Chapter 8: मंत्र
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
मंत्र — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 8 | प्रकार: कहानी | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): शांत मन से बैठा एक बच्चा। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

सुबह की ओर बढ़ता एक बच्चा — हिम्मत और आशा का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
संध्या का समय था। डॉक्टर चड्ढा टेनिस खेलने के लिए तैयार हो रहे थे; मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि कहार डोली लाते दिखाई दिए। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आ रहा था। डोली औषधालय के सामने आकर रुक गई। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर द्वार पर पड़ी हुई चिक (बाँस की पतली कमाची से बना पर्दा) से अंदर झाँका — ऐसी साफ़-सुथरी ज़मीन पर पैर रखते हुए उसे भय हो रहा था कि कोई घुड़क न बैठे। डॉक्टर साहब ने चिक के अंदर से गरजकर कहा — ‘कौन है? क्या चाहता है?’ बूढ़े ने हाथ जोड़कर कहा कि वह बड़ा गरीब आदमी है; उसका लड़का कई दिन से बहुत बीमार है। डॉक्टर ने कहा — ‘कल सवेरे आओ, कल सवेरे। हम इस वक़्त मरीज़ों को नहीं देखते।’ बूढ़े ने घुटने टेककर ज़मीन पर सिर रख दिया और कहा — ‘दुहाई है सरकार की, लड़का मर जाएगा। हुज़ूर, चार दिन से आँखें नहीं खोली हैं।’ डॉक्टर ने घड़ी देखी — केवल दस मिनट का समय और बाकी है — और कहा कि यह उनके खेलने का समय है, कल सवेरे आओ। बूढ़े ने पगड़ी उतारकर चौखट पर रख दी और रोते हुए कहा — ‘हुज़ूर, एक निगाह देख लें। बस, एक निगाह! लड़का मर जाएगा। हुज़ूर, सात लड़कों में से यही एक बच रहा है। छह पहले ही बीमारी से मर गए। हम रो-रोकर ही मर जाएँगे।’ डॉक्टर ने उसकी बातों की ओर ध्यान नहीं दिया; धीरे से चिक उठाई और मोटर की तरफ़ बढ़ चले। बूढ़ा पीछे दौड़ा — ‘सरकार, बड़ा धरम होगा। हुज़ूर, दया कीजिए। लड़के को छोड़कर इस संसार में मेरा कोई और नहीं है।’ डॉक्टर ने मुँह फेर लिया, उसकी तरफ़ देखा तक नहीं, मोटर में बैठकर बोले — ‘कल आना।’ मोटर चली गई; बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की तरह खड़ा रहा। डोली जिधर से आई थी, उधर ही चली गई। यहाँ से निराश होकर वह फिर किसी डॉक्टर के पास न गया। उसी रात हँसता-खेलता सात साल का बालक इस संसार से सिधार गया — बूढ़े माँ-बाप के जीवन का आधार छिन गया।
कई साल गुज़र गए। डॉक्टर चड्ढा ने खूब यश और धन कमाया। उनके दो बच्चे थे — एक लड़का और एक लड़की। लड़की का विवाह हो चुका था; लड़का कॉलेज में पढ़ता था, उसका नाम था कैलाश। आज उसकी बीसवीं सालगिरह थी। कैलाश ने अपने सभी सहपाठी मित्रों को बुलाया था; उसकी एक खास मित्र भी थी — मृणालिनी। कैलाश और मृणालिनी आपस में प्रेम करते थे। कैलाश को साँप पालने, खिलाने और नचाने का शौक था; उसने तरह-तरह के साँप पाल रखे थे और यह विद्या एक बड़े सपेरे से सीखी थी। साँपों की जड़ी-बूटियाँ जमा करने का उसको मरज (खराब आदत, रोग) था — इतना पता भर मिल जाए कि किसी व्यक्ति के पास