Chapter 11: चेतक की वीरता
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Malhar (Nayi pustak — 2025 ke baad wali)
चेतक की वीरता — EG के अपने शब्दों में सार
पुस्तक: Malhar (Nayi pustak — 2025 ke baad wali, Bihar Board, कक्षा 6) | अध्याय 11 | माध्यम: Hindi

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): युद्धभूमि में चेतक पर सवार महाराणा प्रताप। यह कहानी के विषय की सामान्य तस्वीर है।

स्वामी के साथ खड़ा वीर घोड़ा। स्वामिभक्ति की सामान्य तस्वीर।
पाठ के बारे में
यह कविता श्यामनारायण पाण्डेय (1907–1991) की प्रसिद्ध रचना ‘हल्दीघाटी’ (1939) का एक अंश है। इसमें महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वीरता का वर्णन है। कवि चेतक की गति, फुर्ती और निर्भीकता को एक के बाद एक चित्रों से दिखाता है।
चेतक चौकड़ी भर-भरकर दौड़ता है; हवा को भी पाला (प्रतियोगिता में हरा) देता है; उसके तन पर कभी कोड़ा नहीं गिरा — अर्थात् वह बिना मार खाए ही दौड़ता है। अरि (शत्रु) के मस्तक पर वह इस प्रकार दौड़ता है मानो आसमान पर दौड़ रहा हो। बाग (लगाम) हिलते ही वह सवार को लेकर उड़ जाता है; राणा की पुतली (आँख की पुतली) फिरने से पहले ही वह मुड़ जाता है — अर्थात् राणा के मन का भाव समझकर पहले ही दिशा बदल लेता है।
भालों, ढालों और करवालों (तलवारों) के बीच वह निर्भीक सरपट दौड़ता है। कवि कहता है — है यहीं रहा अब यहाँ नहीं, वहीं रहा है वहाँ नहीं — अर्थात् चेतक की गति इतनी तेज़ है कि वह एक जगह दिखाई देकर पल में दूसरी जगह पहुँच जाता है। वह नद-सा लहर गया, फिर ठहर गया; विकराल बज्र-मय बादल-सा अरि-सेना पर घहर गया — अर्थात् वज्र की तरह शत्रु-सेना पर टूट पड़ा। भाला गिर गया, गिरा निषंग (तरकश), हय-टापों (घोड़े की टापों) से अंग खन गया — अर्थात् चेतक की टापों की आवाज़ से वैरी-समाज दंग रह गया।
चेतक की वीरता के चित्र
- चौकड़ी भर-भरकर दौड़ना; हवा को पाला देना; कोड़ा कभी तन पर न गिरना।
- अरि-मस्तक पर आसमान-सी दौड़; बाग हिलते ही उड़ जाना।
- राणा की पुतली फिरने से पहले मुड़ जाना — सवार के भाव की समझ।
- भालों-ढालों-करवालों में निर्भीक सरपट दौड़।
- ‘है यहीं रहा अब यहाँ नहीं’ — पल में जगह बदलना।
- नद-सा लहरना, ठहरना; बज्र-मय बादल-सा शत्रु पर घहरना।
- भाला और निषंग गिरना; हय-टापों से अंग खन जाना; वैरी-समाज का दंग रह जाना।
क्या सीखना है
कवि और रचना का नाम, चेतक के गुणों के चित्र, ‘सवार’ कौन है, और उपमाओं के अर्थ याद करो। ध्यान रहे — इस अंश में चेतक की मृत्यु या प्रताप को सुरक्षित पहुँचाने का वर्णन नहीं है; अंश वैरी-समाज के दंग रह जाने पर समाप्त होता है।
मुख्य शब्द
- चौकड़ी — घोड़े की तेज़ दौड़ की एक चाल; चारों पैरों से एक साथ उछलकर दौड़ना।
- अरि — शत्रु, दुश्मन।
- बाग — लगाम।
- पुतली — आँख की पुतली।
- करवाल — तलवार।
- निषंग — तरकश (तीरों का थैला)।
- हय — घोड़ा, अश्व।
- बज्र — वज्र; इंद्र का अस्त्र, बिजली की तरह प्रहार करने वाला।
याद रखें
