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Chapter 2: असली चित्र

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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असली चित्र — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6)  |  अध्याय 2  |  प्रकार: कहानी  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

असली चित्र के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): अपने चित्र पर काम करता एक चित्रकार। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

असली चित्र के लिए चित्र

दो चित्रों को ध्यान से देखता एक बच्चा — असली और नकली को परखने का एक सामान्य चित्र।

अध्याय का सार

राजा कृष्णदेव राय के राज्य में एक महाकंजूस सेठ रहता था। उसके पास अपार धन था, लेकिन एक कौड़ी खर्च करने में उसकी जान निकलती थी — अर्थात् वह पैसे खर्च करने से बहुत कतराता था। एक बार उसके मित्रों ने उसे एक कलाकार से अपना चित्र बनवाने के लिए राजी कर लिया। सेठ मान तो गया, पर जब चित्रकार चित्र बनाकर लाया, तो उसका मूल्य — सौ स्वर्ण मुद्राएँ — देने की उसकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी।

सेठ की एक और खासियत थी: वह अपने चेहरे की आकृति बदलने में माहिर था। चित्रकार के आते ही वह कमरे में जाता और कुछ ही देर में बदला हुआ चेहरा लेकर आ जाता। फिर कहता कि चित्र उसके चेहरे से मिलता ही नहीं, इसलिए यह उसके किस काम का — जब ठीक चेहरे से मिलता हुआ चित्र बनेगा, तभी कीमत देगा। चित्रकार निराश लौट जाता, नया चित्र बनाता, और सेठ फिर चेहरा बदल लेता। कई दिनों तक यही हुआ: चित्रकार मेहनत करता रहा और हर बार उसे निराशा हाथ लगती रही।

कई दिनों के अनुभव से चित्रकार सेठ की चाल भी समझ गया और उसकी कंजूसी भी जान गया। वह अपनी मेहनत को बेकार नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए उसने तेनालीराम से मिलने का फैसला किया और अपनी समस्या रखकर समाधान माँगा। तेनालीराम ने सलाह दी: कल कंजूस के पास एक आईना लेकर जाओ और कहो कि आज उसका बिल्कुल सही चित्र लेकर आए हो — रत्तीभर भी फर्क नहीं मिलेगा। चित्रकार ने वैसा ही किया। सेठ झुंझलाकर बोला कि यह चित्र कहाँ है, यह तो आईना है। चित्रकार ने जवाब दिया कि आईने के सिवा उसकी असली सूरत और कौन बना सकता है — और जल्दी से उसके चित्रों की कीमत एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ निकालें। सेठ समझ गया कि यह बुद्धि और सूझ-बूझ तेनालीराम की ही हो सकती है, और उसने बिना देर किए एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ चित्रकार को दे दीं। अगले दिन तेनालीराम ने यह घटना राजा कृष्णदेव राय को सुनाई, तो वे हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। कहानी का शीर्षक ‘असली चित्र’ इसीलिए है कि आईना ही असली सूरत दिखाता है — और कंजूसी का जवाब सूझ-बूझ से दिया गया।

तुम्हें क्या सीखना चाहिए

इस कहानी से कहानी का क्रम सीखो — सेठ की कंजूसी, चेहरा बदलने की चाल, चित्रकार की मेहनत और निराशा, तेनालीराम की सलाह, आईने वाली युक्ति और एक हजार स्वर्ण मुद्राओं वाला अंत। शब्दार्थ याद रखो (अपार, स्वर्ण, अदा करना, भौंचक, कारस्तानी, हश्र, राजी), संज्ञा के भेद छाँटना सीखो, मुहावरों का वाक्य-प्रयोग करो और ‘जैसे को तैसा’ कहावत का अर्थ समझो।

मुख्य शब्द

  • अपार — बहुत, अधिक; जिसका पार न हो
  • राजी — मानना; किसी बात के लिए तैयार होना
  • स्वर्ण — सोना (धातु); स्वर्ण मुद्रा = सोने का सिक्का
  • अदा करना — चुकाना; कीमत देना
  • भौंचक — आश्चर्यचकित; हक्का-बक्का
  • कारस्तानी — करतूत, कर्म; चालबाज़ी भरा काम
  • हश्र — परिणाम; अंत में जो हुआ
  • कंजूस — जो धन खर्च करने से बहुत कतराता हो
  • जैसे को तैसा — जैसा व्यवहार कोई करे, वैसा ही जवाब देना

