Chapter 19: बसंती हवा
Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 6 • Hindi • Book: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
बसंती हवा — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में
पुस्तक: Kislay Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 6) | अध्याय 19 | प्रकार: कविता | माध्यम: हिंदी
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चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): वसंत में खिला खेत और पेड़। यह एक सामान्य चित्र है, किताब का दृश्य नहीं।

वसंत के बगीचे में खेलते बच्चे — उमंग का एक सामान्य चित्र।
अध्याय का सार
यह कविता केदारनाथ अग्रवाल की है। इसमें बसंती हवा स्वयं अपना परिचय देती है — ‘हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।’ कविता का हर पद इसी टेक-पंक्ति पर समाप्त होता है। बसंती हवा बावली, मस्तमौला, बेफ़िक्र और निडर है — वह जिधर चाहती है, उधर घूमती है।
पहला पद — आत्म-परिचय: ‘सुनो बात मेरी — अनोखी हवा हूँ, बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला, नहीं कुछ फ़िकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ।’ बसंती हवा कहती है कि वह अनोखी है — पगली-सी, आज़ादी पसंद करने वाली, बिना किसी फ़िकर के, बड़ी निडर।
दूसरा पद — अजब मुसाफ़िर: ‘मुसाफ़िर अजब हूँ, न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी, न दुश्मन।’ आम मुसाफ़िर का घर होता है, उद्देश्य होता है, इच्छाएँ और आशाएँ होती हैं — बसंती हवा का इनमें से कुछ नहीं है; इसीलिए वह दूसरे मुसाफ़िरों से अलग है।
तीसरा पद — यात्रा: ‘जहाँ से चली मैं, जहाँ को गई मैं, शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर — झुलती चली मैं, झुमती चली मैं।’ हवा शहर से गाँव तक, बस्ती से नदी तक, रेत और सुनसान जगहों तक, हरे खेतों और पोखरों तक — हर जगह झूलती-झूमती चलती है।
चौथा पद — पेड़ों और खेतों में खेल: वह महुए के पेड़ पर चढ़ी, थपाथप मचाया, धम्म से गिरी, फिर आम के ऊपर चढ़ी, उसे भी झकोरा, कान में ‘कू’ किया; उतरकर भागी, हरे खेत पहुँची — वहाँ गेहूँओं में लहर खूब मारी, पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही।
पाँचवाँ पद — अलसी: खड़ी देख अलसी, लिए शीश कलसी — अलसी का पौधा ऐसा लगता है, मानो कोई स्त्री सिर पर कलसी (घड़ा) लिए खड़ी हो। हवा ने उसे खूब हिलाया-डुलाया, पर कलसी गिरी नहीं। (सरसों वाली पंक्ति स्कैन में अस्पष्ट है; उसका सार यहाँ नहीं दिया गया है।)
छठा पद — अरहरी, पथिक और हँसी: मुझे देखते ही अरहरी लजाई, बनाया-मनाया, न मानी, न मानी, उसे भी न छोड़ा; पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला; हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ, हँसे लहलहाते, हरे खेत सारे, हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी, बसंती हवा में, हँसी सृष्टि सारी। हवा की हँसी से दिशाएँ, खेत, धूप — सारी सृष्टि हँस पड़ती है। यही खेत-खलिहानों के हँसने का अर्थ है — हवा के चलते प्रकृति में आनंद और उल्लास छा जाता है।
तुम्हें क्या सीखना चाहिए
