Chapter 11: सजीवों में अनुकूलन
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Science • Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
सजीवों में अनुकूलन — EG's own notes, in simple Hindi
Book: Vigyan (BSEB, Class 6) (Purani pustak — 2025 se pehle wali) | Chapter 11 | Medium: Hindi

Diagram (labels are printed on the image): हर जीव अपने आवास के अनुसार ढला होता है। यह सामान्य चित्र है, पुस्तक का चित्र नहीं।

नागफनी (cactus) में पत्तियों के स्थान पर काँटे होते हैं। यह सामान्य चित्र है।
अध्याय के बारे में
एक ऊँट और एक घोड़े में बहुत गहरी दोस्ती थी। दोनों जब भी मिलते, ढेर सारी बातें करते। घोड़े को अपनी तेज चाल और सुन्दरता पर घमंड था। ऊँट बड़ा शान्त स्वभाववाला और बुद्धिमान था। ऊँट का कद बहुत लम्बा था। एक दिन ऊँट घोड़े को रेत के तूफान की बात सुना रहा था। उसने बताया कि तूफान के कारण वह रास्ते में भटक गया था। पाँच दिन तक अपने मालिक को पीठ पर लादे घूमता रहा और फिर जाकर घर पहुँचा। ऊँट की बात सुनकर घोड़ा हंसने लगा। बोला, "अरे तुम जैसे धीरे चलनेवाले जानवर और क्या कर सकते हो? मैं होता तो एक दिन में रास्ता ढूँढकर मालिक को घर पहुँचा देता।" ऊँट चुपचाप घोड़े की बात सुनता रहा। फिर बोला, "कभी मेरे साथ चलना जहाँ रेत के बड़े-बड़े टीले होते हैं और दूर-दूर तक कोई घर नजर नहीं आता।" घोड़ा झट तैयार हो गया। बोला, "चलो अभी चलते हैं।" और अगले ही क्षण दोनों चल दिए रेत के टीलों की ओर। घोड़ा तो टप-टप, सरपट भागना शुरू कर दिया। ऊँट मजे से पहले अपनी एक तरफ की दोनों टाँगें आगे बढ़ाता, फिर दूसरी तरफ की। थोड़ी दूर जाकर घोड़ा रुक गया और ऊँट का इन्तज़ार करने लगा। जैसे ही ऊँट पास आया तो घोड़ा बोला, "कितना धीमे चलते हो। जरा तेज चलो।" ऊँट बोला, "रुको भाई, आगे जाकर तो तुम भी धीमे हो जाओगे।" और वही हुआ। रेत के टीलों के पास पहुँचते-पहुँचते घोड़े की चाल धीमी हो गई। उसके पैर रेत में धँस जाते और वह मुश्किल से आगे बढ़ पाता। पर ऊँट अपनी उसी चाल से चलता रहा। उसके पैर नीचे रखते ही फैल जाते और रेत में धँसने से बच जाते। धूप भी तेज थी। गर्मी और प्यास के मारे घोड़े की हालत खराब थी। पर ऊँट को तो जैसे कोई परेशानी ही नहीं थी। वह अपनी मस्ती में चलता रहा। घोड़ा अब थक चुका था। बोला, "मुझे आगे नहीं जाना है। चलो वापस चलें।" ऊँट बोला, "क्यों भाई, इतनी जल्दी थक गए।" घोड़ा तो हाँफ रहा था। झट मुड़कर वापस जाने लगा। पर यह क्या? अचानक रेत का तूफान आ गया। चारों तरफ अंधेरा हो गया और रेत ही रेत उड़ने लगी। घोड़े की तो हालत खराब हो गई। आँखों में रेत, कानों में रेत, नाक और मुँह में रेत ही रेत। तूफान रुकने तक घोड़े की हालत काफी खराब हो चुकी थी, जबकि ऊँट तूफान में भी आराम से खड़ा रहा। घोड़ा हैरान था। बोला, "ऊँट भाई, तुम इतने आराम से कैसे खड़े हो? तुम्हारी आँखें, नाक, कान में रेत नहीं गई?" ऊँट बोला, "मेरी आँखों को देखो। पलकों के लम्बे बाल और घनी भौहें उन्हें रेत और मिट्टी से बचा लेती हैं। मेरे छोटे-छोटे कानों में भी रेत आसानी से नहीं जा सकती। अपनी नाक को मैं अपनी मर्जी से खोल सकता हूँ या बन्द कर सकता हूँ।" "और जब पाँच-पाँच दिन तक खाते-पीते नहीं हो तो जीते कैसे हो?" घोड़े ने पूछा। ऊँट ने बताया, "मेरे कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रहता है जो बुरे वक्त में काम आता है। पानी पिए बिना भी मैं कई दिन तक जी सकता हूँ।" अब घोड़े को समझ में आ गया कि अगर वह तेज भागने की ताकत रखता है तो ऊँट रेतीले इलाकों में रहने की। दोनों में अपनी-अपनी खूबियाँ हैं। इसलिए तेज भागने पर उसे घमंड नहीं करना चाहिए था।
बताइए — रेत में चलना ऊँट के लिए क्यों सुविधाजनक था? रेत के तूफान से घोड़े की हालत खराब क्यों हो गई? ऊँट की नाक में क्या खास बात है? ऊँट को उसके कूबड़ से क्या लाभ है? (उत्तर नीचे 'प्रश्नोत्तर' में दिए गए हैं।)
विभिन्न परिवेश, विभिन्न जीव