याद रखें

  • राजा कृष्णदेव राय के राज्य का कंजूस सेठ; चित्र की तय कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएँ थी।
  • सेठ चेहरा बदलने में माहिर था — हर बार चित्र लाने पर वह नया चेहरा बना लेता था।
  • चित्रकार कई दिनों तक नए-नए चित्र बनाता रहा और हर बार निराश लौटा।
  • तेनालीराम की सलाह: आईना लेकर जाओ और कहो कि यही बिल्कुल सही चित्र है।
  • आईने पर सेठ झुंझलाया; चित्रकार ने एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ माँगीं और सेठ ने दे दीं।
  • राजा कृष्णदेव राय यह घटना सुनकर हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।
  • सीख: कंजूसी और चालबाज़ी का जवाब सूझ-बूझ और बुद्धि से दिया जा सकता है; मेहनत बेकार नहीं जानी चाहिए।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: सौ और एक हजार स्वर्ण मुद्राओं को आपस में मिला देना — तय कीमत सौ थी, अंत में मिली एक हजार (सभी चित्रों की कीमत के रूप में माँगी गई)। दूसरी गलती: यह लिख देना कि सेठ ने चित्र इसलिए नहीं लिया क्योंकि चित्र खराब था — असली कारण उसकी कंजूसी और चेहरा बदलने की चाल थी। तीसरी गलती: आईने वाली युक्ति को चित्रकार की अपनी सूझ बताना — यह सलाह तेनालीराम की थी। चौथी गलती: संज्ञा छाँटते समय व्यक्तिवाचक और जातिवाचक को मिला देना — कृष्णदेव राय, तेनालीराम, हिमालय व्यक्तिवाचक हैं; चित्रकार, लोग, गाय जातिवाचक हैं।

सारणी / चार्ट: कहानी की घटनाएँ क्रम से

क्रमघटनापरिणाम
1मित्रों ने कंजूस सेठ को चित्र बनवाने के लिए राजी कियासेठ मान गया, पर सौ स्वर्ण मुद्राएँ देने की हिम्मत नहीं हुई
2सेठ ने चेहरा बदलने की चाल चलीहर चित्र ‘चेहरे से न मिलने’ के बहाने ठुकरा दिया गया
3चित्रकार कई दिनों तक नए चित्र बनाता रहाहर बार निराशा; पर वह सेठ की चाल समझ गया
4चित्रकार ने तेनालीराम से सलाह लीआईना लेकर जाने की युक्ति मिली
5आईना सेठ के सामने रखा गयासेठ झुंझलाया — ‘यह तो आईना है!’
6चित्रकार ने एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ माँगींसेठ ने बिना देर किए दे दीं; राजा सुनकर लोट-पोट हो गए

अभ्यास — खुद करके देखो

  1. सेठ चित्रकार को कीमत क्यों नहीं देना चाहता था? दो कारण लिखो।
    संकेत: कंजूसी और चेहरा बदलने की चाल — दोनों सोचो।
  2. ‘एक कौड़ी खर्च करने में उसकी जान निकलती थी’ — इस वाक्य का आशय अपने शब्दों में लिखो।
    संकेत: यह मुहावरेदार वर्णन है; सीधा अर्थ नहीं, भाव लिखो।
  3. तेनालीराम की सलाह क्या थी? वह क्यों कारगर हुई?
    संकेत: आईना और असली सूरत का संबंध सोचो।
  4. कहानी का शीर्षक ‘असली चित्र’ क्यों रखा गया है? अपना मत लिखो।
    संकेत: चित्र, चेहरा और आईना — तीनों में ‘असली’ कौन है?
  5. चित्रकार की जगह तुम होते तो क्या करते? दो उपाय लिखो।
    संकेत: अपने अनुभव से जोड़कर लिखो; झगड़ा और सूझ-बूझ में अंतर सोचो।

