Chapter 5: हार की जीत
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
हार की जीत — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 5 | प्रकार: कहानी | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): अपने घोड़े की सेवा करते बाबा भारती का एक सामान्य चित्र। यह किताब का दृश्य नहीं है।

घोड़ा लौटाता और क्षमा माँगता एक व्यक्ति — हृदय परिवर्तन का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
बाबा भारती गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते थे और भगवान का भजन करते थे। भगवत् भजन से जो समय बचता, वह अपने घोड़े को अर्पण हो जाता। यह घोड़ा बड़ा सुंदर और बड़ा बलवान था; इसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में नहीं था। बाबा उसे ‘सुलतान’ कहकर पुकारते थे — अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने अपना सब कुछ छोड़ दिया था, पर सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे — कहते थे कि सुलतान ऐसे चलता है, जैसे घनघटा को देखकर मोर नाचता हो। जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर वे न लगा लेते, तब तक उन्हें चैन न आता। माँ को अपने बेटे, किसान को अपने लहलहाते खेत, गुरु को अपने शिष्य और साहूकार को अपने देनदार को देखकर जो आनंद होता है, वही आनंद बाबा को अपने घोड़े को देखकर होता था।
खड्गसिंह उस इलाके का कुख्यात डाकू था; लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची, और उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। एक दिन दोपहर के समय वह बाबा के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। सुलतान की चाह उसे खींच लाई थी। बाबा और डाकू अस्तबल में गए — बाबा ने घोड़ा दिखाया गर्व से, और खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सहस्रों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से आज तक न गुजरा था। वह सोचने लगा कि भाग्य की बात है — ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए; इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या मतलब। फिर वह बालकों की तरह अधीरता से बोला कि जब तक इसकी चाल न देखी, तो क्या देखा। बाबा मनुष्य ही थे — अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनकर उनका हृदय फूला न समाया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए, उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे, और एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से दौड़ने लगा। उसकी चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया — वह डाकू था, और जो वस्तु उसे पसंद आ जाती, वह उस पर अपना अधिकार समझता था। जाते-जाते वह बाबा से बोला कि वह यह घोड़ा उनके पास नहीं रहने देगा।
बाबा घबरा गए। अब उन्हें रात में नींद नहीं आती थी; सारी रात वे अस्तबल की रखवाली करते, और प्रतिक्षण उन्हें खड्गसिंह का भय लगा रहता। कई मास बीत गए, किंतु वह नहीं आया — यहाँ तक कि बाबा कुछ लापरवाह हो गए और इस भय को स्वप्न के भय के समान मिथ्या समझने लगे। एक दिन संध्या का समय था; बाबा सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे, आँखों में चमक और मुख पर प्रसन्नता लिए। अचानक एक ओर से करुण आवाज़ आई — ‘ओ बाबा, इस कंगले की बात भी सुनते जाना।’ एक अपाहिज वृक्ष की छाया में कराह रहा था। उसने कहा कि वह दुखियारा है, रामावाला यहाँ से तीन मील की दूरी पर है, उसे वहाँ जाना है — घोड़े पर चढ़ा लें, परमात्मा भला करेगा। वहाँ दुर्गादत्त वैद्य का नाम पूछने पर उसने कहा कि वह उनका सौतेला भाई है। बाबा घोड़े से उतरकर उसे घोड़े पर बैठा लिया और स्वयं लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। अचानक झटका लगा और लगाम उनके हाथ से छूट गई — अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठ गया और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा था। वह अपाहिज खड्गसिंह था।