बच्चों, इसी प्रकार और भी जानवर आपने देखे होंगे जो अलग-अलग जगह पर पाए जाते हैं। नीचे दी गई तालिका 11.1 में विभिन्न परिवेश में जन्तुओं के नाम लिखिए — क्रियाकलाप-1: तालिका 11.1: विभिन्न परिवेश में पाए जानेवाले जन्तु — जंगल में: शेर; रेगिस्तान में: ऊँट; पर्वतीय क्षेत्र में: भालू; जल में: मछली; (आगे की पंक्ति खाली है — अपने मित्रों, माता-पिता एवं अध्यापक से बातचीत करके और पुस्तकों, चित्रों, टी.वी. कार्यक्रमों, पत्रिकाओं से इस तालिका को और बढ़ाइए।) इसी तरह जगह-जगह पर अलग-अलग प्रकार के पौधे भी पाए जाते हैं जैसे रेगिस्तान में नागफनी, जल में कमल, पर्वतीय क्षेत्र में शंक्वाकार पेड़, जैसे पाइनस तथा सागवान एवं फर्न आदि। (नोट: किताब पर्वतीय क्षेत्र के पौधों में पाइनस के साथ सागवान एवं फर्न का भी नाम लेती है — यहाँ किताब की सूची ज्यों की त्यों दी गई है।) इस तालिका 11.1 में रेगिस्तान व जलीयवाले कॉलम में आपको क्या मिला? क्या दोनों में एक प्रकार के जीव/पौधे हैं? इन दोनों जगहों के परिवेश में क्या फर्क है? समुद्र में जंतु तथा पौधे लवणीय जल (खारे पानी) में रहते हैं तथा श्वसन के लिए जल में घुली हुई वायु (ऑक्सीजन) का उपयोग करते हैं। समुद्र तथा मरुस्थल भिन्न प्रकार के परिवेश हैं और हम इन दोनों क्षेत्रों में बिल्कुल विभिन्न प्रकार के पौधे और जंतु देखते हैं — क्या ऐसा नहीं है? पाठ के शुरू में ऊँट एवं घोड़े की कहानी हमने पढ़ी। ऊँट के शरीर में ऐसी क्या खास बातें हैं जो उसे रेगिस्तानी इलाकों में रहने योग्य बनाती हैं? इसके लक्षण को सूचीबद्ध करें। किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ होगा?
ऊँट के अनुकूलन — पूरी सूची
ऊँट के पैर रेत में नीचे रखते ही फैल जाते हैं, इसलिए वे रेत में धँसने से बच जाते हैं। उसकी आँखों की पलकों के लम्बे बाल और घनी भौहें आँखों को रेत और मिट्टी से बचा लेती हैं। उसके छोटे-छोटे कानों में रेत आसानी से नहीं जा सकती। अपनी नाक को वह अपनी मर्जी से खोल सकता है या बन्द कर सकता है। उसके कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रहता है जो बुरे वक्त में काम आता है। पानी पिए बिना भी वह कई दिन तक जी सकता है। इसके अलावा ऊँट के पैर लम्बे होते हैं जिससे उसका शरीर रेत की गरमी से दूर रहता है। साथ ही वे बहुत कम पेशाब करते हैं। उन्हें पसीना भी नहीं आता। इन्हीं सब बातों के कारण वे जल के बिना बहुत दिनों तक रह सकते हैं।
मछली के अनुकूलन
अपने आस-पास किसी नदी, तालाब, पोखर पर जाइए तथा वहाँ विभिन्न प्रकार की मछलियों का अवलोकन कीजिए। विभिन्न मछलियों की आकृति में क्या समानता है? मछलियों का शरीर धाररेखीय होता है। इसे नौकाकार भी कहते हैं। इनका शरीर चिकने शल्कों से ढंका रहता है। शल्क, इनके शरीर को सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा इनकी विशिष्ट आकृति जल में गति करने में सहायक है। मछली के पक्ष एवं पूँछ चपटे होते हैं जो उसे जल के अंदर दिशा परिवर्तन एवं संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। क्या ऐसी ही कई बातें अन्य जलीय जन्तुओं में भी हैं? हमने देखा कि मछली एवं ऊँट में अलग-अलग शारीरिक संरचनाएँ हैं जो उन्हें जल एवं रेगिस्तान में रहने में मदद करती हैं। ऐसे ही पृथ्वी पर असंख्य जीव-जन्तु एवं पौधे पाए जाते हैं, जिनमें अपने परिवेश में रहने के लिए कुछ विशिष्ट संरचनाएँ होती हैं। ऐसी विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति को अनुकूलन कहते हैं। एक सजीव जिस परिवेश में रहता है, जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं उसका वासस्थान कहलाता है। जमीन पर पाए जानेवाले सजीवों के वास स्थान स्थलीय वास स्थान तथा जल में पाए जानेवाले सजीवों के वास स्थान को जलीय वास स्थान कहते हैं। स्थलीय वास स्थान में कई विविधताएँ हैं जैसे वन, घास के मैदान, रेगिस्तान और पर्वतीय प्रदेश इसी प्रकार जलीय आवास में भी विविधताएँ हैं, जैसे— दल-दल, खारे पानी की झीलें व समुद्र आदि।
सामंजस्य के दो प्रकार — पर्यानुकूलन और आनुवंशिक अनुकूलन