इस कविता से सीखो — बसंती हवा का आत्म-परिचय (बावली, मस्तमौला, निडर, बेफ़िक्र); दूसरे मुसाफ़िरों से अंतर (न घर-बार, न उद्देश्य, न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन); यात्रा का क्रम (शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर); खेल-प्रसंग (महुआ, आम, गेहूँ के खेत, अलसी, अरहरी, पथिक); और अंत की हँसी (दिशाएँ, खेत, धूप, सारी सृष्टि)। शब्दार्थ याद रखो (बावली–पगली, मस्तमौला–आज़ादी पसंद करने वाला, मुसाफ़िर–यात्री, निर्जन–सुनसान, सृष्टि–संसार, शीश–सिर, कलसी–घड़ा, पथिक–राही, अलसी–तीसी) और विशेषण तथा योजक-चिह्न वाले शब्द सीखो।
मुख्य शब्द
- बावली — पगली
- मस्तमौला — आज़ादी पसंद करने वाला
- मुसाफ़िर — यात्री
- निर्जन — सुनसान
- सृष्टि — संसार
- शीश — माथा, सिर
- कलसी — घड़ा, गगरी
- पथिक — यात्री, राही
- अलसी — तीसी, एक प्रकार का छोटा पौधा जिसके बीज से तेल निकलता है
- मानवीकरण — निर्जीव/प्रकृति पर मानवीय भाव चढ़ाना (जैसे हवा का हँसना, अलसी का लजाना)
याद रखें
- पाठ: ‘बसंती हवा’; कवि: केदारनाथ अग्रवाल; टेक-पंक्ति: ‘हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।’
- हवा का स्वभाव: अनोखी, बड़ी बावली, बड़ी मस्तमौला, बेफ़िक्र, बड़ी निडर — जिधर चाहती है, उधर घूमती है।
- अजब मुसाफ़िर: न घर-बार, न उद्देश्य, न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन — इसीलिए दूसरे मुसाफ़िरों से अलग।
- यात्रा: शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर — झुलती-झूमती चलती है।
- खेल: महुआ (थपाथप), आम (झकोरा, कान में ‘कू’), गेहूँ के खेत (लहर, अनेकों पहर), अलसी (शीश पर कलसी, हिलाने पर भी न गिरी), अरहरी (लजाई, मनाने पर भी न मानी), पथिक (उसी पर ढकेला)।
- अंत: हवा की हँसी से दिशाएँ, हरे खेत, चमचमाती धूप — सारी सृष्टि हँस पड़ती है।
- व्याकरण: विशेषण — अनोखी, बड़ी, मस्तमौला, निडर; योजक-चिह्न वाले शब्द — घर-बार, दिन-रात आदि।
परीक्षा टिप / सामान्य गलती
सामान्य गलती: बसंती हवा को ‘साधारण हवा’ लिखना — वह अजब मुसाफ़िर है: न घर-बार, न उद्देश्य, न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन। दूसरी गलती: अलसी-कलसी की सुंदरता को केवल ‘घड़ा’ लिखना — सुंदरता मानवीकरण में है: अलसी ऐसी लगती है, मानो कोई स्त्री सिर पर कलसी लिए खड़ी हो। तीसरी गलती: कवि का नाम गलत लिखना — कवि केदारनाथ अग्रवाल हैं। चौथी गलती: खेतों के हँसने को सचमुच की हँसी समझना — यह मानवीकरण है: हवा के चलते खेत लहलहाते हैं, धूप चमचमाती है, प्रकृति उल्लास से भर जाती है।
सारणी / चार्ट: बसंती हवा की यात्रा — क्रम से
| क्रम | स्थान/पात्र | हवा ने क्या किया |
|---|---|---|
| 1 | शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर | झुलती-झूमती चली |
| 2 | महुए का पेड़ | चढ़ी, थपाथप मचाया, धम्म से गिरी |
| 3 | आम का पेड़ | चढ़ी, झकोरा, कान में ‘कू’ किया |
| 4 | गेहूँ के हरे खेत | लहर खूब मारी, अनेकों पहर तक रही |
| 5 | अलसी | शीश पर कलसी लिए खड़ी देखी; हिलाया-डुलाया, कलसी गिरी नहीं |
| 6 | अरहरी | देखते ही लजाई; मनाया, न मानी; उसे भी न छोड़ा |
| 7 | पथिक | आ रहे पथिक पर ढकेला; ज़ोर से हँसी — दिशाएँ, खेत, धूप, सारी सृष्टि हँस पड़ी |
