धारा बह रही है या नहीं, यह कैसे पता चलेगा?
उत्तर: सेल से तार में, तार से बल्ब में और फिर बल्ब में से होकर तार के ही जरिए सेल के दूसरे सिरे तक धारा के प्रवाहित होने का पूरा चक्कर परिपथ (सर्किट) कहलाता है। धारा जब बहती है तो सर्किट पूरा या चालू कहलाता है; धारा नहीं बहती तो सर्किट अधूरा या कहीं से कटा हुआ कहलाता है। बल्ब ही सूचक है — बल्ब जल रहा है तो धारा बह रही है, नहीं जल रहा तो परिपथ कहीं अधूरा/कटा है। - प्रश्न: बल्ब की बनावट समझाओ — उसके दो सिरे कौन-से हैं, कुंडल से उनका क्या संबंध है, और फ्यूज बल्ब क्यों नहीं जलता?
उत्तर: बल्ब के अंदर पतले तार का छोटा-सा कुंडल होता है। कुंडल के तार का एक सिरा अंदर ही अंदर बल्ब के नीचे की घुंडी से जुड़ा होता है, दूसरा सिरा बल्ब की चूड़ी से जुड़ा होता है — इसलिए घुंडी और चूड़ी ही बल्ब के दो सिरे कहलाते हैं। होल्डर में कसने पर बल्ब की चूड़ी होल्डर की चूड़ी से और घुंडी होल्डर की घुंडी से जुड़ती है; होल्डर की पत्तियाँ ही होल्डर के सिरे कहलाती हैं। अगर कुंडल टूटा हुआ हो तो बल्ब फ्यूज कहलाता है — कुंडल टूटने से परिपथ बल्ब के अंदर ही कट जाता है, धारा नहीं बहती, इसलिए बल्ब नहीं जलता। - प्रश्न: चालक और कुचालक में अंतर बताओ। धातुओं के बारे में तालिका 14.4 से क्या निष्कर्ष निकलता है? हवा चालक है या कुचालक — प्रयोग से कैसे सिद्ध होता है?
उत्तर: जिस वस्तु को परिपथ में जोड़ने से बल्ब जलता है वह विद्युत चालक है — चालक धारा के बहने में कम रुकावट डालते हैं। जिसे जोड़ने से बल्ब नहीं जलता वह कुचालक है — कुचालक धारा को बहने से रोकते हैं। तालिका से निष्कर्ष: सभी धातुएँ (लोहा, ताँबा, एल्युमिनियम) चालक हैं — लोहे की कोई भी चीज (चाबी, कील, चूड़ी, तार, पत्ती) चालक निकलती है। अपवाद: पेंसिल का सीसा (ग्रेफाइट) धातु नहीं फिर भी चालक है। हवा कुचालक है — खुले सिरों वाले परिपथ में तारों के बीच केवल हवा होती है, फिर भी बल्ब नहीं जलता; अगर हवा चालक होती तो वह परिपथ चल पड़ता। - प्रश्न: टॉर्च में दो सेल कैसे डालने चाहिए? एक सेल उल्टा डालने पर बल्ब क्यों नहीं जलता? टॉर्च का स्विच कैसे काम करता है? स्टील की टॉर्च में सर्किट कैसे बनता है?
