Chapter 9: बाल-लीला
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
बाल-लीला — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 9 | प्रकार: कविता | माध्यम: हिंदी
यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): माखन की मटकी की ओर बढ़ता एक बालक। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

आँगन में खेलते बच्चे — बचपन के आनंद का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
यह पद सूरदास का है — बाल-कृष्ण की लीला का एक प्रसंग। ग्वाल-बालों ने माँ यशोदा से शिकायत की है कि कृष्ण ने माखन खाया है। कृष्ण अपनी माँ के सामने खड़े होकर सफ़ाई देते हैं — ‘मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो’ — अर्थात् मैया, मैंने माखन नहीं खाया। यही पद का आरंभ और उसकी जान है: एक बच्चे की भोली सफ़ाई।
कृष्ण अपने पक्ष में कई तर्क रखते हैं। पहला: भोर होते ही उन्हें गैयों (गायों) के पीछे मधुवन भेज दिया गया था; वे चार पहर तक बंसीवट में भटकते रहे और साँझ पड़े घर आए — तो माखन खाने का समय ही कहाँ था? दूसरा: वे अभी छोटे बालक हैं, उनकी बाँहें छोटी हैं — छींके (सींके) तक वे किस विधि से पहुँच सकते थे? सींका वह रस्सी की बनी चीज़ है जिसे छत या छप्पर से लटकाकर रखा जाता है और उस पर चीज़ें रखी जाती हैं — छोटे बच्चे की बाँह वहाँ तक पहुँच ही नहीं सकती। तीसरा: ग्वाल-बाल सब उनसे बैर पर गए हैं (उनके विरुद्ध हो गए हैं) और उन्होंने बरबस (ज़बरदस्ती) कृष्ण के मुख पर माखन लपेट दिया है — इसलिए मुँह पर लगा माखन खाने का प्रमाण नहीं है।
इसके बाद कृष्ण माँ से एक मीठी शिकायत भी करते हैं: माँ, तुम मन की बहुत भोरी हो — तुमने इनकी कही बात पर विश्वास कर लिया। अगर ऐसा ही रहा, तो तुम्हारे मन में कुछ भेद उत्पन्न हो जाएगा — तुम मुझे पराया (दूसरे का) बच्चा समझने लगोगी। अंत में वे रूठकर कहते हैं कि अपनी लकुटी (छोटी लाठी) और कमरिया (कंबल) वापस ले लो — तुमने मुझे बहुत नाच नचाया है, अर्थात् बहुत परेशान किया है। सूरदास कहते हैं कि तब यशोदा हँस पड़ीं (बिहँसी) और कृष्ण को उर (छाती) से कंठ लगाकर गले लगा लिया। पद का अंत माँ-बेटे के प्रेम में होता है — शिकायत, तर्क और रूठना सब प्रेम में घुल जाते हैं।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस पद से कृष्ण के तर्कों का क्रम सीखो — मधुवन भेजा जाना और बंसीवट में भटकना, छोटी बाँहों से सींका न पा सकना, ग्वाल-बालों का बैर और बरबस मुख लपेटना — और पद का अंत (लकुटी-कमरिया वापस लेना, यशोदा का हँसकर गले लगाना)। शब्दार्थ याद रखो (भटक्यो–भटकना, बहियन–बाँह, परायो–दूसरा, लकुटी–छोटी लाठी, बिहँसी–हँसकर, छींको–सींका) और ब्रजभाषा के शब्दों के मानक हिंदी रूप पहचानना सीखो।
मुख्य शब्द
- भटक्यो — भटकना; इधर-उधर घूमना
- बहियन — बाँह (बाँहें)
- परायो — दूसरा; अपना नहीं
- लकुटी — छोटी लाठी
- बिहँसी — हँसकर
- छींको — सींका; रस्सी की बनी चीज़ जिसे छत/छप्पर से लटकाकर रखा जाता है और उस पर कोई चीज़ रखी जाती है
- बरबस — ज़बरदस्ती
- बैर परे हैं — विरुद्ध हो गए हैं; दुश्मनी पर उतर आए हैं
- कमरिया — कंबल (छोटा)
- उर कंठ लगायो — छाती से लगाकर गले लगाया
याद रखें
- पद के रचयिता: सूरदास; प्रसंग: बाल-कृष्ण की लीला — माखन खाने की शिकायत पर सफ़ाई।
- कृष्ण का पहला तर्क: भोर में गैयों के पीछे मधुवन भेजे गए; चार पहर बंसीवट में भटके; साँझ पड़े घर आए।
- दूसरा तर्क: छोटे बालक हैं, बाँहें छोटी हैं — सींके तक किस विधि से पहुँच सकते थे?