कोई अच्छी जड़ी है, फिर उसे चैन न आता; उसे लेकर ही छोड़ता। मृणालिनी कई बार आ चुकी थी और हर बार साँप देखने का आग्रह करती थी; कैलाश हर बार टाल जाता। आज मृणालिनी ने साँप देखने की ठान ली। कैलाश ने कहा कि कल ज़रूर दिखा देगा, इस वक़्त अच्छी तरह दिखा भी नहीं सकता — घर मेहमानों से भरा हुआ है, कमरे में पैर रखने की जगह तक नहीं है, साँप भीड़ देखकर चौंक जाएँगे। मृणालिनी की ज़िद को कुछ और लोगों ने भी हवा दी। कैलाश मृणालिनी और अन्य मित्रों को साँपों के दरबे के आगे ले जाकर बीन बजाने लगा, फिर एक-एक खाना खोलकर एक-एक साँप को निकालने लगा। क्या कमाल था! ऐसा जान पड़ता था कि वे साँप उसकी एक-एक बात मानते हैं। उसने साँपों को हाथ में, गले में डालना शुरू किया। मृणालिनी घबरा रही थी। एक मित्र ने व्यंग्य किया — ‘अजी, दाँत तोड़ डाले होंगे।’ कैलाश हँसकर बोला कि दाँत तोड़ डालना मदारियों का काम है; इनके दाँत नहीं तोड़े गए हैं — कहो तो दिखा दूँ? यह कहकर उसने एक काले साँप को पकड़ लिया और बोला कि उसके पास इससे बड़ा ज़हरीला साँप दूसरा नहीं है; इसका काटा तुरंत मर जाता है; इसके काटे की दवा नहीं, कोई मंत्र नहीं। इसके दाँत दिखा दूँ? एक मित्र बोला कि उसे तो विश्वास नहीं आता, लेकिन कैलाश कहता है तो मान लेता है। कैलाश पर इस वक़्त भूत सवार था। उसने साँप की गर्दन पकड़कर ज़ोर से दबाई, इतनी ज़ोर से कि उसका मुँह लाल हो गया। साँप ने कैलाश के हाथों ऐसा व्यवहार कभी नहीं देखा था; उसने सोचा कि आज यह मुझे मार डालना चाहता है, अतः वह आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया। कैलाश ने उसकी गर्दन खूब दबाकर मुँह खोल दिया और उसके ज़हरीले दाँत दिखाते हुए बोला — ‘जिन सज्जनों को शक हो, आकर देख लें। आया विश्वास या अब भी कुछ शक है?’ मित्रों को दाँत दिखाकर कैलाश ने साँप की गर्दन ढीली कर दी। साँप क्रोध से पागल हो गया था; गर्दन ढीली पड़ते ही उसने फन उठाकर कैलाश की अँगुली में ज़ोर से काटा और वहाँ से भाग निकला। कैलाश की अँगुली से टप-टप खून टपकने लगा। उसने ज़ोर से अँगुली दबा ली और कमरे की तरफ़ भागा; तुरंत ही एक जड़ी पीसकर लगाई। मित्रों में हलचल मच गई; डॉक्टर साहब घबरा गए। डॉक्टर साहब ने चीरा लगाने को कहा, लेकिन कैलाश को जड़ी पर पूरा विश्वास था। एक ही मिनट में कैलाश की आँखें झपकने लगीं; होठों पर नीलापन दौड़ने लगा; यहाँ तक कि वह खड़ा भी न रह सका, फ़र्श पर बैठ गया। सारे मेहमान कमरे में जमा हो गए; कैलाश को फ़र्श पर लिटा दिया गया और पंखा झलने लगे। एक महाशय बोले कि कोई मंत्र झाड़नेवाला मिले, तो संभव है जान बच जाए। एक मंत्र झाड़नेवाला आया भी, मगर कैलाश की सूरत देखकर उसे मंत्र चलाने की हिम्मत न पड़ी — बोला कि अब क्या हो सकता है, जो कुछ होना था, हो चुका। घर के सभी लोग रोने लगे।