जीव अपने पर्यावरण के साथ सामंजस्य करके ही जीवित रहता है। यह सामंजस्य दो प्रकार का होता है — (क) अल्प अवधि में विकसित होनेवाला सामंजस्य, (ख) लंबी अवधि में विकसित होनेवाला सामंजस्य। अपने परिवेश में होनेवाले परिवर्तनों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए कुछ जीवों में थोड़े समय के लिए परिवर्तन हो सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम मैदानी क्षेत्र में रह रहे हैं और अचानक पर्वतीय क्षेत्र में चले जाए तो हमें श्वास लेने में कठिनाई होती है तथा कोई भी शारीरिक श्रम करने में असुविधा होती है। थोड़े दिनों में हम उस परिवेश से सामंजस्य कर लेते हैं। इस प्रकार के अस्थायी अनुकूलन को पर्यानुकूलन कहते हैं। इससे अलग कुछ सामंजस्य लंबे अंतराल के बाद उत्पन्न होता है जैसे— उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में रहनेवाले लोगों में जन्म से ही फेफड़ों की क्षमता अधिक होती है क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। यह आनुवंशिक अनुकूलन है। क्या आपके साथ ऐसा पर्यानुकूलन हुआ है? विस्तार से अपने दोस्तों के साथ चर्चा कीजिए। क्या पर्यानुकूलन लम्बे समय तक रहता है या अपने परिवेश में आने पर समाप्त हो जाता है? (पर्यानुकूलन अस्थायी होता है — अपने परिवेश में लौटने पर समाप्त हो जाता है; आनुवंशिक अनुकूलन जन्मजात और स्थायी होता है।)
बीजों का प्रयोग — क्रियाकलाप-2
चने के कुछ सूखे बीजों को एकत्रित कीजिए। कुछ बीजों के एक ढेर को अलग रख दें तथा शेष को एक दिन के लिए पानी में भीगने के लिए रख दें। भीगे हुए बीजों को चार हिस्सों में बाँटें। उसमें से एक हिस्से को तीन-चार दिन के लिए पूरी तरह पानी में डुबोकर रख दें। सूखे हुए बीजों को तथा पानी में पूरी तरह डूबे हुए बीजों को बिल्कुल न हिलाए। भीगे बीजों में से एक भाग को धूपवाले कमरे में तथा दूसरे भाग को पूरे अंधेरे क्षेत्र में रख दें, जैसे आलमारी, संदूक जिसमें धूप न आए। अंतिम भाग को ठंडी जगह जैसे फ्रिज या बर्फ की पेटी में रखें। इन तीन भागों को प्रतिदिन जल में नम रखें व अधिक जल को निकाल दें। कुछ दिन बाद आप क्या देखते हैं? क्या सभी पाँचों भाग समान रूप से अंकुरित होते हैं? क्या प्रकाश और अंधेरे में रखे बीजों के अंकुरण की मात्रा में फर्क है? ऐसा क्यों हुआ? वायु, जल, प्रकाश तथा ऊष्मा जैसे अजैव घटक सजीवों के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। सजीव बहुत ठंडे और बहुत ऊष्ण परिवेश में भी पाए जाते हैं। ये जीव इस विषम परिवेश में जीवित रहने के लिए कुछ विशिष्ट व्यवस्था को अपनाते हैं। यहाँ अनुकूलन काम आता है। अनुकूलन अल्पकाल में नहीं होता है। हजारों वर्षों की अवधि में किसी जीव में किसी क्षेत्र के अजैव घटकों में परिवर्तन के कारण आते हैं। वे जन्तु जो इन परिवर्तनों के प्रति अपने आपको नहीं ढाल पाते वे नष्ट हो जाते हैं। केवल वे ही जीवित रहते हैं जो अपने आपको बदलते परिवेश के अनुसार अनुकूलित कर लेते हैं। निम्न तालिका 11.2 में अलग-अलग वास स्थानों में अजैव घटकों को कम, ज्यादा, बहुत कम, बहुत ज्यादा भरिए। तालिका 11.2: घटक | मरुस्थलीय | मैदानी | जलीय — ताप: दिन में ज्यादा, रात में कम | कम | कम; पानी, मिट्टी, हवा, प्रकाश की पंक्तियाँ खाली हैं — इन्हें अवलोकन और चर्चा से भरिए (किताब में केवल ताप की पंक्ति भरी है)।
विभिन्न वासस्थान — स्थलीय वासस्थान: 1. मरुस्थल
मरुस्थल में दिन में तेज गर्मी पड़ती है और रातें अधिक ठंडी होती हैं। ऊँट के बारे में हमने पढ़ा। रेगिस्तान में पाए जानेवाले छोटे जीव अधिक ताप से बचने के लिए गहरे बिलों में चले जाते हैं तथा रात को भोजन के लिए बाहर आ जाते हैं। चित्र 11.3 में कुछ रेगिस्तानी पौधों के चित्र दिए गए हैं— नागफनी, बबूल, ग्वारपाठा (घृतकुमारी) आदि रेगिस्तानी पौधे अपने आस-पास देखे होंगे। इनमें क्या खास बातें हैं? क्रियाकलाप-3: गमले अथवा बगीचे में लगे एक कैक्टस तथा पत्तियोंवाला एक पौधा लीजिए। दोनों को पोलीथीन से ढँक दीजिए। कुछ देर धूप में रहने दीजिए। दोनों पौधे वाष्पोत्सर्जन करते हैं। थोड़ी देर बाद पॉलीथीन में इकट्ठा हुई पानी की मात्रा को देखिए। 1. किस पौधे ने कम वाष्पोत्सर्जन किया? 2. कम वाष्पोत्सर्जन इस पौधे को अपने परिवेश से अनुकूलन में किस प्रकार मदद करता है? (प्रयोग में दिखेगा: कैक्टस की पॉलीथीन में पानी बहुत कम इकट्ठा होता है — कैक्टस कम वाष्पोत्सर्जन करता है; कम वाष्पोत्सर्जन से जल की बचत होती है, जो रेगिस्तान जैसे पानी की कमी वाले परिवेश में जीने के लिए सबसे बड़ा अनुकूलन है।)
पर्वतीय क्षेत्र