अभ्यास — खुद करके देखो
- बसंती हवा का आत्म-परिचय अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: बावली, मस्तमौला, निडर, बेफ़िक्र — इन चारों बातों को जोड़ो। - महुआ, आम और गेहूँ के खेत — तीनों प्रसंगों को क्रम से लिखो।
संकेत: थपाथप, झकोरा, लहर — हर प्रसंग की एक पहचान याद करो। - अरहरी और पथिक के प्रसंगों को अपने शब्दों में लिखो।
संकेत: अरहरी क्यों लजाई? पथिक के साथ क्या हुआ? — दोनों सोचो। - वसंत का आगमन कब होता है? इस ऋतु में तुम कैसा अनुभव करते हो? अपनी भाषा में लिखो।
संकेत: मौसम, फूल, खेत, हवा — अपने अनुभव से जोड़ो। - वायु को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाने चाहिए? चर्चा करके लिखो।
संकेत: पेड़ लगाना, धुआँ कम करना, सफ़ाई — अपने सुझाव सोचो।
प्रश्नोत्तर
- बसंती हवा कैसी है? उसका आत्म-परिचय लिखो।
बसंती हवा अनोखी है — बड़ी बावली (पगली-सी), बड़ी मस्तमौला (आज़ादी पसंद करने वाली), बिना किसी फ़िकर के, बड़ी निडर। वह जिधर चाहती है, उधर घूमती है। उसका टेक-पद है — ‘हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।’ - बसंती हवा ने अपने आपको दूसरे मुसाफ़िरों से अलग क्यों बताया?
क्योंकि आम मुसाफ़िर का घर-बार होता है, उद्देश्य होता है, इच्छाएँ और आशाएँ होती हैं, प्रेमी और दुश्मन होते हैं — पर बसंती हवा का इनमें से कुछ नहीं है। वह अजब मुसाफ़िर है — न घर-बार, न उद्देश्य, न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन। इसीलिए वह दूसरे मुसाफ़िरों से अलग है। - बसंती हवा कहाँ-कहाँ गई और उसने क्या-क्या किया?
वह शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर — हर जगह झुलती-झूमती गई। महुए पर चढ़कर थपाथप मचाया, आम को झकोरा और कान में ‘कू’ किया, गेहूँ के खेतों में अनेकों पहर तक लहर मारी, अलसी को शीश पर कलसी लिए खड़ी देखा और हिलाया-डुलाया, अरहरी को लजाते देखा और मनाया, पथिक पर ढकेला — और अंत में ज़ोर से हँसी, जिससे दिशाएँ, खेत, धूप, सारी सृष्टि हँस पड़ी। - इस पाठ में खेत-खलिहानों के हँसने की बात कही गई है। ऐसा क्यों?
क्योंकि यह मानवीकरण है — हवा के चलते हरे खेत लहलहाते हैं, धूप चमचमाती है, दिशाएँ उल्लास से भर जाती हैं। कवि ने प्रकृति के इस आनंद को ‘हँसी’ कहा है — हवा की हँसी से सारी सृष्टि हँस पड़ती है। - ‘खड़ी देख अलसी, लिए शीश कलसी’ की सुंदरता को स्पष्ट कीजिए।
सुंदरता मानवीकरण और चित्रात्मकता में है — अलसी का पौधा ऐसा लगता है, मानो कोई स्त्री सिर पर कलसी (घड़ा) लिए खड़ी हो। हवा ने उसे खूब हिलाया-डुलाया, फिर भी कलसी गिरी नहीं — यह संतुलन और शोभा का चित्र है। अलसी को स्त्री-सा रूप देना ही इस पंक्ति की सुंदरता है।
किताब के अभ्यास — विस्तार सहित प्रश्नोत्तर
किताब के ‘प्रश्न-अभ्यास’ खंड से, EG के अपने शब्दों में उत्तर। व्यक्तिगत प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभव से लिखने हैं।
- पाठ से 1 — बसंती हवा ने अपने आपको दूसरे मुसाफ़िरों से अलग क्यों बताया?
क्योंकि उसका न घर-बार है, न उद्देश्य, न इच्छा, न आशा, न प्रेमी, न दुश्मन — आम मुसाफ़िर के ये सब होते हैं। - पाठ से 2 — इस पाठ में खेत-खलिहानों के हँसने की बात कही गई है। ऐसा क्यों?
