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Chapter 2: गोल

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Malhar (Nayi pustak — 2025 ke baad wali)

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गोल — EG के अपने शब्दों में सार

पुस्तक: Malhar (Nayi pustak — 2025 ke baad wali, Bihar Board, कक्षा 6)  |  अध्याय 2  |  माध्यम: Hindi

Labelled diagram for गोल

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): गोल वस्तुओं (पहिया, सूरज, गेंद) की सामान्य तस्वीर। यह पाठ ध्यानचंद के हॉकी गोल के बारे में है; पुस्तक का दृश्य नहीं।

Illustration for गोल

गेंद से खेलते बच्चे। खेल की सामान्य तस्वीर; पाठ हॉकी के गोल के बारे में है।

पाठ के बारे में

इस पाठ का नाम सुनकर पहले गोल गेंद, गोल रोटी, गोल चंद्रमा जैसे आकार याद आते हैं। पर यह पाठ एक विशेष प्रकार के ‘गोल’ और उसे करने वाले के बारे में है — हॉकी के खेल में किया जाने वाला गोल। यह पाठ प्रसिद्ध खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के संस्मरण (अपनी यादों) का एक अंश है।

सन् 1933 की बात है। ध्यानचंद पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेलते थे। पंजाब रेजिमेंट और सैपर्स एंड माइनर्स टीम के बीच मुकाबला हो रहा था। माइनर्स टीम के खिलाड़ी उनसे गेंद छीनने की कोशिश करते, पर हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में हॉकी स्टिक उनके सिर पर दे मारी। उन्हें मैदान से बाहर ले जाया गया। थोड़ी देर बाद वे पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आए। आते ही उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” वह खिलाड़ी घबरा गया और हर समय यही देखता रहा कि कब उसके सिर पर हॉकी मारी जाएगी। ध्यानचंद ने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल के बाद उन्होंने फिर उसकी पीठ थपथपाई और कहा, “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। ध्यानचंद कहते हैं — बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।

ध्यानचंद का जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में परिवार झाँसी आकर बस गया। 16 साल की उम्र में वे ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए। पहले खेल में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी बार-बार उन्हें हॉकी खेलने को कहते। धीरे-धीरे खेल में निखार आया और तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में उन्हें कप्तान बनाया गया; उस समय वे सेना में लांस नायक थे। बर्लिन में उनके खेलने के ढंग से लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे। भारतीय टीम को स्वर्ण पदक मिला। ध्यानचंद की हमेशा यही कोशिश रहती कि गेंद को गोल के पास ले जाकर किसी साथी खिलाड़ी को दे दें ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। इसी खेल भावना से उन्होंने दुनिया के खेल-प्रेमियों का दिल जीत लिया। वे कहते थे — हार या जीत मेरी नहीं, पूरे देश की है।

लेखक-परिचय में बताया गया है कि भारत उनके जन्मदिन को ‘राष्ट्रीय खेल दिवस’ के रूप में मनाता है और देश का सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘खेल रत्न’ उन्हीं के नाम पर दिया जाता है। सफलता का रहस्य पूछने पर वे यही कहते थे — लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।

घटना-क्रम

  1. 1933: पंजाब रेजिमेंट बनाम सैपर्स एंड माइनर्स — सिर पर हॉकी की चोट, पट्टी बाँधकर वापसी।
  2. ‘बदला ज़रूर लूँगा’ कहकर विरोधी को चिंता में डालना, फिर झटपट छह गोल करना।
  3. खेल के बाद पीठ थपथपाकर समझाना — खेल में गुस्सा अच्छा नहीं; दो गोल से ही हराते, पर छह गोल बदला बन गए।
  4. जीवन-क्रम: 1905 प्रयाग में जन्म, झाँसी, 16 वर्ष में सिपाही, सूबेदार मेजर तिवारी की प्रेरणा।
  5. 1936 बर्लिन ओलंपिक: कप्तान, लांस नायक, ‘हॉकी का जादूगर’, स्वर्ण पदक, साथियों को श्रेय देने की भावना।

क्या सीखना है

ध्यानचंद का जीवन-क्रम (1905, 1933, 1936), ‘बदले’ का अर्थ (गोल करके जवाब देना, मारकर नहीं), सफलता के तीन मंत्र (लगन, साधना, खेल भावना) और ‘हॉकी का जादूगर’ की उपाधि का कारण याद करो।