पहाड़ों पर सामान्यतः बहुत ठंड होती है और सर्दियों में तो हिमपात भी होता है। पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्ष शंक्वाकार (कीप जैसा) होता है तथा इनकी शाखाएँ तिरछी होती हैं। इनमें से कुछ वृक्षों की पत्तियाँ सुई के समान होती हैं। इससे वर्षा का जल एवं हिम आसानी से नीचे की ओर खिसक जाता है। पर्वतों पर इन वृक्षों से अधिक भिन्न आकृति एवं आकारवाले वृक्ष भी मिल सकते हैं। (चित्र 11.4 (क) पर्वतीय वृक्ष — पाईन, विलो, देवदार।) पर्वत पर जीवित रहने के लिए कुछ अन्य प्रकार के अनुकूलन हो सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्र में पाए जानेवाले जंतु भी वहाँ की परिस्थितियों के प्रति अनुकूलित होते हैं (चित्र 11.4 (ख) देखें)। यह याक है उनकी मोटी त्वचा या फर ठंड से उनका बचाव करती है। जैसे— शरीर को गरम रखने के लिए याक का शरीर लंबे बालों से ढँका होता है। पहाड़ी तेंदुए के शरीर पर फर होते हैं। यह बर्फ पर चलते समय उसके पैरों को ठंड से बचाता है। पहाड़ी बकरी के मजबूत खुर उसे ढालदार चट्टानों पर दौड़ने के लिए अनुकूलित करते हैं। अतः जैसे-जैसे हम पर्वतीय क्षेत्रों में ऊपर चढ़ते जाते हैं परिवेश का स्वरूप बदलता जाता है और हमें विभिन्न ऊँचाइयों पर पाए जानेवाले जीवों के अनुकूलन में विविधता दिखाई देती है।
घास स्थल — शेर और हिरण
शेर वन में अथवा घास स्थल में रहता है तथा एक ऐसा शक्तिशाली जंतु है जो हिरण जैसे जंतुओं का शिकार कर उन्हें मारकर खा जाता है। (चित्र-11.5: शेर, हिरण।) इन दोनों जंतुओं की आँखें उनके चेहरे पर किस प्रकार स्थित हैं? क्या वे चेहरे के सामने हैं अथवा पार्श्व (बगल) में हैं? शेर के अगले पैर के नख लंबे होते हैं जिन्हें वह पादाँगुलियों के अंदर खींचकर छिपा सकता है। क्या शेर की यह संरचनाएँ उसके जीवन-यापन में सहायता करती है? उसका मटमैला रंग शिकार के दौरान उसे घास के सूखे मैदानों में छिपाए रखता है और शिकार को पता भी नहीं चलता। चेहरे के सामने की आँखें उसे वन में दूर तक शिकार खोजने में सहायक होती है तथा शिकार को चारों तरफ देखने में सहायक होती है। एक दूसरा जंतु हिरण है जो वन या घासस्थल में रहता है। पौधों के कठोर तनों को चबाने के लिए इसके मजबूत दाँत होते हैं। हिरण को अपने शिकारी की उपस्थिति की जानकारी आवश्यक है ताकि वह उसका शिकार न बन सके और वहाँ से भाग जाए। उसके लंबे कान उसे शिकारी की गतिविधि की जानकारी देते हैं। इसके सिर के पार्श्व में दोनों ओर स्थित आँखें दोनों दिशा में देखकर खतरा महसूस कर सकती है। हिरण की तेज गति उसे शिकारी से दूर भागने में सहायक होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शेर, हिरण तथा अन्य जंतुओं एवं पौधों में और भी बहुत सी विशिष्ट संरचनाएँ होती हैं जो उन्हें उनके वासस्थान में जीवित रहने योग्य बनाती हैं।
जलीय वासस्थान — समुद्र, तालाब एवं झील
समुद्र में रहने के लिए मछली के अनुकूलन के विषय में हम चर्चा कर चुके हैं। दूसरे बहुत से समुद्री जंतुओं का शरीर भी धाररेखीय होता है जिससे वह जल में आसानी से तैर सकते हैं। स्क्विड एवं ऑक्टोपस जैसे कुछ समुद्री जंतुओं का शरीर आमतौर पर धाररेखीय नहीं होता। वे समुद्र की गहराई में तलहटी में रहते हैं तथा अपनी ओर आनेवाले शिकार को पकड़ते हैं। जब वे जल में चलते हैं तो अपने शरीर को धाररेखीय बना लेते हैं। जल में श्वास लेने के लिए इनमें गलफड़े (क्लोम) होते हैं। डॉलफिन एवं व्हेल जैसे कुछ जंतुओं में गिल नहीं होते। यह सिर पर स्थित नासाद्वार अथवा वात-छिद्रों द्वारा श्वास लेते हैं। ये जल में लंबे समय तक बिना श्वास लिए रह सकते हैं। वे समय-समय पर जल के सतह पर आकर श्वसन-छिद्रों से जल बाहर निकालते हैं एवं श्वास द्वारा स्वच्छ वायु अंदर भरते हैं। क्या आपने कभी दूरदर्शन पर अथवा समुद्री जीवन पर चलचित्र में डॉलफिन की इस रोचक क्रिया को देखा है? क्या आपने तालाब, झील, नदियों एवं नालों में पौधों को उगते देखा है? यदि संभव हो तो समीपवर्ती किसी तालाब के भ्रमण पर जाइए और वहाँ दिखाई देनेवाले कुछ पौधों को बाहर निकाल लीजिए। इन पौधों की पत्तियाँ, तने और जड़ें किस प्रकार व्यवस्थित हैं? अपने आस-पास के तालाबों, पोखरों में मिलने वाले जलीय पौधे के स्थानीय नाम की सूची बनाएँ तथा अवलोकन कीजिए कि पौधे का कौन सा हिस्सा या अंग जलीय वासस्थान के लिए अनुकूलित है। इनमें से कुछ पौधों की जड़ें जलाशय की तलहटी की मिट्टी में स्थिर रहती है। स्थलीय पौधों में जड़, मिट्टी से जल एवं खनिज पोषकों के अवशोषण का महत्त्वपूर्ण कार्य करती है। परन्तु जलीय पौधों की जड़ें आकार में बहुत छोटी होती हैं एवं इनका मुख्य कार्य पौधे को तलहटी में जमाए रखना होता है। इन पौधों का तना लंबा, खोखला एवं हल्का होता है। तना जल की सतह