बाबा कुछ देर चुप रहे, फिर निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर कहा — ‘ज़रा ठहर जाओ।’ खड्गसिंह बोला कि अब यह घोड़ा न देगा। बाबा बोले कि वे एक प्रार्थना करते हैं, अस्वीकार न करना, नहीं तो उनका दिल टूट जाएगा — और प्रार्थना यही थी कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया; उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर भागना पड़ेगा, परंतु बाबा ने स्वयं उससे यही कहा। बाबा ने कारण बताया: लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया, तो वे किसी अपाहिज पर विश्वास न करेंगे। यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से मुँह मोड़ लिया, जैसे उससे कोई संबंध ही न हो, और चले गए — परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में गूँज रहे थे।
रात्रि के अंधकार में खड्गसिंह बाबा के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था, आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, गाँव में कुत्ते भौंक रहे थे। वह सुलतान की लगाम पकड़े हुए था; धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा — फाटक खुला हुआ था। किसी समय वहाँ बाबा स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी अथवा डाके का भय न था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर फाटक बंद कर दिया; इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे। रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था; चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा ने कुटिया से बाहर निकलकर ठंडे जल से स्नान किया, और फिर जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई, और घोर निराशा ने पाँवों को मन भर का बना दिया — वे वहीं रुक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे, मानो कोई पिता बहुत दिनों के बिछुड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो — बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। फिर वे संतोष से बोले — ‘अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।’ यही कहानी का शीर्षक ‘हार की जीत’ है: बाबा की हार (घोड़ा छिन जाना) वास्तव में जीत बन गई — खड्गसिंह का हृदय बदल गया, और अपाहिजों पर लोगों का विश्वास भी बच गया।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस कहानी से घटना का क्रम सीखो — बाबा का सुलतान-प्रेम, खड्गसिंह का आना, चाल देखने की बात, अपाहिज का छल, ‘घटना प्रकट न करना’ वाली प्रार्थना, रात में घोड़े की वापसी और बाबा का संतोष-वाक्य। शब्दार्थ याद रखो (देनदार–कर्जदार, असह्य–असहनीय, छवि–शोभा, अंकित–लिखा हुआ, बाँका–अनोखा एवं सुंदर, करुणा–दया, विस्मय–आश्चर्य, प्रयोजन–मतलब), संज्ञा के पाँच भेद पहचानना सीखो और मुहावरों (लट्टू होना, फूले न समाना, हृदय पर साँप लोटना, मुँह मोड़ लेना) के अर्थ समझो।
मुख्य शब्द
- देनदार — कर्जदार; जिससे रुपया लेना हो
- असह्य — असहनीय; जो सहा न जा सके
- छवि — शोभा, सुंदरता
- अंकित — लिखा हुआ; मन पर छपा हुआ
- बाँका — अनोखा एवं सुंदर
- करुणा — दया
- विस्मय — आश्चर्य
- प्रयोजन — मतलब, उपयोग
- कुख्यात — बुरे कामों के लिए प्रसिद्ध
- पश्चाताप — अपने गलत काम पर पछतावा
- अपाहिज — अंगों से असमर्थ व्यक्ति; चलने-फिरने में असमर्थ
याद रखें
- बाबा भारती: गाँव से बाहर छोटे मंदिर में रहते, भगवान का भजन करते; घोड़ा ‘सुलतान’ — सुंदर, बलवान, इलाके में जोड़ नहीं।
- सुलतान से प्रेम: हाथ से खरहरा, खुद दाना, संध्या को आठ-दस मील का चक्कर; चाल पर लट्टू — जैसे घनघटा देखकर मोर नाचता हो।
- खड्गसिंह: इलाके का कुख्यात डाकू; सुलतान की कीर्ति सुनकर अधीर; अस्तबल में घोड़ा देखकर सोचा — ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए।
- चाल देखने की बात पर बाबा फूले न समाए; घोड़ा वायु-वेग से दौड़ा; खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया; जाते-जाते बोला — घोड़ा आपके पास नहीं रहने दूँगा।
- कई मास बाद संध्या को अपाहिज का छल: रामावाला तीन मील दूर, दुर्गादत्त वैद्य का सौतेला भाई होने का दावा; लगाम छूटते ही अपाहिज तनकर बैठा और घोड़ा दौड़ा ले गया — वह खड्गसिंह था।
