Chapter 4: हॉकी का जादूगर
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
हॉकी का जादूगर — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 4 | प्रकार: संस्मरण | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): मैदान पर हॉकी खेलता एक खिलाड़ी। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

मैदान पर टीम भावना से हॉकी खेलते बच्चे — खेल का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
यह पाठ मेजर ध्यानचंद का संस्मरण है — अपने जीवन की एक घटना की याद। खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक होती ही रहती है; जिन दिनों वे खेला करते थे, उन दिनों भी यही होता था। सन् 1933 की बात है: वे पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करते थे। एक दिन पंजाब रेजिमेंट और सैपर्स एंड माइनर्स टीम के बीच मुकाबला हो रहा था। माइनर्स टीम के खिलाड़ी उनसे गेंद छीनने की कोशिश करते, पर हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक उनके सिर पर दे मारी, और उन्हें मैदान से बाहर ले जाया गया।
थोड़ी देर बाद वे पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आ पहुँचे। आते ही उन्होंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा — ‘तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।’ यह सुनकर वह खिलाड़ी घबरा गया और हर समय यही देखता रहता कि कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक पड़ने वाली है। ध्यानचंद ने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल खत्म होने के बाद उन्होंने फिर उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा — ‘दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते, तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।’ वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। ध्यानचंद कहते हैं कि बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी — और यही उनके बदला लेने का ढंग था: गुस्से का जवाब खेल से देना, मार का जवाब मार से नहीं।
आगे ध्यानचंद अपने जीवन का परिचय देते हैं। आज जहाँ भी जाते हैं, बच्चे और बूढ़े उन्हें घेर लेते हैं और सफलता का राज जानना चाहते हैं। उनके पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र नहीं है — वे हर किसी से यही कहते हैं कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं। किताब के अनुसार उनका जन्म सन् 1904 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ; बाद में वे झाँसी आकर बस गए। 16 साल की उम्र में वे ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए। उनकी रेजिमेंट का हॉकी में काफी नाम था, पर खेल में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे, जो बार-बार उन्हें हॉकी खेलने के लिए कहते थे। छावनी में हॉकी खेलने का कोई निश्चित समय नहीं था — सैनिक जब चाहे मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय वे एक नौसिखिया खिलाड़ी थे। जैसे-जैसे उनके खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे उन्हें तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में उन्हें कप्तान बनाया गया; उस समय वे सेना में लांस नायक थे। बर्लिन ओलंपिक में लोग उनके खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल वे ही करते थे — उनकी हमेशा यह कोशिश रहती थी कि गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दें, ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण उन्होंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया, और बर्लिन ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय वे हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि हार या जीत उनकी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस संस्मरण से घटना का क्रम सीखो — 1933 का मुकाबला, सिर पर स्टिक, पट्टी बाँधकर वापसी, छह गोल, ‘दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं’ वाला अंत — और ध्यानचंद के जीवन के तथ्य (किताब के अनुसार 1904 प्रयाग, झाँसी, 16 साल में सिपाही, 1936 बर्लिन कप्तान, लांस नायक, स्वर्ण पदक, ‘हॉकी का जादूगर’)। सफलता के तीन मंत्र (लगन, साधना, खेल भावना) और सर्वनाम के छह भेद भी याद रखो।