तक वृद्धि करता है जबकि पत्तियों एवं फूल जल की सतह पर प्लवन (तैरते) करते रहते हैं। आपने तालाबों में कमल के पौधों को देखा होगा। फूल जल की सतह पर रहती है तथा बड़ी-बड़ी गोल पत्तियाँ जल की सतह पर फैली रहती हैं। जलकुम्भी पौधे का नाम भी आपने सुना होगा। कुछ जलीय पौधे जल में पूरी तरह डूबे रहते हैं। ऐसे पौधों के सभी भाग जल में वृद्धि करते हैं। इनमें से कुछ पौधों की पत्तियाँ सकरी एवं पतले रिबन की तरह होती हैं। यह बहते जल में सरलता से मुड़ जाती है। कुछ अन्य पौधों में पत्तियाँ बहुत अधिक विभाजित होती है जिससे जल इनके बीच से बहता रहता है और पत्ती को कोई क्षति भी नहीं होती। आपने मेढक तो देखा ही होगा। मौका मिले तो इसके पिछले पाँव को ध्यान से देखिए। मेढक के पिछले पाँव लम्बे, मजबूत होते हैं जो उसे छलांग लगाने एवं शिकार करने में मदद करते हैं। इन पश्च पदों में जालयुक्त पादाँगुलियाँ होती हैं, जो उन्हें तैरने में सहायता करती हैं। हमने केवल कुछ जंतुओं एवं पौधों की चर्चा की है। जबकि विभिन्न आवासों में रहनेवाले जीवों की संख्या बहुत अधिक है। कल्पना कीजिए कि यदि हम पृथ्वी के सभी क्षेत्रों में उपलब्ध पौधों की पत्तियों की एलबम तैयार करें तो उनमें कितनी विविधता होगी।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
- अनुकूलन की परिभाषा — परिवेश में रहने के लिए जीवों की विशिष्ट संरचनाएँ एवं स्वभाव की स्थिति।
- वासस्थान — वह परिवेश जहाँ से जीव को भोजन, वायु, शरण स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं; स्थलीय बनाम जलीय।
- ऊँट के अनुकूलन — फैलनेवाले पैर, लम्बे पैर, पलकों के लम्बे बाल + घनी भौहें, छोटे कान, मर्जी से खुलने-बंद होनेवाली नाक, कूबड़ में चर्बी, कम पेशाब, पसीना नहीं।
- मछली के अनुकूलन — धाररेखीय/नौकाकार शरीर, चिकने शल्क, चपटे पक्ष व पूँछ (दिशा परिवर्तन + संतुलन), गलफड़े।
- पर्यानुकूलन बनाम आनुवंशिक अनुकूलन — अस्थायी (पर्वत पर कुछ दिन में साँस का सामंजस्य) बनाम जन्मजात स्थायी (पर्वतीय लोगों के फेफड़ों की अधिक क्षमता)।
- अजैव घटक — वायु, जल, प्रकाश, ऊष्मा; अनुकूलन हजारों वर्षों में विकसित होता है, अल्पकाल में नहीं।
मुख्य शब्द
- अनुकूलन (Adaptation): अपने परिवेश में रहने के लिए जीवों में पाई जानेवाली विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति।
- वासस्थान (Habitat): वह परिवेश जहाँ सजीव रहता है और जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं।
- स्थलीय वासस्थान: जमीन पर पाए जानेवाले सजीवों का वासस्थान — वन, घास के मैदान, रेगिस्तान, पर्वतीय प्रदेश।
- जलीय वासस्थान: जल में पाए जानेवाले सजीवों का वासस्थान — दल-दल, खारे पानी की झीलें, समुद्र, तालाब, झील, नदी, नाले।
- पर्यानुकूलन (Acclimatization): अस्थायी अनुकूलन — जैसे मैदान से पर्वत पर जाने पर कुछ दिनों में साँस का सामंजस्य हो जाना।
- आनुवंशिक अनुकूलन: लंबे अंतराल में विकसित, जन्मजात अनुकूलन — जैसे उच्च पर्वतीय लोगों में जन्म से फेफड़ों की अधिक क्षमता।
- अजैव घटक (Abiotic factor): परिवेश के निर्जीव घटक जो सजीवों के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं — वायु, जल, प्रकाश, ऊष्मा।
- धाररेखीय (Stream Line): मछली के शरीर की नाव जैसी आकृति — जल में आसानी से तैरने में सहायक।
- शल्क: मछली के शरीर को ढकनेवाले चिकने आवरण — सुरक्षा देते हैं और गति में सहायक हैं।
- गलफड़े (क्लोम): जल में श्वास लेने के अंग — जल में घुली वायु से ऑक्सीजन अवशोषित करते हैं; डॉलफिन/व्हेल में नहीं होते।
- नासाद्वार (Nasal aperture): डॉलफिन/व्हेल के सिर पर स्थित वात-छिद्र — इन्हीं से वे सतह पर आकर श्वास लेते हैं।
- पादाँगुलियाँ (Toes): पैर की अँगुलियाँ — मेढक की पिछली पादाँगुलियाँ जालयुक्त होती हैं और तैरने में सहायता करती हैं।
- शंक्वाकार: कीप जैसी आकृति — पर्वतीय वृक्ष शंक्वाकार होते हैं, शाखाएँ तिरछी, पत्तियाँ सुई जैसी; वर्षा का जल एवं हिम आसानी से नीचे खिसक जाता है।
- अवशोषण (Absorption): ग्रहण करना — स्थलीय पौधों की जड़ें मिट्टी से जल एवं खनिज पोषकों का अवशोषण करती हैं।
- वाष्पोत्सर्जन: पत्तियों से जलवाष्प का निकलना — कैक्टस कम वाष्पोत्सर्जन करता है, जिससे जल की बचत होती है।
याद रखें