- बाबा की प्रार्थना: घटना को किसी के सामने प्रकट न करना — नहीं तो लोग किसी अपाहिज पर विश्वास न करेंगे।
- रात में खड्गसिंह ने सुलतान को अस्तबल में बाँध दिया; आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
- चौथे पहर बाबा ने घोड़े की हिनहिनाहट सुनी, गले से लिपटकर रोए (जैसे पिता बिछुड़े पुत्र से मिले) और बोले — ‘अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।’
- लेखक: सुदर्शन। शीर्षक का अर्थ: हार (घोड़ा छिनना) ही जीत बनी — हृदय-परिवर्तन और विश्वास की रक्षा।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: अपाहिज को सचमुच का अपाहिज लिख देना — वह खड्गसिंह का छल था। दूसरी गलती: बाबा की प्रार्थना का कारण गलत लिखना — कारण घोड़ा वापस पाना नहीं, बल्कि यह था कि लोग किसी अपाहिज पर विश्वास करना न छोड़ दें। तीसरी गलती: घोड़े की वापसी को बाबा की चाल समझ लेना — घोड़ा खड्गसिंह ने स्वयं रात में वापस बाँधा, पश्चाताप के आँसुओं के साथ। चौथी गलती: संज्ञा-भेद में सुलतान को जातिवाचक लिखना — सुलतान किसी विशेष घोड़े का नाम है, इसलिए व्यक्तिवाचक है।
सारणी / चार्ट: कहानी की घटनाएँ क्रम से
| क्रम | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| 1 | बाबा का सुलतान-प्रेम (खरहरा, दाना, संध्या का चक्कर) | सुलतान की कीर्ति इलाके में फैली |
| 2 | खड्गसिंह का आना और घोड़ा देखना | ईर्ष्या — ‘ऐसा घोड़ा मेरे पास होना चाहिए’ |
| 3 | चाल देखने की बात; बाबा का सवार होकर दौड़ाना | खड्गसिंह ने घोड़ा न रहने देने की धमकी दी |
| 4 | कई मास का भय, फिर लापरवाही | संध्या को अपाहिज का छल सफल हुआ |
| 5 | बाबा की प्रार्थना — घटना प्रकट न करना | खड्गसिंह आश्चर्यचकित; शब्द कानों में गूँजते रहे |
| 6 | रात में घोड़े की वापसी (पश्चाताप के आँसू) | बाबा का संतोष — ‘अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा’ |
अभ्यास — खुद करके देखो
- बाबा सुलतान से कैसा स्नेह करते थे? तीन उदाहरण लिखो।
संकेत: खरहरा, दाना और संध्या का चक्कर — तीनों सोचो। - बाबा की प्रार्थना ने खड्गसिंह के मन पर क्या असर डाला?
संकेत: ‘प्रकट न करना’ वाली बात और विश्वास की रक्षा के बारे में सोचो। - ‘हार की जीत’ शीर्षक का अर्थ अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: क्या हारा गया और क्या जीता गया — दोनों सोचो। - अपाहिज पर विश्वास न करने का खतरा क्या था? बाबा ने उसे कैसे बचाया?
संकेत: एक छल से सभी अपाहिजों पर अविश्वास का डर सोचो। - तुम्हारी प्रिय वस्तु कोई छीनने का प्रयास करे, तो तुम क्या करोगे? दो उपाय लिखो।
संकेत: अपने अनुभव से जोड़कर लिखो; झगड़ा और समझदारी में अंतर सोचो।
प्रश्नोत्तर
- बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से किस प्रकार स्नेह करते थे?
बाबा अपने हाथ से सुलतान का खरहरा करते थे, खुद दाना खिलाते थे और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। भगवत् भजन से बचा समय वे घोड़े को अर्पण कर देते थे, और संध्या समय उस पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर लगाए बिना उन्हें चैन नहीं आता था। - खड्गसिंह सुलतान को देखने के लिए क्यों अधीर हो उठा?
क्योंकि सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक पहुँची थी — वह बड़ा सुंदर और बलवान घोड़ा था, जिसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में नहीं था। इसी प्रशंसा ने उसके हृदय को घोड़ा देखने के लिए अधीर कर दिया। - घोड़ा देखने के बाद खड्गसिंह के मन में क्या उथल-पुथल होने लगी?
घोड़ा देखकर वह आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा; फिर उसके हृदय में हलचल होने लगी — उसने सोचा कि ऐसा बाँका घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए, इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या मतलब। चाल देखने पर उसके हृदय पर साँप लोट गया, अर्थात् उसे ईर्ष्या हुई, और उसने घोड़ा छीनने का निश्चय कर लिया। - बाबा की प्रार्थना क्या थी और उसका क्या परिणाम हुआ?