शहर से कई मील दूर एक छोटे-से घर में एक बूढ़ा और बुढ़िया अँगीठी के सामने बैठे जाड़े की रात काट रहे थे। मिट्टी के तेल की एक कुप्पी ताक पर जल रही थी। घर में न चारपाई थी, न बिछौना; एक कोने में थोड़ी-सी पुआल पड़ी थी। बुढ़िया दिन भर उपले और सूखी लकड़ियाँ बटोरती थी; बूढ़ा रस्सी बाँटकर बाज़ार में बेच आता था — यही उनकी ज़िंदगी थी। किसी ने द्वार पर आवाज़ दी — ‘भगत, भगत! क्या सो गए? ज़रा किवाड़ खोलो।’ भगत ने उठकर किवाड़ खोल दिए। एक आदमी ने अंदर आकर कहा कि कुछ सुना — डॉक्टर चड्ढा के लड़के को साँप ने काट लिया; तुम चाहो तो चले जाओ, आदमी बन जाओगे, खूब पैसा मिलेगा। बूढ़े ने कठोर भाव से सिर हिलाकर कहा — ‘मैं नहीं जाता। मेरी बला से मरे। मैं उस डॉक्टर को खूब जानता हूँ। मेरा लड़का अंतिम साँसें गिन रहा था; मैं भैया को लेकर उन्हीं के पास गया था। डॉक्टर साहब खेलने जा रहे थे। मैं पैरों पर गिर पड़ा कि एक नज़र देख लीजिए, मगर उसने सीधे मुँह बात तक नहीं की। अब जान पड़ेगा कि बेटे का गम कैसा होता है। उस बखत मेरी आँखों में आँसू निकल पड़े थे, पर उन्हें तनिक भी दया न आई थी।’ ‘तो नहीं जाओगे? हमने जो सुना था, उसे कह दिया।’ ‘अच्छा किया, अच्छा किया। कलेजा ठंडा हो गया। तुम जाओ। आज चैन की नींद सोऊँगा। एक चिलम और पीऊँगा। अब मालूम होगा लाला को। सारी साहबी निकल जाएगी। हमारा क्या बिगड़ा? लड़के के चले जाने से कोई राज तो नहीं चला गया? जहाँ छह बच्चे गए, वहाँ एक और चला गया। तुम्हारा तो राज सूना हो जाएगा। उसी के वास्ते सबका गला दबा-दबाकर धन जोड़ा था न! अब क्या करोगे?’ आदमी चला गया; भगत ने किवाड़ बंद कर लिए, तब चिलम पीने लगा। बुढ़िया ने कहा — ‘इतनी रात गए जाड़े में कौन जाएगा?’ ‘अरे, दोपहर ही होती तो भी मैं न जाता। सवारी दरवाज़े पर लेने आती, तो भी न जाता। भूला थोड़े ही हूँ। मेरे बेटे को निर्दयी ने एक नज़र देखा भी न था।’ भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पाकर भी वह बैठा रह गया। अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि साँप की खबर सुनकर वह दौड़कर न गया हो — कैसा भी मौसम हो; लेन-देन का विचार कभी मन में आया ही नहीं।
बुढ़िया सो चुकी थी। बूढ़े का मन भारी हो रहा था; उसे चैन न आ रहा था; ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोई चीज़ खो गई है। बूढ़ा खड़ा हो गया; उसने अपनी लकड़ी उठाई और धीरे से किवाड़ खोले। बुढ़िया जाग पड़ी — ‘कहाँ जाते हो?’ ‘कहीं नहीं, देखता था कि कितनी रात है?’ ‘अभी बहुत रात है, सो जाओ।’ ‘नींद नहीं आती।’ ‘नींद काहे को आएगी? मन तो चड्ढा के घर लगा हुआ है।’ ‘चड्ढा ने हमारे साथ कौन-सी नेकी कर दी है, जो वहाँ जाऊँ। पागल नहीं हूँ कि जो मेरे लिए काँटे बोए, उसके लिए फूल बोता फिरूँ।’ बुढ़िया फिर सो गई। भगत ने किवाड़ लगा दिए और फिर आकर बैठ गया। उसने फिर किवाड़ खोले, इतने धीरे कि बुढ़िया को खबर भी न लगे; बाहर निकल आया। भगत ने आगे पैर बढ़ाया; लाठी खट-खट करता लपका चला जा रहा था। उसके मन में कई बार आया कि न जाए, रुक जाए — लेकिन अंतर्मन उसे आगे ठेल रहा था। इतने में दो आदमी आते दिखाई दिए; दोनों बातें करते चले आ रहे थे — ‘चड्ढा बाबू का घर उजड़ गया, वही तो एक लड़का था।’ भगत के कान में यह आवाज़ पड़ी; उसकी चाल और भी तेज़ हो गई; वह दौड़ने लगा — अपनी उम्र में वह इतना तेज़ कभी न दौड़ा था। इतने में उसे चड्ढा साहब का घर दिखाई दिया। रात के दो बज चुके थे; मेहमान विदा हो चुके थे; सभी रो-रोकर थक चुके थे। सहसा भगत ने द्वार पर पहुँचकर आवाज़ दी। डॉक्टर साहब बाहर आए; देखा, एक बूढ़ा आदमी खड़ा है — कमर झुकी हुई, पोपला मुँह, भौंहें तक सफ़ेद हो गई हैं, लकड़ी के सहारे काँप रहा है। बूढ़े ने कहा — ‘भैया कहाँ हैं? ज़रा मुझे दिखा दीजिए।’ चड्ढा ने कहा — ‘चलो देख लो, मगर तीन-चार घंटे हो गए। जो कुछ होना था, सो हो चुका। बहुतेरे झाड़ने-फूँकने वाले देखकर चले गए।’ डॉक्टर को आशा तो नहीं थी; वे भगत को अंदर ले गए। उसने कैलाश की हालत एक मिनट तक देखी, फिर मुस्कुराकर कहा — ‘अभी कुछ नहीं बिगड़ा है बाबूजी! आप पानी का इंतज़ाम करवाइए।’ लोगों ने पानी भर-भरकर कैलाश को नहलाना शुरू कर दिया। बूढ़ा भगत खड़ा मुस्कुरा-मुस्कुराकर मंत्र पढ़ रहा था; एक बार मंत्र समाप्त हो जाता, तब वह एक जड़ी कैलाश को सुँघा देता। इस तरह न जाने कितने घड़े कैलाश के सिर पर डाले गए और न जाने कितने मंत्र भगत ने फूँके। सुबह होते-होते कैलाश ने लाल-लाल आँखें खोलीं, अँगड़ाई ली और पीने को पानी माँगा। यह देख भगत वहाँ से निकलकर घर की तरफ़ लपका — यहाँ चारों ओर भगत की तलाश होने लगी — और भगत लपका हुआ चला जा रहा था कि बुढ़िया के उठने के पहले घर पहुँच जाए।
जब मेहमान लोग चले गए, तो डॉक्टर साहब ने नारायणी से कहा — ‘बूढ़ा न जाने कहाँ चला गया। एक चिलम तम्बाकू का भी हक़दार न हुआ।’ नारायणी ने कहा — ‘मैंने तो सोचा था इसे कोई बड़ी रकम दूँगी।’ चड्ढा ने कहा — ‘रात को तो मैंने नहीं पहचाना, पर ज़रा साफ़ होने पर पहचान गया। एक बार यह एक मरीज़ को लेकर आया था। मुझे अब याद आता है कि मैं खेल के लिए जा रहा था और मैंने मरीज़ को देखने से इंकार कर दिया था। आज उस दिन की बात याद करके मुझे जितनी ग्लानि हो रही है, उसे प्रकट नहीं कर सकता। मैं उसे अब खोज निकालूँगा और उसके पैरों पर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराऊँगा। वह कुछ लेगा नहीं, यह जानता हूँ। उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए हुआ है। उसकी सज्जनता ने मुझे ऐसा आदर्श दिखा दिया है जो अब से जीवनपर्यंत मेरे सामने रहेगा।’ कहानी का शीर्षक ‘मंत्र’ इसीलिए सार्थक है: भगत के मंत्र ने कैलाश की जान बचाई, पर उससे बड़ा मंत्र भगत की सज्जनता थी — बुराई का जवाब भलाई से देना, बिना किसी लेन-देन की आशा के।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस कहानी से घटना का क्रम सीखो — बूढ़े की प्रार्थना और डॉक्टर का इंकार, बालक की मृत्यु, कई साल बाद कैलाश का साँप-शौक और सालगिरह, दाँत दिखाने की ज़िद और साँप का काटना, भगत का इंकार और फिर मन का बदलना, रात के दो बजे पहुँचना, पानी-मंत्र-जड़ी से इलाज, सुबह कैलाश का होश में आना और डॉक्टर की ग्लानि। शब्दार्थ याद रखो (चिक–बाँस की पतली कमाची से बना पर्दा, औषधालय–दवाखाना, दुहाई–रक्षा के लिए की गई पुकार, सिधार–मर जाना, सालगिरह–वर्षगाँठ, निर्दयी–दया नहीं करने वाला, यश–इज़्ज़त, प्रतिष्ठा, मरज–खराब आदत, रोग) और मुहावरों का प्रयोग तथा ‘अ’ उपसर्ग से विलोम बनाना सीखो।