- पृथ्वी पर पाए जानेवाले सजीवों में अपने परिवेश में रहने के लिए कुछ विशिष्ट संरचनाएँ होती हैं। ऐसी विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति को अनुकूलन कहते हैं।
- पर्वतीय क्षेत्रों के पौधे शंक्वाकार होते हैं।
- मछली का आकार धाररेखीय या नौकाकार होता है।
- डॉलफिन एवं व्हेल जैसी जन्तुओं में गिल/गलफड़े नहीं होते हैं।
- मेढक के पिछले पैरों में झिल्लीयुक्त पादाँगुलियाँ होती है, जो उन्हें तैरने में सहायता करती है।
- ऊँट रेगिस्तान में रहने के लिए अनुकूलित है — उसके पैर फैलते हैं, नाक मर्जी से बंद होती है, कूबड़ में चर्बी जमा रहती है, पसीना नहीं आता, पेशाब कम करता है।
- पर्यानुकूलन अस्थायी है; आनुवंशिक अनुकूलन जन्मजात है।
- अनुकूलन अल्पकाल में नहीं होता — हजारों वर्षों की अवधि में विकसित होता है; जो जीव बदलते परिवेश के अनुसार अनुकूलित नहीं हो पाते, वे नष्ट हो जाते हैं।
- जलीय पौधों की जड़ें छोटी होती हैं — उनका मुख्य कार्य पौधे को तलहटी में जमाए रखना है, अवशोषण नहीं।
- जलीय पौधों का तना लंबा, खोखला एवं हल्का होता है; पत्तियाँ एवं फूल जल की सतह पर प्लवन करते हैं।
परीक्षा टिप
अनुकूलन के प्रश्नों में हमेशा 'कौन-सा लक्षण, किस परिवेश की किस समस्या का उत्तर है' — इस तरह जोड़कर लिखें: ऊँट के फैलनेवाले पैर = रेत में धँसने से बचाव; लम्बे पैर = रेत की गरमी से दूरी; बंद होनेवाली नाक + पलकों के बाल + छोटे कान = रेत के तूफान से बचाव; कूबड़ की चर्बी + कम पेशाब + पसीना नहीं = जल/भोजन की कमी में जीवन। मछली का धाररेखीय शरीर = जल में गति; शल्क = सुरक्षा; गलफड़े = जल में श्वास। पर्वतीय वृक्ष का शंक्वाकार रूप = हिम/वर्षा जल का नीचे खिसकना। शेर की सामने की आँखें = दूर तक शिकार खोजना; हिरण की पार्श्व आँखें + लंबे कान = दोनों दिशाओं से खतरे की जानकारी। पर्यानुकूलन और आनुवंशिक अनुकूलन को कभी एक-दूसरे से न मिलाएँ — पहला अस्थायी, दूसरा जन्मजात।
सारणी — वासस्थान और उनके अनुकूलन
| वासस्थान | परिवेश की समस्या | अनुकूलन (उदाहरण सहित) |
|---|---|---|
| मरुस्थल (रेगिस्तान) | दिन में तेज गर्मी, रातें ठंडी, पानी की कमी, रेत के तूफान | ऊँट: फैलनेवाले पैर, लम्बे पैर, बंद होनेवाली नाक, पलकों के बाल, कूबड़ में चर्बी, कम पेशाब, पसीना नहीं; छोटे जीव: दिन में गहरे बिल, रात को भोजन; पौधे: नागफनी, बबूल, ग्वारपाठा — कम वाष्पोत्सर्जन |
| पर्वतीय क्षेत्र | बहुत ठंड, हिमपात, ऑक्सीजन कम | वृक्ष: शंक्वाकार, तिरछी शाखाएँ, सुई जैसी पत्तियाँ (पाईन, विलो, देवदार); याक: लंबे बाल/मोटी फर; पहाड़ी तेंदुआ: फर; पहाड़ी बकरी: मजबूत खुर; पर्वतीय लोग: जन्म से फेफड़ों की अधिक क्षमता |
| घास स्थल / वन | शिकार करना और शिकार से बचना | शेर: सामने की आँखें (दूर तक शिकार खोजना), लंबे नख (पादाँगुलियों में छिपते हैं), मटमैला रंग (सूखी घास में छिपाव); हिरण: पार्श्व आँखें, लंबे कान, मजबूत दाँत, तेज गति |
| जलीय (समुद्र) | जल में गति, जल में श्वास, खारा पानी | मछली: धाररेखीय शरीर, शल्क, चपटे पक्ष व पूँछ, गलफड़े; स्क्विड/ऑक्टोपस: चलते समय शरीर धाररेखीय; डॉलफिन/व्हेल: नासाद्वार से सतह पर श्वास |
| जलीय (तालाब/झील) | जल में स्थिर रहना, सतह तक पहुँचना, बहते जल में टूटना नहीं | पौधे: छोटी जड़ें (जमाए रखना), लंबा-खोखला-हल्का तना, सतह पर प्लवन करती पत्तियाँ व फूल (कमल, जलकुम्भी); डूबे पौधे: सकरी रिबन जैसी या बहुत विभाजित पत्तियाँ; मेढक: लंबे मजबूत पिछले पैर, जालयुक्त पादाँगुलियाँ |
तालिका 11.1 (किताब की): जंगल में — शेर; रेगिस्तान में — ऊँट; पर्वतीय क्षेत्र में — भालू; जल में — मछली। तालिका 11.2 (किताब में केवल ताप की पंक्ति भरी है): ताप — मरुस्थलीय: दिन में ज्यादा, रात में कम; मैदानी: कम; जलीय: कम। पानी, मिट्टी, हवा, प्रकाश की पंक्तियाँ किताब में खाली हैं — इन्हें 'कम, ज्यादा, बहुत कम, बहुत ज्यादा' में से चुनकर अवलोकन व चर्चा से भरिए।
अभ्यास — खुद करके देखो
- क्रियाकलाप-1 की तालिका 11.1 को आगे बढ़ाओ — हर परिवेश (जंगल, रेगिस्तान, पर्वतीय क्षेत्र, जल) में दो-दो और जन्तु जोड़ो और बताओ कि वे उसी परिवेश में क्यों पाए जाते हैं। संकेत: तालिका 11.1 के उदाहरण देखो — शेर, ऊँट, भालू, मछली।
- क्रियाकलाप-3 दोहराओ — कैक्टस और पत्तियोंवाले पौधे को पोलीथीन से ढँककर धूप में रखो; किसकी पॉलीथीन में पानी कम इकट्ठा हुआ और क्यों? संकेत: कैक्टस कम वाष्पोत्सर्जन करता है — जल की बचत ही उसका अनुकूलन है।