बाबा की प्रार्थना थी कि खड्गसिंह इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करे, नहीं तो उनका दिल टूट जाएगा — क्योंकि तब लोग किसी अपाहिज पर विश्वास न करेंगे। परिणाम यह हुआ कि खड्गसिंह के कानों में बाबा के शब्द गूँजते रहे, उसे पश्चाताप हुआ, और उसने रात में सुलतान को चुपके से अस्तबल में वापस बाँध दिया। - ‘हार की जीत’ शीर्षक का क्या अर्थ है?
बाहर से देखें तो बाबा हार गए — उनका घोड़ा छिन गया। परंतु वास्तव में यही हार जीत बन गई: खड्गसिंह का हृदय बदल गया और उसने घोड़ा लौटा दिया, और अपाहिजों पर लोगों का विश्वास भी बच गया। इसीलिए कहानी का नाम ‘हार की जीत’ है।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से किस प्रकार स्नेह करते थे?
अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते, देख-देखकर प्रसन्न होते; भजन से बचा समय घोड़े को देते; संध्या को आठ-दस मील का चक्कर लगाए बिना चैन न आता; उसकी चाल पर लट्टू थे — जैसे घनघटा देखकर मोर नाचता हो। - पाठ से 2 — बाबा भारती के घोड़े को देखने के लिए खड्गसिंह क्यों अधीर हो उठा?
सुलतान की कीर्ति — सुंदरता और बल — उसके कानों तक पहुँची थी; ऐसा बाँका घोड़ा उसने कभी नहीं देखा था, इसलिए उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। - पाठ से 3 — घोड़ा देखने के बाद खड्गसिंह के दिमाग में क्या उथल-पुथल होने लगी?
पहले आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा; फिर हलचल हुई — ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए, साधु को ऐसी चीज़ों से क्या मतलब; चाल देखकर हृदय पर साँप लोट गया और उसने घोड़ा छीनने का निश्चय कर लिया। - पाठ से 4 — खड्गसिंह ने बाबा भारती के घोड़े को पाने के लिए किस प्रकार का रूप बदला?
उसने अपाहिज का रूप धारण किया — वृक्ष की छाया में कराहता हुआ दुखियारा बनकर, रामावाला जाने और दुर्गादत्त वैद्य का सौतेला भाई होने की बात कहकर बाबा की दया पाई, और लगाम छूटते ही घोड़ा दौड़ा ले गया। - पाठ से 5 — पाठ के किन वाक्यों से पता चलता है कि बाबा भारती को अपने घोड़े पर गर्व था?
‘बाबा ने घोड़ा दिखाया गर्व से’ — यह वाक्य सीधे बताता है। इसके अलावा: अपनी वस्तु की प्रशंसा सुनकर उनका हृदय फूला न समाया; वे घोड़े के शरीर और रंग को देखकर मन-ही-मन फूले न समाते थे; संध्या को घोड़े पर सवार होकर घूमने में उनकी आँखों में चमक और मुख पर प्रसन्नता थी। - पाठ से 6(क) — सही/गलत: ‘बाबा भारती का घोड़ा कमज़ोर एवं दुर्बल था।’
गलत — घोड़ा बड़ा सुंदर और बड़ा बलवान था; उसके जोड़ का घोड़ा इलाके में नहीं था। - पाठ से 6(ख) — सही/गलत: ‘घोड़े का नाम सुलतान था।’
सही — बाबा उसे ‘सुलतान’ कहकर पुकारते थे। - पाठ से 6(ग) — सही/गलत: ‘खड्गसिंह को बाबा भारती का घोड़ा पसंद था।’
सही — घोड़ा देखकर वह आश्चर्यचकित हुआ और उसने सोचा कि ऐसा घोड़ा उसके पास होना चाहिए। - पाठ से 6(घ) — सही/गलत: ‘बाबा भारती ने सुलतान से बिछुड़ने पर प्रसन्नता व्यक्त की।’
गलत — सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी; वापसी पर वे गले से लिपटकर रोए। - पाठ से 6(ङ) — सही/गलत: ‘खड्गसिंह ने चुपके से घोड़े को अस्तबल में बाँध दिया।’
सही — रात के अंधकार में उसने सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और फाटक बंद कर दिया, आँखों में पश्चाताप के आँसू लिए। - पाठ से आगे 1 — ‘लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया, तो वे किसी अपाहिज पर विश्वास न करेंगे।’ बाबा भारती के इस वक्तव्य का क्या अभिप्राय है?