मुख्य शब्द
- संस्मरण — अपने जीवन की बीती घटना की लिखित याद
- टीम — दल; एक साथ खेलने वालों का समूह
- छावनी — सैनिकों का विश्राम स्थल; सेना का ठिकाना
- निखार — चमक; खेल में आया सुधार और सुंदरता
- नौसिखिया — नया सीखने वाला; अभी सीख रहा खिलाड़ी
- साधना — लगातार लगन से किया गया अभ्यास
- खेल भावना — खेल में ईमानदारी, अनुशासन और साथियों के प्रति आदर का भाव
- सर्वनाम — संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किया जाने वाला शब्द (जैसे मैं, तुम, वह)
- लांस नायक — सेना का एक पद (किताब के अनुसार 1936 में ध्यानचंद का पद)
याद रखें
- 1933: पंजाब रेजिमेंट बनाम सैपर्स एंड माइनर्स का मुकाबला; गुस्से में एक खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मारी।
- पट्टी बाँधकर वापसी; ‘बदला ज़रूर लूँगा’ कहकर खिलाड़ी को घबरा देना; फिर एक के बाद एक छह गोल।
- अंत में: ‘दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है — नहीं मारते तो दो ही गोल से हराता।’ खिलाड़ी शर्मिंदा हुआ।
- सफलता का राज (कोई गुरु-मंत्र नहीं): लगन, साधना और खेल भावना।
- किताब के अनुसार जन्म: सन् 1904, प्रयाग, साधारण परिवार; बाद में झाँसी में बसे।
- 16 साल की उम्र में ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में साधारण सिपाही के रूप में भर्ती; सूबेदार मेजर तिवारी बार-बार हॉकी खेलने को कहते थे।
- 1936 बर्लिन ओलंपिक में कप्तान (तब लांस नायक); खेल से प्रभावित होकर लोग ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे; स्वर्ण पदक मिला।
- ध्यानचंद की कोशिश: गेंद गोल के पास ले जाकर साथी को देना, ताकि गोल का श्रेय साथी को मिले।
- सिद्धांत: हार या जीत मेरी नहीं, पूरे देश की है।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: छह गोल और दो गोल को मिला देना — ध्यानचंद ने छह गोल किए; ‘दो गोल’ वह संख्या है जिससे वे बिना मार खाए भी हराते। दूसरी गलती: बदले को मार का बदला मार से समझ लेना — उनका बदला खेल से था, स्टिक से नहीं। तीसरी गलती: जन्म-वर्ष और उम्र गलत लिखना — किताब के अनुसार जन्म 1904, प्रयाग और भर्ती की उम्र 16 साल है (OCR में 16 का ‘1’ छूट गया था; रेंडर किए गए पृष्ठ से पुष्ट)। परीक्षा में किताब का ही तथ्य लिखो। चौथी गलती: ‘हॉकी का जादूगर’ कहलाने का कारण केवल गोल करना बताना — कारण उनकी खेल भावना भी थी (साथी को श्रेय देना)।
सारणी / चार्ट: ध्यानचंद की सफलता के कारण
| कारण | पाठ में उदाहरण |
|---|---|
| लगन | नौसिखिया होने पर भी छावनी में जब चाहे अभ्यास; खेल में धीरे-धीरे निखार |
| साधना | लगातार अभ्यास से तरक्की; 1936 में बर्लिन ओलंपिक के कप्तान बने |
| खेल भावना | गुस्से का जवाब खेल से दिया; गोल का श्रेय साथी को देने की कोशिश; हार-जीत देश की मानी |
| साथियों का आदर | गेंद गोल के पास ले जाकर साथी को देना; दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीतना |
| धैर्य | सिर पर स्टिक लगने पर भी पट्टी बाँधकर मैदान में वापसी |
अभ्यास — खुद करके देखो
- ध्यानचंद ने बदला किस प्रकार लिया? मार और खेल के बदले में अंतर लिखो।
संकेत: छह गोल और ‘दोस्त’ वाले वाक्य को याद करो। - सफलता के तीन मंत्र कौन-से हैं? अपने खेल/पढ़ाई में उन्हें कैसे लागू करोगे?