मुख्य शब्द

  • संस्मरण — अपनी यादों का लिखा हुआ वर्णन; लेखक पाठक से अपनी यादें साझा करता है।
  • गोल — हॉकी के खेल में गेंद को विरोधी के गोल में पहुँचाना; इस पाठ का ‘गोल’ आकार नहीं है।
  • खेल भावना — हार-जीत से ऊपर उठकर ईमानदारी, संयम और साथियों के सम्मान से खेलना।
  • रेजिमेंट — सेना का एक स्थायी विभाग/दल।
  • सूबेदार मेजर — स्वतंत्रता से पहले भारतीय सैन्य अधिकारियों का एक बड़ा पद।
  • लांस नायक — भारतीय सेना का एक पद (रैंक)।
  • छावनी — सैनिकों के रहने का क्षेत्र।
  • लगन, साधना — मन लगाकर निरंतर अभ्यास करना; सफलता के मंत्र।

याद रखें

  • ध्यानचंद का जन्म 1905 में प्रयाग में हुआ; परिवार बाद में झाँसी बस गया।
  • 1933 के मैच में सिर पर हॉकी लगने के बाद भी वे पट्टी बाँधकर लौटे और छह गोल किए।
  • उनका ‘बदला’ मारकर नहीं, गोल करके था — और खेल के बाद विरोधी को समझाकर दिया गया।
  • 1936 बर्लिन ओलंपिक में वे कप्तान थे; भारत को स्वर्ण पदक मिला।
  • सफलता के मंत्र: लगन, साधना और खेल भावना।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: ‘गोल’ को केवल गोल आकार समझना। इस पाठ में ‘गोल’ हॉकी का गोल है। उत्तर में हमेशा संदर्भ लिखो — ‘हॉकी में किया जाने वाला गोल’। दूसरी गलती: बदले को मारपीट समझना — ध्यानचंद का बदला गोल करके और समझाकर था।

तालिका: ध्यानचंद का जीवन-क्रम

वर्ष / अवस्थाघटना
1905प्रयाग में जन्म; बाद में झाँसी में बसना
16 वर्षफर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट में साधारण सिपाही
1933पंजाब रेजिमेंट बनाम सैपर्स एंड माइनर्स; चोट के बाद छह गोल
1936बर्लिन ओलंपिक में कप्तान; ‘हॉकी का जादूगर’; स्वर्ण पदक

भाषा और व्याकरण — पाठ के बिंदु

शब्द-युग्म: एक ही शब्द दो बार — जैसे-जैसे, वैसे-वैसे। भिन्न-भिन्न शब्दों के युग्म — धक्का-मुक्की, नोंक-झोंक। योजक चिह्न (-) से जुड़े शब्दों को योजक की सहायता से भी लिखा जा सकता है — हार-जीत, बच्चे-बढ़े, अच्छा-बुरा, छोटा-बड़ा, उत्तर-दक्षिण, गुरु-शिष्य, अमीर-गरीब, अमृत-विष। बात पर बल: ‘मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है’ में ‘तो’ और ‘ही’ बल देने वाले शब्द हैं; इन्हें हटाने से वाक्य का ज़ोर घट जाता है। संस्मरण की रचना: ‘उन दिनों मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था’ — लेखक पाठक से सीधे अपनी यादें साझा करता है, यही संस्मरण की विशेषता है।

पाठ से आगे — सुनो, बोलो, लिखो, खोजो

मेरी समझ से: ध्यानचंद की बात से पता चलता है कि वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए। लोगों ने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण कहना शुरू किया। सोच-विचार: सफलता का रहस्य — लगन, साधना, खेल भावना। स्वयं से पहले दूसरों को रखने के प्रमाण — गेंद साथी को देना ताकि उसे श्रेय मिले; हार-जीत को देश की मानना। मिलान: लांस नायक — सेना का पद; बर्लिन ओलंपिक — 1936 में जर्मनी के बर्लिन में आयोजित खेल, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया; पंजाब रेजिमेंट — अंग्रेज़ों के समय की भारतीय सेना का एक दल; सैपर्स एंड माइनर्स टीम — अंग्रेज़ों के समय का एक हॉकी दल; सूबेदार — स्वतंत्रता से पहले भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद; छावनी — सैनिकों के रहने का क्षेत्र। आगे: खेल-समाचार लिखना और आँखों देखा हाल (कमेंटरी) प्रस्तुत करना भी पाठ की गतिविधियाँ हैं।

अभ्यास — स्वयं करके देखो

  1. ध्यानचंद ने ‘बदला’ किस तरह लिया?
    Hint: हॉकी मारकर नहीं, गोल करके — इस अंतर पर ध्यान दो।
  2. 1933 के मैच में चोट लगने के बाद ध्यानचंद ने क्या किया?
    Hint: पट्टी बाँधकर मैदान में लौटने के बारे में सोचो।
  3. ध्यानचंद की सफलता के तीन मंत्र कौन-से हैं?
    Hint: लगन, साधना और खेल भावना।
  4. वे गेंद साथी को क्यों दे देते थे?
    Hint: श्रेय देने की भावना से सोचो।
  5. ध्यानचंद के जीवन पर चार पंक्तियाँ लिखो।
    Hint: पहले जन्म, फिर 1933, फिर 1936।