प्रश्नोत्तर

  1. कंजूस सेठ कौन था और उसकी क्या विशेषता थी?
    राजा कृष्णदेव राय के राज्य में रहने वाला एक सेठ, जिसके पास अपार धन था, लेकिन वह एक कौड़ी खर्च करने में भी कतराता था। वह अपने चेहरे की आकृति बदलने में भी माहिर था — यही दोनों बातें कहानी की घटनाओं की जड़ हैं।
  2. चित्रकार को बार-बार निराशा क्यों हाथ लगी?
    क्योंकि सेठ हर बार चित्र लाने पर अपना चेहरा बदल लेता था और कहता था कि चित्र उसके चेहरे से मिलता ही नहीं। चित्र में कोई कमी नहीं थी; कमी सेठ की चाल में थी, इसलिए चित्रकार की मेहनत हर बार बेकार जाती दिखी।
  3. चित्रकार ने तेनालीराम से मिलने का फैसला क्यों लिया?
    क्योंकि कई दिनों के अनुभव से वह सेठ की चाल और कंजूसी समझ चुका था, पर अपनी मेहनत को बेकार नहीं जाने देना चाहता था। कंजूस सेठ से पार पाने का उपाय सोचने के लिए उसने तेनालीराम से मिलने और सलाह लेने का फैसला किया।
  4. आईने वाली युक्ति ने कैसे काम किया?
    आईना सदा असली सूरत दिखाता है — चेहरा कितना भी बदला जाए, आईने में वही दिखेगा जो सामने है। इसलिए सेठ ‘चित्र मिलता नहीं’ का बहाना नहीं चला सका। चित्रकार ने कहा कि आईने के सिवा उसकी असली सूरत और कौन बना सकता है, और एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ माँगीं — सेठ को समझ आ गया कि यह तेनालीराम की सूझ है, और उसने पैसे दे दिए।
  5. इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
    सीख यह है कि कंजूसी और चालबाज़ी से काम नहीं चलता, और मेहनत का मूल्य सूझ-बूझ से वसूला जा सकता है। ‘जैसे को तैसा’ का अर्थ यह नहीं कि झगड़ा किया जाए, बल्कि यह कि चाल का जवाब बुद्धि से दिया जाए — और कठिनाई में समझदार व्यक्ति से सलाह लेना चाहिए।

किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर

किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।

  1. पाठ से 1 — यह कहानी आपको कैसी लगी? इस संदर्भ में अपने विचार लिखिए।
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: कहानी मनोरंजक लगी क्योंकि कंजूस की चाल और आईने वाली युक्ति दोनों मज़ेदार हैं; या सीख भरी लगी क्योंकि इसमें सूझ-बूझ की जीत दिखाई गई है। कारण के साथ अपना मत लिखो।)
  2. पाठ से 2 — इस कहानी का कौन-सा पात्र अच्छा लगा और क्यों?
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: तेनालीराम, क्योंकि उसने बिना झगड़े के सूझ-बूझ से समस्या सुलझाई; या चित्रकार, क्योंकि उसने मेहनत नहीं छोड़ी और सलाह लेकर अपना हक़ लिया। पात्र और कारण दोनों लिखो।)
  3. पाठ से 3 — चित्रकार ने तेनालीराम से मिलने का फैसला क्यों लिया?
    क्योंकि वह कई दिनों की मेहनत के बाद सेठ की चाल समझ चुका था, पर अकेले उससे पार नहीं पा रहा था। वह अपनी मेहनत को बेकार नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए उसने तेनालीराम से मिलकर समस्या रखी और समाधान की प्रार्थना की।
  4. पाठ से 4 — ‘एक कौड़ी खर्च करने में उसकी जान निकलती थी।’ इस वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।
    आशय यह है कि सेठ अत्यंत कंजूस था — उसके पास अपार धन था, फिर भी छोटी-सी रकम खर्च करना भी उसे बहुत भारी लगता था, जैसे जान निकल रही हो। यह वाक्य उसकी कंजूसी की पराकाष्ठा को मुहावरेदार ढंग से बताता है; इसका सीधा अर्थ जान निकलना नहीं है।
  5. पाठ से 5 — रिक्त स्थान भरिए।
    (क) कंजूस सेठ ने चित्रकार से सौ स्वर्ण मुद्राएँ देने का वादा किया। (ग) चित्रकार ने तेनालीराम से सलाह ली। (नोट: किताब के इस प्रश्न के (ख) और (घ) भाग स्कैन में अस्पष्ट हैं, इसलिए वे यहाँ अनुमान से नहीं भरे गए हैं — किताब से मिलान करके लिखो।)
  6. पाठ से 6 — चित्रकार ने सेठ को चित्र की जगह आईना क्यों दिखाया?
    (ग) वह सेठ के साथ ‘जैसे को तैसा’ कहावत चरितार्थ कर रहा था — सेठ चेहरा बदलकर चित्र को झूठा बता रहा था, तो चित्रकार ने आईना दिखाकर ऐसा ‘चित्र’ दिया जिसे झूठा बताया ही नहीं जा सकता था। इसी से (घ) भी पूरा हुआ — उसे अपना पारिश्रमिक (एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ) मिल गया। (क) और (ख) सही नहीं हैं: वह सेठ को मूर्ख नहीं समझता था, और वह सही चित्र बना सकता था — समस्या चित्र में नहीं, सेठ की चाल में थी।
  7. पाठ से आगे 1 — चित्रकार की जगह आप होते तो क्या करते?
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: पहले सेठ से साफ़ बात करता, तय कीमत पहले लेता, या किसी समझदार व्यक्ति से सलाह लेता। अपने उपाय और उसका कारण लिखो।)
  8. पाठ से आगे 2 — गप्प लगाने से नुकसान ज़्यादा होता है या फायदा? पाँच वाक्यों में लिखिए।
    (अपना उत्तर पाँच वाक्यों में लिखो — जैसे: गप्प से समय बरबाद होता है, काम अधूरा रहता है, भरोसा टूटता है; कभी-कभी मनोरंजन होता है, पर नुकसान ज़्यादा होता है। अपना मत कारणों सहित लिखो।)
  9. पाठ से आगे 3 — बार-बार चेहरा बदल लेने के बाद चित्रकार को सलाह किसने दी? दी गई सलाह का क्या परिणाम हुआ?
    सलाह तेनालीराम ने दी — आईना लेकर जाने की। परिणाम यह हुआ कि सेठ का बहाना खत्म हो गया, चित्रकार को एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ मिलीं, और राजा कृष्णदेव राय घटना सुनकर हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए।
  10. पाठ से आगे 4 — क्या इस कहानी का कोई और शीर्षक हो सकता है? यदि हाँ, तो क्या?
    (अपना उत्तर लिखो — जैसे: ‘आईना और कंजूस’, ‘तेनालीराम की सूझ’ या ‘चेहरा बदलने वाला सेठ’ — और बताओ कि तुम्हारा शीर्षक कहानी के किस पक्ष को दिखाता है।)
  11. व्याकरण 1 — बॉक्स के शब्दों को संज्ञा के भेदों में छाँटिए: कृष्णदेव राय, चित्रकार, तेनालीराम, पानी, आईना, लोग, कंजूसी, दूध, ईमानदारी, गाय, वर्ग, चीनी, हिमालय, मेला।
    व्यक्तिवाचक — कृष्णदेव राय, तेनालीराम, हिमालय (किसी विशेष व्यक्ति/स्थान का नाम)। जातिवाचक — चित्रकार, आईना, लोग, गाय (पूरी जाति/वर्ग का बोध)। भाववाचक — कंजूसी, ईमानदारी (गुण/भाव का बोध)। द्रव्यवाचक — पानी, दूध, चीनी (द्रव्य/पदार्थ का बोध)। समूहवाचक — वर्ग, मेला (समूह का बोध)। (नोट: किताब की सूची में ‘गाय’ दो बार छपी दिखती है; यहाँ उसे एक बार गिना गया है।)
  12. व्याकरण 2 — मुहावरों का वाक्य-प्रयोग कीजिए।
    पानी-पानी होना — झूठ पकड़े जाने पर वह सबके सामने पानी-पानी हो गया। काम चाँदी होना — सलाह मानते ही चित्रकार का काम चाँदी हो गया। हँसते-हँसते लोट-पोट होना — आईने वाली बात सुनकर राजा हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए। हिम्मत हारना — बार-बार निराशा मिलने पर भी चित्रकार ने हिम्मत नहीं हारी। भौंचक रह जाना — नया चेहरा देखकर चित्रकार भौंचक रह गया।
  13. व्याकरण 3 — विपरीतार्थक शब्द लिखिए।
    नया — पुराना; निराशा — आशा; समझ — नासमझी; देर — जल्दी; सही — गलत।
  14. व्याकरण 4 — निम्न शब्दों से वाक्य बनाइए: चित्रकार, पत्रकार, कलाकार, सलाहकार, नाटककार।
    चित्रकार — चित्रकार ने सेठ का सुंदर चित्र बनाया। पत्रकार — पत्रकार ने गाँव की समस्या पर समाचार लिखा। कलाकार — कलाकार ने मंच पर सुंदर नृत्य प्रस्तुत किया। सलाहकार — तेनालीराम चित्रकार के सलाहकार बने। नाटककार — नाटककार ने इस कहानी पर एक छोटा नाटक लिखा।
  15. कुछ करने को 1 — तेनालीराम की तरह बीरबल और गोनू झा के किस्से भी प्रचलित हैं; कक्षा में वैसे किस्से सुनाइए।
    (गतिविधि: बीरबल या गोनू झा का कोई किस्सा याद करके, उसके पात्र और सूझ-बूझ वाली युक्ति के साथ, कक्षा में सुनाओ।)
  16. कुछ करने को 2 — इस कहानी को एकांकी के रूप में कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
    (गतिविधि: सेठ, चित्रकार, तेनालीराम और राजा के पात्र बाँटकर, आईने वाले दृश्य सहित, कहानी का एकांकी तैयार करके कक्षा में प्रस्तुत करो।)

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