उत्तर: टॉर्च में दो सेल इस तरह डालते हैं कि एक सेल की घुंडीवाला धन सिरा दूसरे सेल के चपटे ऋण सिरे को सीधे या किसी धातु के जरिए छूता रहे। छुट्टन ने एक सेल उल्टा जोड़ दिया था, इसलिए धन-ऋण का सही क्रम नहीं बना और उसकी टॉर्च का बल्ब नहीं जल रहा था। स्विच: बाहर से स्विच प्लास्टिक का दिखता है पर अंदर उसमें लोहे की पत्ती जुड़ी है; स्विच आगे खिसकाने पर पत्ती ऊपर जाकर बल्ब के चूड़ीवाले सिरे को छूती है — सर्किट पूरा होता है और बल्ब जल उठता है; पीछे हटाने पर संपर्क टूटता है और बल्ब बुझ जाता है। बल्ब का घुंडीवाला सिरा सीधे सेल की घुंडी को छूता है और निचले ढक्कन का स्प्रिंग दोनों सेलों को कसकर सटाए रखता है। स्टील की टॉर्च में नीचे से ऊपर को आता हुआ कोई तार नहीं होता — स्टील की बॉडी ही चालक है, धारा बॉडी से होकर स्प्रिंग से स्विच तक पहुँचती है। - प्रश्न: बल्ब में रोशनी कैसे होती है — वहाँ तो कोई आग नहीं जलती? एडीसन की कहानी का सार संख्याओं सहित बताओ।
उत्तर: बल्ब में आग नहीं जलती — विद्युत धारा से बल्ब का कुंडल इतना अधिक गर्म हो जाता है कि उसमें से रोशनी निकलने लगती है, जैसे भट्टी में तपता लोहा लाल होकर चमकने लगता है। जलता बल्ब गर्म भी हो जाता है — काँच छूकर यह महसूस किया जा सकता है। एडीसन की कहानी: वे जीवन में स्कूल लगभग तीन महीने ही गए, फिर भी उन्होंने एक हजार से अधिक आविष्कार किए। प्लैटिनम के पतले तार में धारा बहाने पर वह चमका पर कुछ पल में जलकर टूट गया। काँच के खोखले बल्ब में फिलामेंट फिट करके सारी हवा निकालने पर बल्ब 8 मिनट तक जला। काजल पुते धागे (कार्बन-फिलामेंट) का बल्ब पूरे 45 घंटों तक लगातार प्रकाश देता रहा। बाँस के रेशे पर धातु लेप चढ़ाकर बनाया फिलामेंट कई दिनों तक बिना फ्यूज हुए जला; जापान से विशेष बाँस भी आयात करवाया गया; अंत में सूत के आधार पर बना फिलामेंट बाँस से भी बेहतर निकला। पहली खबर दिसंबर 1879 में अमेरिका के अखबार में छपी और करीब 3000 लोगों के सामने प्रदर्शन करके उन्होंने अपनी खोज सिद्ध की। आज के बल्बों के कुंडल टंगस्टन धातु के बने होते हैं।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: (क) निम्न वस्तुओं में बिजली का चालक है— (i) लकड़ी (ii) कागज (iii) प्लास्टिक (iv) लोहा। (ख) बल्ब के आविष्कारक थे— (i) जेम्स वाट (ii) एडीसन (iii) ग्राहम बेल (iv) जहाँगीर भाभा। (ग) बल्ब की कुंडली किस धातु की बनी होती है— (i) लोहा (ii) पीतल (iii) टंगस्टन (iv) स्टील। (घ) हवा है— (i) बिजली का चालक (ii) बिजली का कुचालक (iii) कभी चालक, कभी कुचालक (iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर: (क) (iv) लोहा — लकड़ी, कागज और प्लास्टिक तीनों कुचालक हैं। (ख) (ii) एडीसन — थॉमस अल्वा एडीसन को बिजली का बल्ब सबसे पहले बनाने का श्रेय जाता है। (ग) (iii) टंगस्टन — आजकल बल्बों के फिलामेंट (कुंडल) टंगस्टन के बने होते हैं। (घ) (ii) बिजली का कुचालक — खुले सिरों के बीच हवा होने पर भी बल्ब नहीं जलता। - प्रश्न: निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — (क) जब विद्युत धारा सेल के एक सिरे से तार व बल्ब से होते हुए सेल के दूसरे सिरे तक प्रवाहित होती है तो इस चक्कर को ............ कहते हैं। (ख) किसी वस्तु को विद्युत परिपथ में जोड़ने पर बल्ब जल उठता है, तो इस वस्तु को विद्युत का ............ कहते हैं। (ग) ऐसी चीजें जिनको सर्किट में जोड़ने से बल्ब नहीं जलता है, इन्हें ............ कहा जाता है।
उत्तर: (क) परिपथ (सर्किट)। (ख) चालक। (ग) कुचालक। - प्रश्न: राहुल ने एक नया सेल खरीदा। उसकी घुंडी पर एक प्लास्टिक की सील बनी थी। प्लास्टिक की सील हटाए बिना राहुल ने सेल को टॉर्च में डाला। बताएँ, राहुल की टॉर्च क्यों नहीं जली?