मुख्य शब्द
- चिक — बाँस की पतली कमाची से बना पर्दा
- औषधालय — दवाखाना
- दुहाई — रक्षा के लिए की गई पुकार
- सिधार — मर जाना, मृत्यु
- सालगिरह — वर्षगाँठ
- निर्दयी — दया नहीं करने वाला
- यश — इज़्ज़त, प्रतिष्ठा
- मरज — खराब आदत, रोग
- भगत — मंत्र-झाड़ने वाला बूढ़ा; भक्त-भाव वाला व्यक्ति (कहानी में बूढ़े का नाम/संबोधन)
- ग्लानि — अपने गलत काम पर शर्म और पछतावा
- सज्जनता — भले आदमी का गुण; बिना स्वार्थ के भलाई करना
याद रखें
- लेखक: प्रेमचंद; कहानी: ‘मंत्र’।
- पहली घटना: संध्या को डॉक्टर चड्ढा टेनिस खेलने जा रहे थे; बूढ़ा डोली में बीमार लड़का लाया — चार दिन से आँखें नहीं खोली थीं; सात लड़कों में यही एक बचा था।
- डॉक्टर का इंकार: ‘कल सवेरे आओ’ — खेलने का समय; पगड़ी उतारकर चौखट पर रखने और ‘एक निगाह’ की प्रार्थना पर भी ध्यान नहीं दिया।
- उसी रात सात साल का बालक सिधार गया; बूढ़े माँ-बाप के जीवन का आधार छिन गया।
- कई साल बाद: कैलाश (कॉलेज छात्र) की बीसवीं सालगिरह; मित्र मृणालिनी; साँप पालने-नचाने का शौक; सपेरे से सीखी विद्या; जड़ी-बूटियों का मरज।
- दाँत दिखाने की ज़िद: काला साँप (सबसे ज़हरीला, काटा तुरंत मारता है, दवा-मंत्र नहीं) की गर्दन दबाकर दाँत दिखाए; गर्दन ढीली होते ही साँप ने अँगुली में काटा; जड़ी पर विश्वास, चीरा नहीं; एक मिनट में आँखें झपकना, होठों पर नीलापन।
- भगत: शहर से कई मील दूर, बुढ़िया के साथ; उपले-लकड़ियाँ, रस्सी बाँटकर बेचना; अस्सी वर्ष के जीवन में साँप की खबर सुनकर दौड़कर न गया हो — ऐसा कभी नहीं हुआ; लेन-देन का विचार कभी नहीं आया।
- भगत का द्वंद्व: पहले इंकार (‘मेरी बला से मरे’, ‘कलेजा ठंडा हो गया’), फिर मन भारी, चैन नहीं, चुपके से निकलना, दौड़कर जाना।
- इलाज: रात के दो बजे पहुँचना; ‘अभी कुछ नहीं बिगड़ा है’ — पानी का इंतज़ाम, नहलाना, मंत्र पढ़ना, जड़ी सुँघाना; सुबह कैलाश ने आँखें खोलीं, अँगड़ाई ली, पानी माँगा।
- भगत बिना कुछ लिए चला गया (एक चिलम तम्बाकू का भी हक़दार न हुआ); डॉक्टर की ग्लानि — पैरों पर गिरकर क्षमा माँगने का निश्चय; ‘उसका जन्म यश की वर्षा करने ही के लिए हुआ है।’
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: बूढ़े को कोई और समझ लेना — पहली घटना का बूढ़ा ही बाद में ‘भगत’ है, जिसने कैलाश का इलाज किया। दूसरी गलती: साँप के काटने का कारण ‘साँप ज़हरीला था’ लिख देना — कारण कैलाश की ज़िद और गर्दन दबाकर दाँत दिखाना था; साँप ने आत्मरक्षा में काटा। तीसरी गलती: भगत के जाने का कारण ‘पैसा’ बताना — वह पहले पैसे के लालच में नहीं गया; बाद में सज्जनता और अंतर्मन के कारण गया, और बिना कुछ लिए लौटा। चौथी गलती: इलाज को केवल ‘मंत्र’ बताना — किताब के अनुसार पानी से नहलाना, मंत्र पढ़ना और जड़ी सुँघाना — तीनों हुए।
सारणी / चार्ट: दो घटनाएँ — एक ही सूत्र
| पक्ष | पहली घटना (बूढ़े का लड़का) | दूसरी घटना (कैलाश) |
|---|---|---|
| रोगी | बूढ़े का सात साल का लड़का (चार दिन से आँखें नहीं खोलीं) | डॉक्टर चड्ढा का लड़का कैलाश (साँप का काटा) |