- कवि श्यामनारायण पाण्डेय हैं (1907–1991); रचना ‘हल्दीघाटी’ (1939) का अंश है।
- चेतक महाराणा प्रताप का घोड़ा है — ‘सवार’ का अर्थ महाराणा प्रताप है।
- चेतक के तन पर कभी कोड़ा नहीं गिरा — वह बिना मार के दौड़ता था।
- राणा की पुतली फिरने से पहले ही चेतक मुड़ जाता था।
- ‘है यहीं रहा अब यहाँ नहीं’ — चेतक की अद्भुत गति का चित्र है।
- अंश का अंत: भाला और निषंग गिरना, हय-टापों से अंग खन जाना, वैरी-समाज का दंग रह जाना।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: इस अंश में चेतक की मृत्यु या प्रताप को बचाकर ले जाने की बात जोड़ देना। यह अंश केवल चेतक की गति और वीरता का वर्णन करता है और वैरी-समाज के दंग रह जाने पर समाप्त होता है — अंश से बाहर की बात उत्तर में न जोड़ो।
तालिका: चेतक के चित्र और उनका अर्थ
| कविता की पंक्ति/चित्र | अर्थ |
|---|---|
| हवा को पाला | हवा से भी तेज़; हवा से प्रतियोगिता-सा |
| अरि-मस्तक पर दौड़ | शत्रुओं के सिरों के ऊपर से एक छोर से दूसरे छोर तक; आसमान-सी ऊँची दौड़ |
| बाग हिली | लगाम हिलते ही सवार को लेकर उड़ जाना |
| पुतली फिरी नहीं | राणा का भाव समझकर पहले ही मुड़ जाना |
| बज्र-मय बादल | वज्र की तरह शत्रु-सेना पर टूट पड़ना |
भाषा और व्याकरण — पाठ के बिंदु
समानार्थी शब्द: हय — अश्व, घोड़ा; हवा — अनल, पवन, बयार; रण — युद्ध, समर; आसमान — आकाश, गगन; नद — सरिता, तटिनी; करवाल — तलवार, असि। पाठ में कुछ शब्द-समूहों में से असमानार्थी शब्द को छाँटने का अभ्यास है — जैसे ‘नभचर’ आसमान का समानार्थी नहीं है, ‘तरंग’ रण का समानार्थी नहीं है, ‘ढाल’ करवाल का समानार्थी नहीं है, ‘नाद’ नद का समानार्थी नहीं है। उपमा: चेतक की तुलना हवा, आसमान, नद और बज्र-मय बादल से की गई है — ये सब उसकी गति और शक्ति को दिखाते हैं।
पाठ से आगे — सुनो, बोलो, लिखो, खोजो
मेरी समझ से: शत्रु-सेना पर चेतक कैसे टूट पड़ता था — विकराल बज्र-मय बादल की तरह। ‘सवार’ कौन है — महाराणा प्रताप। मिलान: हवा को पाला — हवा से भी तेज़; अरि-मस्तक पर दौड़ — सिरों के ऊपर से एक छोर से दूसरे छोर; बाग हिली — लगाम हिलते ही उड़ना; पुतली फिरी नहीं — राणा का भाव समझकर पहले ही मुड़ जाना; बज्र-मय बादल — शत्रु का नाश। सोच-विचार: चेतक को ‘वीर’ क्यों कहा गया है? क्योंकि वह बिना डरे भालों-ढालों-करवालों के बीच दौड़ता था। खोज: हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में जानकारी एकत्र करो।
अभ्यास — स्वयं करके देखो
- चेतक किसका घोड़ा था?
Hint: महाराणा प्रताप के बारे में सोचो। - चेतक की गति कैसी थी?
Hint: हवा और आसमान के बारे में सोचो। - ‘सवार’ से क्या तात्पर्य है?
Hint: राणा के बारे में सोचो। - चेतक की कोई दो विशेषताएँ लिखो।
Hint: कोड़ा और पुतली के बारे में सोचो। - कविता का भाव अपने शब्दों में लिखो।
Hint: पहले चित्र, फिर भाव।
प्रश्न और उत्तर
- चेतक किसका घोड़ा था?
चेतक महाराणा प्रताप का घोड़ा था। इस कविता में ‘सवार’ का अर्थ महाराणा प्रताप ही है। - चेतक की गति कैसी थी?