उत्तर: प्लास्टिक विद्युत का कुचालक है। सील हटाए बिना सेल की घुंडी का धातु-से-धातु संपर्क ही नहीं बन पाया — सील की कुचालक परत के कारण परिपथ अधूरा रह गया और धारा नहीं बही, इसलिए टॉर्च नहीं जली। (यही कारण है कि तारों के सिरों से भी प्लास्टिक हटाना जरूरी होता है।) - प्रश्न: बल्ब के अंदर का कुंडल टूटने के कारण जब बल्ब फ्यूज हो जाता है, तो बताएँ तब बल्ब क्यों नहीं जलता है?
उत्तर: कुंडल टूटने से बल्ब के अंदर ही धारा का रास्ता कट जाता है — परिपथ टूट जाता है। धारा बल्ब से होकर नहीं बह पाती, कुंडल गर्म होकर रोशनी नहीं दे पाता, इसलिए फ्यूज बल्ब नहीं जलता। बाहर से बल्ब ठीक दिख सकता है, पर अंदर का टूटा कुंडल ही कारण है। - प्रश्न: किशन के पास एक ही तार था। तार के एक सिरे को उसने अपने बल्ब की चूड़ी पर कसा और दूसरा सिरा सेल पर दबाया। फिर एक स्टील के डिब्बे पर सेल और बल्ब को दबाकर इस तरह रखा कि उसका बल्ब जल उठा। अपनी कॉपी में चित्र बनाकर समझाएँ कि एक ही तार से उसका परिपथ कैसे पूरा हो गया?
उत्तर: स्टील का डिब्बा धातु का बना है — धातुएँ विद्युत की चालक होती हैं। डिब्बे ने दूसरे तार का काम किया: तार ने बल्ब की चूड़ी को सेल के एक सिरे से जोड़ा, और सेल के दूसरे सिरे से बल्ब की घुंडी तक धारा स्टील के डिब्बे से होकर पहुँची। इस तरह सेल → तार → बल्ब → स्टील का डिब्बा → सेल का पूरा चक्कर बन गया और बल्ब जल उठा। (यही सिद्धांत स्टील की टॉर्च में भी काम करता है — वहाँ बॉडी ही तार का काम करती है।) - प्रश्न: अपने शब्दों में समझाएँ कि बल्ब में रोशनी कैसे होती है।
उत्तर: बल्ब में कोई आग नहीं जलती। जब परिपथ पूरा होता है तो विद्युत धारा बल्ब के पतले कुंडल से होकर बहती है। कुंडल इतना अधिक गर्म हो जाता है कि उसमें से रोशनी निकलने लगती है — जैसे लोहार की भट्टी में तपता लोहा लाल होकर चमकने लगता है। यही गर्म कुंडल की चमक बल्ब की रोशनी है; इसीलिए जलता हुआ बल्ब छूने पर गर्म भी लगता है।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
इस पृष्ठ को पढ़ते समय पहले क्रियाकलाप-1 के छह चरण क्रम से समझें — बल्ब जलाने की पूरी प्रक्रिया इन्हीं चरणों में है। फिर परिपथ की परिभाषा और चित्र 14.2 की जाँच को ध्यान से पढ़ें — बल्ब तभी जलेगा जब परिपथ पूरा हो। चालक/कुचालक की तालिका को प्रयोग करके स्वयं भरने का अभ्यास करें — धातु = चालक का नियम और ग्रेफाइट व हवा के अपवाद याद रखें। टॉर्च के सर्किट (दो सेल, स्विच की पत्ती, स्प्रिंग, स्टील बॉडी) और एडीसन की कहानी की संख्याओं को बार-बार दोहराएँ। अभ्यास के प्रश्न स्वयं करके देखें, फिर प्रश्नोत्तर से मिलान करें। किताब के अभ्यास के सभी प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं — परीक्षा से पहले उन्हें बिना देखे लिखने का अभ्यास करें। घर के बिजली कनेक्शन से कोई प्रयोग कभी नहीं करना है — केवल सेल वाली टॉर्च से।