| मदद माँगी गई | डॉक्टर चड्ढा से — ‘एक निगाह देख लें’ | भगत से — ‘चले जाओ, आदमी बन जाओगे, खूब पैसा मिलेगा’ |
| पहला जवाब | इंकार — ‘कल सवेरे आओ, खेलने का समय है’ | इंकार — ‘मैं नहीं जाता, मेरी बला से मरे’ |
| परिणाम | उसी रात बालक सिधार गया | भगत अंतर्मन से गया, इलाज किया, सुबह कैलाश होश में आया |
| अंतिम भाव | बूढ़े माँ-बाप का आधार छिन गया | डॉक्टर की ग्लानि; भगत की सज्जनता जीवनपर्यंत आदर्श बनी |
अभ्यास — खुद करके देखो
- साँप ने कैलाश को क्यों काटा? साँप के व्यवहार का कारण अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: गर्दन दबाना और आत्मरक्षा — दोनों सोचो। - भगत पहले क्यों नहीं गया और बाद में क्यों गया? उसके मन के द्वंद्व को लिखो।
संकेत: पुरानी चोट और अंतर्मन की पुकार — दोनों सोचो। - डॉक्टर चड्ढा को अंत में ग्लानि क्यों हुई? अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: पुरानी घटना की याद और भगत की सज्जनता — दोनों सोचो। - ‘मंत्र’ शीर्षक का अर्थ लिखो — भगत का मंत्र और सज्जनता का मंत्र, दोनों पक्षों से।
संकेत: इलाज के मंत्र और भलाई के मंत्र में अंतर सोचो। - समाज में गरीबों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए तुम क्या-क्या करना चाहोगे? तीन उपाय लिखो।
संकेत: अपने अनुभव से जोड़कर लिखो।
प्रश्नोत्तर
- कैलाश ने साँप पाल रखे थे; फिर भी साँप ने उसे क्यों काटा?
क्योंकि कैलाश ने साँप के साथ वैसा व्यवहार किया जैसा पहले कभी नहीं किया था — उसने काले साँप की गर्दन ज़ोर से दबाकर उसका मुँह खोल दिया और दाँत दिखाए, ताकि मित्रों का शक दूर हो। साँप ने सोचा कि आज यह मुझे मार डालना चाहता है, इसलिए आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया; गर्दन ढीली पड़ते ही उसने फन उठाकर कैलाश की अँगुली में ज़ोर से काटा। साँप का काटना ज़िद और दुर्व्यवहार का परिणाम था, न कि साँप की आदत का। - डॉक्टर चड्ढा बूढ़े व्यक्ति को क्यों खोज रहे थे?
क्योंकि रात को साफ़ होने पर वे पहचान गए कि इलाज करने वाला बूढ़ा वही व्यक्ति है, जो कभी अपने बीमार लड़के को लेकर आया था और जिसे उन्होंने खेलने के समय कहकर देखने से इंकार कर दिया था। उस दिन की बात याद करके उन्हें जितनी ग्लानि हो रही थी, उसे वे प्रकट नहीं कर सकते थे — इसलिए वे उसे खोज निकालकर उसके पैरों पर गिरकर अपना अपराध क्षमा कराना चाहते थे, हालाँकि वे जानते थे कि वह कुछ लेगा नहीं। - कैलाश को साँप के काटने की खबर सुनकर बूढ़े व्यक्ति को नींद क्यों नहीं आ रही थी?
क्योंकि उसका मन चड्ढा के घर लगा हुआ था। एक ओर पुरानी चोट थी — डॉक्टर ने उसके बेटे को एक नज़र देखा भी नहीं था — और दूसरी ओर उसका जीवन-भर का स्वभाव था कि साँप की खबर सुनकर वह दौड़कर जाता था, बिना लेन-देन का विचार किए। इसी द्वंद्व से उसका मन भारी हो रहा था, उसे चैन नहीं आ रहा था, और ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोई चीज़ खो गई है। - भगत की सज्जनता ने डॉक्टर चड्ढा पर क्या प्रभाव डाला?