- तीसरा तर्क: ग्वाल-बाल सब बैर पर गए हैं; उन्होंने बरबस मुख पर माखन लपेट दिया है।
- माँ से शिकायत: तुम मन की बहुत भोरी हो, इनकी कही बात पर विश्वास कर लिया; नहीं तो मन में भेद उपजेगा — मुझे पराया बच्चा समझोगी।
- रूठना: अपनी लकुटी-कमरिया वापस ले लो — बहुत नाच नचाया है (बहुत परेशान किया है)।
- अंत: सूरदास के अनुसार तब यशोदा बिहँसीं (हँस पड़ीं) और कृष्ण को उर से कंठ लगाकर गले लगा लिया।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: केवल ‘कृष्ण ने माखन नहीं खाया’ लिखकर उत्तर छोड़ देना — परीक्षा में उसके तीनों तर्क लिखो (मधुवन/बंसीवट, छोटी बाँहें-सींका, ग्वाल-बालों का बैर और बरबस मुख लपेटना)। दूसरी गलती: ‘छींको’ को कोई बर्तन समझ लेना — छींको सींका है, रस्सी की बनी लटकने वाली चीज़। तीसरी गलती: पद को कहानी समझकर गद्य में लंबा वर्णन लिख देना — यह पद है, सूरदास की रचना; उत्तर में भाव और तर्क लिखो, पद की लंबी पंक्तियाँ नकल करके नहीं।
सारणी / चार्ट: कृष्ण के तर्क — क्रम से
| क्रम | तर्क | भाव |
|---|---|---|
| 1 | मधुवन भेजा जाना | भोर में गैयों के पीछे मधुवन भेजे गए; चार पहर बंसीवट में भटके; साँझ पड़े घर आए — माखन खाने का अवसर ही नहीं था |
| 2 | छोटी बाँहें, ऊँचा सींका | बालक हैं, बाँहें छोटी हैं — सींके तक किस विधि से पहुँच सकते थे? |
| 3 | ग्वाल-बालों का बैर | सब बैर पर गए हैं; उन्होंने बरबस मुख पर माखन लपेट दिया है — मुँह पर लगा माखन प्रमाण नहीं है |
| 4 | माँ की भोलापन पर शिकायत | माँ मन की भोरी है, इनकी बात पर विश्वास कर लिया; मन में भेद उपजेगा — मुझे पराया समझोगी |
| 5 | रूठना और मनाना | लकुटी-कमरिया वापस ले लो, बहुत नाच नचाया है — तब यशोदा हँसकर गले लगा लेती हैं |
अभ्यास — खुद करके देखो
- कृष्ण ने माखन न खाने के पक्ष में कौन-कौन से तर्क दिए? तीनों लिखो।
संकेत: मधुवन, छोटी बाँहें और ग्वाल-बालों का बैर — तीनों सोचो। - ‘छींको’ क्या है? छोटे बच्चे के लिए वह क्यों पहुँच से बाहर था?