प्रश्न और उत्तर

  1. इस पाठ में ‘गोल’ का क्या अर्थ है?
    इस पाठ में ‘गोल’ हॉकी के खेल में किया जाने वाला गोल है — गेंद को विरोधी के गोल में पहुँचाना। यह गोल आकार की बात नहीं है।
  2. 1933 के मैच में क्या हुआ था?
    पंजाब रेजिमेंट और सैपर्स एंड माइनर्स टीम के मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में हॉकी स्टिक ध्यानचंद के सिर पर दे मारी। वे पट्टी बाँधकर मैदान में लौटे और झटपट छह गोल कर दिए।
  3. ध्यानचंद का ‘बदला’ कैसा था?
    उनका बदला मारकर नहीं, खेल से था। उन्होंने विरोधी से कहा कि चिंता मत करो, बदला ज़रूर लूँगा — फिर छह गोल करके दिखाया और खेल के बाद समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं।
  4. ध्यानचंद को ‘हॉकी का जादूगर’ क्यों कहा गया?
    1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके खेलने के विशेष कौशल से लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे।
  5. ध्यानचंद की सफलता का रहस्य क्या था?
    लगन, साधना और खेल भावना — यही तीन मंत्र वे सबको बताते थे। वे हार-जीत को अपनी नहीं, पूरे देश की मानते थे।

विस्तार — प्रश्न और उत्तर

  1. [सही/गलत] ध्यानचंद ने विरोधी खिलाड़ी के सिर पर हॉकी मारकर बदला लिया। सही है या गलत?
    गलत। उन्होंने गोल करके बदला लिया और खेल के बाद उसे समझाया; मारकर बदला नहीं लिया।
  2. [रिक्त स्थान] ध्यानचंद का जन्म सन् ______ में प्रयाग में हुआ था।
    1905।
  3. [मिलान] ‘सूबेदार मेजर तिवारी’ कौन थे — (क) विरोधी टीम के कप्तान (ख) रेजिमेंट के अधिकारी जिन्होंने ध्यानचंद को हॉकी खेलने को प्रेरित किया (ग) ओलंपिक के निर्णायक।
    (ख) रेजिमेंट के अधिकारी जिन्होंने ध्यानचंद को हॉकी खेलने को प्रेरित किया।
  4. [एक शब्द] 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद किस पद पर थे?
    कप्तान (सेना में उस समय लांस नायक)।
  5. [लघु उत्तर] ‘बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी’ — इस वाक्य का अर्थ समझाओ।
    जो व्यक्ति दूसरों के साथ बुरा करता है, वह मन ही मन डरता रहता है कि कहीं उसके साथ भी वैसा ही न हो जाए। विरोधी खिलाड़ी भी यही सोचकर घबराया हुआ था।
  6. [लघु उत्तर] ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे — दो प्रमाण दो।
    पहला, गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी को दे देना ताकि उसे गोल का श्रेय मिले। दूसरा, हार-जीत को अपनी नहीं, पूरे देश की मानना।
  7. [दीर्घ उत्तर] 1933 के मैच की पूरी घटना क्रम से अपने शब्दों में लिखो।
    मुकाबला, गेंद छीनने की बेकार कोशिशें, गुस्से में सिर पर हॉकी, बाहर ले जाया जाना, पट्टी बाँधकर वापसी, ‘बदला ज़रूर लूँगा’ कहना, विरोधी का घबराना, छह गोल, खेल के बाद पीठ थपथपाकर समझाना और विरोधी का शर्मिंदा होना।
  8. [व्याकरण] ‘जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई’ — इसमें शब्द-युग्म पहचानो और दो नए युग्म बनाओ।
    जैसे-जैसे, वैसे-वैसे (एक ही शब्द के युग्म)। जैसे धीरे-धीरे, साथ-साथ। भिन्न शब्दों के युग्म: धक्का-मुक्की, नोंक-झोंक।
  9. [व्याकरण] ‘मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है’ में बल देने वाले शब्द कौन-से हैं? उन्हें हटाकर वाक्य लिखो और अंतर बताओ।
    ‘तो’ और ‘ही’। हटाने पर — ‘मैंने अपना बदला ले लिया है’ — अर्थ वही रहता है पर ज़ोर और आत्मविश्वास घट जाता है।
  10. [लेखन] यदि तुम ध्यानचंद की जगह होते, तो चोट लगने पर क्या करते? अपना उत्तर तर्क सहित लिखो।
    अपने विचार से लिखो — मारकर बदला लेना खेल भावना के विरुद्ध है; खेल से जवाब देना ही सही बदला है।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ो, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलो, फिर बिना देखे अभ्यास हल करो। उत्तर अध्यापक या माता-पिता से जाँचवाओ।