- क्रियाकलाप-2 का छोटा रूप करो — चने के बीजों को धूप, अंधेरे और फ्रिज में रखकर देखो कि अंकुरण में क्या फर्क आता है। संकेत: वायु, जल, प्रकाश, ऊष्मा — चारों अजैव घटक अंकुरण के लिए आवश्यक हैं।
- अपने आस-पास के तालाब/पोखर के किसी जलीय पौधे की पत्ती, तना और जड़ देखकर लिखो — कौन-सा अंग जलीय वासस्थान के लिए अनुकूलित है और कैसे? संकेत: छोटी जड़ें = जमाए रखना; खोखला तना = सतह तक पहुँचना; सतह पर पत्तियाँ = प्लवन।
- शेर और हिरण की आँखों की स्थिति का चित्र बनाओ — सामने की आँखें किसे लाभ देती हैं, पार्श्व आँखें किसे? संकेत: शेर = शिकारी (सामने), हिरण = शिकार (पार्श्व, दोनों दिशाएँ)।
प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: अनुकूलन क्या है? वासस्थान से क्या समझते हो? स्थलीय और जलीय वासस्थान में अंतर बताओ।
उत्तर: अपने परिवेश में रहने के लिए जीवों में पाई जानेवाली विशिष्ट संरचनाओं एवं स्वभाव की स्थिति को अनुकूलन कहते हैं। वासस्थान वह परिवेश है जहाँ सजीव रहता है और जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। जमीन पर पाए जानेवाले सजीवों के वासस्थान स्थलीय (वन, घास के मैदान, रेगिस्तान, पर्वतीय प्रदेश) और जल में पाए जानेवाले सजीवों के वासस्थान जलीय (दल-दल, खारे पानी की झीलें, समुद्र, तालाब, झील) कहलाते हैं। - प्रश्न: कहानी के चार प्रश्नों के उत्तर दो — (क) रेत में चलना ऊँट के लिए क्यों सुविधाजनक था? (ख) रेत के तूफान से घोड़े की हालत खराब क्यों हो गई? (ग) ऊँट की नाक में क्या खास बात है? (घ) ऊँट को उसके कूबड़ से क्या लाभ है?
उत्तर: (क) ऊँट के पैर नीचे रखते ही फैल जाते हैं, इसलिए वे रेत में धँसते नहीं — घोड़े के पैर धँस जाते थे। (ख) घोड़े की आँखों, कानों, नाक-मुँह में रेत भर गई; ऊँट की पलकों के लम्बे बाल, घनी भौहें, छोटे कान और बंद होनेवाली नाक उसे तूफान से बचाते हैं। (ग) ऊँट अपनी नाक को अपनी मर्जी से खोल सकता है या बन्द कर सकता है — तूफान में वह नाक बंद कर लेता है। (घ) कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रहता है जो बुरे वक्त में काम आता है; पानी पिए बिना भी ऊँट कई दिन तक जी सकता है। - प्रश्न: पर्यानुकूलन और आनुवंशिक अनुकूलन में अंतर उदाहरण सहित बताओ।
उत्तर: पर्यानुकूलन अस्थायी होता है — मैदानी क्षेत्र का व्यक्ति पर्वत पर जाने पर पहले श्वास लेने में कठिनाई महसूस करता है, पर थोड़े दिनों में उस परिवेश से सामंजस्य कर लेता है; अपने परिवेश में लौटने पर यह समाप्त हो जाता है। आनुवंशिक अनुकूलन लंबे अंतराल में विकसित, जन्मजात होता है — उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में रहनेवाले लोगों में जन्म से ही फेफड़ों की क्षमता अधिक होती है क्योंकि वहाँ ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है। - प्रश्न: मछली, डॉलफिन और मेढक — तीनों के जलीय अनुकूलन अलग-अलग क्यों हैं?
उत्तर: मछली पूरी तरह जलीय है — धाररेखीय शरीर, शल्क, चपटे पक्ष व पूँछ, और जल में घुली वायु से श्वास के लिए गलफड़े। डॉलफिन/व्हेल स्तनधारी हैं — उनमें गिल नहीं होते; वे सिर के नासाद्वार (वात-छिद्र) से सतह पर आकर श्वास लेते हैं और लंबे समय तक बिना श्वास लिए जल में रह सकते हैं। मेढक उभयचर है — लंबे मजबूत पिछले पैर छलांग व शिकार में मदद करते हैं और जालयुक्त पादाँगुलियाँ तैरने में सहायता करती हैं। - प्रश्न: अनुकूलन अल्पकाल में क्यों नहीं होता? जो जीव अनुकूलित नहीं हो पाते, उनका क्या होता है?
उत्तर: अनुकूलन हजारों वर्षों की अवधि में किसी क्षेत्र के अजैव घटकों (वायु, जल, प्रकाश, ऊष्मा) में परिवर्तन के कारण विकसित होता है। वे जन्तु जो इन परिवर्तनों के प्रति अपने आपको नहीं ढाल पाते, वे नष्ट हो जाते हैं। केवल वे ही जीवित रहते हैं जो अपने आपको बदलते परिवेश के अनुसार अनुकूलित कर लेते हैं।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: सजीवों के वासस्थान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: वह परिवेश जहाँ सजीव रहता है और जहाँ से उसे भोजन, वायु, शरण स्थल एवं अन्य आवश्यकताएँ पूरी होती हैं, उसका वासस्थान कहलाता है। - प्रश्न: ऊँट रेगिस्तान में जीवनयापन के लिए किस प्रकार अनुकूलित है?