संकेत: रस्सी की बनी लटकने वाली चीज़ और ऊँचाई के बारे में सोचो। - कृष्ण माँ से क्यों कहते हैं कि तुम मन की भोरी हो? इसका भाव लिखो।
संकेत: दूसरों की बात पर विश्वास और मन में भेद उपजने के बारे में सोचो। - पद के अंत में यशोदा क्या करती हैं? इसका क्या अर्थ है?
संकेत: हँसकर गले लगाना — माँ के प्रेम और विश्वास के बारे में सोचो। - अपने बचपन की कोई मज़ेदार घटना चार-पाँच वाक्यों में लिखो।
संकेत: घटना, तुम्हारी सफ़ाई और माँ की प्रतिक्रिया — तीनों लिखो।
प्रश्नोत्तर
- कृष्ण अपनी माँ के सामने कौन-कौन से तर्क रखते हैं?
तीन तर्क: (1) भोर में उन्हें गैयों के पीछे मधुवन भेज दिया गया था; वे चार पहर बंसीवट में भटकते रहे और साँझ पड़े घर आए — माखन खाने का समय ही नहीं था। (2) वे छोटे बालक हैं, बाँहें छोटी हैं — सींके तक किस विधि से पहुँच सकते थे? (3) ग्वाल-बाल सब उनसे बैर पर गए हैं और उन्होंने बरबस उनके मुख पर माखन लपेट दिया है — इसलिए मुँह पर लगा माखन खाने का प्रमाण नहीं है। - कृष्ण माँ की भोलापन पर क्या शिकायत करते हैं?
वे कहते हैं कि माँ मन की बहुत भोरी है — उसने ग्वाल-बालों की कही बात पर विश्वास कर लिया। अगर ऐसा ही रहा, तो उसके मन में कुछ भेद उत्पन्न हो जाएगा और वह कृष्ण को पराया (दूसरे का) बच्चा समझने लगेगी। यह शिकायत भी प्रेम की ही भाषा है — बच्चा माँ से चाहता है कि वह उसकी बात पर विश्वास करे। - पद के अंत में क्या होता है?
कृष्ण रूठकर कहते हैं कि अपनी लकुटी और कमरिया वापस ले लो — तुमने मुझे बहुत नाच नचाया है, बहुत परेशान किया है। तब सूरदास के अनुसार यशोदा हँस पड़ीं और कृष्ण को छाती से लगाकर गले लगा लिया — शिकायत और रूठना माँ के प्रेम में घुल गए। - ‘मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि-विधि पायो’ का भाव क्या है?
भाव यह है कि मैं अभी छोटा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं — सींके तक मैं किस तरह पहुँच सकता हूँ? यह तर्क है कि ऊँचे लटके सींके से माखन उतारना छोटे बच्चे के लिए संभव ही नहीं है, इसलिए माखन खाने का आरोप गलत है। - इस पद से हमें क्या सीख मिलती है?
सीख यह है कि किसी पर आरोप लगाने से पहले उसकी बात भी सुननी चाहिए, और माँ-बच्चे के प्रेम में शिकायत तथा रूठना भी प्रेम का ही रूप है। साथ ही, ब्रजभाषा के मधुर शब्दों और बाल-लीला के भोलेपन का आनंद लेना भी इस पद की देन है।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — अपने साथियों द्वारा लगाए गए आरोपों को गलत बताने के लिए कृष्ण अपनी माँ के सामने कौन-कौन से तर्क रखते हैं?