चेतक चौकड़ी भर-भरकर दौड़ता था; हवा को भी पाला देता था — अर्थात् हवा से भी तेज़ था। वह एक जगह दिखाई देकर पल में दूसरी जगह पहुँच जाता था। - चेतक सवार के भाव को कैसे समझता था?
राणा की पुतली फिरने से पहले ही चेतक मुड़ जाता था — अर्थात् वह राणा के मन का भाव समझकर पहले ही दिशा बदल लेता था। - चेतक के तन पर कोड़ा क्यों नहीं गिरता था?
क्योंकि चेतक बिना मार खाए ही तेज़ दौड़ता था; उसे दौड़ने के लिए कोड़े की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। - कविता में चेतक की वीरता कैसे दिखाई गई है?
चेतक भालों, ढालों और करवालों के बीच निर्भीक सरपट दौड़ता था और विकराल बज्र-मय बादल की तरह शत्रु-सेना पर टूट पड़ता था।
विस्तार — प्रश्न और उत्तर
- [बहुविकल्पीय] शत्रु-सेना पर चेतक कैसे टूट पड़ता था — (क) नदी के उफान की तरह (ख) विकराल बज्र-मय बादल की तरह (ग) आँधी की तरह (घ) बिजली की चमक की तरह।
(ख) विकराल बज्र-मय बादल की तरह — वज्र की तरह शत्रु-सेना पर घहरकर टूट पड़ता था। - [सही/गलत] इस अंश में चेतक की मृत्यु का वर्णन है। सही है या गलत?
गलत। यह अंश केवल चेतक की गति और वीरता का वर्णन है; अंश वैरी-समाज के दंग रह जाने पर समाप्त होता है। - [रिक्त स्थान] चेतक के तन पर कभी ______ नहीं गिरा।
कोड़ा। - [मिलान] हय — घोड़ा; अरि — शत्रु; बाग — लगाम; करवाल — तलवार; निषंग — तरकश।
हय — घोड़ा/अश्व; अरि — शत्रु; बाग — लगाम; करवाल — तलवार; निषंग — तरकश। - [एक शब्द] ‘है यहीं रहा अब यहाँ नहीं’ — इससे चेतक की किस विशेषता का पता चलता है?
गति (अद्भुत तेज़ी)। - [लघु उत्तर] ‘बाग हिली’ और ‘पुतली फिरी नहीं’ — इन दोनों चित्रों का अर्थ समझाओ।
‘बाग हिली’ — लगाम हिलते ही चेतक सवार को लेकर उड़ जाता था। ‘पुतली फिरी नहीं’ — राणा की आँख की पुतली फिरने से पहले ही चेतक मुड़ जाता था; वह सवार के भाव को पहले ही समझ लेता था। - [लघु उत्तर] ‘नद-सा लहर गया, फिर ठहर गया’ — इस पंक्ति का भाव लिखो।
चेतक नदी की लहर की तरह आगे बढ़ा और फिर अचानक ठहर गया — उसकी गति में लहर की-सी सहजता और ठहराव दोनों थे। - [दीर्घ उत्तर] चेतक की वीरता के पाँच चित्र अपने शब्दों में लिखो।
चौकड़ी भरकर दौड़ना; हवा को पाला देना; बिना कोड़े दौड़ना; अरि-मस्तक पर आसमान-सी दौड़; भालों-ढालों-करवालों में निर्भीक दौड़; बज्र-मय बादल-सा शत्रु पर टूट पड़ना। - [व्याकरण] नीचे दिए गए शब्द-समूहों में से असमानार्थी शब्द छाँटो — (क) हवा: अनल, पवन, बयार (ख) रण: तरंग, युद्ध, समर (ग) आसमान: आकाश, गगन, नभचर (घ) करवाल: तलवार, असि, ढाल।
(ख) में तरंग, (ग) में नभचर, (घ) में ढाल असमानार्थी हैं; (क) में तीनों समानार्थी हैं। - [लेखन] अपने किसी पालतू जानवर या देखे हुए जानवर की कोई विशेषता लिखो जो तुम्हें वीरता या समझदारी की लगे।
अपने अनुभव से लिखो — जानवर, उसकी विशेषता और तुम्हारा भाव।
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