क्योंकि हवा के चलते खेत लहलहाते हैं, धूप चमचमाती है, प्रकृति उल्लास से भर जाती है — कवि ने इस आनंद को मानवीकरण से ‘हँसी’ कहा है। - पाठ से 3 — ‘बसंती हवा’ का कौन-सा अंश आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है और क्यों?
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: मुझे अलसी-कलसी वाला अंश सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है, क्योंकि उसमें अलसी स्त्री-सी लगती है; या अंत की हँसी वाला अंश, क्योंकि उसमें सारी सृष्टि हँस पड़ती है।) - पाठ से 4 — ‘खड़ी देख अलसी, लिए शीश कलसी’ की सुंदरता को स्पष्ट कीजिए।
मानवीकरण की सुंदरता — अलसी सिर पर कलसी लिए स्त्री-सी लगती है; हिलाने पर भी कलसी नहीं गिरती। - पाठ से आगे 1 — वसंत का आगमन कब होता है? इस ऋतु में आप कैसा अनुभव करते हैं? अपनी भाषा में लिखिए।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: वसंत माघ-फाल्गुन में आता है; इस ऋतु में मौसम सुहावना लगता है, फूल खिलते हैं, खेत हरे होते हैं, मन प्रसन्न रहता है।) - पाठ से आगे 2 — इस पाठ को पढ़ने के बाद हवा के प्रति आपके मन में किस प्रकार के भाव उठते हैं? लिखिए।
(अपना उत्तर लिखो — जैसे: हवा अब मुझे मस्तमौला, निडर और आनंद देने वाली लगती है; उसके बिना प्रकृति सूनी लगती है।) - पाठ से आगे 3 — सरस्वती पूजा को वसंत पंचमी के नाम से भी जानते हैं। सरस्वती पूजा पर एक निबंध लिखिए।
(गतिविधि: सरस्वती पूजा (वसंत पंचमी) पर निबंध लिखो — पूजा की विधि, महत्त्व, अपने अनुभव।) - व्याकरण 1 — नीचे दिए गए पद्यांश में विशेषण शब्दों को रेखांकित कीजिए।
अनोखी (हवा), बड़ी (बावली), बड़ी (मस्तमौला), बड़ी (निडर) — विशेषण: अनोखी, बड़ी, मस्तमौला, निडर। (पंक्तियाँ: ‘अनोखी हवा हूँ, बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला, नहीं कुछ फ़िकर है, बड़ी ही निडर हूँ।’) - व्याकरण 2 — योजक चिह्न (-) वाले शब्द लिखिए।
पाठ से: घर-बार। किताब का उदाहरण: दिन-रात। अन्य उदाहरण: सुख-दुःख, आना-जाना, छोटा-बड़ा, हँसी-खुशी। योजक चिह्न दर्शाता है कि इसके दोनों ओर के शब्द परस्पर मिले हुए हैं। - कुछ करने को 1 — ऋतु से संबंधित कोई कविता अपनी कक्षा में सुनाइए।
(गतिविधि: किसी ऋतु — वसंत, वर्षा, शरद — से संबंधित कविता कक्षा में सुनाओ।) - कुछ करने को 2 — आप किन-किन चिड़ियों को आवाज़ से पहचान सकते हैं? उनकी बोली के साथ सूची बनाइए।
(गतिविधि: चिड़ियों — जैसे कोयल (कू-कू), कौआ (काँव-काँव), मोर (म्याऊँ) — की सूची उनकी बोली के साथ बनाओ।) - कुछ करने को 3 — वायु को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाने चाहिए? कक्षा में अपने साथियों से चर्चा कीजिए।
(गतिविधि: साथियों से चर्चा करो — पेड़ लगाना, वाहनों का धुआँ कम करना, कूड़ा न जलाना, सफ़ाई — और अपने सुझाव लिखो।)
इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में बोलें, फिर बिना देखे अभ्यास करके देखें। प्रश्नोत्तर से अपने आप को जाँचें। अपने उत्तर शिक्षक या माता-पिता से जाँचवाएँ।