भगत ने बिना कुछ लिए, बिना बदले की भावना के, रात के दो बजे आकर कैलाश का इलाज किया और सुबह होने से पहले चुपके से चला गया। इस सज्जनता ने डॉक्टर को ऐसा आदर्श दिखा दिया जो जीवनपर्यंत उनके सामने रहेगा — उन्हें अपनी पुरानी निर्दयता पर ग्लानि हुई और वे भगत के पैरों पर गिरकर क्षमा माँगना चाहते थे। - इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
शिक्षा यह है कि बुराई का जवाब भलाई से देना ही सबसे बड़ा मंत्र है। डॉक्टर की निर्दयता का जवाब भगत ने निर्दयता से नहीं, सज्जनता से दिया — और वही सज्जनता डॉक्टर का हृदय बदल गई। साथ ही यह भी कि किसी की गरीबी या पद देखकर उसकी प्रार्थना ठुकराना गलत है, और ज़िद तथा दिखावे (जैसे दाँत दिखाना) से हानि होती है।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — डॉक्टर के लड़के कैलाश ने साँप पाल रखे थे; फिर भी साँप ने उसे क्यों काटा?
क्योंकि कैलाश ने साँप की गर्दन ज़ोर से दबाकर मुँह खोल दिया और दाँत दिखाए — साँप ने ऐसा व्यवहार पहले कभी नहीं देखा था, उसने समझा कि आज यह मुझे मार डालना चाहता है, इसलिए आत्मरक्षा में उसने अँगुली में काट लिया। - पाठ से 2 — डॉक्टर चड्ढा बूढ़े व्यक्ति को क्यों खोज रहे थे?
पहचान जाने के बाद ग्लानि के कारण — वे उसके पैरों पर गिरकर अपना पुराना अपराध (मरीज़ को देखने से इंकार) क्षमा कराना चाहते थे, हालाँकि जानते थे कि वह कुछ लेगा नहीं। - पाठ से 3 — कैलाश को साँप के काटने की खबर सुनकर बूढ़े व्यक्ति को नींद क्यों नहीं आ रही थी?
मन चड्ढा के घर लगा होने के कारण — पुरानी चोट और जीवन-भर के स्वभाव (साँप की खबर पर दौड़कर जाना, बिना लेन-देन के विचार के) के बीच द्वंद्व से मन भारी था और चैन नहीं आ रहा था। - पाठ से आगे 1 — डॉक्टर द्वारा बूढ़े के लड़के को देखने से इंकार करने पर बूढ़ा व्यक्ति कैसा महसूस कर रहा होगा? अपने शब्दों में लिखिए।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: उसे निराशा, अपमान और असहायता महसूस हुई होगी; सात में से छह बच्चे पहले ही खो चुका था, आखिरी बच्चे की जान का सवाल था, और डॉक्टर की निर्दयता ने उसके मन में गहरी चोट पहुँचाई होगी।) - पाठ से आगे 2 — समाज में गरीबों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए आप क्या-क्या करना चाहेंगे?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: गरीबों के लिए इलाज और शिक्षा की व्यवस्था, काम के अवसर, साफ़ पानी और आवास, और उनके साथ सम्मान का व्यवहार। अपने उपाय कारणों सहित लिखो।) - पाठ से आगे 3 — इस पाठ में आपको किसका चरित्र सबसे अच्छा लगा और क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: भगत का, क्योंकि उसने बदले की भावना छोड़कर बिना स्वार्थ के जान बचाई; या डॉक्टर चड्ढा का पश्चाताप भी अच्छा लगा, क्योंकि गलती मानना भी बड़ा गुण है। पात्र और कारण दोनों लिखो।) - पाठ से आगे 4 — इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
बुराई का जवाब भलाई से देना; गरीब की प्रार्थना ठुकराना गलत है; ज़िद और दिखावे से हानि होती है; गलती मानकर क्षमा माँगना भी सज्जनता है। - व्याकरण 1(क) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘चैन न आना’।
कैलाश की खबर सुनकर भगत को चैन न आया। - व्याकरण 1(ख) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘हवा देना’।
मृणालिनी की ज़िद को कुछ और लोगों ने भी हवा दी। - व्याकरण 1(ग) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘पगड़ी उतारकर रखना’।
बूढ़े ने पगड़ी उतारकर चौखट पर रख दी और रोते हुए प्रार्थना की। (अर्थ: अत्यंत विनती करना, इज़्ज़त दाँव पर लगाकर माँगना।) - व्याकरण 1(घ) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘भूत सवार होना’।