उत्तर: ऊँट के पैर रेत में फैल जाते हैं (धँसते नहीं) और लम्बे होते हैं (शरीर रेत की गरमी से दूर रहता है); पलकों के लम्बे बाल और घनी भौहें आँखों को रेत से बचाती हैं; छोटे कानों में रेत आसानी से नहीं जाती; नाक मर्जी से खोली/बंद की जा सकती है; कूबड़ में भोजन चर्बी के रूप में जमा रहता है; वह बहुत कम पेशाब करता है और उसे पसीना भी नहीं आता — इसलिए जल के बिना बहुत दिनों तक रह सकता है। - प्रश्न: मछली जल में अपने को किस प्रकार अनुकूलित करती है?
उत्तर: मछली का शरीर धाररेखीय (नौकाकार) होता है जिससे वह जल में आसानी से तैर सकती है; चिकने शल्क शरीर को सुरक्षा देते हैं और गति में सहायक हैं; चपटे पक्ष एवं पूँछ जल के अंदर दिशा परिवर्तन एवं संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं; गलफड़ों से वह जल में घुली वायु की ऑक्सीजन लेती है। - प्रश्न: पर्वतीय पौधे किस प्रकार अनुकूलित हैं?
उत्तर: पर्वतीय वृक्ष शंक्वाकार (कीप जैसे) होते हैं, शाखाएँ तिरछी होती हैं और कई की पत्तियाँ सुई के समान होती हैं — इससे वर्षा का जल एवं हिम आसानी से नीचे की ओर खिसक जाता है और बर्फ के भार से शाखाएँ टूटती नहीं हैं। उदाहरण: पाईन, विलो, देवदार। - प्रश्न: रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — (क) स्थल पर पाए जानेवाले पौधों एवं जंतुओं के वास स्थान को ............ आवास कहते हैं। (ख) वे वास स्थान जिनमें जल में रहनेवाले पौधे एवं जंतु रहते हैं, ............ आवास कहलाते हैं। (ग) याक का शरीर लंबे ............ से ढका होता है। (घ) मछली का शरीर ............ होता है जिससे वह जल में आसानी से तैर सकती है। (ङ) जलीय पौधों का तना ............ खोखला एवं ............ होता है।
उत्तर: (क) स्थलीय। (ख) जलीय। (ग) बालों। (घ) धाररेखीय (नौकाकार)। (ङ) लंबा, हल्का। - प्रश्न: मिलान कीजिए — मछली, ऊँट, नागफनी, याक, घोड़ा ↔ कूबड़, धाररेखीय शरीर, मजबूत खुर, पहाड़ी जानवर, कम वाष्पोत्सर्जन।
उत्तर: मछली — धाररेखीय शरीर; ऊँट — कूबड़; नागफनी — कम वाष्पोत्सर्जन; याक — पहाड़ी जानवर; घोड़ा — मजबूत खुर। (नोट: घोड़ा–मजबूत खुर शेष बचा जोड़ा है; पाठ में मजबूत खुर पहाड़ी बकरी के बताए गए हैं — मिलान शेष-विकल्प से बनता है।) - प्रश्न: सही विकल्प चुनें — (क) ऊँट निम्न परिवेश में पाया जानेवाला जन्तु है — 1. जलीय 2. पर्वतीय 3. मरुस्थलीय 4. इनमें से कोई नहीं। (ख) धाररेखीय शरीर होता है — 1. घोड़े का 2. भालू का 3. मछली का 4. मेढक का। (ग) हमें श्वास लेने में कठिनाई होती है — 1. मैदानी क्षेत्र में 2. जलीय क्षेत्र में 3. पर्वतीय क्षेत्र में 4. रेगिस्तानी क्षेत्र में। (घ) घास स्थल अथवा वनों का शक्तिशाली जन्तु है — 1. हिरण 2. शेर 3. घोड़ा 4. ऊँट। (ङ) जलकुम्भी पाया जाता है — 1. जंगल में 2. पर्वतों पर 3. जल में 4. बर्फ में।
उत्तर: (क) 3. मरुस्थलीय। (ख) 3. मछली का। (ग) 3. पर्वतीय क्षेत्र में (ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है)। (घ) 2. शेर। (ङ) 3. जल में। - प्रश्न: परियोजना कार्य — अपने आस-पास के क्षेत्र का भ्रमण करके जन्तु एवं पौधों की सूची उनके अनुकूलन के विशिष्ट लक्षणों के साथ तैयार करो और कक्षा में प्रस्तुत करो।
उत्तर: भ्रमण के दौरान हर जन्तु/पौधे के लिए लिखो: नाम, वासस्थान (स्थलीय/जलीय — वन, घास स्थल, रेगिस्तान, पर्वतीय, तालाब, नदी), और उसके अनुकूलन के विशिष्ट लक्षण (जैसे ऊँट के फैलनेवाले पैर, मछली का धाररेखीय शरीर, पर्वतीय वृक्ष का शंक्वाकार रूप)। फिर सूची को कक्षा में प्रस्तुत करो और बताओ कि हर लक्षण उसके परिवेश की किस समस्या का उत्तर है।
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें
इस पृष्ठ को पढ़ते समय पहले ऊँट-घोड़े की कहानी पढ़ें — वही इस अध्याय की कुंजी है। फिर हर वासस्थान की सारणी को ध्यान से देखें और हर लक्षण के सामने यह पूछें: यह लक्षण किस समस्या का उत्तर है? अभ्यास के प्रश्न स्वयं करके देखें, फिर प्रश्नोत्तर से मिलान करें। किताब के अभ्यास के सभी प्रश्नों के उत्तर अंत में दिए गए हैं — परीक्षा से पहले उन्हें बिना देखे लिखने का अभ्यास करें। तालिका 11.2 की खाली पंक्तियाँ (पानी, मिट्टी, हवा, प्रकाश) स्वयं भरने का प्रयास करें — यही इस अध्याय का सबसे अच्छा स्व-परीक्षण है।