मधुवन भेजा जाना और बंसीवट में चार पहर भटकना; छोटी बाँहों से सींका न पा सकना; ग्वाल-बालों का बैर और बरबस मुख पर माखन लपेटना — ये तीन तर्क कृष्ण रखते हैं, और साथ में माँ की भोलापन पर शिकायत भी करते हैं कि उसने दूसरों की बात पर विश्वास कर लिया। - पाठ से 2(क) — इन पंक्तियों का भाव किन पद-पंक्तियों में समाहित है: ‘माँ, मैं अभी बहुत छोटा हूँ; छोटी-छोटी मेरी बाँहें हैं, सींका मैं किस तरह पा सकता हूँ। माँ, मेरे सभी दोस्त अभी दुश्मन बन बैठे हैं। मेरे मुँह पर ज़बरदस्ती माखन लगा दिए हैं।’
यह भाव पद की इन पंक्तियों में है: ‘मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि-विधि पायो’ (छोटा बालक, छोटी बाँहें, सींका कैसे पाऊँ) और ‘ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो’ (सब दोस्त दुश्मन बन बैठे हैं, मुँह पर ज़बरदस्ती माखन लगा दिया है)। - पाठ से 2(ख) — इन पंक्तियों का भाव किन पद-पंक्तियों में समाहित है: ‘माँ, अपनी यह लाठी और कंबल लो। तूने मुझे बहुत परेशान किया है। इस पर यशोदा हँसकर कृष्ण को गले से लगा लेती है।’
यह भाव पद की अंतिम पंक्तियों में है: ‘यह लै अपनी लकुटी कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो’ (अपनी लाठी-कंबल ले लो, बहुत परेशान किया है) और ‘सूरदास, तब बिहँसी जसोदा, लै उर कंठ लगायो’ (तब यशोदा हँसकर कृष्ण को छाती से लगाकर गले लगा लेती हैं)। - पाठ से आगे 1 — अपने बचपन की कोई भी मज़ेदार घटना लिखिए।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: बचपन में कोई शरारत, माँ की डाँट, अपनी सफ़ाई और अंत में सबका हँस पड़ना। घटना को चार-पाँच वाक्यों में लिखो।) - पाठ से आगे 2(क) — निम्नलिखित का अर्थ अपनी मातृभाषा में कीजिए: ‘मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि-विधि पायो। ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो।’
अर्थ: मैं अभी छोटा बच्चा हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं — सींके तक मैं किस तरह पहुँच सकता हूँ? और मेरे सभी ग्वाल-बाल दोस्त मुझसे दुश्मनी पर उतर आए हैं; उन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन लगा दिया है। - पाठ से आगे 2(ख) — निम्नलिखित का अर्थ अपनी मातृभाषा में कीजिए: ‘तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो। जिय तेरे कछु भेद उपजिहै, जानि परायो जायो।’
अर्थ: माँ, तुम मन की बहुत भोली हो — तुमने इनकी कही बात पर विश्वास कर लिया। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो तुम्हारे मन में कुछ भेद (फ़र्क) पैदा हो जाएगा, और तुम मुझे पराया (दूसरे का) बच्चा समझने लगोगी। - व्याकरण 1 — निम्नलिखित शब्दों के मानक हिंदी रूप लिखिए: भटक्यो, बहियन, छींको, परायो, लकुटी।
भटक्यो — भटका; बहियन — बाँहें; छींको — सींका; परायो — पराया; लकुटी — छोटी लाठी। (नोट: किताब के प्रश्न में इन बोली-शब्दों के प्रयोग के बारे में पूछा गया है; यहाँ उनके मानक हिंदी रूप दिए गए हैं।) - कुछ करने को 1 — प्रस्तुत कविता में कृष्ण के 6–7 वर्ष की उम्र का वर्णन है; अपनी याददाश्त के आधार पर लिखिए कि जब आप इस उम्र के थे, तो उस समय आपकी माँ आपके लिए क्या-क्या करती थी।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: माँ खाना बनाती थी, कपड़े पहनाती थी, कहानियाँ सुनाती थी, बीमार होने पर देखभाल करती थी। अपनी यादों से लिखो।) - कुछ करने को 2 — सूरदास की कोई दूसरी रचना खोजिए और पढ़िए।
(गतिविधि: सूरदास की कोई दूसरी रचना — जैसे कोई और पद — खोजकर पढ़ो और कक्षा में सुनाओ।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