दाँत दिखाने की ज़िद में कैलाश पर भूत सवार था। (अर्थ: किसी बात की धुन में अंधा हो जाना।) - व्याकरण 1(ङ) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘कलेजा ठंडा होना’।
खबर सुनकर भगत ने कहा — ‘कलेजा ठंडा हो गया।’ (अर्थ: बदले की भावना से मन को संतोष मिलना; यहाँ भगत के आरंभिक भाव के रूप में।) - व्याकरण 1(च) — मुहावरे का वाक्य-प्रयोग: ‘सीधे मुँह बात न करना’।
डॉक्टर ने बूढ़े से सीधे मुँह बात तक नहीं की। (अर्थ: ढंग से बात तक न करना, उपेक्षा करना।) - व्याकरण 2(क) — ‘अ’ उपसर्ग लगाकर विलोम: धर्म।
धर्म → अधर्म। - व्याकरण 2(ख) — ‘अ’ उपसर्ग लगाकर विलोम: ज्ञान।
ज्ञान → अज्ञान। - व्याकरण 2(ग) — ‘अ’ उपसर्ग लगाकर विलोम: भाव।
भाव → अभाव। - व्याकरण 2(घ) — ‘अ’ उपसर्ग लगाकर विलोम: सहमत।
सहमत → असहमत। - व्याकरण 2(ङ) — ‘अ’ उपसर्ग लगाकर विलोम: सावधानी।
सावधानी → असावधानी। - कुछ करने को 1 — समाज की कुरीतियों, भेदभावों से संबंधित कहानियों का संकलन कीजिए तथा उनमें से कोई एक कहानी जो आपको अच्छी लगी हो, उसे अपने मित्रों को सुनाइए।
(गतिविधि: कुरीतियों और भेदभाव पर कहानियों का संकलन बनाओ, उनमें से एक अच्छी कहानी चुनकर मित्रों को सुनाओ और उस पर चर्चा करो।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।
महत्वपूर्ण प्रश्न — प्रश्न और उत्तर (Important Questions)
नीचे दिए गए प्रश्न ‘मंत्र’ की समझ की जाँच के लिए हैं — उत्तर पहले बिना देखे लिखें, फिर पृष्ठ से मिलाकर सुधारें।
- ‘मंत्र’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘मंत्र’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके शीर्षक और उसके प्रसंगों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘चिक’ का अर्थ प्रसंग सहित समझाइए।
‘चिक’ का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, बल्कि ‘मंत्र’ के प्रसंग से समझना चाहिए। पहले इसका सामान्य अर्थ लिखें, फिर यह बताएँ कि पाठ में यह किस प्रसंग में आया है और उस प्रसंग में इसका क्या महत्त्व है। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं। - ‘मंत्र’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘मंत्र’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल सार रट लेना, बिना प्रसंग और शब्दार्थ समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘मंत्र’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है। - ‘औषधालय’ जैसे मुख्य शब्दों को लंबे समय तक याद रखने की विधि क्या है?
मुख्य शब्दों को तीन के समूह में बाँटकर पढ़ें — शब्द, अर्थ और प्रसंग। प्रत्येक समूह को एक वाक्य में बाँधकर बोलकर दोहराएँ, फिर बिना देखे लिखें। अगले दिन फिर से बिना देखे लिखकर जाँचें। जो शब्द छूट जाए, उसे फिर से प्रसंग सहित पढ़ें। बोलना, लिखना और अगले दिन दोहराना — यही तीन चरण किसी भी शब्द को स्थायी बनाते हैं। - ‘मंत्र’ को पढ़ने के बाद स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
पहला — इस पाठ का केंद्रीय भाव एक वाक्य में क्या है? दूसरा — मुख्य शब्दों का प्रसंग सहित अर्थ क्या है? तीसरा — इस पाठ की सीख मेरे जीवन में कहाँ काम आएगी? यदि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर बिना पुस्तक देखे दिए जा सकें, तो पाठ तैयार है। यदि कोई उत्तर अटके, तो उसी अंश को दोबारा पढ़ें। - ‘मंत्र’ के उत्तर में मूल पाठ की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि परीक्षक समझ की जाँच करता है, याददाश्त की नकल की नहीं। मूल पंक्तियों की नकल से यह पता नहीं चलता कि विद्यार्थी ने भाव समझा है या नहीं। अपने शब्दों में लिखा गया उत्तर, भले ही सरल हो, यह सिद्ध करता है कि भाव समझ में आ गया है। इसीलिए सार और उत्तर हमेशा अपनी भाषा में लिखें, मुख्य शब्दों को छोड़कर।