अभिप्राय यह है कि एक व्यक्ति के छल की खबर फैलने से सभी अपाहिजों और दुखियारों पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा, और फिर कोई भी सच्चे ज़रूरतमंद की सहायता नहीं करेगा। बाबा अपने घोड़े से ज़्यादा इस विश्वास की रक्षा को महत्त्व देते थे — इसीलिए उन्होंने घटना छिपाने की प्रार्थना की। - पाठ से आगे 2 — खड्गसिंह ने चुपके से रात में सुलतान को वापस अस्तबल में बाँध दिया; ऐसा उसने क्यों किया?
क्योंकि बाबा के शब्द — घटना प्रकट न करने की प्रार्थना और अपाहिजों पर विश्वास की चिंता — उसके कानों में गूँज रहे थे। उसे अपने छल और डकैती पर पश्चाताप हुआ; वह घोड़ा रखना नहीं चाहता था, पर सामने आकर लौटाने की हिम्मत भी नहीं थी, इसलिए चुपके से रात में घोड़ा बाँधकर चला गया। - पाठ से आगे 3 — बाबा भारती के किस व्यवहार से खड्गसिंह के सोच में परिवर्तन हुआ?
बाबा के निस्वार्थ व्यवहार से — घोड़ा छिन जाने पर भी उन्होंने बदला या शिकायत नहीं माँगी, बल्कि केवल यही प्रार्थना की कि घटना किसी को न बताई जाए, ताकि अपाहिजों पर विश्वास बना रहे। घोड़े से मुँह मोड़ लेने का उनका त्याग और दूसरों के हित की चिंता ही खड्गसिंह के हृदय को बदल गई। - पाठ से आगे 4 — आपकी प्रिय वस्तु कोई छीनने का प्रयास करे, तो आप क्या करेंगे?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: शांति से बात करूँगा, बड़ों/शिक्षक से मदद लूँगा, शिकायत करूँगा, पर मार-पीट नहीं करूँगा। अपना उपाय और कारण लिखो।) - पाठ से आगे 5 — अगर आपको बाबा भारती से घोड़ा लेना होता, तो आप क्या करते?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: बाबा से विनती करता, कीमत देता, या घोड़े की देखभाल का वादा करता — छल से कभी नहीं लेता।) - पाठ से आगे 6 — कहानी का कोई दूसरा शीर्षक क्या हो सकता है?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: ‘सुलतान की वापसी’, ‘बाबा की प्रार्थना’ या ‘पश्चाताप’ — और बताओ कि तुम्हारा शीर्षक कहानी के किस पक्ष को दिखाता है।) - व्याकरण 1 — संज्ञा के पाँच भेद (किताब के उदाहरणों से)।
किताब के वाक्यों में रेखांकित शब्द क्रमशः हैं: जातिवाचक (जैसे किसान/खेतों की जाति का बोध), व्यक्तिवाचक (जैसे खड्गसिंह — विशेष व्यक्ति), भाववाचक (जैसे प्रसन्नता — भाव), द्रव्यवाचक (जैसे जल — द्रव्य), समूहवाचक (जैसे भीड़ — समूह)। इस प्रकार संज्ञा के पाँच भेद हैं: जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, भाववाचक, द्रव्यवाचक, समूहवाचक। - व्याकरण 1(क) — ‘वह ईमानदारीपूर्वक काम करता है।’ में संज्ञा का भेद बताइए।
भाववाचक — ‘ईमानदारी’ एक भाव/गुण का बोध कराती है। - व्याकरण 1(ख) — ‘सुलतान बड़ा सुंदर और बलवान था।’ में संज्ञा का भेद बताइए।
व्यक्तिवाचक — ‘सुलतान’ किसी विशेष घोड़े का नाम है। - व्याकरण 1(ग) — ‘कार्तिक पूर्णिमा के दिन सोनपुर में मेला लगता है।’ में संज्ञा का भेद बताइए।