संकेत: लगन, साधना, खेल भावना — तीनों के अपने उदाहरण सोचो। - ‘हार या जीत मेरी नहीं, पूरे देश की है’ — इस वाक्य का भाव लिखो।
संकेत: टीम और देश के बारे में सोचो, केवल अपने बारे में नहीं। - सर्वनाम किसे कहते हैं? पाठ के दो उदाहरण लिखो।
संकेत: मैं, तुम, वह, इसका — संज्ञा की जगह आने वाले शब्द। - अपने जीवन का कोई संस्मरण चार-पाँच वाक्यों में लिखो।
संकेत: घटना, तुम्हारी भावना और उससे मिली सीख — तीनों लिखो।
प्रश्नोत्तर
- ध्यानचंद किस खेल से संबंध रखते हैं?
ध्यानचंद हॉकी से संबंध रखते हैं। वे भारत के प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी थे, जिन्हें बर्लिन ओलंपिक में उनके खेल से प्रभावित होकर ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा। - दूसरी टीम के खिलाड़ी ने ध्यानचंद को हॉकी स्टिक मारी; इसका बदला उन्होंने किस प्रकार लिया?
उन्होंने मार का जवाब मार से नहीं दिया। पट्टी बाँधकर मैदान में लौटे, खिलाड़ी से कहा कि बदला ज़रूर लेंगे — जिससे वह घबरा गया — और फिर एक के बाद एक छह गोल कर दिए। खेल के बाद उन्होंने कहा कि उन्होंने अपना बदला ले ही लिया है; अगर वह खिलाड़ी उन्हें स्टिक नहीं मारता, तो शायद वे उसे दो ही गोल से हराते। - ध्यानचंद ने अपनी सफलता का राज क्या बताया है?
उनके पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र नहीं है। वे कहते हैं कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं। - ‘दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं’ — ऐसा ध्यानचंद ने क्यों कहा?
क्योंकि खेल में गुस्सा करने से खेल बिगड़ता है और खिलाड़ी का अपना ही नुकसान होता है। गुस्से में स्टिक मारने वाले खिलाड़ी को उन्होंने खेल से हराकर और फिर दोस्त कहकर समझाया कि खेल भावना से खेलना ही सही तरीका है — गुस्सा खेल का हिस्सा नहीं होना चाहिए। - ध्यानचंद को कब से ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा?
सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक से, जब वे कप्तान थे। वहाँ लोग उनके हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू कर दिया।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — ध्यानचंद किस खेल से संबंध रखते हैं?
हॉकी से। वे हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी थे और ‘हॉकी का जादूगर’ कहलाए। - पाठ से 2 — दूसरी टीम के खिलाड़ी ने ध्यानचंद को हॉकी स्टिक मारी; इसका बदला उन्होंने किस प्रकार लिया?
पट्टी बाँधकर मैदान में लौटकर, खिलाड़ी को ‘बदला ज़रूर लूँगा’ कहकर घबरा देकर, और फिर छह गोल करके। अंत में दोस्त कहकर समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। - पाठ से 3 — ध्यानचंद ने अपनी सफलता का राज क्या बताया है?
लगन, साधना और खेल भावना — यही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं; कोई अलग गुरु-मंत्र उनके पास नहीं है। - पाठ से 4 — ‘दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं’ — ऐसा ध्यानचंद ने क्यों कहा?
क्योंकि गुस्सा खेल की भावना के विरुद्ध है। गुस्से में किया गया बुरा काम खिलाड़ी को शर्मिंदा करता है और खेल को बिगाड़ता है; सही बदला खेल से दिया जाता है, मार से नहीं। - पाठ से 5 — ध्यानचंद को कब से ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा?
सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक से, जब वे कप्तान थे और लोग उनके खेलने के ढंग से बहुत प्रभावित हुए। - पाठ से आगे 1 — अगर ध्यानचंद हॉकी नहीं खेलते, तो वे क्या कर रहे होते?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: सेना में सिपाही के रूप में ही रहते और कोई और काम करते; पर उनकी लगन किसी भी काम में उन्हें आगे ले जाती। अपना मत कारण सहित लिखो।) - पाठ से आगे 2 — ध्यानचंद की जगह अगर आप होते, तो अपना बदला किस प्रकार लेते?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: मैं भी खेल से ही जवाब देता, शिकायत करता, या शांति से समझाता। अपना तरीका और उसका कारण लिखो।) - पाठ से आगे 3 — खेलते समय नोंक-झोंक क्यों हो जाती है?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: जीतने की चाह, हार का डर, थकान, किसी के गलत खेलने पर गुस्सा, या नियमों पर मतभेद — इनसे मैदान में नोंक-झोंक हो जाती है, पर खेल भावना से उसे सुलझाना चाहिए।) - पाठ से आगे 4 — विजेता बनने के लिए मनुष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: लगन, साधना, खेल भावना, धैर्य, अनुशासन, साथियों का आदर और हार-जीत को देश/टीम की मानने की भावना।) - व्याकरण 1 — सर्वनाम के छह भेद (परिभाषा सहित)।
संज्ञा के स्थान पर प्रयोग किए जाने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं। (क) पुरुषवाचक — बोलने वाले, सुनने वाले या किसी अन्य के लिए (जैसे मैं, तुम, वह)। (ख) निश्चयवाचक — किसी व्यक्ति/वस्तु की ओर संकेत के लिए (जैसे उस, इसका, इतना)। (ग) अनिश्चयवाचक — किसी निश्चित व्यक्ति/वस्तु का बोध न हो (जैसे कोई, कुछ)। (घ) प्रश्नवाचक — प्रश्न करने के लिए (जैसे कौन, क्या)। (ङ) संबंधवाचक — किसी व्यक्ति/वस्तु/घटना का संबंध जोड़ने के लिए (जैसे जो, से, जिसने, जैसा, तैसा)। (च) निजवाचक — कर्ता अपने लिए प्रयोग करे (जैसे अपना, स्वयं, आप ही)। - व्याकरण 1(क) — ‘कौन खा रहा है?’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
प्रश्नवाचक सर्वनाम — ‘कौन’ प्रश्न करने के लिए आया है। - व्याकरण 1(ख) — ‘मैं अपने काम पर लौट आया।’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
निजवाचक सर्वनाम — ‘अपने’ कर्ता के अपने लिए आया है। (नोट: मोटे अक्षर वाला शब्द किताब में ‘अपने’ माना गया है; यदि शिक्षक ‘मैं’ को मोटा बताएँ, तो वह पुरुषवाचक होगा।) - व्याकरण 1(ग) — ‘यही मेरा घर है।’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
निश्चयवाचक सर्वनाम — ‘यही’ किसी निश्चित वस्तु (घर) की ओर संकेत करता है। - व्याकरण 1(घ) — ‘जैसी करनी वैसी भरनी।’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
संबंधवाचक सर्वनाम — ‘जैसी…वैसी’ दो बातों का संबंध जोड़ते हैं। - व्याकरण 1(ङ) — ‘मैं स्वयं चला जाऊँगा।’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
निजवाचक सर्वनाम — ‘स्वयं’ कर्ता के अपने लिए आया है। - व्याकरण 1(च) — ‘कुछ तो किया करो।’ में सर्वनाम का भेद बताइए।
अनिश्चयवाचक सर्वनाम — ‘कुछ’ से किसी निश्चित वस्तु/काम का बोध नहीं होता। - व्याकरण 2 — वाक्य बनाइए।
(नोट: किताब के इस प्रश्न की शब्द-सूची स्कैन में अपठनीय है, इसलिए नीचे पाठ के शब्दों से वाक्य बनाने का अभ्यास दिया गया है — किताब की सूची से मिलान करके अपने वाक्य लिखो।) पट्टी — खिलाड़ी ने पट्टी बाँधकर फिर खेलना शुरू किया। निखार — अभ्यास से उसके खेल में निखार आता गया। नौसिखिया — उस समय मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था। बार-बार — सूबेदार मेजर बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते थे। - व्याकरण 3(क) — क्रिया शब्द रेखांकित कीजिए: ‘खेल में तो यह सब चलता ही है।’
क्रिया: चलता है। - व्याकरण 3(ख) — क्रिया शब्द रेखांकित कीजिए: ‘मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था।’
क्रिया: खेला करता था। - व्याकरण 3(ग) — क्रिया शब्द रेखांकित कीजिए: ‘बाद में हम झाँसी आकर बस गए।’
क्रिया: बस गए। - व्याकरण 3(घ) — क्रिया शब्द रेखांकित कीजिए: ‘वह बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते।’
क्रिया: कहते। - व्याकरण 3(छ) — क्रिया शब्द रेखांकित कीजिए: ‘बर्लिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला।’
क्रिया: मिला। (किताब की क्रम-संख्या (क, ख, ग, घ, छ) ही रखी गई है।) - व्याकरण 4(क) — शब्दों को क्रम में सजाकर वाक्य बनाइए: नौसिखिया / उस समय / मैं एक / था / खिलाड़ी।
उस समय मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था। - व्याकरण 4(ख) — शब्दों को क्रम में सजाकर वाक्य बनाइए: आता / खेल में / मेरे / गया / निखार।
मेरे खेल में निखार आता गया। - व्याकरण 4(ग) — शब्दों को क्रम में सजाकर वाक्य बनाइए: शर्मिंदा / वह / बड़ा / हुआ / सचमुच / खिलाड़ी।
वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। - व्याकरण 4(घ) — शब्दों को क्रम में सजाकर वाक्य बनाइए: ले जाया / मैदान से / बाहर / मुझे / गया।
मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया। - कुछ करने को 1 — अखबार में रोज़ाना खेल का एक पृष्ठ आता है; जो खबर अच्छी लगे, उसे संकलित कीजिए।
(गतिविधि: अखबार के खेल-पृष्ठ से अच्छी खबरें काटकर/लिखकर एक संकलन बनाओ।) - कुछ करने को 2 — यह पाठ एक ‘संस्मरण’ है; आप भी अपना कोई संस्मरण लिखिए।
(लेखन-कार्य: अपने जीवन की कोई घटना — घटना, तुम्हारी भावना, उससे मिली सीख — संस्मरण के रूप में लिखो।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।
महत्वपूर्ण प्रश्न — प्रश्न और उत्तर (Important Questions)
नीचे दिए गए प्रश्न ‘हॉकी का जादूगर’ की समझ की जाँच के लिए हैं — उत्तर पहले बिना देखे लिखें, फिर पृष्ठ से मिलाकर सुधारें।
- ‘हॉकी का जादूगर’ का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
‘हॉकी का जादूगर’ का केंद्रीय भाव यह है कि पाठ का मुख्य संदेश उसके शीर्षक और उसके प्रसंगों के आपसी संबंध से बनता है। सार खंड में दिए गए बिंदुओं को क्रम से जोड़कर, बिना मूल पंक्तियों की नकल किए, पाँच-सात वाक्यों में लिखें — पहले विषय का परिचय, फिर दो-तीन मुख्य तर्क या प्रसंग, और अंत में पाठ की सीख। जो उत्तर इस क्रम में लिखा जाता है, वह पूरा और संतुलित लगता है। - ‘संस्मरण’ का अर्थ प्रसंग सहित समझाइए।