समूहवाचक — ‘मेला’ लोगों के समूह का बोध कराता है। (नोट: ‘सोनपुर’ व्यक्तिवाचक भी है; यहाँ मेले को समूहवाचक के उदाहरण के रूप में लिया गया है — मोटा शब्द स्कैन में चिह्नित नहीं दिखता, शिक्षक से मिलान करके पक्का करो।) - व्याकरण 1(घ) — ‘दूध स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।’ में संज्ञा का भेद बताइए।
द्रव्यवाचक — ‘दूध’ एक द्रव्य/पदार्थ है। - व्याकरण 1(ङ) — ‘बस घाटी से होकर गुजरती है।’ में संज्ञा का भेद बताइए।
जातिवाचक — ‘बस’ वाहनों की एक जाति का बोध कराती है। (नोट: मोटा शब्द स्कैन में चिह्नित नहीं दिखता; ‘घाटी’ भी जातिवाचक है — शिक्षक से मिलान करके पक्का करो।) - व्याकरण 2(क) — ‘पश्चात्’ से वाक्य बनाइए।
बाबा भारती कुछ देर चुप रहे; पश्चात् उन्होंने निश्चय करके कहा — ‘ज़रा ठहर जाओ।’ - व्याकरण 2(ख) — ‘महात्मा’ से वाक्य बनाइए।
बाबा भारती महात्मा की तरह निस्वार्थ थे; उन्होंने अपने घोड़े से ज़्यादा दूसरों के विश्वास की चिंता की। - व्याकरण 2(ग) — ‘निश्चय’ से वाक्य बनाइए।
बाबा ने निश्चय करके पूरे बल से कहा कि खड्गसिंह उनकी एक प्रार्थना सुने। - व्याकरण 2(घ) — ‘प्रशंसा’ से वाक्य बनाइए।
अपनी वस्तु की प्रशंसा सुनकर बाबा का हृदय फूला न समाया। - व्याकरण 2(ङ) — ‘अपाहिज’ से वाक्य बनाइए।
अपाहिज बनकर खड्गसिंह ने बाबा की दया का गलत लाभ उठाया। - व्याकरण 2(च) — ‘स्वीकार’ से वाक्य बनाइए।
खड्गसिंह ने बाबा की प्रार्थना स्वीकार की और घटना किसी को नहीं बताई — बल्कि घोड़ा लौटा दिया। - व्याकरण 3 — इस पाठ में घोड़े की विशेषता से संबंधित शब्द चुनकर लिखिए।
सुंदर, बलवान, बाँका (अनोखा एवं सुंदर), वायु-वेग से दौड़ने वाला, चाल से मन मोह लेने वाला, छवि हृदय पर अंकित कर देने वाला, लहलहाते खेत जैसा आनंद देने वाला (तुलना के रूप में)। - व्याकरण 4(क) — मुहावरे का अर्थ: ‘लट्टू होना’।
किसी पर मोहित हो जाना; बहुत पसंद आ जाना — जैसे बाबा सुलतान की चाल पर लट्टू थे। - व्याकरण 4(ख) — मुहावरे का अर्थ: ‘फूले न समाना’।
बहुत प्रसन्न होना; खुशी से मन का भर जाना — जैसे प्रशंसा सुनकर बाबा का हृदय फूला न समाया। - व्याकरण 4(ग) — मुहावरे का अर्थ: ‘हृदय पर साँप लोटना’।
ईर्ष्या या जलन होना — जैसे सुलतान की चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। - व्याकरण 4(घ) — मुहावरे का अर्थ: ‘मुँह मोड़ लेना’।
ध्यान हटा लेना; संबंध तोड़ने का भाव दिखाना — जैसे बाबा ने सुलतान की ओर से मुँह मोड़ लिया, मानो उससे कोई संबंध ही न हो। - कुछ करने को 1 — आपके आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति है जो अपने व्यवहार से आपको प्रभावित करता है; उसका पता कीजिए और उसकी दिनचर्या लिखिए।
(गतिविधि: ऐसे व्यक्ति को पहचानो, उससे बात करो और उसकी दिनचर्या — उठना, काम, दूसरों की मदद — लिखकर कक्षा में सुनाओ।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