‘संस्मरण’ का अर्थ केवल शब्दकोश से नहीं, बल्कि ‘हॉकी का जादूगर’ के प्रसंग से समझना चाहिए। पहले इसका सामान्य अर्थ लिखें, फिर यह बताएँ कि पाठ में यह किस प्रसंग में आया है और उस प्रसंग में इसका क्या महत्त्व है। परिभाषा, प्रसंग और महत्त्व — ये तीन कड़ियाँ मिलकर ही पूरा उत्तर बनाती हैं। - ‘हॉकी का जादूगर’ से क्या सीख मिलती है? अपने जीवन से जोड़कर बताइए।
इस पाठ की सीख केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के लिए है — पाठ जो मूल्य या सिद्धांत प्रस्तुत करता है, उसे दैनिक जीवन के एक उदाहरण से जोड़कर देखें। उत्तर में पहले पाठ की सीख एक वाक्य में लिखें, फिर अपने जीवन का एक छोटा उदाहरण दें, और अंत में यह बताएँ कि उस सीख को अपनाने से क्या अंतर पड़ेगा। सीख और उदाहरण का यह जोड़ ही अच्छे उत्तर की पहचान है। - ‘हॉकी का जादूगर’ के अध्ययन में विद्यार्थी सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
सबसे बड़ी गलती है — केवल सार रट लेना, बिना प्रसंग और शब्दार्थ समझे। ऐसा विद्यार्थी प्रश्न के शब्द बदल जाने पर उत्तर नहीं बना पाता। इससे बचने के लिए प्रत्येक शब्द को प्रसंग सहित पढ़ें, प्रत्येक अनुच्छेद के बाद ‘इसने केंद्रीय भाव में क्या जोड़ा’ पूछें, और अंत में बिना देखे सार लिखकर जाँचें। समझ के साथ पढ़ा गया पाठ ही परीक्षा में काम आता है। - ‘हॉकी का जादूगर’ पर पाँच अंक का प्रश्न आए, तो उत्तर की रूपरेखा कैसी हो?
रूपरेखा इस प्रकार हो — भूमिका में एक वाक्य का परिचय, मुख्य भाग में तीन-चार बिंदु क्रम से, प्रत्येक बिंदु के साथ एक छोटा उदाहरण या परिणाम, और निष्कर्ष में एक वाक्य का संदेश। बिंदुओं को अलग-अलग पंक्तियों या अनुच्छेदों में लिखें, मुख्य शब्दों का सही प्रयोग करें, और मूल पाठ की नकल से बचें। यही रूपरेखा लंबे उत्तर को पूर्ण और पठनीय बनाती है। - ‘टीम’ जैसे मुख्य शब्दों को लंबे समय तक याद रखने की विधि क्या है?
मुख्य शब्दों को तीन के समूह में बाँटकर पढ़ें — शब्द, अर्थ और प्रसंग। प्रत्येक समूह को एक वाक्य में बाँधकर बोलकर दोहराएँ, फिर बिना देखे लिखें। अगले दिन फिर से बिना देखे लिखकर जाँचें। जो शब्द छूट जाए, उसे फिर से प्रसंग सहित पढ़ें। बोलना, लिखना और अगले दिन दोहराना — यही तीन चरण किसी भी शब्द को स्थायी बनाते हैं। - ‘हॉकी का जादूगर’ को पढ़ने के बाद स्वयं से कौन-से तीन प्रश्न पूछने चाहिए?
पहला — इस पाठ का केंद्रीय भाव एक वाक्य में क्या है? दूसरा — मुख्य शब्दों का प्रसंग सहित अर्थ क्या है? तीसरा — इस पाठ की सीख मेरे जीवन में कहाँ काम आएगी? यदि इन तीनों प्रश्नों के उत्तर बिना पुस्तक देखे दिए जा सकें, तो पाठ तैयार है। यदि कोई उत्तर अटके, तो उसी अंश को दोबारा पढ़ें। - ‘हॉकी का जादूगर’ के उत्तर में मूल पाठ की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि परीक्षक समझ की जाँच करता है, याददाश्त की नकल की नहीं। मूल पंक्तियों की नकल से यह पता नहीं चलता कि विद्यार्थी ने भाव समझा है या नहीं। अपने शब्दों में लिखा गया उत्तर, भले ही सरल हो, यह सिद्ध करता है कि भाव समझ में आ गया है। इसीलिए सार और उत्तर हमेशा अपनी भाषा में लिखें, मुख्य शब्दों को छोड़कर।

